चित्र आधारित हाइकु सृजन प्रतियोगिता
हाइकु ताँका प्रवाह
(माह - मार्च-2021, क्र. 11)
----000----
चित्र आधारित हाइकु सृजन प्रतियोगिता
हाइकु ताँका प्रवाह
(माह - मार्च-2021, क्र. 11)
----000----
हाइकुकार
प्रवीण कुमार दाश
हाइकु
नदी बहती
धरा खुश हो रही
पीड़ा निकली ।
नेह का बीज
उर की भूमि पर
फूटा अंकुर ।
मोती चुगता
क्षीर नीर विवेक
हंस सिखाता ।
बिटिया रानी
जाएगी पी के घर
हुई सयानी ।
जोड़ तू तृण
घोंसले चहकेंगे
सृजन पूर्ण ।
संत आगम
शिशिर अगुवानी
चली हेमंत ।
मेहंदी रची
गाल हो गये पीले
देखो चांद के ।
सूरज उगा
चाहत जीवन में
होता प्रभात ।
प्रकाश सोया
सज उठी बगिया
धूप की शैया ।
मेघ मुस्काया
तरबतर धरा
बीज हर्षाया ।
माँ की ममता
धरा बन सहती
प्रसव पीड़ा ।
ऑंखें युगल
काजल का श्रृंगार
मन सजल ।
राम का स्पर्श
धन्य हुई अहिल्या
शाप से मुक्ति ।
सूर्य की आग
अवनि की ओर में
बढ़ाए ताप ।
धरा की कोख
बीज बोता किसान
फल संतान ।
प्रकृति राह
शजर से जीवन
यही नियम ।
पौधे जीवन
वयता जड़ तन
प्रभु शरण ।
ताल में बड़
डटे अकड़ कर
जड़ पकड़ ।
लड़ती रही
बाधाएं पार कर
सरिता बढ़ी ।
खग चातक
स्वाति बूंद की आस
निहारे नभ ।
सुंदर वन
मोह लेते हैं मन
वृक्ष चंदन ।
प्रवासी पंछी
मन न लगा वहाँ
लौटा वतन ।
पंख सहारे
शीत से बचाती माँ
नन्हें चूजों को ।
--0--
प्रवीण कुमार दाश
साँकरा, जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
हाइकुकार
सुभाष शर्मा
हाइकु
--0--
पानी की बूंद
आसमान से गिरी
माटी मे मिली ।
जीवन खिला
हरित क्रांति आई
खुशियाँ लाई ।
पानी का मोल
जीवन अनमोल
वृक्ष बचाओ ।
पछताओगे
सूखेंगे जब ताल
पंछी बेहाल ।
बसंत आया
चली हवा बासंती
आम बौराया ।
बयार चली
कोंपल इतराए
टेसू मुस्काए ।
जिया तरसे
पिया न आए पास
मिलन आस ।
बैरी मौसम
लगाए कैसी अगन
करो जतन।
पिया मिलन
गौरी क्यों शरमाए
नैना झुकाए ।
---0---
- सुभाष शर्मा
610 A , महालक्ष्मी नगर
इन्दौर (म.प्र.)
चित्र आधारित चोका लेखन प्रतियोगिता
हाइकु ताँका प्रवाह
(माह : फरवरी - 2021, क्र. 10)
----000----
1.
आया प्रभात
स्वर्णिम सा उजास
खिलती कली
कुहासे संग ढली
खोलती मुख
मिल जाये प्रकाश
आयेगा अलि
मकरंद की चाह
लेगा पराग
सुवासित पवन
बहेगी हौले
इतनी सी चाहत
फिर माली तोड़ ले ।
गंगा पांडेय 'भावुक'
2.
कांटो से लड़ी
शबनम में भीगी
भोर में खिली
मासूम सी है कली
बासन्ती रंग
अधखिला बदन
धीमी खुशबू
छिप रहा यौवन
धड़के मन
छेड़ रहा पवन
गाये भंवरा
मंडराए तितली
खिलता रूप
शर्माती पंखुड़ियां
हरीतिमा ने
थामा मेरा जीवन
पीला गुलाब
खुशी और सौभाग्य
का है प्रतीक
देता एक सन्देश
परमप्रिय
ध्यान रखे अपना
सामाजिकता
मित्रता का प्रतीक
पीला गुलाब
सुप्रभात में तारा
चमके सदा
सन्देश देती कली ।
निर्मला हांडे
3.
