हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐
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रविवार, 26 सितंबर 2021

दीप और पतंग (हाइकुकार : प्रदीप कुमार दाश "दीपक")

दीप और पतंग

हाइकु 

1)

पूस की रात 

हल्कू जाएगा खेत 

मन उदास ।


2)

अकड़ खूब 

बहे बाढ़ में पेड़ 

बचती दूब ।

 

3)

नदी सिमटी 

कचरों के ढेर में 

पीर उफनी ।


4)

स्मृति कोलाज

अँसुवन की धार 

गीले अल्फाज ।


5

माटी का तन

प्रकृति की गोद में 

ठहरा मन ।


6

अमा की रात 

दीप बेपरवाह 

स्वयं प्रकाश ।


7

अमरबेल 

बढ़ती जाती लता 

सत्ता लालसा ।


8

धूप से तंग

उड़ गए बेमन 

फूलों के रंग ।


9

थोड़ी सी राख 

अंतिम सत्य यही 

फिर भी साख ।


10

कली चटकी 

भौंरे थे मतवाले 

महक लुटी ।


11

व्योम से पानी 

समष्टि हेतु सदा 

वो बलिदानी । 


12

धरा - आकाश 

कोहरे की चादर 

कोमल पाश ।


13

उषा के भाल

दमकती बिंदिया 

सूरज लाल ।


14

दीप सम्मुख

थकी, हारी व झुकी 

निविड़ निशा ।


15

घना अंधेरा 

दीप जलता रहा 

मन अकेला ।


16

प्रीत में जंग 

कैद हुआ गुलाब 

डायरी बंद ।


17

स्वच्छ है जल 

कीचड़ से निकला 

खिला कमल ।


18

वृक्ष है चुप 

हवा, पानी व धूप 

सँवरे रूप ।


19

भीड़ दिखावा 

साथ यहाँ छलावा

चल अकेला । 


20

वक्त की मार 

पतझड़ में पत्ते 

सहते घात । 


21

तंतु हजार 

बुनती चदरिया 

देह जुलाहा ।


22

चली कुल्हाड़ी 

रोते देख पेड़ को 

रुठे हैं मेघ । 


23

खिले सुमन 

बाँचती चली हवा 

मृदु सुगंध ।


24

चांद सौगात 

चेहरा चमकाती 

कजरी रात ।


25

चांद तनहा 

झील की पगडंडी 

चला अकेला ।


26

आँखें बोलतीं 

सन्नाटे की आवाज 

राज खुलती । 


27

कुएं में बाल्टी 

जब जब झुकती 

भर के आती ।


28

शलभ गान 

प्रेम पंथ दीपक 

महाप्रयाण ।


~ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆

रविवार, 16 मई 2021

हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकुकार 

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


हाइकु 

--0--


रिश्ते व नाते 

बोनसाई हो गए

मौन जज़्बात ।


मातृ दिवस 

बूढ़ी माँ थक गई

देख नाटक ।


हाय दौलत

नोंचे जिंदा इंसान 

कैसे ये गिद्ध ?


आरियाँ चलीं 

क्रुद्ध हुई प्रकृति 

मौत लौटाई ।


अकेला सूर्य 

आलोकित करता

संपूर्ण जग ।


चुप है मिट्टी 

हवा के अनुकूल 

धूल लिपटी ।


ढाया सितम 

कोरोना का मौसम 

बदलें हम ।


कोरोना रोग

यह कैसा मौसम

छाया है शोक ।


दरख्त सूखे

सूखी पत्ती मानिंद 

झड़ते लोग ।


आया संकट

धैर्य की है लड़ाई

रखें हिम्मत ।

---00---


□  प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

हाइकु (俳句)

 हाइकु                      俳句





1.

अंधेरी रात                   暗い夜

दीपक बता रहा            深く伝える     

उसे औकात ।              彼に 状態

   

2.

शिशिर रात                  冬の夜

शीतल हैं जज़्बात         感情は寒い

पेड़ों के गात ।              木の体


3.

