हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

~ हाइकु मञ्जूषा फरवरी 2018 के चयनित हाइकु ~

हाइकु मञ्जूषा

फरवरी - 2018 के चयनित हाइकु
{ श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन }
संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", एवं "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" समूह से साभार । )


01.
सुरम्य शोभा
जगत सुरभित
भोर की आभा ।

✍पूर्णिमा सरोज

02.
बसन्त दूत
बौर देख करती
कुहू का शोर ।

✍सविता बरई

03.
लगा ग्रहण
उम्मीदों ने निखारा
चमका चाँद ।

✍रामेश्वर बंग

04.
देवदास सा
झूमता समीर है
पी मकरंद ।

✍के.के.वर्मा

05.
चहके पंछी
सागर लहराया
रवि उदित ।

✍रति चौबे

06.
रंगीला फाग
नाचती तितलियाँ
कूकता बाग ।

✍ऋतुराज दवे

07.
अमिया डाल
गाती कोयल काली,
विरह गीत ।

✍पूनम मिश्रा

08.
निखर उठा
काले उबटन से
शशि सलोना ।

✍रति चौबे

09.
रौशन देश
दीपक फिर बुझा
सरहद में ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

10.
शूल के पथ
कर्म करता चल
होगा सफल ।

✍रामेश्वर बंग

11.
बेटी बिदाई
बहे अश्रु की धारा
आँगन सूना ।

✍सविता बरई

12.
रवि आरोही
चल पड़ा है छूने
नभ-शिखर ।

✍सुधा राठौर

13.
राह भटकी
भू खनन से रोती
त्रस्त नदियाँ ।

✍वीणा शर्मा

14.
डंडे की चोट
बंदर का नाचना
है मजबूरी ।

✍क्रान्ति

15.
यादें सुहानी
जिंदगी की कहानी
करती बयां ।

✍क्रान्ति

16.
चंद्र साम्राज्य
तारे खिलखिलाते
मुस्काती निशा ।

✍रति चौबे

17.
चाँदी के बूटे
रजनी की चूनर
तारों ने टाँके ।

✍सुधा राठौर

18.
निभा कर्तव्य
चमके भाग्य रेखा
स्वर्णिम कल ।

✍रामेश्वर बंग

19.
मन उलझा
अनसुलझा रहा
कैसे सुलझे ?

✍वृन्दा पंचभाई

20.
बेटी पढ़ती
सदा आगे बढ़ती
राह गढ़ती ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

21.
चाँद मुस्काया
आकाश में बिखरी
चाँदनी छटा ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

22.
साथ चलते
नदी के दो किनारे
पर न मिले ।

✍वृंदा पंच भाई

23.
मीत बनाएँ
कटुता मिटा कर
प्रीत बढ़ाएं ।

✍परमेश्वर अंचल

24.
रख उर में
मधु मधुर रस
महके रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

25.
चिंतन पथ
व्यथित भावनाएं
कथित सत्य ।

✍अविनाश बागड़े

26.
चुग रहे हैं
हवाओं के पखेरू
धूप की उष्मा ।

✍सुधा राठौर

27.
बाल की खाल
बनी ढोल न ढाल
कैसा कमाल ।

✍गंगा पाण्डेय भावुक

28.
सूरज हँसा
किरणे मुस्कुराई
भोर मुखर ।

✍अविनाश बागड़े

29.
अबला नारी
ना कह सकी पीर
दुःख की मारी ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

30.
धरा की छाती
फाड़ता है किसान
उगाता अन्न ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

31.
चने के खेत
चुग रही है धूप
ओस के हीरे ।

✍मंजु शर्मा

32.
उम्र की शाख़
झरने लगे पात
वक़्त के साथ ।
     
✍सुधा राठौर

33.
चाँद न तारे
अभिलाषा के पुष्प
सबसे प्यारे ।

✍बलजीत  सिंह

34.
शहरी फ्लैट
बिखरे परिवार
टूटते रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

35.
सूरज उगा
धरती के तम को
पल मे चुगा ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

36.
बसंत आया
अंग अंग समाया
मन बौराया ।

✍मधु सिंघी

37.
खेत विरान
कट गयी फसलें
बाकी लगान ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

दर्द सी रहा
कब तक सहता
अब जी रहा ।

✍मनीलाल पटेल

39.
जीवन रंग
सूखे पत्तो में ओस
जख्म का सीना ।

✍भीष्मदेव होता

40.
हर घर में
है सुगबुगाहट
फाग आहट ।
                
✍सुधा राठौर

41.
रिश्ते अचूक
स्वार्थ की पगडण्डी
रही विमुख ।

✍भीष्मदेव होता

42.
सर्वस्व दान
गौ माता वरदान
पशु महान

✍ऋतुराज दवे

43.
माँ की सूरत
आईना बेटियों की
नेक नियत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

44.
बासंती सोच
महकाती जीवन
लाती बहार ।

✍रामेश्वर बंग

45.
चमक रहा
तृण तृण में ओस
ओस में सूर्य ।

✍आरती परीख

46.
माटी की काया
माटी में मिल जाए
फिर भी दर्प ।

✍अयाज़ ख़ान

47.
टेसू दहका
वसंत के आंगन
मन महका ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

48.
सूरज जागा
पंछी चहचहाएं
प्राची के गाँव ।

✍सुधा राठौर

49.
प्रीत तुम्हारी
महक रहा मन
गुलाब क्यारी !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

50.
तेरी नेमत
चलती हुई साँस
मेरी किस्मत ।

✍अविनाश बागड़े

51.
दोहरी नीति
श्वेतपोश खेलते
गरीब ठगे ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

52.
महल दुःखी
काँटो में रहकर
गुलाब सुखी ।

✍ऋतुराज दवे

53.
पुराना धन
"स्मृतियों" के सन्दूक
झाँकता मन ।

✍ऋतुराज दवे

54.
अक्षत आशा
मन का जख्म भरे
ज्ञान पिपासा ।

✍भीष्मदेव होता

55.
बहे सरिता
करने उपकार
धरा पुनिता ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

56.
सूखते पात
तन्हा हैं टहनियाँ
वक़्त के साथ ।

✍सुधा राठौर

57.
सहेजा प्यार
दिल की किताब में
यादें गुलाब ।

✍ऋतुराज दवे

58.
दोस्ती के क्षण
खट्टी -मीठी सी यादें
पराग कण ।

✍वीणा शर्मा

59.
बिखरी आभा
भोर है सुशोभित
जग हर्षित ।

✍पूर्णिमा सरोज

60.
नयन नीर
आँखों से बह चले
सुनाते पीर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

61.
सरसों फूली
ओढ़ चादर पीली
धरा सज ली ।

✍वृन्दा पंचभाई

62.
धुंधली संध्या
जलते नेह दीप
चिंतित तम ।

✍पूनम मिश्रा

63.
धरा के रंग
खिले सरसों संग
पीले हैं अंग ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

64.
खिली है धूप
बसंती बयार ने
दी है दस्तक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

65.
मौन ये वन
पराग भरा पथ
भोर पावन ।

✍पूनम मिश्रा

66.
धरती पीली
सरसों ज्यों महकी
बेटी चहकी ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

67.
रंग है पीला
खेतों में है बिखरा
तन निखरा ।

✍मधु गुप्ता "महक"

68.
होली के रंग
तनमन भिगोये
बसंत संग ।

✍तेज राम नायक

69.
सरसों फूल
अठखेलियाँ करे
पवन संग ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

70.
रंग बिरंगे
प्रसूनों से सजके
प्रकृति झूमे ।

✍सविता बरई

71.
गुलाब जैसा
कांटों के संग जीना
हमने सीखा।।

✍देवेन्द्रनारायण दास

72.
चली  बयारें
लिये  फाल्गुन  राग
जग  रंगीली ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

73.
मछली रोती
कैसे दिखाए आँसू
पानी में होती ।

✍मुकेश शर्मा

74.
मिट्टी  न  धूल
विश्वास  से  महके
रिश्तों  के  फूल ।

✍बलजीत  सिंह

75.
मन चमन
महकता पराग
शब्द सुमन ।

✍रामेश्वर बंग

76.
घाव गंभीर
समय मरहम
घटाये पीर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

77.
उठी न डोली
भर सका न बाप
दूल्हे की झोली ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

78.
गुलाब रोया
शहीद से लिपट
सुपुत्र खोया ।

✍स्नेहलता वर्मा

79.
परसा फूले
फागुन रंग खिले
वन प्रांत में ।

✍नरेश कुमार जगत

80.
कहाँ है रब?
सुनता क्या अजान?
मैं अनजान ।

✍मनीभाई

81.
शान्ति की खोज
घण्टा में छिपकली
बैठती रोज ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

82.
सरसों फूल
वसुधा का श्रृंगार
पीत बहार ।

✍भीष्मदेव होता

83.
सखि बसंत
पिय के संग झूमे
मन बावरा ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

84.
वन की आग
टेसू गुनगुनाए
वासंती राग ।

✍भीष्मदेव होता

85.
हुआ अजान
अल्ला हू अकबर
रब को जान ।

✍मधु गुप्ता "महक"

86.
सीमित चाह
किसान स्वप्न जोहे
बादल राह ।

✍ऋतुराज दवे

87.
प्रेम प्रतीक
विरह में दहका
खिला पलाश ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

88.
सब है एक
मंदिर या मस्जिद
माथा तो टेक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

89.
बहा ले जाती
दुःख दर्द समेटे
माँ है नदिया ।

✍ए. ए. लूका

90.
छिपी किरणें
किसका अनुराग,
उडे पराग ।

✍पूनम मिश्रा

91.
राह रोक ली
बदलियों ने मिल
सूरज फ़ंसा ।

✍अविनाश बागड़े

92.
भटके नभ
सूरज खोता मार्ग
बरसे नैन ।

✍पूनम मिश्रा

93.
भोली सूरत
हृदय में बसती
माँ की मूरत ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

94.
निष्फल चोट
माँ सुरक्षा कवच
आंचल ओट ।

✍ऋतुराज दवे

95.
बेटी बेचारी
अभावों की दुलारी
मां की लाचारी ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

96.
जीवन धूप
पिता का समर्पण
छाते का रूप ।

✍ऋतुराज दवे

97.
माँ का चमन
फूल और खुशबू
भाई - बहन ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

98.
पिता का मन
मधुर नारियल
बाहर सख्त ।

✍सुरंगमा यादव

99.
एक दूजे के
पूरक नर नारी
न प्रतिद्वंद्वी  ।

✍सुरंगमा यादव

100.
आधुनिक  स्त्री
श्रद्धा इड़ा का रूप
प्रगतिशील ।

✍सुरंगमा यादव

101.
फूल बेबस
तितली को कसक
भौंरे पे शक ।

✍राकेश गुप्ता

102.
गालों पे गड्ढे
पड़ते हैं उनके
गिर जाता मैं ।

✍राकेश गुप्ता

103.
निशा ने बांधे
चांदनी के नुपूर
नाचें अनंग ।

✍हेमलता मिश्र

104.
चंद्र बिंदिया
सुहाग भरी निशा
घूंघट किया ।

✍हेमलता मिश्र

105.
जगत माता
ऐ नारी तुम बिन
सब अधूरा ।

✍क्रान्ति

106.
बहक मत
संभलकर सदा
ढलता चल ।

✍परमेश्वर अंचल

107.
साँकल बजी
आत्म-मुग्धा कामिनी
द्वार पे खड़ी ।

✍पुष्पा सिंघी

108.
देते हैं दिशा
जीवन पथ पर
हमारे पिता ।

✍रामेश्वर बंग

109.
वरदहस्त
पिता सघन छाया
ज्यों वट वृक्ष ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

110.
विश्वास पूंजी
पति पत्नी के बीच
रिश्तों की डोरी।

✍मनीभाई"नवरत्न"

111.
मोती झरते
नयनों के निर्झर
भीगे कपोल ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

112.
आंखों का पानी
जीवन की कहानी
पीर पुरानी ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

113.
बेटी की विदा
आँसुओं की बारात
आँखों के द्वार ।

✍ऋतुराज दवे

114.
एक से लगे
झूठे आँसू लूटेरे
मासूम ठगे ।

✍ऋतुराज दवे

115.
मन निचोड़ा
यादों भरी कोठरी
आँसू से धोया ।

✍ऋतुराज दवे

116.
टूटते स्वप्न
उदास मन झरे
नयन नीर ।

✍रामेश्वर बंग

117.
गोरखधंधा
नाम नयनसुख
आँख का अंधा ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

118.
चांद सी रोटी
दिखते स्वप्न कई
ना होते पूरे ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

119.
राजमहल
नींद से जाग उठा
सपना टूटा ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

120.
लौटेगा पुत्र
जलाये नेत्र ज्योति
वह बूढ़ी माँ ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

121.
प्रणय गीत
लिखती रहीं आँखें
अश्रु लेखनी ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

122.
स्वप्न से भरा
आंखों में तैर कर
अश्रु क्यों गिरा ।

✍सुशील शर्मा

123.
आँसू व व्यथा
रोके नहीं रुकते
कहते कथा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

124.
नयन नीर
आँखों से बह गये
सुनाते पीर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

125.
अश्रु में डूबे
जख्म सारे धो गये
नयन मेरे ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