ब्रम्ह मुहुर्त
ओस का आलिंगन
प्रसन्न पुष्प
मुस्कान बिखेरता
सीख कर्म का
देने लगा अनोखा
मिली प्रेरणा
हँसी नन्ही कलियाँ
पाखी ने छोड़ा
घोसलों में बिछौना
शंखनाद के स्वर
भोर के कर्ण
सिंदुरिया दामन
लहराकर
वसुंधरा प्रांगण
अनंत ऊर्जा
लाई संग सौगात
हँसा पंकज
देता रवि को अर्ध्य
श्रद्धा का पर्व
देख भोर बिसात
गूँजता सुप्रभात !!!
नीलम शुक्ला
4.
अधखिली सी
ओस ओढ़े पंखुड़ी
भिगोती फूल
राह में पंक रोड़े
या मिले शूल
वो खिलना ना भूले
जाड़ा या धूप
सहिष्णु गुण मूल
हो अनुकूल
या वक़्त प्रतिकूल
टूटा, बिखरा
हर पीड़ा क़बूल
शाख़ को छोड़
झर के जाना कूल
एक बसंत
क्षणिक है जीवन
सजा लो शीश
या चरणों की धूल
रंग बिखेरे
पर हित उसूल
जीना सिखाते फूल ।
विद्या चौहान
5.
भ्रमर राग
मुद मंगल गान
अवनि जाग
शुभ नव विहान
स्वर्ण रश्मियाँ
उज्जवल वितान
चटकी कली
अधरन मुस्कान
ओस ठिठके
मखमली संज्ञान
हरित पर्ण
प्रकृति नव प्राण
शुभ्र जलज
सरोवर की शान
सुरम्य ऊषा
छेड़े जीवन तान
चित्त बैरागी
फिरे सब जहान
जाग मनुज
दृढ़ कर संधान
प्रकृति का आह्वान ।
शर्मिला चौहान
6.
पीत पुष्प हूँ
विकसित प्रवृति
खुश्बू बिखेरूं
होता मनभावन
आदर्श बना
आशा से परिपूर्ण
शीश चढ़ता
प्रभुजी के मस्तक
धन्य हो जाता
स्व अस्तित्व रखता
मेरी नियति
परोपकार करूं
सबको भाता
सबके घर आता
न भेदभाव
न गरीब अमीर
सभी है मेरे
मै रहता सबका ही
हरीतिमा फैलाऊँ ।
निर्मला पांडे
7.
टपकी रात
ओस की बूंदे सारी
फूल औ पाती
भीगी है फुलवारी..
आँसू से सींचा
चमन लागे न्यारा
मोती बिखरे
कैसा श्रृंगार प्यारा..
अश्क किसी के
ले के कोई खिलता
सुगंध फैला
मुस्कुरा के मिलता..
ये खेल सारा
किस्मत पे ठहरा
लगता पार
कोई डूबे गहरा..
खुश रहना
मेरे फूल हरदम
उड़ जाउंगी
धूप के पड़ते ही
प्रेम न होगा कम ।
अमिता शाह "अमी"
8.
ओस ने छुआ
कली कुनमुनाई
पाँखुरी खिलीं
कपोल से फिसलीं
पारद बूँदें
निष्कलुष सौंदर्य
पीताभ छवि
हरित परिधान
सृजन का उन्वान ।
सुधा राठौर
9.
नयन खोल
अलसाए भोर में
पद्म कलिका
श्वेत रंग मे रंगी
मदमस्त हो
निहार दल चूमे
रवि स्पर्श से
हौले हौले खिलता
मै अम्बुज हूँ
अनुपम सृष्टि हूँ
सुन्दरतम्
सांकेतिक रचना
राष्ट्रीय फूल
शुद्धता सुंदरता
पंक निलय
सलिल मे खिलता
जग निहारूं
पौराणिक वृतान्त
विधाता देव
प्रसून पंकज से
अमल पुष्प
विष्णुप्रिया आसीन
देते आशीष
समृद्धि फलें फूले
संकुल वन
अलिकुल झूमते
बिखेरे राग
मधुर ताल लिये
कर्म बिया का
भरपूर औषधी
फल आहार
अनुपम अनूठा
नीचे लहरें
ऊपर स्थिर खड़ा
ठाकुर द्वार
शोभायमान होता
अमूल्य धरोहर ।
रूबी दास
10.