छठ का पर्व                  第6 お祭りの

उदीयमान सूर्य               朝日

प्रथम अर्घ्य                   最初の崇拝


4.

अमा की रात                月の夜

दीपक लड़ रहा             ディーパックは戦っている

तम के साथ ।               暗闇で


5.

नन्हा सा पौधा              小さな植物

मिट्टी, पानी व               土壌、水、空気

पोषित काया ।              保護された体格


6.

अमरबेल                      ネナシカズラ

बढ़ती जाती लता           成長するクリーパー

सत्ता लालसा ।              パワーへの憧れ


7.

टूटे हैं पत्ते                     葉が壊れている

छिपा न सके पीर           痛みを隠すことができませんでした

निर्वस्त्र पेड़ ।                 ヌードツリー


8.

छोटा सा कूप                小さな井戸

समझ लिया जग            彼の世界と同じ

खूश मंडूक ।                 幸せなカエル


9.

शीत आतंक                  コールドパニック

सरगुजिहा ठंड               スルグジャの寒さ

बिच्छू का डंक               スコーピオン刺傷


□  प्रदीप कुमार दाश

□  プラディープクマールダッシュ

शनिवार, 30 जनवरी 2021

भारतीय हिन्दी काव्य साहित्य की श्रीवृद्धि में प्रतिष्ठित जापानी काव्य शैलियाँ

 भारतीय हिन्दी काव्य साहित्य की श्रीवृद्धि में प्रतिष्ठित जापानी काव्य शैलियाँ


          आठवीं शताब्दी में जापान के इतिहास में "नारा युग के नाम से अभिहित "मान्योशू" काल में ताँका (वाका), सेदोका और चोका तीन काव्य शैलियां प्रसिद्ध हुईं । इसके उपरांत हाइकु, सेन्रियु, रेंगा (श्रृंखलित पद्य), हाइगा, कतौता एवं अन्य कई काव्य शैलियां जापानी साहित्य में प्रचलित हुईं । गद्य/पद्य के मिश्रित रूप "हाइबुन" की शैली यात्रा साहित्य के रूप में प्रचलित रही । इन सभी शैलियों में 5-7 वर्ण पंक्तियों की प्रमुखता देखी जा सकती है । इन शैलियों में "हाइकु" अत्यधिक प्रचलित काव्य शैली के रूप में प्रसिद्ध है । जापान की ये बहुचर्चित काव्य शैलियाँ भारतीय साहित्य में भी विशेष चर्चित व प्रतिष्ठित हैं । इन काव्य शैलियों का प्रारंभिक परिचय देखते हैं -


हाइकु

           हाइकु मूलतः जापान का एक काव्य रूप है, 15 वीं शताब्दी में रेंगा की प्रारंभिक तीन पंक्ति "होक्कु" के बंधन से मुक्ति पाकर स्वतंत्र कविता "हाइकु" के नये नाम से विकसित हुआ । 17 वीं शताब्दी में बाशो द्वारा "हाइकु" को एक काव्य विधा के रूप में नई प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी के सौजन्य से भारतीय साहित्यकारों को हाइकु का प्रारंभिक परिचय प्राप्त हुआ । वर्ष 1985 में प्रकाशित "शाश्वत क्षितिज" हिन्दी का प्रथम हाइकु संग्रह है । "हाइकु" एक ऐसी संपूर्ण लघु कविता है जो पाठक के मर्म मस्तिष्क को तीक्ष्णता से स्पष्ट करते हुए झकझोरने की सामर्थ्य रखता है । विश्व की सबसे छोटी और चर्चित विधा "हाइकु" भारत में 5-7-5 वर्णक्रम की त्रिपदी लघु कविता है जिसमें बिम्ब और प्रतीक चयन ताजे होते हैं । एक विशिष्ट भाव के आश्रय में जुड़ी हुई इसकी तीनों पंक्तियां स्वतंत्र रहते हुए भी एक अन्य आश्रित पंक्तियों के बिना अधूरी होती हैं । प्रकृति के साथ जीवन के सौंदर्य बोध से जुड़े जो सहज हाइकु काल सापेक्ष में पाठक के मर्म को स्पर्श करने में समर्थ होते हैं वही कालजयी हाइकु होते हैं । "हाइकु" में एक पूरी कविता का एहसास महत्वपूर्ण होता है ।