126.
उषा ठिठुरी
काँपती दुपहरी
निशा सिहरी ।

✍सुधा राठौर

127.
नारी की हठ
जैसे लक्ष्मण रेखा
दृढ़ अकाट्य ।

✍मनीलाल पटेल

128.
छवि तुम्हारी
माँ है बहुत प्यारी
लगती न्यारी ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

129.
जगत माता
ऐ नारी तुम बिन
सब अधूरा ।

✍क्रान्ति

130.
मोह में अंधी
सिंहासन लालसा
माता कैकयी ।

✍कमल शर्मा 'बेधड़क'

131.
लाल सिंदूरी
सुबह का सूरज
आभा अनोखी ।

✍सरला सिंह शैल कृति

132.
चूड़ी सुहाग
जीवन भरे साज
मधुर राग ।

✍वीणा शर्मा

133.
खनका रहा
अनबुने सपने
मन गुल्लक ।

✍आरती परीख

134.
कोयल राग,
खिलते झूमे बौर,
घुलती मिश्री ।

✍पूनम मिश्रा

135.
दुबका बैठा
बादल ये बेचारा
रवि से हारा ।

✍सुधा राठौर

136.
"गुरु" कुम्हार
भीतर हाथ ओट
बाहर चोट ।

✍ऋतुराज दवे

137.
गुरु का ज्ञान
जीवन पथ पर
देता प्रकाश ।

✍रामेश्वर बंग

138.
स्वार्थ के गुरू
दक्षिणा में अंगूठा
माँगते मिले ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

139.
आँखें खोलती
मन की पाठशाला
रस घोलती ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

140.
स्व शिष्य मोह
एकलव्य से छल
कैसा गुरुत्व ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

141.
यह जिन्दगी
एक खुली पुस्तक
पढ़े तो कोई ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

142.
ज्ञान की वूटी
जीवन उपहार
मिटे विकार ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

143.
जीवन पोथी
श्वेत पृष्ठ है कोई
कोई धूमिल ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

144.
बने सुलेख
गुरु-चरण बैठ
लिखूँ जो लेख ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

145.
बिकती शिक्षा
अभिशप्त व्यवस्था
शिष्यत्व शून्य ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

146.
मन पुस्तक
कठिन है पढ़ना
रहस्य गूढ़ ।

✍संजीव नाईक

147.
गुरु शरण
विनयी पुष्प मन
सदा बसन्त ।

✍पुष्पा सिंघी

148.
बसन्त गीत
प्रेम की पाठशाला
पढ़ते मीत ।

✍किरण मिश्रा

149.
गुरु तराशे
अनगढ़ पत्थर
पूजे जगत ।

✍पुष्पा सिंघी

150.
बोते हैं ज्ञान
पाठशाला में गुरू
उगे भविष्य ।

✍किरण मिश्रा

151.
झरते पत्ते
दे जाते नव आशा
सृष्टि का सार ।

✍रामेश्वर बंग

152.
धीर-अधीर
लाल-गुलाब-भाषा
आशा-प्रत्याशा ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

153.
दर्प दर्पण
अतिकृत उत्कंठा
नष्ट प्रतिष्ठा ।

✍नीरू मोहन 'वागीश्वरी'

154.
मुट्ठी में आशा
कठिन डगर है
घना कुहासा ।

✍सुशील शर्मा

155.
हवा न आग
उम्मीदों के सहारे
जले चिराग ।
     
✍बलजीत  सिंह

156.
भ्रमित मन
लालसा मरीचिका
भटके तन ।

✍ऋतुराज दवे

157.
श्रृंगार नहीं
पुष्प की अभिलाषा
शहीदी पथ ।
    
✍मुकेश शर्मा

158.
खिला कमल
प्रेम की अभिलाषा
पुष्प हृदय ।

✍किरण मिश्रा

159.
आशा निराशा
सिक्के के दो पहलू
अंध उजास ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

160.
न हो निराश
अंधकार में प्रात
छिपाये गात ।

✍सुरंगमा यादव

161.
मन धरती
नव आशा अंकुर
लहक उठी ।

✍सुरंगमा यादव

162.
बड़ी लालसा
व्याकुल मन प्राण
क्षितिज दूर ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

163.
अभिलाषा है
बने देश हमारा
जगत गुरू ।

✍संजय डागा

164.
उर के भाव
सुन्दर रुप मिले
हर पन्नों पे ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

165.
आशा के दीप
चहुं ओर प्रदीप्त
रेत के सीप ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

166.
आशा सींचती
जीवन की बगिया
सदा खिलती ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

167.
आशा-सुमन
महके-मुरझाये
यही जीवन ।

✍पुष्पा सिंघी

168.
सबल आशा
जीवन परिभाषा
भावी प्रत्याशा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

169.
सितारों जड़ी
फलक की चुनरी
चाँद ने ओढ़ी ।

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

170.
रजनी सजी
ओढनी सितारों की
दुल्हन लगी ।

✍वीणा शर्मा

171.
लटका चाँद
क्षितिज छोर पर
हँसिया जैसा ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

172.
तारों का रेला
टहनी पर अटका
चाँद अकेला ।

✍मीनाक्षी भटनागर

173.
चाँदनी छाई
धरती पे चांदी की
पर्त  बिछाई ।
                                 
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

174.
श्रेष्ठ  विधान
सूरज  से  मिलता
दिशा  का  ज्ञान ।

✍बलजीत  सिंह

175.
टूटे जो तारे
करें मनोकामना
दुखी बेचारे ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

176.
हँसी रजनी
उजास बाँट रही
चन्दा चिमनी ।

✍पुष्पा सिंघी

177.
भोर का रवि
बाँटे ऊर्जा के बीज
मन की जमीं ।

✍ऋतुराज दवे

178.
किरण हार
सूरज के घोड़े पे
रश्मि सवार ।

✍ऋतुराज दवे

179.
धूप टोकरी
सूरज माथे पर
दौड़ती भूख ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

180.
तेरा चेहरा
आसमान में चांद
आंखे हैं तारे ।

✍सुशील शर्मा

181.
रात का तम
चांद का मलहम
भरते ज़ख़्म ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

182.
किसे ब्याहने
सितारों की बारात
लाया है चाँद ।

✍सुरंगमा यादव

183.
रवि किरणें
बिखरी धरा पर
आई मिलने ।

✍आर्विली आशेन्द्र लूका

184.
करते श्रम
उगते रवि संग
फैले उमंग ।

✍वृन्दा पंचभाई

185.
चांदनी रात
नदी खिलखिलाके
दिखाये दांत ।

✍मनीलाल पटेल "मनीभाई"

186.
सूरज उगा
घना तिमिर भगा
जगत जगा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

187.
सूरज ढला
चाँद का आगमन
सन्ध्या मुस्काई ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

188.
दिखे सितारे
विटप में लटके
जूगनू प्यारे ।

✍भीष्मदेव होता

189.
कर्म तप है
मधुमय साधना,
भू कर्म क्षेत्र ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

190.
तन जर्जर
बढ़ी तृष्णा भँवर
मन कातर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

191.
कर्म की पूजा
उन्नति का है मन्त्र
राह न दूजा ।

✍किरण मिश्रा

192.
भ्रमित दशा
जगत मरीचिका
माया की तृषा ।

✍ऋतुराज दवे

193.
जीवन सार
कर्म के हाथों खुले
मोक्ष के द्वार।

✍वीणा शर्मा

194.
राह भटके
तृषा की मरीचिका
कष्ट दिलाए ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

195.
चढ़ अटारी
माया खूब नचाती
रचे नौटंकी ।

✍मीनाक्षी भटनागर

196.
भवसागर
नौका परोपकार
किनारा मोक्ष ।

✍संजीव नाईक

197.
जीवन धर्म
हस्त रेखीय कर्म
भाग्य का मर्म ।

✍डॉ राजीव पाण्डेय

198.
कर्म ही धर्म
फल मिले न मिले
स्वयं दीपक ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

199.
सबकी चाह
प्रत्यक्ष या परोक्ष
केवल मोक्ष ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

200.
तन जर्जर
बढ़ी तृष्णा भँवर
मन कातर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

201.
तृषा की अग्नि
ईर्ष्या की लकड़ियां
माया पवन ।

✍सुशील शर्मा

202.
मोक्ष की तृषा
माया-काया जाल में
शिकारी हँसा ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

203.
माया नगरी
ढोता फिरे मानव
लोभ गठरी ।

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

204.
धन का लोभ
मरीचिका औ तृषा
अमिट चाह ।

✍स्नेहलता "स्नेह"
  
205.
मृग की तृषा
अदृश्य मरू जल
घोर प्रत्याशा ।

✍मधु गुप्ता "महक"

206.
नेक ईरादा
दया व कर्म खोले
मोक्ष का द्वार ।

✍क्रान्ति

207.
मोक्ष के द्वार
मुक्त हुए कैद से
पंच विकार ।
                
✍भीष्मदेव होता

208.
कर्म किए जा
फल की न हो  इच्छा
फूल खिलेगा ।

✍अनिता मंदिलवार सपना

209.
मेरे समीप
दूर तक फैले हैं
पीड़ा के द्वीप  ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

210.
युद्ध सदैव
है अकल्याणकारी
विनाशकारी ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

211.
बनें प्रबुद्ध
हे! सम्यक् सम्बुद्ध
करें न युद्ध ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

212.
जग उत्थान
मन  प्रेम कस्तूरी
शांति आह्वान

✍मीनाक्षी भटनागर

213.
शांति कपोत
हुआ लहूलुहान
बुझती ज्योति ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

214.
युद्ध का दंश
सदियां अपभ्रंश
झेलता वंश

✍डॉ राजीव पाण्डेय

215.
युद्ध विनाश
संस्कृतियों का नाश
मनुज ह्रास !

✍किरण मिश्रा

216.
पीड़ा ने लिखी
आंसू की कलम से
भाग्य को चिठ्ठी ।
      
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

217.
सूखा सावन
पीड़ा का महाकाव्य
रचते आंसू ।

✍पुष्पा सिंघी

218.
रोटी महिमा
वही गाये जो जाने
भूख की पीड़ा ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

219.
सुखद पीड़ा
प्रस्फुटित अंकुर
धरा की कोख ।

✍सुरंगमा यादव

220.
रक्त जो सींचे
खिले स्वेद के पुष्प
कर्म बगीचे ।

✍ऋतुराज दवे

221.
विरोधाभास
शांति के नाम पर
युद्ध हुँकार ।

✍ऋतुराज दवे

222.
रक्त से लाल
समर की मेदिनी
बिछती लाशें ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

223.
समर-कथा
कौन शमन करे
मनुज-व्यथा ।

✍पुष्पा सिंघी

224.
कलह ज्वार
बैर का ज्वालामुखी
करे विनाश ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

225.
मीडिया रचे
पीड़ाओं के प्रपंच
बिकते पंच ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

226.
मन की पीड़ा
सुनकर गुनोगे
उठाओ बीड़ा ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

227.
पावन काम
नव प्राण संचार
शोणित दान ।

✍भीष्मदेव होता
        
228.
युद्ध है जारी
ममता को कोसती
भ्रूण बेचारी ।
       
✍भीष्मदेव होता

229.
गुलाब रोया
शहीद से लिपट
सुपुत्र खोया ।

✍स्नेहलता वर्मा

230.
परसा फूले
फागुन रंग खिले
वन झाड़ में ।

✍नरेश कुमार जगत

231.
चली बयार
लिये फागुन राग
जग रंगोली ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

232.
खिली है धूप
वासंती बयार ने
दी है दस्तक ।

✍मधु गुप्ता

233.
रंग-बिरंगे
प्रसूनों से सज के
प्रकृति झूमे ।

✍सविता बरई

234.
हुआ अजान
अल्ला हू अकबर
रब को जान ।

✍मधु गुप्ता "महक"

235.
सब है एक
मंदिर या मस्जिद
माथा तो टेक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

236.
कहाँ है रब ?
सुनता क्या अजान ?
मैं अनजान ।

✍मनीलाल पटेल

237.
चहके कुंज,
गूंजे चिडिया स्वर,
बुनते नीड ।

✍पूनम मिश्रा

238.
प्रात: समीर
छूती कोमल भोर
हंसता कुंज ।

✍पूनम मिश्रा

239.
फूल ये कहें
काटाें के संग हम
प्रेम से रहें ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

240.
प्रेम है त्याग
वासना का संसार
जलाता आग ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

241.
प्रेम कपास
है बुने चदरिया
प्रीत उजास ।

✍मीनाक्षी भटनागर

242.
नवल सृष्टि
संदली पहचान
प्रेमिल दृष्टि ।

✍मीनाक्षी भटनागर

243.
प्यार की धारा
जीवन की नैया को
देती सहारा ।

✍बलजीत  सिंह

244.
प्रेम का भ्रूण
गर्भपात दग़ा से
लक्ष्य वफ़ा से ।

✍शेख शहज़ाद उस्मानी

245.
मौसम लिखे
प्रकृति पत्र पर
प्रेम के छंद ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

246.
सुमन शय्या
समर्पण की रात
हँसे प्रभात ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

247.
मन भिगोए
स्मृतियों के बादल
दिल पे छाए ।

✍ऋतुराज दवे

248.
चुप हैं शब्द
प्रेम का मौन स्पर्श
छू लेता मन ।

✍ऋतुराज दवे

249.
पहला प्यार
अप्राप्य उपलब्धि
स्मृतियां शेष ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