मैं शतदल
खिलने को आतुर
होगा सबेरा
फैलाऊॅं पंख सारे
भरूॅं उड़ान
कहूॅं शुभ प्रभात
बाॅंटू खुशियाॅं
कैसी हो कठिनाई
मानूॅं ना हार
भाल बूॅंदें श्रम की
देतीं प्रेरणा
जीतूॅंगा जग सारा
यही संदेशा प्यारा ।
सुषमा अग्रवाल
11.
अंक धरा का
पुलकित हो कर
सृजन दिव्य
जब यूं खिल जाए
मृदुल स्पर्श
मधुरिम तरंग
झूमें पवन
जल कण हैं संग
नयन बंद
नासापुट चंचल
आत्म मुग्धता
आनंद अखण्डित
है पुष्प समर्पित ।
डॉ. शीला भार्गव
12.
आये हैं द्वारे
मन की है भावना
मनो भाव से
करते हैं प्रार्थना
पुष्प लेकर
सुनो प्रभु वंदना
सुखी जीवन
हो, यही है कामना
हाथ जोड़ याचना ।
मीरा जोगलेकर
13.
ओस ने बुनी,
ऊषा संग चुनरी,
प्रत्यूषा लाली,
दुल्हन का स्वरूप,
भोर सजाती,
पंछियों का संगीत
वृंदा झूमती
फूल बने बाराती
पुरवाई का प्यार ।
पूनम मिश्रा पूर्णिमा
14.
हुई है भोर
मै खिल रहा जब
ओंस की बूंद
दे रही थी पहरा
छोड़ जंजीर ऐसी
फिर अडिग
संबल ही था मेरा
हो रही थी सुबह
निखर रहा था मै ।
कविता कौशिक
15.
ओस की बूंदे
खिले पुष्प अधर
महके बाग
संग है हरियाली
भोर भी काली
बरसे यूँ शबनम
पंखुड़ी झांके
प्रभु चरण साजे
अर्पित करूँ
मोहब्बत पैगाम
मंदिर और धाम ।
रेशम मदान
16.
अँगड़ाई ले
खिल रहा अंबुज
अलसुबह
भँवरे का चुंबन
दे आलिंगन
सूरज की किरणें
रूप निखारे
मोती से चमकते
तुहिन कण
अलौकिक श्रृंगार
प्रकृति का प्यार ।
रमा वर्मा
------00------
हाइकु 俳句
1.
अंधेरी रात 暗い夜
दीपक बता रहा 深く伝える
उसे औकात । 彼に 状態
2.
शिशिर रात 冬の夜
शीतल हैं जज़्बात 感情は寒い
पेड़ों के गात । 木の体
3.
छठ का पर्व 第6 お祭りの
उदीयमान सूर्य 朝日
प्रथम अर्घ्य 最初の崇拝
4.
अमा की रात 月の夜
दीपक लड़ रहा ディーパックは戦っている
तम के साथ । 暗闇で
5.
नन्हा सा पौधा 小さな植物
मिट्टी, पानी व 土壌、水、空気
पोषित काया । 保護された体格
6.
अमरबेल ネナシカズラ
बढ़ती जाती लता 成長するクリーパー
सत्ता लालसा । パワーへの憧れ
7.
टूटे हैं पत्ते 葉が壊れている
छिपा न सके पीर 痛みを隠すことができませんでした
निर्वस्त्र पेड़ । ヌードツリー
8.
छोटा सा कूप 小さな井戸
समझ लिया जग 彼の世界と同じ
खूश मंडूक । 幸せなカエル
9.