सेन्रियु

          सेन्रियु शिल्प की दृष्टि से हाइकु के समान लघु कविता का एक जापानी रूप है । रेंगा काल में "हाइकु" के वजन का "हाइकाई" शब्द हास्य व्यंग की रचनाओं के लिए प्रयुक्त हुआ, ठीक इसी तरह "हाइकु" के वजन का "सेन्रियु" शब्द प्रयुक्त हुआ । हाइकु "हाइकु" है और सेन्रियु "प्रतिहाइकु" है । सेन्रियु में धर्म, मनुष्य की दुर्बलता है, अंधविश्वास है । सेन्रियु  हल्के फुल्के व गहरे हास्य के होते हैं जबकि हाइकु गंभीर होते हैं । सेन्रियु  में हाइकु के विपरीत कीगो या किरेजि शब्द नहीं होते । हाइकु और सेन्रियु में केवल कलेवर की साम्यता है शेष सर्वथा अलग । सेन्रियु शुद्ध जैविक धरातल पर यथार्थ जगत से विषय चुनता है । इसमें मनुष्य के दुर्बल क्षणों पर व्यंग के छींटे होते हैं, सेन्रियु के मूल में मनुष्य है, प्रकृति नहीं । शिल्प की दृष्टि से हाइकु व सेन्रियु दोनों समान हैं परंतु मूल संवेदना की दृष्टि से दोनों पृथक-पृथक हैं । वर्ष 2003 में हिंदी का प्रथम सेन्रियु संग्रह "रूढ़ियों का आकाश" प्रकाशित हुआ है ।


ताँका

          ताँका (वाका) जापान का बहुत ही प्राचीन काव्य रूप है । यह क्रमशः 5-7-5-7-7 के वर्णानुशासन में रची गई पंचपदी रचना है, जिसमें कुल 31 वर्ण होते हैं । इसमें व्यतिक्रम स्वीकार नहीं है । हाइकु विधा के परिवार की इस "ताँका" रचना को "वाका" भी कहा जाता है ताँका का शाब्दिक अर्थ लघुगीत माना गया है । ताँका शैली से ही 5-7-5 वर्णक्रम के "हाइकु" स्वरूप का विन्यास स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त किया है । वास्तविकता यह है कि "ताँका" हाइकु की भांति अतुकांत वर्णिक कविता है । लय इसमें अनिवार्य नहीं, परंतु यदि हो तो काव्यात्मक सौंदर्य बढ़ जाता है । एक महत्वपूर्ण भाव पर आश्रित ताँका  की प्रत्येक पंक्तियां स्वतंत्र होती हैं । शैल्पिक वैशिष्ट्य के दायरे में ही रचनाकार के द्वारा रचित कथ्य की सहजता, अभिव्यक्ति क्षमता व काव्यात्मकता से परिपूर्ण रचना श्रेष्ठ ताँका कहलाती है । हिंदी का प्रथम एकल ताँका संग्रह "अश्रु नहायी हँसी" वर्ष 2009 में आया ।


चोका

        चोका जापानी कविता की एक बहुचर्चित काव्य शैली है । चोका में  न्यूनतम 09 पंक्तियाँ आवश्यक हैं, इस कविता की अधिकतम लंबाई रचनाकार के ऊपर निर्भर है । इस शैली की पंक्तियों में 5 व 7 वर्णों की आवृत्ति होती है । अंतिम पांच पंक्तियों में 5-7-5-7-7 वर्ण की एक ताँका रचना का क्रम व्यवस्थित होता है । चोका मूलतः गायन किया जाता है एवं ऊँचे स्वरों में इसका वाचन भी किया जाता है । वर्ष 2011 में हिंदी का प्रथम चोका संग्रह "ओक भर किरनें" प्रकाशित हुआ है ।