250.
एक स्वरूप
प्रेम ही परमात्मा
दूजा न रूप ।

✍किरण मिश्रा

251.
महकी रूह
खिला मन आँगन
प्रेम सुमन ।

✍किरण मिश्रा

252.
प्रेम से बुना
बिखरा हुआ स्वप्न
स्मृति के धागे ।

✍सुशील शर्मा

253.
तुम्हारी स्मृति
पीत अमलतास
झरते फूल ।

✍सुशील शर्मा

254.
स्मृति दिलाये
हर राह गुजरी
आँखों में नमी ।

✍तुकाराम पुंडलिकराव खिल्लारे

255.
प्रेम जो खिला
जीवन रेगिस्तान
मन भी हरा ।

✍वीणा शर्मा

256.
स्मृति - बयार
छुकर गुजरी तो
चुभी शूल-सी ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

257.
चमक उठी
नैनों में बन मोती
प्रेम की ज्योति ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

258.
शलभ जले
रौशनी भ्रमजाल
प्रेमांध कीट ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

259.
बीते लमहा
यादों का पुलिंदा है
रखो सहेज ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

260.
प्रिय बिछोह
करे व्यथित मन
अश्रु धार दे ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

261.
नभ से धरा
सूरज की किरणें
आती मिलने ।

✍केवरा यदु "मीरा "

262.
ये बाल स्मृति
भुलाए न भूलती
साथ रहती ।

✍सविता बरई

263.
पिता की स्मृति
वट वृक्ष की छाया
है सुखदायी ।
     
✍मधु गुप्ता "महक"

264.
प्रेम का बीज
उग रही स्मृतियां
हृदय चीर !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

265.
प्रेम दिवस
दिखावा भरपूर
प्रेम काफूर ।

✍पुष्पा सिंघी

266.
तस्वीर देख
पुरानी छत रोती
स्मृति बपौती ।

✍पुष्पा सिंघी

267.
वियोग-जेल
स्मृतियों की बेड़ियाँ
नियति-खेल ।

✍पुष्पा सिंघी

268.
क्षितिज गाँव
धरा-नभ मिलन
नेहिल छाँव ।

✍पुष्पा सिंघी

269.
जगायें भक्ति
सम्भव प्रभु मिलन
मिटे आसक्ति ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

270.
प्रेम सुमन
उदास जीवन में
लाए बसंत ।

✍रामेश्वर बंग

271.
प्रेम प्रसंग
उर स्पंद मृदंग
मन मलंग ।

✍दाताराम पुनिया

272.
बेटी वसंत
टेसू भरा आँगन
श्वास पर्यन्त ।

✍वीणा शर्मा

273.
बसन्त आया
कुहू कुहू कोयल
प्रसन्न चर्या ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे       

274.
बसंत आया
सुगन्धि नाच उठी 
जग बौराया ।
                                   
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"             
           
275.
मन बसंत
खिला स्नेह की कली
महके रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

276.
लुटा बसंत
कामुक था महंत
जीवन अंत ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

277.
फूल रंगोली
है धरा कैनवस
रचे प्रकृति ।

✍मीनाक्षी भटनागर

278.
मासूम कली
घर आँगन खिली
लगती भली ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

279.
भ्रमर गूँजें
मकरंद लालसा
पुष्प मित्रता ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

280.
कुच कलश
थरथराने लगे
काम के पुष्प ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

281.
प्रकृति नटी
मधुमय उमंग
हँसे सुमन ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

282.
बिटिया कली
मन आँगन खिली
चाहत मिली ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

283.
खिली कोंपल
मासूम सी किल्कारी
गूंजा आँगन ।

✍उषा साहिबा

284.
पीली सरसों
केशरी है पलाश
पुष्प सुवास ।

✍सुशील शर्मा

285.
रंग अनंत
चित्रकार बसंत
सजा दिगंत  ।

✍सुशील शर्मा

286.
बासन्ती भोर
पलाश दिनकर
क्षितिज कोर ।

✍किरण मिश्रा

287.
नैन भ्रमर
मुकुलित कँवल
मनस सर !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

288.
डाली का फूल
नाजुक सी जिन्दगी
करे कबूल ।

✍बलजीत सिंह
     
289.
तितली  रानी
रंगीन  फूलों  पर
हुई  दीवानी ।
     
✍बलजीत  सिंह

290.
फूलों की बातें
हवा हौले-से सुने
कहानी बुने ।

✍पुष्पा सिंघी

291.
भौंरा गुंजारे
जैसे कोई तपस्वी
मन्त्र उच्चारे ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

292.
पत्तियां देखें
पुष्प, भौंरे, बसंत
बनके संत ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

293.
नवोढा कली
बिखरी अधखिली
भाग्य का खेल ।

✍सुरंगमा यादव

294.
रजनी भागी
किरणों की थपकी
कलियाँ जागी ।

✍ऋतुराज दवे

295.
भंवरा गाये
कलियों को रिझाये
पराग पाये ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

296.
अल्हड़ कली
सहमी सी संभली
उर में अलि ।

✍दाता राम पुनिया

297.
आया बसंत
धरती आच्छादित
फूले रसाल ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

298.
न तोड़ कली
जग में आने तो दो
खुशियाँ देगी ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

299.
खिले सुमन
इठलाए चमन
पुलके मन ।
    
✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

300.
बसंत राग
कोयल गाती कैसे ?
बनके कैदी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

301.
बसंत ऋतु
सभी के मन भाए
जी भरमाए ।

✍मधु गुप्ता "महक"

302.
छाये बसन्त
हर मन तरंग
फूले पलास।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

303.
फूल को देख
अलि गुनगुनाये
बाग में झूमे ।

✍सविता बरई

304.
ऋतु बसंत
कुहुकिनी कुहूके
डाल में झूले ।

✍सविता बरई

305.
आया बसंत
आम्र  कुंज महके
फूले पलाश ।

✍केवरा यदु

306.
ऋतु बसंत
कामदेव ने भेजा
खुशी अनंत ।

✍भीष्मदेव होता
       
307.
सरसों फूले
बसंत आगमन
चेहरे खिले ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

308.
वसुधा ओस
बटोरती किरणें
जागती भोर ।

✍पूनम मिश्रा

309.
रू-ब-रू लिखा
दो शब्द के मध्य में
हू-ब-हू लिखा ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

310.
जिंदगी दक्ष
नया कल देकर
छीनती उम्र ।

✍क्रान्ति

311.
आया सूरज
ले किरनों का रंग
भागा तिमिर ।

✍केवरा यदु 'मीरा

312.
आँगन मध्य
पिंजरे में तरसा
मिट्ठू चहका ।

✍शशि त्यागी

313.
मन के द्वार
खिलखिलाता प्यार
हो मनुहार ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

314.
जीवन-ज्योति
मिट्टी के दीये में ज्यों
रौशनी होती ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

315.
कालिख खोह
पत्थर अनमोल
मिलते हीरे ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

316.
पत्थर पर
शिल्पी की नजरें ही
देखती मूर्ति ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

317.
मिट्टी के लोग
पत्थर बन कर
धूल में मिले ।

✍सुशील शर्मा

318.
ईश रचता
मानव होते भिन्न
माटी अभिन्न ।

✍मीनाक्षी भटनागर

319.
कड़वी बात
पत्थर पे खरोंच
टिकती याद ।

✍ऋतुराज दवे

320.
छानता धूल
कर्म ही होता मूल
बनता फूल ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

321.
नदी का स्नेह
पत्थर बन रेत
रहता साथ ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

322.
खड़े पर्वत
अडिग अविचल
तपस्यारत ।

✍अभिषेक जैन

323.
पत्थर थामे
मिट्टी जमीन पर
नर्मी की शक्ति ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

324.
मिट्टी की काया
कर जीवन कर्म
छोड़ अहम ।

✍रामेश्वर बंग

325.
विस्तृत नभ
क्षमताओं के पंख
उड़ते सब ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

326.
माथे पे लिखा
कैसे पढ़ती आँखें
भाग्य विधान ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

327.
नवप्रभात
ललछौही किरणें
धूप व छाँव ।

✍पूनम मिश्रा

328.
कुहू का डेरा
मंजरियों का गाँव
कूकों ने घेरा ।

✍इंदिरा किसलय

329.
मुग्ध आकाश
मखमली सेमल
रचाए रास ।

✍इंदिरा किसलय

330.
टूटे पिंजरे
सुख दुख से परे
परिन्दे उड़े ।

✍राकेश गुप्ता

331.
बड़ी सुरीली
भौंरों की शहनाई
पड़ी सुनाई ।

✍इंदिरा किसलय

332.
मस्ती के धागे
इश्क चादर बुन
आया फागुन ।

✍राकेश गुप्ता

333.
फाग के ढंग
खेल रहा अनंग
फूलों के संग ।

✍सुधा राठौर

334.
खिले सुमन
बही हवा सुगंध
हर्षित मन ।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

335.
बादल फटा
बिखरे हैं जमीं पे
टूटे आईना ।

✍भीष्मदेव होता

336.
झरना कहे
जिंदगी परिभाषा
जर ठहर ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

337.
नाचते गाते
उछल-उछल के
झरना झरे ।

✍केवरा यदु "मीरा"

338.
सूरज चला
एक नये सफर
नव प्रभात ।

✍पुरूषोत्तम होता

339.
पूजे जाते हैं
पत्थर के देवता
इंसान भूखे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

340.
अस्ताचल में
सूरज खेले होली
मले गुलाल ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

341.
महुआ खिला
जीवन का अंदाज़
फागुन आया ।

✍अविनाश

342.
इश्क खुमार
तैरा सो डूब गया
डूबा  सो पार ।

✍राकेश गुप्ता

343.
फागुनी गीत
पलाशी हुई प्रीत
होली की रीत ।

✍सुधा राठौर

344.
पलास फूल
जंगल लगे आग
केसर रंग ।

✍सरला सिंह "शैलकृति"

345.
जल भंडार
सागर तट पर
मेघों की टोली ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

346.
भोर की बेला
अंबर में घुमेगा
सूरज छैला ।

✍आरती परीख

347.
अंधेरा भागा
इरादों का सूरज
मन में जागा ।

✍आरती परीख

348.
गीत विहग
चेतन अचेतन
पार्थिव राग ।

✍शैलमित्र अश्विनी कुमार

349.
शर्म का बोध
पश्चाताप सागर
डूबता क्रोध ।

✍ऋतुराज दवे

350.
किरणें हँसी
खिले जड़-चेतन
मिली ताजगी ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

351.
आवारा मेघ
नकाब में चंद्रमा
डरी चाँदनी ।

✍भुपिंदर कौर

352.
आया अरूण
भू ने खोला घूंघट
खिला कमल ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

353.
सुबह संझा
धूप-छांव की रेकी
धरा ने देखी ।

✍रंजना सिन्हा "सैराहा"

354.
वसुधा ओस
बटोरती किरणें
जागती भोर ।

✍पूनम मिश्रा

355.
दुर्गम पथ
आकाश हिमालय
फिर भी चढ़ ।

✍कमल नयन

356.
विधि-विधान
जीवन सुरक्षित
बीज में बंद ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

357.
वक्त की आंधी
टूटे शाख से पत्ते
ढूंढते ठौर ।

✍रामेश्वर बंग

358.
संध्या समय
कतारबद्ध पंछी
घर की ओर ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

359.
एक जीवन
बनाये उपवन
कर जतन ।

✍अविनाश बागड़े

360.
जीवन सार
कर्म के हाथों खुले
मोक्ष के द्वार ।

✍वीणा शर्मा

361.
आँखें मिलती
झुक कर उठती
मौन स्वीकृति ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

362.
बेचते मोक्ष
आधुनिक ईश्वर
ठगें परोक्ष ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

363.
कटी पतंग
बाट जोहते प्राण
ढलती साँझ ।

✍अंशु विनोद गुप्ता

364.
नीम चमेली
गिलहरी फुदके
बिखरे गंध ।

✍पूनम मिश्रा

365.
तितली आगे
जिंदगी की दौड़ है
भंवरा पीछे ।

✍कश्मीरी लाल चावला

366.
हैरान धरा
उगाई थी फसलें
उगे मकान ।

✍अंजु गुप्ता

367.
राजमहल
नींद से जाग उठा
सपना टूटा ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

368.
धरा ने खेला
अम्बर संग रंग
मचा धमाल ।

✍सीमा सिंघल

369.
तेज लपटें
उड़ते हैं स्फुलिंग
जैसे जुगनू ।

✍इंदिरा किसलय

370.
अधीर धरा
किरण कलश से
है रंग झरा ।

✍इंदिरा किसलय
---00---

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

~ हाइकु पुरोधा, परम आदरणीय, श्रद्धेय, स्वर्गीय डाॅ. भगवतशरण अग्रवाल जी को हाइकु श्रद्धांजलि ~

हाइकु श्रद्धांजलि 

 

बूँद में समा

सागर और सूर्य

हवा ले उड़ी ।


मर जाऊँगा
यकीन नहीं होता
फिर क्या होगा ?

सत्य ने छला
झूठ ने छला होता
दुख न होता ।

कहानी मेरी
लिखी किसी और ने
जीनी मुझे है ।

जब भी मिले
कहना कुछ चाहा
कहा और ही ।

बोए सपने
सींचे इन्द्रधनुष
फले कैक्टस ।

उनके बिना
दीवारें हैं‚ छत है
घर कहाँ है ?