शीत आतंक コールドパニック
सरगुजिहा ठंड スルグジャの寒さ
बिच्छू का डंक スコーピオン刺傷
□ प्रदीप कुमार दाश
□ プラディープクマールダッシュ
भारतीय हिन्दी काव्य साहित्य की श्रीवृद्धि में प्रतिष्ठित जापानी काव्य शैलियाँ
आठवीं शताब्दी में जापान के इतिहास में "नारा युग के नाम से अभिहित "मान्योशू" काल में ताँका (वाका), सेदोका और चोका तीन काव्य शैलियां प्रसिद्ध हुईं । इसके उपरांत हाइकु, सेन्रियु, रेंगा (श्रृंखलित पद्य), हाइगा, कतौता एवं अन्य कई काव्य शैलियां जापानी साहित्य में प्रचलित हुईं । गद्य/पद्य के मिश्रित रूप "हाइबुन" की शैली यात्रा साहित्य के रूप में प्रचलित रही । इन सभी शैलियों में 5-7 वर्ण पंक्तियों की प्रमुखता देखी जा सकती है । इन शैलियों में "हाइकु" अत्यधिक प्रचलित काव्य शैली के रूप में प्रसिद्ध है । जापान की ये बहुचर्चित काव्य शैलियाँ भारतीय साहित्य में भी विशेष चर्चित व प्रतिष्ठित हैं । इन काव्य शैलियों का प्रारंभिक परिचय देखते हैं -
हाइकु
हाइकु मूलतः जापान का एक काव्य रूप है, 15 वीं शताब्दी में रेंगा की प्रारंभिक तीन पंक्ति "होक्कु" के बंधन से मुक्ति पाकर स्वतंत्र कविता "हाइकु" के नये नाम से विकसित हुआ । 17 वीं शताब्दी में बाशो द्वारा "हाइकु" को एक काव्य विधा के रूप में नई प्रतिष्ठा प्राप्त हुई । बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी के सौजन्य से भारतीय साहित्यकारों को हाइकु का प्रारंभिक परिचय प्राप्त हुआ । वर्ष 1985 में प्रकाशित "शाश्वत क्षितिज" हिन्दी का प्रथम हाइकु संग्रह है । "हाइकु" एक ऐसी संपूर्ण लघु कविता है जो पाठक के मर्म मस्तिष्क को तीक्ष्णता से स्पष्ट करते हुए झकझोरने की सामर्थ्य रखता है । विश्व की सबसे छोटी और चर्चित विधा "हाइकु" भारत में 5-7-5 वर्णक्रम की त्रिपदी लघु कविता है जिसमें बिम्ब और प्रतीक चयन ताजे होते हैं । एक विशिष्ट भाव के आश्रय में जुड़ी हुई इसकी तीनों पंक्तियां स्वतंत्र रहते हुए भी एक अन्य आश्रित पंक्तियों के बिना अधूरी होती हैं । प्रकृति के साथ जीवन के सौंदर्य बोध से जुड़े जो सहज हाइकु काल सापेक्ष में पाठक के मर्म को स्पर्श करने में समर्थ होते हैं वही कालजयी हाइकु होते हैं । "हाइकु" में एक पूरी कविता का एहसास महत्वपूर्ण होता है ।
सेन्रियु
सेन्रियु शिल्प की दृष्टि से हाइकु के समान लघु कविता का एक जापानी रूप है । रेंगा काल में "हाइकु" के वजन का "हाइकाई" शब्द हास्य व्यंग की रचनाओं के लिए प्रयुक्त हुआ, ठीक इसी तरह "हाइकु" के वजन का "सेन्रियु" शब्द प्रयुक्त हुआ । हाइकु "हाइकु" है और सेन्रियु "प्रतिहाइकु" है । सेन्रियु में धर्म, मनुष्य की दुर्बलता है, अंधविश्वास है । सेन्रियु हल्के फुल्के व गहरे हास्य के होते हैं जबकि हाइकु गंभीर होते हैं । सेन्रियु में हाइकु के विपरीत कीगो या किरेजि शब्द नहीं होते । हाइकु और सेन्रियु में केवल कलेवर की साम्यता है शेष सर्वथा अलग । सेन्रियु शुद्ध जैविक धरातल पर यथार्थ जगत से विषय चुनता है । इसमें मनुष्य के दुर्बल क्षणों पर व्यंग के छींटे होते हैं, सेन्रियु के मूल में मनुष्य है, प्रकृति नहीं । शिल्प की दृष्टि से हाइकु व सेन्रियु दोनों समान हैं परंतु मूल संवेदना की दृष्टि से दोनों पृथक-पृथक हैं । वर्ष 2003 में हिंदी का प्रथम सेन्रियु संग्रह "रूढ़ियों का आकाश" प्रकाशित हुआ है ।
ताँका