सेदोका

         सेदोका 5-7-7-5-7-7 वर्णक्रम की षट्पदी छः चरणीय एक प्राचीन जापानी काव्य विधा है । इसमें कुल 38 वर्ण होते हैं, व्यतिक्रम स्वीकार नहीं है । इस काव्य के कथ्य कवि की संवेदना से जुड़ कर भाव प्रवलता के साथ प्रस्तुत होने वाली एक प्रसिद्ध काव्य विधा है । सेदोका में निर्दिष्ट भाव से आश्रित पंक्तियाँ "हाइकु" की तरह स्वतंत्र होना एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है । दो कतौते से एक सेदोका पूर्ण होता है । सेदोका भी हाइकु विधा के परिवार की ही एक काव्य शैली है । वर्ष - 2012 में प्रकाशित "बुलाता है कदंब" हिंदी का प्रथम सेदोका संग्रह है ।


रेंगा

          हिंदी हाइकुकारों के लिए यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि "हाइकु" रेंगा की प्रारंभिक तीन पंक्तियां हैं । हेइयान युग में काव्य रचना अभिजात्य वर्ग की सांस्कृतिक अभिरुचि का विषय था । दो अथवा दो से अधिक रचनाकार मिल कर काव्य की रचना करने लगे जिससे रेंगा (श्रृंखलित पद्य) की परंपरा का विकास हुआ । इसमें एक व्यक्ति 5-7-5 वर्णक्रम की प्रथम तीन पंक्तियों की रचना करता है, जिसे "होक्कु" कहते हैं । दूसरा रचनाकार 7-7 वर्ण क्रम की दो पंक्तियां जोड़ कर उसे पूरा करता है । इस 31 वर्ण के ताँका शिल्प की कविता मे अब तीसरा व्यक्ति दूसरे की रची हुई दो पंक्तियों को कविता का पूर्वांश मान कर 5-7-5 वर्णों की अगली कड़ी जोड़ता है,  जिसका पूर्व कड़ी से कोई संबंध होना आवश्यक नहीं है । यह श्रृंखला आगे बढ़ाई जाती है एवं एक स्थान पर इस काव्य श्रृंखला को पूर्णता प्रदान की जाती है । श्रृंखलित पद्य के इस पूर्ण  रूप को "रेंगा" कहा जाता है । वर्ष - 2017 में 66 कवियों द्वारा हिंदी भाषा में रचित "कस्तूरी की तलाश" विश्व के प्रथम रेंगा संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है । 

         जापानी कवि किकाकु रेंगा की प्रथम तीन पंक्तियाँ 'होक्कु' को वृक्ष के तने के समान, द्वितीयांश को शाखाओं के समान, तृतीयांश को धरती के समान तथा नई-नई कड़ियां जोड़ते चले जाना कोंपलों के समान माना है ।


हाइगा

      जापानी लिपि चित्रात्मक होती है, जिसे कांजी कहते हैं । वहाँ सुलेख (कैलीग्रैफी) को विशेष ध्यान दिया जाता है । जापान में काली स्याही की चित्रांकन कला को "सुमिए" कहते हैं । 17 वीं शताब्दी के प्रारंभ में सुमिए के साथ हाइकु का संयोग निखरा, जिसे "हाइगा" कहा जाने लगा । "हाइकु" में "कु" का अर्थ कविता और "हाइगा" में "गा" का अर्थ चित्र है । इस प्रकार "हाइकु" कविता चित्र के साथ व्यंजित होना हाइगा कहलाता है । "हाइगा" में चित्रांकन, रचना सृजन और हस्तलिपि तीनों महत्वपूर्ण हैं, चित्र कैलीग्रैफी एवं हाइकु तीनों का संगम हाइगा कहलाता है । हाइगा का रेखाचित्र कलात्मक होना आवश्यक नहीं, वरन भावों को चित्रित करने में समर्थ होना आवश्यक है । हाइगा का शाब्दिक अर्थ है "चित्रकाव्य" । जापान में चित्र के समायोजन से वर्णित हाइकु को हाइगा कहा गया है । इस प्रकार "हाइगा" हाइकु का उसके भावार्थ के साथ सामंजस्य पूर्ण चित्र पर प्रदर्शित रूप होता है । भारत में वर्ष 2016 में प्रकाशित "हाइगा आनंदिका" हिंदी का प्रथम हाइगा संग्रह है ।