मैं था ही कहाँ ?
जन्म भर व्यर्थ ही
ढूँढ़ता रहा ।

  - डाॅ. भगवतशरण अग्रवाल

 

  * परिचय *

जन्म : २३ फरवरी १९३०‚ फतेहगंज पूर्वी‚ जिला बरेली‚ उत्तरप्रदेश।

देहावसान :  06 फरवरी 2018

शिक्षा : बी.ए. आॅनर्स (हिन्दी), एम.ए.‚ पी.एच.डी. लखनऊ विश्वविद्यालय।

कार्यक्षेत्र :
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर –इन–चार्ज‚ गुजरात विश्वविद्यालय हिन्दी अनुस्नातक केन्द्र‚ एल.डी. आर्टस कॉलेज‚ अहमदाबाद। विजिटिंग प्रोफेसर एवं पी.एच.डी. निर्देशक‚ गुजरात विश्वविद्यालय।

सम्मानोपाधि :
साहित्य महामहोपाध्याय–हिन्दी साहित्य सम्मेलन‚ इलाहबाद, साहित्यालंकार, साहित्य शिरोमणि, महाकवि जायसी सम्मान तथा अपने कार्य के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित ।

प्रकाशित महत्वपूर्ण कृतियाँ :
01. शाश्वत क्षितिज  (1985)
02. टुकड़े- टुकड़े आकाश (1987)
03. अकह  (1994)
04. अर्घ्य  (1995)
05. सबरस (1997)
06. इन्द्रधनुष  (2000)
07. हूँ भी; नहीं भी (2004)
हाइकु संग्रह, काव्य संग्रह, गीत संग्रह, कहानी संग्रह, हास्य व्यंग्य शोध समीक्षा और कई संपादित ग्रंथ प्रकाशित ।

संपादन :
हिन्दी कवयित्रियों की हाइकु साधना (2002)
हाइकु काव्य विश्वकोश (विश्व में प्रथम - 2009)
संपादक : हाइकु–भारती (त्रैमासिक पत्रिका)

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 ~•~ श्रद्धांजलि के हाइकु ~•~

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श्रद्धा के फूल
हे ! दिवंगत आत्मा
करें क़ुबूल ।

आँखें रो रही
आज हाइकु ज्योति
कहीं खो गयी ।

स्मृति नमन
भगवत शरण
धन्य जीवन ।

हाय खो गया
हाइकु आभूषण
ईश शरण ।

श्रद्धा सुमन
अर्पित दिवंगत
तव चरण ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


नमन तुम्हें
हाइकु के पुरोधा
शत प्रणाम  ।

अर्पित  तुझे
श्रद्धांजली के पुष्प
शत नमन ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

उड़ा अकेला
कहाँ पहुँचा पंछी
कोई जाने ना ।

आँसू न बहा
'हा. विश्वकोश काव्य'
सदा अमर ।

✍डाॅ. सुधा गुप्ता


करूँ नमन
श्रद्धा पुष्प अर्पण
हे ! महात्मन।

काव्य-सफर
कर चले जग में
नाम अमर ।

नम नयन
करेगा हरपल
तुम्हें स्मरण ।

✍रविबाला "सुधा"ठाकुर

तुम्हें नमन
हाइकु रचयिता
करें वंदन ।

तुम्हें अर्पित
विनम्र श्रद्धांजलि
हाइकु कृति ।

✍मीनाक्षी भटनागर

अस्त हो गया
'सूर्य' सा उदित था
आभा अभी भी ।

दैदीप्यमान..
मौत के आगोश में
रो रही मौत ।

आँसू ढुलके
भगवत जी नहीं
'हाइकु' जिंदा ।

✍रति चौबे

परम पूज्य
हाइकु पितामह
तुम्हें प्रणाम ।

✍क्रांति

छोड खजाना
हाइकु के अंबार
हुआ अमर ।

✍कश्मीरीलाल चावला

शत नमन
विनम्र श्रद्धांजलि
चुप कलम ।

✍ऋतुराज दवे

पुण्य स्मरण
भगवत शरण
स्पर्श चरण ।

स्पर्श चरण
भगवत शरण
शब्द सुमन ।

मार्गदर्शन
भगवत शरण
एक दर्शन ।

छूटा पिंजरा
उड़ गया पखेरू
दे कर ज्ञान ।

छोटी सी विधा
बड़े-बड़े विचार
आप पुरोधा ।

निसर्ग कथ्य
यह आवागमन
शाश्वत सत्य ।

अहो!आकाश
एक पुण्यात्मा आई
तुम्हारे पास ।

✍अविनाश बागड़े

ॐ शांति ओम
भगवतशरण
हाइकु व्योम ।

✍गंगा प्रसाद पांडेय "भावुक"

कोटी नमन
भगवत शरण
श्रद्धा सुमन ।

✍एन. एस. गोहिल

तुम्हें नमन
अर्पित हैं तुमको
भाव-सुमन !

✍डाॅ. मिथिलेश दीक्षित

अग्रवाल जी
सादर श्रद्धांजलि
तुम्हें नमन ।

✍मधु गुप्ता

हिवड़ै तणी
सरदाजंलि बाने
नमन घणो ।

✍गोविन्द सिंह गहलोत

आप हुए हैं
भगवत शरण
रोये हाइकु ।

✍डाॅ. आनन्द  शाक्य

लय विलीन
ऐतिहासिक योद्धा
खोया कुलीन ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

श्रद्धा सुमन
बहती अश्रु धारा
है समर्पित ।

✍महेन्द्र देवांगन "माटी"

यादें हैं शेष
केवल  इतिहास
प्रेरणादायी ।

✍महेन्द्र देवांगन "माटी"

लेखनी ही थी
इनका भगवान
करे नमन ।

✍वृंदा पंचभाई

मील-पाहन
व्यक्तित्व व कृतित्व
हाइकु कृति ।

साहित्य गंगा
हाइकु की गैलेक्सी
सदा शरण ।

क़लम शांत
हाइकु हैं मुखर
हुए अमर ।

प्रदीप्त दीप
हाइकु विश्व कोश
आत्मा शाब्दिक ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मन के पुष्प
विनम्र श्रद्धायुक्त
भाव अर्पित ।

देह का त्याग
जीव की महायात्रा
प्रभु की ओर ।

देह निर्मुक्त
भव बंधन मुक्त
महा प्रयाण ।

जन्म से मृत्यु
सतत काल चक्र
जीवन सत्र ।

अंतिम धाम
प्रभु पद विश्राम
मुक्ति की आस ।

✍सुशील शर्मा

साहित्य सेवी
शब्द ब्रम्ह साधक
तुम्हें प्रणाम ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

तुम्हें अर्पित
श्रद्धा सुमन माला
आँसू की धारा ।

अस्त सितारा
अँधेरे में उजाला
करके चला ।

कर कमल
मार्गदर्शन करें
मंजिल दिखे ।

हाइकु गुरु
अश्रुपूरित श्रद्धा
हृदय बसा ।

स्वर्ग स्वागत
सत्रह स्वर्ण वर्ण
सुमन वर्षा ।

✍वीणा शर्मा

नम नयन
व्यथित अंतर्मन
विदा सज्जन ।

✍संजीव कुमार पाणिग्राही

नम हैं आँखें
भगवतशरण
नमन तुम्हें ।

हे कर्मवीर
बढ़ते चले आप
कर्म के साथ ।

शब्दसाधक
प्रेरक रहा जीवन
रहोगे याद ।

अमर आप
देश का इतिहास
रखेगा याद

सारा जीवन
साहित्य साधना का
दिया सन्देश ।

है श्रद्धांजलि
हृदय के अन्तः से
तुम्हें प्रणाम ।

बहते अश्रु
गमगीन है लोग
आओगे याद ।

सो गए सदा
चिरनिद्रा में आप
यादें ही साथ ।

✍पुरुषोत्तम होता

दुख सागर
ऐसे ही उमड़ता
नम नयन ।

अग्रवाल जी
भगवत शरण
किया वरण ।

✍प्रबोध मिश्र "हितैषी"

आत्मा अमर
सदा जीवित रहे
अंतिम सत्य ।

दिव्य लेखक
हर आखर मोती
रचे हाइकु ।

गुरू महान
रचा हाइकु जग
दिव्य है दीप ।

आखर पुष्प
हाइकु गुलदस्ता
झरे महक ।

गुरू महान
भगवत शरण
जग में नाम ।

हाइकु दीप
झरे दिव्य प्रकाश
जग रोशन ।

✍रामेश्वर बंग

देह लेकर
मृत्यु निकल पड़ा
कर्तव्य पीछे ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

हाइकु फूल
हिंदी काव्य सजाये
डॉ. भगवत !

ठगनी माया
ठगे तन गठरी,
आत्मा आजाद !

हाइकु बीज
उगा हिन्दी गगन
बोये, शरण !

हिन्दी जगत
उतारे,भागवत
हाइकु गंगा !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

टूटता तारा
रोता हुआ आंगन
अऩाथ हम ।

सूना हाइकु
बिखर गया मौन
शत नमन ।

✍पूनम मिश्रा

भगवतजी
हाइकु ही आपकी
वसीयत है ।

दे गए हमें
हाइकु का जखीरा
भगवतजी ।

✍संजय डागा

जन्म व मृत्यु
सहज हो स्वीकार
यही शाश्वत ।

बीच में खिले
जीवन रूपी पुष्प
गर्व की बात ।

हर तरफ
महके उपवन
कर्म- सुगंध ।

हो सुसंस्कार
मधुर व्यवहार
जीवन भर ।

बने दिवस
भगवत शरण
मोक्ष वरण ।

✍मधु सिंघी

श्रद्धा सुमन
अर्पित है आपको
करुं नमन ।

यही है सत्य
धरा से सबको जाना
आप अमर ।

दिखा जग को
अपना ये हुनर
हो गये विदा ।

प्रणाम करें
आत्मा को मिले शांति
है श्रद्धांजलि ।

✍मधु गुप्ता "महक"

मिट्टी का चोला
कभी मिट्टी ऊपर
कभी है नीचे ।

सो गया देखो
हाइकु बुनकर
अँखियाँ मीचे ।

हाइकु तांके
वे उन्मुक्त ठहाके
स्मृति से झाँके ।

टूटे पिंजरे
सुख दुख से परे
परिन्दे उड़े ।

मुक्ति की चाह
शाश्वत है क्षितिज
लक्ष्य आकाश ।

✍राकेश गुप्ता

कोश प्रणेता
भगवत शरण
शत नमन ।

हाइकुकार
मान रहे आभार
दिव्य ज्ञान का ।

देश विदेश
हाइकु का संदेश
हुआ मुखर ।

दिव्य आरती
ये हाइकु भारती
हम सबकी ।

मौन तपस्वी
आजीवन साधना
हाइकु हित ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

ईश चरण
भगवत शरण
श्रद्धा अर्पण ।

हे सिद्धहस्त
स्वर्ग आसीन भव
कामना स्वस्थ्य ।

हाइकु-पाती
वो हाइकु-भारती
बनी आरती ।

हाइकु निधि
हाइकु विश्व-कोष
उत्कृष्ट कृति ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

श्रद्धा सुमन
अर्पित करते है
यादे है शेष ।

विलीन हुए
भगवत शरण
सूर्य रश्मि  थे ।

संग्राहक थे
प्रवीण प्रणेता जो
है इतिहास ।

त्याग देह को
बसे वैकुण्ठ तुम
स्मृति है शेष ।

एकाकार हो
आत्मा से परमात्मा
हंस अकेला ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

मन के भाव
श्रद्धा रूपी शब्दों से
अर्पण पुष्प ।

कमी आपकी
पूर्ण ना होगी कभी
नमन करें ।

धन्य है आप
समर्पित जीवन
हाइकु हेतु ।

आप अमर
कलाम है जिन्दा
तन नश्वर ।

चिर निद्रा में
लीन है पंचतत्व
नवजीवन ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

सृजनकर्ता
हाइकु के प्रणेता
डॉ. अग्रवाल ।

विश्व विख्यात
हाइकु विश्व कोश
प्रथम कृति ।

रूठी नियति
चिर निद्रा में लीन
महाविभूति ।

विलुप्त ज्योति
अपूरणीय क्षति
होगी न पूर्ति ।

अश्रुपूरित
देती हूँ श्रद्धांजलि
सुमनांजलि ।

✍सुधा राठौर

वर्ण-गैलेक्सी
भगवती शरण
हाइकु ऋषि ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

श्रेष्ठ हाइकु
भगवत शरण
नमः लेखनी ।
   
देव गमन
भगवत शरण
संताप,क्षति ।
   
श्रद्धा सुमन
भगवत शरण
ऊँ शांति शांति ।

✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

करे अर्पण
हाइकु परिवार
श्रद्धा सुमन ।

कर्म महान
मरकर भी करें
अमृत्व दान ।

विश्व वाटिका
चुन लाये सुंदर
हाइकु पुष्प ।

हाइकु कोश
देकर उपहार
किया प्रयाण ।

मन की पीर
झर रही नैन से
हो के अधीर ।

✍सुरंगमा यादव

नम नयन
भगवत शरण
शत नमन ।

✍आलोक "अनल" डनसेना

स्वर्ग गमन
ईश्वर से मिलन
श्रद्धा सुमन ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