कतौता

          कतौता 5-7-7 वर्णक्रम की एक त्रिपदी जापानी काव्य रूप है, जिसमें कुल 19 अक्षर होते हैं । एक एकल कतौता रचना वास्तव में आधी-अधूरी कविता के रूप में रची जाती है, परंतु इस विधा में स्वतंत्रता कतौता के रूप में लेखन का प्रयोग हिंदी में किया जा चुका है । जनवरी 2021 में हिंदी भाषा में प्रकाशित भावों की कतरन हिंदी में ही नहीं वल्कि विश्व के प्रथम कतौता संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है । कतौता 5-7-7 वर्ण क्रम शिल्प की तीन पंक्तियों में निबद्ध, निर्दिष्ट भाव से आश्रित अपने आप में मुकम्मल रूप से स्वतंत्र और पूर्ण रचना है । जापान में इस विधा का उपयोग प्रेमी को संबोधित कविताओं के लिए किया गया था ।


हाइबुन

          हाइबुन एक गद्य कविता है, इसके गद्य में पद्य के पुट रहते हैं । इसे यात्रा विवरण के रुप में लिखा जाता है । यात्रा संदर्भ में बाशो का कथन है कि - "हर दिन एक यात्रा है, और यात्रा ही घर है ।" हाइबुन का "गद्य" हाइकु का स्पष्टीकरण नहीं होता और इसमें उल्लेखित हाइकु गद्य की निरंतरता भी नहीं है । गद्य पाठ में प्रत्येक शब्द की गिनती गद्य कविता की तरह होनी चाहिए । स्तरीय हाइबुन गद्य पाठ को सीमित करता है, जैसे कि उत्तम हाइबुन में 20 से 180 शब्द एवं अधिकतम दो पैराग्राफ़ पर्याप्त हैं । इस लघु गद्य में कसावट आवश्यक है । हाइबुन में आमतौर पर केवल एक हाइकु सम्मिलित किया जाता है, जो गद्य के बाद होता है, गद्य के चरमोत्कर्ष के रूप में "हाइकु" अपनी सेवा प्रदान  करते  हुए हाइबुन का प्रतिनिधित्व करता है ।

         गद्य और हाइकु दोनों के मिश्रण में रस ही महत्वपूर्ण है । गद्य को उस गहराई से जोड़ना चाहिए जिसके साथ हम हाइकु का अनुभव कर सकें । हाइबुन की महत्ता हाइकु को गद्य के अर्थ से सहज जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है । हाइबुन के लेखक को संवेदनशील होकर भी निरपेक्ष होना चाहिए अन्यथा यात्रा के स्थान पर यात्री के प्रधान हो उठने की संभावनाएं बढ़ जाएगी, तथा वह अभिव्यक्त यात्रा साहित्य हाइबुन न रहकर आत्म चरित्र या आत्म स्मरण बन सकता है । इस विधा के पीछे का उद्देश्य हाइबुन लेखक के रमणीय अनुभवों को हुबहू पाठक तक प्रेषित करना है । जिसके माध्यम से पाठक उस अनुभव को आत्मसात  कर  सके उसे अनुभव कर सके ।

            जापान की ये सभी काव्य शैलियाँ अपनी काव्यात्मक कमनीयता एवं प्रभाविष्णुता से भारतीय काव्य साहित्य में घुल-मिल कर भारतीय काव्य साहित्य की श्रीवृद्धि में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं ।


              - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

                       व्याख्याता-हिन्दी 

          साँकरा, जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

                  मो.नं. - 7828104111

मंगलवार, 24 मार्च 2020

प्रदीप कुमार दाश "दीपक" के हाइकु

PRADEEP KUMAR DASH "DEEPAK"

Haiku


1.
The great soul Buddha
Own the search took
Made illuminated .

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
हाइकु 

1.
महात्मा बुद्ध
स्वयं को खोज लिया
बने प्रबुद्ध ।

ପ୍ରଦୀପ କୁମାର ଦାଶ "ଦୀପକ"
ହାଇକୁ

1.
ମହାତ୍ମା ବୁଦ୍ଧ
ଖୋଜି ନେଲେ ନିଜକୁ 
ହେଲେ ପ୍ରବୁଦ୍ଧ ।

PRADEEP KUMAR DASH "DEEPAK" 
俳句 
1。 
大魂仏 自分の検索がかかりました 照らされた。

PRADEEP KUMAR DASH "DEEPAK" 
haiku 
1. 
Dai tamashī Futsu jibun no kensaku ga kakarimashita terasa reta.

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

नूतन वर्ष के हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


नूतन वर्ष के हाइकु 


01.
वर्ष नवल
पूरण हों सभी के
शुभ संकल्प ।

02.
नवीन वर्ष
पग पग में मिले
सदा उत्कर्ष ।

03.
ओस नवल
नव वर्ष का करे
भोर स्वागत ।

04.
नया है वर्ष
उग आया सूरज
भोर नवल ।

05.
व्याप्त हो हर्ष
उत्थान का उत्कर्ष
नूतन वर्ष ।

06.
नूतन वर्ष 
आओ छू लें क्षितिज 
नव संकल्प ।
---0---

□  प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

~ शीत के हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~

शीत के हाइकु 

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु 
--0--

शीत आतंक
सरगुजिहा ठंड
बिच्छू का डंक ।
---0---

पड़े हैं पाले
अकड़ गये पत्ते
पौधे काँपते ।
---0---

शीत लहर
बिछ गयी सुबह
बर्फ चादर ।
---0---

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

प्रदीप कुमार दाश "दीपक" हाइकु (हाइकु दिवस)

हाइकुकार 


प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु 

--0--


धूप से तंग
उड़ गये बेमन
फूलों के रंग ।
--0--

ओस की बूँदें 
कमल पत्र पर
मोती गहने ।
--0--

लम्बी कहानी 
ज़िन्दगी की चादर 
हुई पुरानी ।

--00--

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
04 दिसम्बर 2019 (हाइकु दिवस)

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

~ हाइकुकार प्रदीप कुमार दाश जी के हाइकु ~

हाइकुकार 

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


हाइकु

--0-- 


पीर सताती
जुटा न पाया बाप
दो वक्त रोटी ।

•••

हाय जिंदगी 
भौतिकता की चाह
दौड़ लगाती ।

•••

पाना जो चाहा
सब कुछ पा लिया
मन क्या भरा ?