महाप्रयाण
हाइकु  के पुरोधा
शत प्रणाम ।

स्वयं अर्पण
हाइकु समर्पण
प्रभु शरण ।

खुद जला के
हाइकु की मशाल
हाथों थमाई ।

बन आदर्श
राह करी प्रशस्त
मील पत्थर ।

✍ऋतुराज दवे

डॉ. अग्रवाल
हाइकु पुरोधा थे
माला में गूँथे ।

मोती निकाले
सागर मंथन से
दिव्य पूंज ये ।

श्रद्धांजलि दी
अश्रुपूरित नमन
आभारी मन ।

✍प्रकाश कांबले

मिट्टी से बना
मूर्ति गढ़ता रहा
मिट्टी में मिला ।

सरल भोले
लिखते रहे काव्य
अल्प शब्दों में ।

गूढ़ अर्थों में
सारगर्भित भाव
मन उजास ।

अश्रुपूरित
अर्पित श्रद्धा पुष्प
आदर संग ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

रहे अमर
भगवत शरण
हाइकुकार ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

पुष्प अर्पण
हाइकु के आचार्य
करूँ वंदन ।

✍सविता बरई

है अमानत
हाइकु ज्ञान माला
गुंथी आपने ।

गूंजा आपसे
हाइकु का संगीत
मधुर राग ।

संगीत ध्वनि
अनंत में विलीन
देव शरण ।

श्रद्धा सुमन
करती हूँ अर्पण
मेरा नमन ।

✍नीलम शुक्ला

हाइकु दीप
दमकता सितारा
ज्यों छिप गया ।

श्रद्धा पथ से
अटल बिदाई ले
सुदूर चले ।

आलोकित हैं
राहें भगवत की
निर्वाण पथ ।

जन्म निर्वाण
अविजित नियति
करें प्रणाम ।

✍हेमलता मिश्र

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(सर्वाधिकार सुरक्षित)

बिना अनुमति से कोई अंश प्रकाशित न करें ।

- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

संपादक : हाइकु मञ्जूषा

 

बुधवार, 31 जनवरी 2018

हाइकु मञ्जूषा जनवरी 2018 के चयनित हाइकु


हाइकु मञ्जूषा

जनवरी - 2018 के चयनित हाइकु

{ श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन }

संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", एवं "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" समूह से साभार । )


01.
साल  ये  नया
हरारत  भरी  है
हेमंती  हवा ।

✍सुधा राठौर

02.
श्रम की डोर
बाँधे नव उत्कर्ष
लाई है भोर ।

✍वीणा राघव

03.
अच्छे  संस्कार
जीवन में  खोलते
खुशी  के  द्वार ।

✍बलजीत सिंह

04.
नन्हा सा वर्ष
लिहाफ में लिपटा
मुस्कुराया है ।

✍सुशील शर्मा

05.
नव सृजन
बने नव वर्ष में
जीवन नया ।

✍सतीश राठी

06.
रवि वंदन
रश्मि और प्रकृति
शुभ मिलन ।

✍सविता बरई

07.
शीतल वात
गात पर आघात
पूस की रात ।

✍अनिल शुक्ला

08.
सह न सका
बत्ती का दुःख देखा
मोम पिघला ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

09.
चिंटियाँ करें
पर्वत रेखाकंन
कर्म वंदन ।

✍शैलमित्र अश्विनीकुमार

10.
नूतन वर्ष
माघ की ठिठुरन
गुड़ गजक ।

  ✍मृदुला मिश्रा

11.
है शरारती
शाख की चिलमन
चाँद बेपर्दा ।

✍सुधा राठौर

12.
नया जो साल
खुशियों के अंबार
भर लो थाल ।

✍कश्मीरी लाल चावला

13.
वर्ष नवल
हृदय बह गया
गीत सजल ।

✍पुष्पा सिंघी

14.
झरते पत्ते
चली वक्त की आँधी
ख्वाब टूटते ।

✍रामेश्वर बंग

15.
रातरानी का
मदमस्त यौवन
सजा है मन ।

✍प्रकाश कांबले

16.
खाट पे दादी
चश्मे से देख रही
ठूँठ तुलसी ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

17.
प्रेम के रंग
सद्भावना संग
छाये उमंग ।
    
✍रवीन्द्र वर्मा

18.
प्रभु वन्दन
करलें प्रातः हम
दिन सुगम ।

✍ए. ए. लूका

19.
भोर से आस
साँझ से शिकायत
यही ज़िंदगी ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

20.
खड़ा कोहरा
लिये ठण्ड की लाठी
छूपा सूरज ।

✍देवेन्द्र सगर

21.
रात महकी
चाँदनी ने उडेला
चाँद का इत्र ।

✍सुधा राठौर

22.
खूब निखरा
पत्तों पर प्रसरा
घना कोहरा ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

23.
तिमिर घना
झाँक रहा चंद्रमा
है अनमना ।

✍सुधा राठौर

24.
दाम्पत्य घड़ी
पति पत्नी दो कांटे
प्रेम है धुरी ।

✍ऋतुराज दवे

25.
घड़ी की घंटी
सुधि भाव भर दे
सुप्त मन में ।

✍मनीभाई"नवरत्न"

26.
खुशी के फूल
महकाये जीवन
निखारे मन ।

✍रामेश्वर बंग

27.
स्वयं का भान
अंतस में हो ध्यान
ईश का ज्ञान ।

✍निर्मला सुरेन्द्रन

28.
श्लोक का जाप
गागर में सागर
धुलते पाप ।

✍राधा अय्यर 'सवि'

29.
सर्द मौसम
अलाव से जज़्बात
किसे पुकारूँ ।

✍राजेश पाण्डेय

30.
भभक उठा
हवाओं की फूँक से
रवि का हुक्का ।

✍सुधा राठौर

31.
खिड़की खुली
कच्ची सी धूप मिली
ओस में घुली ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

32.
घर में बेटी
माँ देखती खेत में
सरसो फूल।

✍विष्णु प्रिय पाठक

33.
सारी दौलत
बेटों में गयी बंट
मां मर्माहत ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

34.
हँसे पलाश
आज फागुन मन
इठला उठा ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

35.
प्रेम की डोर
देख चाँद चकोर
मन विभोर ।

✍भीष्मदेव होता

36.
पहाड़ी ओट
साँझ सबेरे रवि
झाँकता रोज ।

✍नरेश जगत

37.
दर्द के अश्रु
मोती बन बिखरे
नैनों से झरे ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

38.
वृक्ष भी अड़ा
वर्षा की प्रतीक्षा में
सूखे से लड़ा ।

✍ऋतुराज दवे

39.
माघ आया है
धुँध सजी सरसों
जाड़ा छाया है ।

✍डॉ. बीना

40.
मन को हाँके
यादों की खिड़कियाँ
बुढ़ापा झाँके ।

✍ऋतुराज दवे

41.
बूढ़े ललाट
उम्र की सलवटें
कथा समेटे ।

✍ऋतुराज दवे

42.
बूढ़े , वृक्ष से
आशीष फल लदे
स्नेह से भरे ।

✍ऋतुराज दवे

43.
गिर जाते हैं
समय की शाख से
उम्र के पन्ने ।

✍अमन चाँदपुरी

44.
तेरा मिलना
मरु के तरु जैसा
शीतल छाँव ।

✍सुधा चौधरी

45.
शिशिर ऋतु
श्री हीन विटपों पे
पर्ण श्रृंगार  ।

✍मंजु शर्मा

46.
उम्र का घडा
मिट्टी के महल में
वक्त से टूटा ।

✍ऋतुराज दवे

47.
मेघ बरसे
जलमग्न है धरा
किसान झूमे ।

✍क्रान्ति

48.
शीत शर्बरी
रतिपति चलाये
कुसुम बाण ।

✍सूर्य करण सोनी

49.
बाँट दी मैंने
थोड़ी सी गर्माहट
रिश्तों के बीच ।

✍सुधा राठौर

50.
काँपते गात
कोहरा हिमपात
ठंडे लिहाफ ।

✍बिमला देवी

51.
धुँध कहर
सड़कों के हादसे
थमे पहर ।

✍बिमला देवी

52.
कोहरा पड़ा
खेतों में गेहूँ पका
किसान हँसा ।

✍बिमला देवी

53.
जीवन धूप
पिता का समर्पण
छाते का रूप ।

✍ऋतुराज दवे

54.
चुभती ठंड,
छिन्न भिन्न घमंड,
रूठी लुगाई ।

✍अजय श्रीवास्तव

55.
शुभ्र प्रभात
धुंध के लिहाफ में
सूर्य का गात ।

✍सुधा राठौर

56.
धूप निकली
क्षणभंगुर ओस
हुई बेहोश ।

✍सुधा राठौर

57.
हवा बेहाल
पत्तों की मर्ज़ी पर
बिगड़ी चाल ।

✍सुधा राठौर

58.
जलती रही
लालटेन उदास
जोहती बाट ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

59.
पेड़पौधों पे
शीत मारता चाँटे
धूप ममता ।

✍आरती परीख

60.
खुशबू तेरी
यहाँ तक पहुँची
महका मन ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

61.
धूप के दाने
सुबह चुग लेगी
पेट भर के ।

✍शुचिता राठी

62.
अरुण गात
सूरज का ललना
झूले पलना ।

✍सुधा राठौर

63.
समेट ली है
रात ने चुपके से
काली चादर ।

✍सुधा राठौर
        
64.
किरण परी
छलकाए गगरी
जागी नगरी ।

✍सुधा राठौर

65.
हवा के तीर
दूब के नयनों में
ओस का नीर ।

✍सुधा राठौर

66.
पतंग कटी
ऊँची उड़ान टूटी
धरा पे लुटी ।

✍आर. के. निगम 'राज़'

67.
मेरी पतंग
आसमान में उड़े
बदले रंग ।

✍आर. के. निगम 'राज़'

68.
मुड़ा भास्कर
उत्तरायण गति 
हुई संक्रांति ।

✍मनी लाल पटेल

69.
बंधी पतंग
मांझा-डोरी के संग
लिए उमंग ।

✍नीरू मोहन

70.
नव उत्कर्ष
बयारित पवन
बसंत स्पर्श ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

71.
जख्म गहरा
खलिहान बंजर
सूखा दरिया ।

✍भीष्मदेव होता

72.
कर लें हम
उपासना प्रभु का
रहें प्रसन्न ।

✍ए. ए. लूका

73.
प्रेम सुगंधी
महके द्वय मन
मैं और तुम ।

✍नरेंद्र मिश्रा

74.
दुल्हन बन
कई रंगों के संग
रंगी पी रंग ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

75.
हुई उदास
पेड़ की झुकी डाली
देख कुदाली ।

✍रामेश्वर बंग

76.
छुप रहा है
अस्ताचल की ओट
निस्तेज रवि ।

✍मधु सिंघी

77.
गाँव की यादें
प्रेम भरे चेहरे
आँगन गूँजे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

78.
माँ की ममता
आँचल की तलाश
छलकी आँखे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

79.
मिलोगे तुम
ऐसी उम्मीद जगी
इन्तज़ार है ।

✍ए. ए. लूका

80.
गजरा चोटी
पहाड़ी में चिपके
बर्फ सफेद ।

✍नरेश जगत

81.
बिजली तार
दुनिया में पसरा
मीठा बाजार ।

✍जगत नरेश

82.
यामिनी आई
घर में दीप जले
तिमिर मिटे ।

✍सविता बरई

83.
यारों का यार
बैठा है छिप कर
पालन हार ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

84.
भोर सुहानी
उगता हुआ सूर्य
लाता संदेश ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

85.
तरु  है  दादा
परिवार  का  मूल
नेक  इरादा ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

86.
जीवन मेरा
पिता का आशीर्वाद
छाँव का घेरा ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

87.
मूरत माँ की
ममता का आँचल
तीरथ झाँकी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

88.
बहन की राखी
स्नेह भरी रसरी
उड़ती पाखी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

89.
चाँदनी रातें
घुंघट में दुल्हन
मनोहरता ।

✍सुमिधा हेम सिदार

90.
भोर प्रभाग
सूरज का संगीत
किरण-राग ।

✍अविनाश बागड़े

91.
सर्द मौसम
पवन के सिर पे
बर्फ गठरी ।
   
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

92.
नभ में जंग
पाने क्षेत्राधिकार
लड़े पतंग ।

✍अभिषेक जैन

93.
उफनी नदी
तोड़ती सारे बंध
ये जलावृष्टि ।

गंगा पाण्डेय "भावुक"

94.
बाँधवी प्रेम
लिपटी सरसों से
मटर बेल ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

95.
रक्षा कवच
ममता का आँचल
देता ममत्व ।

✍रामेश्वर बंग

96.
थरथरायी
शज़र की पत्तियाँ
देख कुल्हाड़ी ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

97.
लहू का रंग
ईर्ष्या द्वेष से तंग
बदले ढंग ।

✍अर्चना कोचर

98.
कोहरे मध्य
सूरज दिख रहा
चाँदी का थाल ।

✍शशि त्यागी

99.
थका व हारा
ठंड से ठिठुरता
भोर का तारा ।

✍मनीष त्यागी

100.
रजनी तवा
सूरज ने बनाई
चाँद की रोटी ।

✍ऋतुराज दवे

101.
मौन पसरा
पंछी का कलरव
चुराती हवा ।

✍सुधा राठौर

102.
मन के शून्य
ईश्वर का स्वरूप
गहरा मौन ।

✍रामेश्वर बंग

103.
ओस की आस
गुलाबी अहसास
सूर्ख लिबास ।

✍अविनाश बागड़े

104.
रस टपके
आम के पुहूपों से
मन बहके ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

105.
सुखी संसार
घर बने मंदिर
माँ का सपना ।

✍सुमिधा हेम सिदार

106.
शहीद फूल
तिरंगा मे लिपटा
माँ का लाडला ।

✍भीष्मदेव होता

107.
अतीत देखा
बीते वक्त ना आये
फिसले  रेत ।

✍सुमिधा हेम सिदार

108.
हवा बहकी
महुआ है महका
रवि दहका ।

✍सुधा राठौर

109.
आया बसंत
कुहकती कोयल
मनवा डोले ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

110.
इंद्रधनुष
रंगीन गुलदस्ता
मन मोहता ।

✍भीष्मदेव होता

111.
डायन  मौत
जिंदगी  परेशान
लगती  सौत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

112.
दिल को भाना
ऋतुराज का आना
गुनगुनाना ।

✍मधु गुप्ता

113.
वस्त्र हो पीले
गाए पीक सुरीली
बेर रसीले ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

114.
नई उमंग
हर्ष से भर आए
सूने नयन ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

115.
मन अधीर
परदेस में पिया
जाने ना पीर ।

✍राधा अय्यर 'सवि'

116.
जद्दोजहद
भूख और प्यास की
तोड़ती हद ।

✍जाविद हिदायत अली

117.
हल्दी के रंग
वक्त के साथ मिटे
गहरे जख्म ।

✍जगत नरेश

118.
उड़ती चील
अपने लक्ष्य पर
पैनी नज़र ।

✍भीष्मदेव होता

119.
बनना फूल
जीवन पथ पर
बन न शूल ।

✍रामेश्वर बंग

120.
जीवन गीत
है प्रेम का संगीत
तुम्हारी प्रीत ।

✍तृप्ति

121.
सूना जीवन
रिमझिम फ़ुहार
ख़्याल आपका ।

✍तृप्ति

122.
नाचता मोर
देखता पग ओर
रुदन ज़ोर ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

123.
टूटी न जूडी
सास-बहूकी जोड़ी
रेल पटरी ।

✍आरती परीख

124.
दुखता दिल
बहते नेत्रजल
हरते पीर ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

125.
रवि का पथ
उष्मा से लथपथ
धूप सतत ।

✍सुधा राठौर

126.
नदी का पथ
मोड़ना आसां कहाँ
दिल आहत ।
                         
✍प्रकाश कांबले

127.
कुसूमासव
एकता की मिसाल
मधुमक्खियाँ ।

✍भीष्मदेव होता

128.
पवन बही
भ्रमर हैं चूमते
सुमन मुख ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

129.
बौराया आम
पीत वर्ण सरसों
बासंती गान ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

130.
आमों के बौर
बने अलि के ठौर
आया बसंत  ।

✍कपिल जैन

131.
पिया हों संत
फिर कैसा फागुन
कैसा बसन्त ।

✍डाॅ. यतीश चतुर्वेदी "राज"

132.
सरसों फूली
चहुँ ओर अनन्त
आया बसन्त ।

✍डॉ. यतीश चतर्वेदी "राज"

133.
बसंत ऋतु
दिन पतंग हुये
रात सरसों ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

134.
बासंती धूप
ऋतुराज निखारे
सौंदर्य रूप ।

✍मनीभाई

135.
हे मां शारदे
हमको दो आशीष
नवाते शीष ।

✍पुरुषोत्तम होता

136.
गीत पँक्तियाँ
आह गढ़ती रही
अश्रु के संग ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

137.
बौराया आम
कुंचाया है महुआ
भीनी सुगंध ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

138.
ॠतुराज है
कोयल कूकी फूली
आम्र मंजरी ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

139.
बिखेर देता,
सुगंध की सत्ता को,
भू, में वसंत ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

140.
स्वप्न की साधें,
याद आती पुरानी,
जागती रातें ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

141.
सरसों फूल
बासंती परिधान
ओढ़ी धरती ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

142.
पुष्प लिबास
स्वर्ण रजत घास
मधु का मास ।

✍राकेश गुप्ता

143.
धूप बिछाती
बिछौने पीले हरे
धरा शर्माती ।

✍राकेश गुप्ता

144.
चंद्रमा झाँके
गगन गोटेदार
सितारे  टाँके ।

✍राकेश गुप्ता

145.
गेंहूँ की बाली
सरसों पर लट्टू
बजाती ताली ।

✍राकेश गुप्ता

146.
दिल पतंग
मिलन आस ताजा
नजर माँझा ।

✍राकेश गुप्ता

147.
गाँव शहर
वसंत मुखरित
अवनि पर  ।  

✍अविनाश बागड़े   
                  
148.
वासन्ती गाँव
पीत वर्ण आनन
मुग्ध कानन ।

✍सुधा राठौर

149.
वासंती टेर
भँवरे का प्रणय
कली हृदय ।

✍अविनाश बागड़े

150.
प्रणय दाह
सिंगार वसंत का
भरता आह ।

✍विवेक कवीश्वर

151.
हवा दहकी
वासन्ती हरारत
पिघला मन ।

✍सुधा राठौर

152.
पराग-गंध
सम्मोहित अनंग
लिखता छंद ।

✍सुधा राठौर

153.
वासंती गीत
गाता हुआ समीर
नदिया तीर ।

✍अविनाश बागड़े

154.
बाजे मृदंग
यूँ ताथैय्या ताथैय्या
नाचे कदम ।

✍रति चौबे

155.
सूरज लिखे
धरा के आँचल पे
बासंती छंद ।

✍रीमा दीवान चड्ढा

156.
पी उर जागी
नेह की भागीरथी
मैं बड़भागी ।

✍विवेक कवीश्वर

157.
बसंत आया
लगी फूलों की हाट
भटका भौंरा ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

158.
ये पतझड़
झरनों की तरह
गिरते पात ।

✍मधु गुप्ता

159.
कोयल गाती
फागुन अगुवाई
करे बसंत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

160.
बसंत आया
महके जर्रा जर्रा
हर्षित धरा ।

✍आरती परीख

161.
कटते पेड़
धरती की पुकार
टूटती साँस ।

✍ऋतुराज दवे

162.
मेरे भीतर
है सबके अंदर
वही ईश्वर ।

✍मनिषा वाणी मेने

163.
लो खुल गया
सूरज का पिटारा
दौड़ीं रश्मियाँ ।

✍सुधा राठौर

164.
सूखता गया
पन्नों में दबकर
प्रेम गुलाब ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

165.
ऋतु वसंत
नवल भू यौवन
खिले आकंठ ।

✍सुशील शर्मा

166.    
माता का दूध
बड़ा होकर भूला
उसका पूत ।         
  
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

167.
कटते वृक्ष
फटे धरती वक्ष
प्रश्न है यक्ष ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

168.
कपोत उड़े
आजादी का उत्सव
उमंग भरे ।

✍सविता बरई

169.
खिलते फूल
गंध जग मे लुटा
झर मिटते ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

170.
हुआ बिहान
करलो स्तुतिगान
प्रभु महान ।

✍ए. ए. लूका

171.
जय भारत
हो वन्दे मातरम
सबकी आन ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

172.
देश की शान
गणतंत्र दिवस
दिन महान ।

✍मनीभाई

173.
पुण्य दिवस
लहराता तिरंगा
राष्ट्र की आन ।

✍पुरुषोत्तम होता

174.
सबका हक
हमारा गणतंत्र
सबकी हद ।
  
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

175.
खड़ी शान से
छब्बीस जनवरी
सीना तान के ।

✍अभिषेक जैन

176.
कभी तो होगा
सुखद गणतंत्र
हृदयासीन ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

177.
वक़्त बदला
अबला नहीं रही
आज की नारी ।

✍उषा शर्मा

178.
झंडा हमारा
सुख शांति ऐश्वर्य
प्रतीक प्यारा ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

179.
लहलहाए,
सोने की चिडिया है
भारत देश ।

✍पूनम मिश्रा

180.
सूरज ढला
साँझ सजने लगी
दीपक जला।

✍मनिषा वाणी

181.
तिरंगा शान
प्रतीक स्वाभिमान
गौरव गान ।

✍ऋतुराज दवे

182.
गर्व समाया
तिरंगे में लिपटी
गौरव गाथा ।

✍ऋतुराज दवे

183.
हो गई भोर
करे भाव विभोर
खगों का शोर ।

✍अविनाश बागड़े

184.
भोर सुहानी
नित नई कहानी
रश्मि की बानी ।

✍पूर्णिमा सरोज

185.
देश की शान
शहीदों का लिखना
विजय गान ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

186.
पलकें उठी
लजाई सी कलियाँ
पास भ्रमर ।

✍अविनाश बागड़े

187.
पलकें उठी
झुकी थी एक पल
जैसे कमल ।

✍प्रकाश कांबले

188.
स्नेह की गंध
महकाते जीवन
खुशी के फूल ।

✍रामेश्वर बंग

189.
सरहद पे
तैनात हैं  सैनिक
देश रक्षित ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

190.
प्रीत में बंधे
धरा और बसंत
मुलाकातों में ।

✍सुधा राठौर

191.
ढाई आखर
वसंत लिख रहा
पात-पातों में ।

✍सुधा राठौर

192.
वीर जवान
देशप्रेम कवच
ध्वज प्रेरणा ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

193.
डूबे सूरज
नयी उम्मीद लिये
उगे सूरज ।

✍अयाज़ ख़ान

194.
स्त्री की राह में
उड़ने न दो धूल
बिछा दो फूल ।

✍शुचिता राठी

195.
सौम्य स्वरूप
प्रभात की किरणें
भोर की धूप ।

✍शुचिता राठी

196.
दूर अँधेरा
करता दिनकर
लाता सवेरा ।

✍शुचिता राठी

197.
आँसू के मोल
बिक रहीं उम्मीदें
दिल दूकान ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

198.
मन सपेरा
जादू से भरी बीन
लोभ के नाग ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

199.
ढूँढते ठाँव
धूप से डरकर
शीत के पाँव ।

✍सुधा राठौर

200.
धूप महकी
टहनियाँ लहकी
हवा बहकी ।

✍सुधा राठौर

201.
बाहर सख्त
साधु मानो श्रीफल
अंतः कोमल ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

202.
चूल्हे में तवा
लगी आग खेत में
बाजार गर्म ।

✍नरेश जगत

203.
रात सयानी
लोरी सुनाती मैय्या
झिंगुर राग ।

✍नरेश जगत

204.
रेल इंजन
नजरों को खिंचते
सरसों फूल ।

✍जगत नरेश

205.
सत्ता है दास
जिसकी सरकार
करे संताप ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

206.
बिखरी रातें
सो गयी है चांदनी
टूटती सांसे ।

✍पूनम मिश्रा

207.
भाव निष्प्राण
संवेदना ने फूँकी
मुर्दे में जान ।

✍ऋतुराज दवे

208.
रस घोलते
पंछियों के कलरव
गीत सुनाते ।

✍उषा साहिबा

209.
नभ से गिरा
टहनी में अटका
उनींदा चाँद ।

✍सुधा राठौर

210.
मधुप हास
फूल कली श्रृंगार
है मधुमास ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

211.
धूप के गाँव
लड़खड़ाते हुए
शीत के पाँव ।

✍आरती परीख

212.
नभ रंगोली
सूर्य देता विदाई
साँझ रंगीली ।

✍मीनाक्षी भटनागर

213.
नागफनियाँ
काँच हुए टुकड़े
सजी दीवारें ।

✍जगत नरेश

214.
मन की नदी
फागुनी हवा चली
लहर उठी ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

215.
हवा चलती
मैना डाली पे बैठी
झूला झूलती ।

✍सविता बरई

216.
हुआ अजूबा
झील के नयनों में
चंद्रमा डूबा ।

✍सुधा राठौर

217.
मन कोमल
सहेजे अविरल
स्वप्न कोंपल ।

✍पूर्णिमा सरोज

218.
मन की व्यथा
हम किसे सुनाएँ
सभी बेगाने ।

✍ए. ए. लूका

219.
ऋतु वसंत
आम्रमञ्जरी संग
बौराया मन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

220.
झूठे वहम
मिट्टी के घरोंदे का
मालिक अहं ।

✍ऋतुराज दवे

221.
शमशान में
मुर्दे समझा रहे
जीवन अर्थ ।

✍ऋतुराज दवे

222.
चाँदनी रात
दरिया का किनारा
तेरी जुस्तजू ।

✍हाॅरून वोरा

223.
सिसके रिश्ते
पड़े तनहाई में
माँ बाप बूढ़े ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

224.
चाँदनी रात
चमकते सितारे
नीर के झाग ।

✍जगत नरेश

225.
दूधिया बल्ब
उज्ज्वलमय निशा
पूर्णिमा तिथि ।

✍जगत नरेश

226.
घायल उर
पर वंशी का स्वर
होता मधुर ।

✍सुधा राठौर

227.
माना ग्रहण
रूपवान चन्द्रमा
लज्जा से लाल ।

✍अंशु विनोद गुप्ता

रविवार, 28 जनवरी 2018

रेंगा

 