•••

जीवन जान
मन और चेतना
सर्वस्व मान ।

•••

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

~ • ~ बापू व शास्त्री के प्रति ~ • ~


बापू व शास्त्री के प्रति


01.
देश की शान
अहिंसा की मिसाल
बापू महान ।
-----0-----

02.
बापू थे सच्चे
अहिंसा था दर्शन
वक्त के पक्के ।
-----0-----

03.
नाम था गांधी
देश की आजादी में
अहिंसा आंधी ।
-----0-----

04.
तीन बंदर
दे रहे हैं बापू की
सीख सुंदर ।
-----0-----

05.
छोड़ विदेशी
अपनाए वे देशी
पहने खादी ।
------0-----

06.
अहिंसा लाठी
अंग्रेजों को हिन्द से
दूर भगाई ।
-----0-----

07.
गांधी व शास्त्री
दोनों विभूतियों को
ढेर बधाई ।
-----0-----

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

~~ • ~~ शिक्षक दिवस पर हाइकु ~~ • ~~


हाइकुकार 

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु 

1.
गुरु कुम्हार 
रौंद मिट्टी का लौंदा 
लाये निखार ।

2.
नादान शिष्य
ठोंक-पीट शिक्षक  
निखारे घट ।

3.
गुरु का ज्ञान 
अंधकूप से मुक्ति 
शंका निदान ।

4.
गुरु आशीष 
निराकार ईश्वर
मिले सान्निध्य ।

5.
गुरु महान
शिष्य को करा गये
ईश्वर भान ।

6.
गुरु महान 
जीवन को दिशा दें 
ज्ञान निधान ।

7.
गुरुता गूढ़ 
अज्ञान का अँधेरा
पल में दूर ।
~ • ~

□  प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

मैनपाट - यात्रा काव्य हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

मैनपाट - यात्रा हाइकु 


बड़ा अचंभा

मैनपाट में बहे

पानी उलटा ।


प्रकृति गर्भ 

उबल रहा यहाँ  

तपता पानी । 


झूले समान

जलजली जमीन

दोलायमान ।


बुद्ध विहार

तिब्बतियों की शैली

खास अंदाज ।


सरई पेड़ 

सघन वन बीच

बुलाएँ मेघ ।


पानी सस्वर

कल-कल करते

बहें निर्झर ।


धातु से स्वर

ठिन-ठिन बोलते

यहाँ पत्थर ।


शीत कोहरा

इठलाती प्रकृति 

ओढ़ दुशाला ।


पाट प्रदेश  

मेरा छत्तीसगढ़ 

बड़ा विशेष ।


                □   प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

                              (छत्तीसगढ़)

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

हाइकुकार प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी के हाइकु

हाइकुकार 

~ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु 


{01}

चली कुल्हाड़ी
रोते देख पेड़ों को 
रुठे हैं मेघ ।

☆☆☆

{02}

बोला न दीप
परिचय उसका
प्रकाश गीत ।

☆☆☆

{03}

बुलाते पेड़ 
सूख गई पत्तियाँ 
बरसो मेघ ।

☆☆☆

{04}

आहत मन
काटे लकड़हारा 
पेड़ का तन ।

☆☆☆

{05}
ठूँठ हैं आज
कोंपलें फूटेंगी 
जीवित आस ।

☆☆☆

{06}

पेड़ हैं सूखे
अनगिनत यादें 
रखे सहेजे ।

☆☆☆

{07}

प्रिय पावस
नयी पत्तियाँ सजीं 
करें स्वागत ।

☆☆☆

{08}

पावस रात
हवा, मेघों के संग
पेड़ों की बात ।

☆☆☆

{09}

पेड़ों के ऋणी
प्राण वायु ले कर
जीवित प्राणी ।

☆☆☆

{10}

सघन वन
चट्टानों से निःसृत
निर्झर तन ।

☆☆☆

□   प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
साँकरा, जिला - रायगढ़
(छत्तीसगढ़)

शनिवार, 3 अगस्त 2019

हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


हाइकुकार

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु

नवल ऊषा
खिल उठी कलियाँ
मोद नियंता ।

ठूँठ निराश
बारिश ने जगाई
कोंपल आस ।

जलती बत्ती
मोम पिघल देता
सहानुभूति ।

छाँव में ग़ुमा
धूप के सफ़र में
खुद को पाया ।

वृक्ष है चुप
हवा,पानी व धूप
सँवारें रूप ।

छांव व धूप
जीवन के दो रूप 
सुख व दुःख ।

पीली पत्तियां
पकड़ हुई ढीली
छूटी डालियां ।

ठिठके पाँव
ठहर गई धूप
छाँव के गाँव ।

रब पालक
हम सब इसके 
नन्हे-बालक ।

मन में भेद
कैसे करोगे रफू
दिल के छेद ?

पत्ते झरते
डाली छोड़ दी साथ
किसे कोसते ।

सुख सहज
दुःख के सफर का
चुकाता कर्ज ।

भीड़ दिखावा
साथ यहाँ छलावा
चल अकेला ।

मिट्टी के घर
बेहद मजबूत
रिश्ते पकड़ ।


□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"साँकरा

जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़) 

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