विश्व के प्रथम रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश" एवं संग्रह के संपादक 

आ. प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी की 

उपलब्धियों की शान में आयोजित रेंगा सृजन ।

        प्रस्तुति : अविनाश बागड़े

    संचालक : हाइकु ताँका प्रवाह

         13 जनवरी 2018

        ●●●●●●●

दीपक सदा
प्रकाशित ही रहा
राह दिखाते  - अविनाश बागड़े
नित नवीन पथ
कल्पनाएँ साकार  - सुधा राठौर
एक दीपक
हमको मिल गया
सम्भाले इसे  - अविनाश बागड़े
स्नेह साथ विश्वास
कस्तूरी की तलाश - प्रदीप कुमार
हम सब है
पांच सात व पांच
सात - सात है  - अविनाश बागड़े
हां साथ साथ चलें
साहित्य पथ रचें  - हेमलता मानवी
सृजन पथ
होता रहे विस्तृत
पूर्ण आश्वस्त  - सुधा राठौर
शब्द ब्रम्ह चढ़ाएं
अक्षत चंदन से  - हेमलता मानवी
हाइकु ताँका
कहीं पे रेंगा रचें
चोका भी साथ  - सुधा राठौर

मिल कर कदम

बढ़ाएँ साथ-साथ  - प्रदीप कुमार
समूह बढे,
हाइकु पहचान,
फैलता जाल  - पूनम
शाम की यह बेला
रेंगा ये अलबेला  - अविनाश बागड़े
चला अथक
मिलते गए राही
बना कारवाँ  - सुधा राठौर

महक चला पथ

 मिले हमसफर  - प्रदीप कुमार
शब्द बुनते,
रेंगा बनते चले
 साहित्य रूचि  - पूनम
कल्पना व साधना
कृति की आराधना  - निर्मल सुरेन्द्र
शब्दों के मोती
चुनते चलें  सभी
बुनें सृजन  - पूर्णिमा
कुछ भाव पिरोएँ
कुछ बिम्ब सजाएँ  - सुधा राठौर
कुछ अक्षर
थोड़े बहुत शब्द
भाव प्रवल - अविनाश बागड़े
होते गहरे अर्थ
देते हमें रोशनी  - रामेश्वर बंग
दीप निःस्वार्थ
जला करे जाँबाज
तम परास्त  - राकेश गुप्ता
मिटता है अँधेरा
मिलता है प्रकाश  - रामेश्वर बंग
ज्ञान प्रदीप्त
बने आकाशदीप
आत्मा उज्ज्वल  - मधु सिंघी
मन करे शीतल
महकता चंदन - रामेश्वर बंग
सुखानुभूति
सदा रहे स्वीकृति
होती प्रगति  - मधु सिंघी

निरंतर चलना
सुखद अनुभूति  - प्रदीप कुमार

शब्दो की माला,
पांच सात पांच ये,
अर्थ है पूर्ण  - पूनम
हाइकु और रेंगा
प्रवाह बना रहे  - अविनाश बागड़े
मन सरिता
शब्द शब्द के मोती
कृति है काव्य  - रामेश्वर बंग
ऊर्जावान बनाये
ये प्रदीप दीपक - अविनाश बागड़े
शिक्षार्थी हम
गुरुजन सम्मुख
नतमस्तक  - सुधा राठौर
गुरु देते आशीष
शब्द शब्द का ज्ञान - रामेश्वर बंग
ज्ञान की पूँजी
अमूल्य धरोहर
करें अर्जित  - सुधा राठौर
निखारे मन भाव
जीवन मे आलोक - रामेश्वर बंग
जीवन पथ
भर देता उजास
ज्ञान -प्रकाश - सुधा राठौर
देता नव चेतना
खिले खुशी के फूल - रामेश्वर बंग
वैश्विक रूप
कस्तूरी की तलाश
मिला स्वरुप - अविनाश बागड़े
रचा है इतिहास
विश्व पटल पर - रामेश्वर बंग
होवे प्रशस्त
सृजन का ये पथ
नित सतत - सुधा राठौर
मिल जाये कस्तूरी
तलाश हो सफल - अविनाश बागड़े
     ■

रविवार, 31 दिसंबर 2017

हाइकु मञ्जूषा दिसम्बर माह 2017 के चयनित हाइकु

                                           हाइकु मञ्जूषा

                             दिसम्बर - 2017 के चयनित हाइकु

                                  {श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन}

                            संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" एवं "हाइकु की सुगंध" समूह से साभार । )

01.
नदी का कर्ज
सागर भेजे मेघ
निभाये फर्ज ।

✍ऋतुराज दवे

02.
सर्दी की धूप
वनवासी कन्या का
उजला रूप ।

✍अयाज़ ख़ान

03.
चाँद उलझा
बादलों की राह में
रात का साया ।

✍अविनाश बागड़े

04.
खेत में आग
पुवाल का टुकड़ा
चिड़ि ले फ़ुर्र ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

05.
तितली-पंख
पीने लगे चोरी से
फूलों के रंग ।

✍सुधा राठौर

06.
तुम्हारे लिए
रेत पर उकेरे
मन के भाव ।

✍सुशील शर्मा

07.
नहाती रोज
उल्फत की फसलें
बहता लहू ।

✍रामेश्वर बंग

08.
निशा अतिथि
कलानिधि चंचल
सखी कौमुदी ।

✍अंकिता कुलश्रेष्ठ

09.
पाषाण खण्ड
किनारे से निकला
सफेद दूब ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

10.
बाँस की पोरी
छिन्न-भिन्न हृदय
गाती है लोरी ।

✍सुधा राठौर

11.
कर्म कल्मष
गुलाब कण्टक सा
दिल को छेदे ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

12.
गुलाब कली
शूलों संग पलती
सुगंध भली ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

13.
विमल रूप
कुहासे से निकली
स्वर्णाभ धूप ।

✍पुष्पा सिंघी

14.
पीपल पर्ण
रेखाएं कर्म ऋण
चुका उऋण ।

✍हेमलता मिश्र

15.
कोहरा कहाँ
मन में या बाहर
ढूँढ़ो तो सही ।

✍सतीश राठी

16.
द्वारे पे आई
बेटी को दी बिदाई
फूटी रुलाई ।

✍डाॅ. वीणा मित्तल

17.
बेटी का बाप
झेलता अभिशाप
दहेज़ सांप ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

18.
सुबह-शाम
हो गया आसमान
लहु-लूहान ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य'

19.
छुई मुई सी
सिकुड़ती जा रही
पूस की धूप ।

✍किरण मिश्रा

20.
यामिनी लाई
सितारों की चुनरी
सजी धरित्री ।

✍सविता बरई

21.
ढलती साँझ
पुराने कागज पे
नये तराने ।

✍पुष्पा सिंघी

22.
मन का द्वार
तू प्रेम की झाड़ू से
सदा बुहार ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

23.
सर्दी की रात
खरोंच रहा बूढ़ा
ठंडा अलाव ।

✍दिनेश चंद्र पांडेय

24.
बनी कहानी
महकी रात भर
रात की रानी ।

✍आर. के. निगम "राज़"

25.
सर्द हालात
कंपकंपाती रात
ठिठुरे गात ।

✍दाता राम पूनिया

26.
ये खलिहान
किसानों की मुस्कान
सोने की खान ।

✍सुमिधा "हेम" सिदार

27.
प्रभु मिलन
ये आत्मा बंजारन
छोड़ती तन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

28.
सरिता थी वो
कल कल करती
गुम हो गई

✍जाविद अली

29.
लाख टका है
तेरी वाणी का मोल
तोल के बोल ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

30.
सत्संग हॉल
लाउडस्पीकर में
शांति का पाठ ।

✍अभिषेक जैन

31.
टूटते रिश्ते
अस्तित्व को ढूँढता
बुजुर्ग पेड़ ।

✍रामेश्वर बंग

32.
एक किरण
नाप गई क्षितिज
कांपे नयन ।

✍पूनम मिश्रा

33.
जीव है रथी
हाँकता देह रथ
काल सारथी ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

34.
सूरज उगा
काली घनी रात को
देकर दगा ।

✍अमन चाँदपुरी

35.
चलती रात
सुबह की मंज़िल
तिमिर साथ ।

✍अविनाश बागड़े

36.
ख्याली पुलाव
बना रहा मानव
चाँद पे घर ।

✍किरण मिश्रा

37.
छोड़ो तनाव
मैत्री  मानव भाव
मिटते घाव ।

✍एन. एस. गोहिल

38.
धूप नहाई
प्रातः अंगड़ाई ले
धरा मुस्काई ।

✍ऋतुराज दवे

39.
तुम्हारी याद
सूखे फूल का स्पर्श
कोयल कूक ।
   
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

40.
भोर की लाली
सुनहरे सपने
ले कर आई ।

✍मधु गुप्ता

41.
प्रण है प्राण
जीवन अभियान
करो प्रयाण ।

✍संजीव कुमार पाणिग्राही

42.
मन सागर
सीप सी थाह सोच
देती है मोती ।

✍रामेश्वर बंग

43.
पूस की ठंड
रात खोजती रही
सूर्य दुशाला ।

✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

44.
ख़्याली पुलाव
वायदों की रेवड़ी
आया चुनाव ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

45.
मनभावन
ऊगता हुआ रवि
रश्मि के संग ।

✍शुचिता राठी

46.
दुंदुभि बजी
नव ऊर्जा संचार
लो भोर आयी ।

✍मधु सिंघी

47.
सूक्ष्म शरीर
मन की चंचलता
चांद के पार ।

✍मनीलाल पटेल "नवरत्न"

48.
बाँटें खुशियाँ
बन के तितलियाँ
भोली बेटियाँ ।

✍अनिल शुक्ला

49.
बेटी चिरैया
कर्तव्य तिनके से
बुने घरौंदा ।

✍ऋतुराज दवे

50.
सोन चिरैया
अंगना में बिटिया
धन पराया ।

✍हेमलता मिश्र

51.
यत्न प्रबल
प्रारब्ध को बदल
नर सबल ।

✍दाता राम पुनिया

52.
भाव विभोर
हँसती हरियाली
रक्तिम भोर ।

✍अविनाश बागड़े

53.
वह सरिता
वजुद समर्पित
सिन्धु को सदा ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

54.
ज्ञान के स्रोत
गोता लगाते ज्ञानी
भाव विभोर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

55.
स्वर्ण बिखरा
झील की देह पर
कमल हँसा ।

✍सुशीला जोशी

56.
नवल पत्ते
प्रकृति के श्रृंगार
पुष्प हँसते ।

✍जगत नरेश

57.
मन सरिता
बहे निर्मल धार
शुद्ध विचार ।

✍रामेश्वर बंग

58.
चूजे प्रसन्न
ममता का आगोश
नेह का घोष ।

✍मधु सिंघी

59.
धरा स्तन से
फूटती जल धार
जीवनाधार ।

✍सुशीला जोशी

60 .
उलझीं तो क्या
खोल के सुलझा लो
जिन्दगानियाँ ।

✍राकेश गुप्ता

61.
नदिया प्यासी
सिमटी सी बगिया
फैली उदासी ।

✍राधा 'सवि'

62.
जीवित आस
रिश्ते होते हैं ख़ास
प्राप्ति आभास ।

✍विनय कुमार अवस्थी

63.
जिंदगी आब
कलकल बहती
झरते ख्वाब ।

✍किरण मिश्रा

64.
श्वेत पर्वत
ध्यानरत सन्यासी
मौन का व्रत ।

✍मनीष त्यागी

65.
धूप कनक
बिखर गई अब
धरा मोहक ।

✍पूनम मिश्रा

66.
बाबा का श्राद्ध
कबाड़ी खरीदता
पुरानी खाट ।

✍पुष्पा सिंघी

67.
शुक्ल का चाँद
दिनोदिन बढ़ता
घटे कृष्ण में ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

68.
विस्तृत नभ
मौन और निस्तब्ध
है हतप्रभ ।

✍सुधा राठौर

69.
अति है बुरी
नीयत क्या समझी
छवि गँवाई ।

✍विनय कुमार अवस्थी

70.
मन गगन
सपनों में खो गये
बंद नयन ।

✍सविता बरई

71.
श्वेत कफ़न
वो भी बन न सका
अंतिम धन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

72.
चाँद निखरा
बादलो का लिबास
धुंध श्रृंगार ।

✍शुचिता राठी

73.
वक्त के साथ
मिट जाते अक्सर
घाव गहरे ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

74.
रवि सदन
करती है किरण
अभिवादन ।

✍अविनाश बागड़े

75.
झुर्रियाँ कहे
दुनिया बदली है
वृद्घाश्रम में ।

✍रति चौबे

76.
प्रदोष चाँद
उग आया गगन,
शुभ्र है साज ।

✍पूनम मिश्रा

77.
पूस की रात
कंपित दीप की लौ
दादी के हाथ ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

78.
बही बयार
मुस्काई है प्रकृति
गाए मल्हार ।

✍नीरु मोहन

79.
माटी मितान
अन्धाधुंध कटाई
रोए किसान ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

80.
झाँकता रवि
धुन्ध की चादर से
रक्तिम भोर ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

81.
सिंदूरी शाम
चाँद के आगोश में
शीतल छाँव ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

82.
कटी पतंगें
सजा बूढ़ा पीपल
आयी खिचड़ी ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

83.
बर्फीली शिखा
हवा छूकर चली
सूरज दिखा ।

✍शैलमित्र अश्विनीकुमार

84.
मन की पाँखें
अनुपम उड़ान
अम्बर नापें ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

85.
बागी दरिया
हतबल नौकाएँ
टेर लगाएँ ।

✍इंदिरा अग्रवाल

86.
बर्फीली हवा,
सुई सी चुभोती है
पूस की रात।

✍देवेन्द्र नारायण दास

87.
मन तरंग
लेती जब हिलोरें
बढ़े उमंग ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

88.
स्निग्ध पूरब
स्तब्ध प्रकृति यहाँ
शीत लहर ।

✍राजेश पाण्डेय

89.
दुबका रवि
ओढ़ कर फिर से
निशा रजाई ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

90.
सजग रहो
सुख दुख सबमें
प्रणत रहो ।

✍डाॅ.मीना कौशल

91.
बीता समय
झरने लगे फूल
ठूँठ जीवन ।

✍ऋतम्भरा

92.
भोर के संग
दिवाकर ले आये
आस उमंग ।

✍चंचला इंचुलकर सोनी

93.
श्रेष्ठ  विधान
सूरज  से  मिलता
दिशा  का  ज्ञान ।

✍बलजीत सिंह

94.
सुबह हुई
रवि धुनिया धुने
रश्मि की रुई ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

95.
मैके की याद
छोंक रही है बहु
दाल के साथ ।

✍अभिषेक जैन

96.
मित्रों के संग
बदल जाते सदा
जीवन रंग ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

97.
चंद्र किरण
धरती पे उतरी
जग मगन ।

✍रेनू सिंघल

98.
बेटी बिदाई
कलेजे का टूकड़ा
होती पराई ।

✍मधु गुप्ता

99.
भागी सहम
माँ के काले टीके से
बुरी नज़र ।

✍ऋतुराज दवे

100.
खिलती धूप
हँसते  है सुमन
सजती धरा ।

✍पूनम मिश्रा

101.
कोमल स्पर्श
मखमल सी धूप
निराला रूप ।

✍शुचिता राठी

102.
श्वेत बादल
नभ में भरे रंग
हवा के संग ।

✍रामेश्वर बंग

103.
ईश का पता
रिश्तों के शिखर पे
माता व पिता ।

✍ऋतुराज दवे

104.
बच्चे हैं न्यारे
ममता के मूरत
जमी के तारे ।

✍डॉ. संतोष चौधरी

105.
नदी पठार
प्रकृति के आकार
धरा आधार ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

106.
ऊषा जो आई
रजनी ने समेटी
काली रजाई ।

✍ऋतुराज दवे

107.
बच्चे हमारे
नभ के जैसे तारे
ईश के प्यारे ।

✍नीरू मोहन

108.
हमसफ़र
जीवन के डगर
सुन्दर पल ।

✍नीलम शुक्ला

109.
पीला है पर्ण
रंगहीन जीवन
ढूँढता ठौर ।

✍रामेश्वर बंग

110.
ठंडी ही होती
रजनी की थाली में
पूनो की रोटी ।

✍ऋतुराज दवे

111.
सूरमेदानी
साँझ की अँखिया है
बड़ी सुहानी ।

✍शुचिता राठी

112.
कुर्सी के ठाठ
चुनावी ठेले पर
बंदर बाँट ।

✍इंदिरा किसलय

113.
निशा के खेत
जुगनू बने तारे
दौड़ते सारे ।

✍ऋतुराज दवे

114.
मन का मौन
बदलता जीवन
देता है पथ ।

✍रामेश्वर बंग

115.
आँसू न बहा
हिम्मत से काम ले
साहस दिखा ।

✍परमेश्वर अंचल

116.
रिश्तों की कली
स्नेह प्यार से खिले
फूल महके ।

✍रामेश्वर बंग

117.
ओस नहाई
दूब ने बटोर ली
शीत-कमाई ।

✍सुधा राठौर

118.
प्यासे पत्थर
बहते निर्झर से
पी रहे जल ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

119.
भानु लाड़ली
ओढ़े चुनरी लाली
भोर नवेली ।

✍पूर्णिमा सरोज

120.
छटा पहरा
हट गया कोहरा
सूरज दिखा ।

✍कपिल जैन

121.
किस दौड़ में
घिसते कलपुर्जे
मानव यंत्र ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

122.
सूर्य किरण
पृथ्वी पे यूँ दौड़ी ज्यों
स्वर्ण हिरण ।
       
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

123.
चाँदनी  भोली
तारों  संग  खेलती
आँख  मिचौली  ।

✍बलजीत सिंह

124.
चाँद चूमता
धरती की चौखट
चाँदनी फैली ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

125.
जीवन रंग
सजीव हो चले हैं
प्रकृति संग ।

✍प्रकाश कांबले

126.
चहके खग
भोर हुई साथियों
चेतन जग ।

✍एन एस गोहिल

127.
गाती थी धुन
बाग से निकल के
चिड़िया गुम ।

128.
पत्तों की बातें
पंछियों के तराने
बाग में जाने ।

✍ऋतुराज दवे

129.
हिन्दू न मुल्ला
मानव बुलबुला
केवल हवा ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

130.
रश्मि गगरी
लुढ़की धरा पर
ज्योति बिखरी ।

✍कृष्णा श्रीवास्तव

131.
शीत लहर
ढा रही है कहर
बनी जहर ।

✍प्रबोध मिश्र 'हितैषी'

132.
है सतरंगी
कहे दिल की बात
मन गुलाब ।

✍रामेश्वर बंग

133.
शीत के शूल
निशा की गलियों में
उगा बबूल ।

✍सुधा राठौर

134.
साफ हृदय
तरू बरगद का
भगाये भय ।

✍एन एस गोहिल

135.
धरा है दंग
मौसम गिरगिट
बदले रंग ।

✍ऋतुराज दवे

136.
ठिठक गई
देहरी पे आकर
साँवली साँझ ।

✍सुधा राठौर

137.
चाँद ने खींचा
सर्दी से डर कर
ओस का पर्दा।

✍मनीष त्यागी

138.
श्रापित हुई
बनी शिला अहिल्या
जोहती स्पर्श ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

139.
गाँव की गोरी
अर्घ्य सुर्य तुलसी
ममता लोरी ।

✍एन एस गोहिल

140.
आत्मा अटकी
अधर में लटकी
मुक्ति जरूरी ।

✍विनय कुमार अवस्थी

141.
घना कोहरा
ठिठुरता बदन
माघी पहरा ।

✍भीष्मदेव होता

142 .
नूतन वर्ष 
जीवन में उत्कर्ष
कर संघर्ष ।

✍किरण मिश्रा

143.
कल्पित मन!
ठिठुरता बसेरा
कलपे जन ।

✍एन एस गोहिल

144.
नूतन वर्ष
खुशियाँ हों या हर्ष
जीव उत्कर्ष ।

✍कुमार आदेश चौधरी 'मौन'

145.
भोर का प्यार
किरण की थपकी
कली मुस्काई ।

✍ऋतुराज दवे

146.
दौड़ाते साथ
उम्र के पड़ाव पे
नूतन ख्वाब ।

✍ऋतुराज दवे

147.
कसमसाई
धूप है अलसाई
गुनगुनाई ।

✍शगुफ्ता यास्मीन काज़ी

148.
बिछड़ा वर्ष
यादों की झरोखा दे
शुभ विदाई ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

149.
भेद अंधेरा
निकला है सूरज
नए वर्ष का ।

✍राजीव गोयल

150.
वर्ष नूतन
सूर्य रश्मियों संग
भर दे रंग ।

✍रामेश्वर बंग

151.
वर्ष नवल
पूरण हों सभी के
शुभ संकल्प ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

देहरी पे सूरज (हाइकु मुक्तक संग्रह की समीक्षा)

  मन को सहज उद्वेलित करता हाइकु मुक्तक संग्रह "देहरी पे सूरज"

                                    कृतिकार : - देवेन्द्र नारायण दास   

प्रकाशक : पूजा ग्राफिक्स बसना       प्रकाशन वर्ष - नवम्बर 2017

पुस्तक मूल्य 100/------                                           68 पृष्ठ

___________________________________________________________________________________

समीक्षक : - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


     हाइकु मूलतः जापानी काव्य विधा है, जिसका शिल्प विधान भारतीय काव्य साहित्य में 05,07,05 वर्णक्रम के क्रम की त्रिपदी लघु काव्य के रुप में स्वीकार किया गया है । भारत में जापान की प्रसिद्ध साहित्यिक विधा हाइकु, ताँका, सेदोका, चोका, हाइबन व रेंगा में लेखन चलता आ रहा है । यह निरा सत्य है कि भारत में "हाइकु" 17 वर्ण की मुकम्मल एक संपूर्ण कविता का रूप है । जापान में इस पर किसी भी प्रकार का प्रयोग अब तक स्वीकार्य नहीं है, परंतु भारत में इस विधा का भारतीयकरण के प्रयास में इसे एक छंद रुप में भी स्वीकार कर कई प्रयोग किये जा चुके हैं व किये जा रहे हैं । हाइकु विधा पर इन प्रयोगों की प्रारंभिक कड़ी में आ. नलिनीकांत जी, डाॅ. सुधा गुप्ता जी, डाॅ. मिथिलेश दीक्षित जी, शैल जी, आ. रामनारायण पटेल जी का नाम अग्रिम पंक्ति में है । प्रयोग अच्छी बात है, परंतु ध्यान की आवश्यकता है कि इन प्रयोगों से हाइकु की आत्मा पर किसी प्रकार का कुठाराघात न हो ।

        हाइकु विधा में प्रयोग के दौरान इस पर कविता, गीत, गजल, रुबाई आदि पर  संप्रेषणीयता के साथ लेखन किये जा रहे हैं, इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ हाइकुकार देवेन्द्रनारायण दास जी का 68 पृष्ठीय हाइकु मुक्तक संग्रह "देहरी पे सूरज" का प्रकाशन निश्चय ही हाइकुकारों में सुखद अनुभूति का संचार करता है । पूजा ग्राफिक्स बसना द्वारा  पुस्तक की बेहतरीन छपाई एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ मन मोह रहा है । संग्रह में रचनाकार द्वारा बड़ी तल्लीनता से रचे गये 136 उत्कृष्ट हाइकु मुक्तक सन्निहित हैं । संग्रह को हाइकु जगत की विदूषी वयोवृद्ध हाइकु कवयित्री आ. सुधा दीदी का आशीष प्राप्त होना भी संग्रह के सौभाग्य का विषय है । सत्साहित्य की साधना में लीन, संघर्षशील रचनाकार आदरणीय देवेन्द्रनारायण दास जी के श्रम की मुक्तक रचनाएँ अपूर्व शांति पहुँचाते हुए पाठक के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ती हैं ।

        संग्रह में बहुत से मुक्तक बेहद प्रभावी बन पड़े हैं, जो मन को सहज उद्वेलित कर रहे हैं । 

मुक्तक की एक बानगी देखें ------

   जलती रही/सुधियों की कंदील/तुम न आये ।

   सितारों वाली/रात ढलती रही/तुम न आये ।

   सावनी रात/सुलगती रहती/प्राण की बाती ।

   याद आती है/तुम्हारी प्यारी बातें/तुम न आये ।।

        (पृ.क्र. 02, मुक्तक क्र. 03)

      संग्रह की मुक्तक रचनाओं में रचनाकार के वैयक्तिक भाव से ले कर सामाजिक व राष्ट्रप्रेम की भावनाओं के साथ साथ रचनाकार की अंतः पीड़ाएँ, उनके सिसकते हुए मन की दशा, उनके अंतः मन की आवाज, उनकी लेखकीय तन्मयता, प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर मानवीकरण, नित नवीनता का समर्थन, ईश्वरीय सौदर्य तथा ईश्वर के प्रति उनकी गहरी आस्था, कहीं आशा तो कहीं निराशा,  समाज को मानवता के संदेश, दिलों में प्रेम संचार, स्मृतियों की महक के प्रसार, मौसम के मनमोहक अनुबंधों के साथ मादक छंदों के सृजन, शब्द ब्रह्म के प्रति कवि की निष्ठा प्रदर्शन, आदि-आदि रचनाकार के मुखरित स्वर संग्रह को जीवट प्रदान करने हेतु पूर्ण सक्षम हैं ।

       निष्कर्षतः सार रुप में कहना चाहूंगा कि "देहरी पे सूरज" आदरणीय देवेन्द्रनारायण जी द्वारा रचित उत्कृष्ट मानसिक व प्राकृतिक बिम्बों की भरपूर रचनाओं का महत्वपूर्ण संग्रह है । हाइकु मुक्तक के इस सफल संग्रहण के रचनाकार परम आदरणीय देवेन्द्रनारायण दास जी को उनके इस उत्कृष्ट व अनुपम संग्रह के प्रकाशन की ढेर सारी शुभकामनाएँ व बधाई देते हुए पाठक वर्ग से अपने ज्ञान की वृद्धि हेतु इस पुस्तक को अवश्य पढ़ने की अपील करता हूँ ।

   प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

  साहित्य प्रसार केन्द्र साँकरा,

   जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

  पिन - 496554

   pkdash399@gmail.com

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