ताँका (वाका) जापान का बहुत ही प्राचीन काव्य रूप है । यह क्रमशः 5-7-5-7-7 के वर्णानुशासन में रची गई पंचपदी रचना है, जिसमें कुल 31 वर्ण होते हैं । इसमें व्यतिक्रम स्वीकार नहीं है । हाइकु विधा के परिवार की इस "ताँका" रचना को "वाका" भी कहा जाता है ताँका का शाब्दिक अर्थ लघुगीत माना गया है । ताँका शैली से ही 5-7-5 वर्णक्रम के "हाइकु" स्वरूप का विन्यास स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त किया है । वास्तविकता यह है कि "ताँका" हाइकु की भांति अतुकांत वर्णिक कविता है । लय इसमें अनिवार्य नहीं, परंतु यदि हो तो काव्यात्मक सौंदर्य बढ़ जाता है । एक महत्वपूर्ण भाव पर आश्रित ताँका की प्रत्येक पंक्तियां स्वतंत्र होती हैं । शैल्पिक वैशिष्ट्य के दायरे में ही रचनाकार के द्वारा रचित कथ्य की सहजता, अभिव्यक्ति क्षमता व काव्यात्मकता से परिपूर्ण रचना श्रेष्ठ ताँका कहलाती है । हिंदी का प्रथम एकल ताँका संग्रह "अश्रु नहायी हँसी" वर्ष 2009 में आया ।
चोका
चोका जापानी कविता की एक बहुचर्चित काव्य शैली है । चोका में न्यूनतम 09 पंक्तियाँ आवश्यक हैं, इस कविता की अधिकतम लंबाई रचनाकार के ऊपर निर्भर है । इस शैली की पंक्तियों में 5 व 7 वर्णों की आवृत्ति होती है । अंतिम पांच पंक्तियों में 5-7-5-7-7 वर्ण की एक ताँका रचना का क्रम व्यवस्थित होता है । चोका मूलतः गायन किया जाता है एवं ऊँचे स्वरों में इसका वाचन भी किया जाता है । वर्ष 2011 में हिंदी का प्रथम चोका संग्रह "ओक भर किरनें" प्रकाशित हुआ है ।
सेदोका
सेदोका 5-7-7-5-7-7 वर्णक्रम की षट्पदी छः चरणीय एक प्राचीन जापानी काव्य विधा है । इसमें कुल 38 वर्ण होते हैं, व्यतिक्रम स्वीकार नहीं है । इस काव्य के कथ्य कवि की संवेदना से जुड़ कर भाव प्रवलता के साथ प्रस्तुत होने वाली एक प्रसिद्ध काव्य विधा है । सेदोका में निर्दिष्ट भाव से आश्रित पंक्तियाँ "हाइकु" की तरह स्वतंत्र होना एक महत्वपूर्ण विशेषता होती है । दो कतौते से एक सेदोका पूर्ण होता है । सेदोका भी हाइकु विधा के परिवार की ही एक काव्य शैली है । वर्ष - 2012 में प्रकाशित "बुलाता है कदंब" हिंदी का प्रथम सेदोका संग्रह है ।
रेंगा
हिंदी हाइकुकारों के लिए यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि "हाइकु" रेंगा की प्रारंभिक तीन पंक्तियां हैं । हेइयान युग में काव्य रचना अभिजात्य वर्ग की सांस्कृतिक अभिरुचि का विषय था । दो अथवा दो से अधिक रचनाकार मिल कर काव्य की रचना करने लगे जिससे रेंगा (श्रृंखलित पद्य) की परंपरा का विकास हुआ । इसमें एक व्यक्ति 5-7-5 वर्णक्रम की प्रथम तीन पंक्तियों की रचना करता है, जिसे "होक्कु" कहते हैं । दूसरा रचनाकार 7-7 वर्ण क्रम की दो पंक्तियां जोड़ कर उसे पूरा करता है । इस 31 वर्ण के ताँका शिल्प की कविता मे अब तीसरा व्यक्ति दूसरे की रची हुई दो पंक्तियों को कविता का पूर्वांश मान कर 5-7-5 वर्णों की अगली कड़ी जोड़ता है, जिसका पूर्व कड़ी से कोई संबंध होना आवश्यक नहीं है । यह श्रृंखला आगे बढ़ाई जाती है एवं एक स्थान पर इस काव्य श्रृंखला को पूर्णता प्रदान की जाती है । श्रृंखलित पद्य के इस पूर्ण रूप को "रेंगा" कहा जाता है । वर्ष - 2017 में 66 कवियों द्वारा हिंदी भाषा में रचित "कस्तूरी की तलाश" विश्व के प्रथम रेंगा संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है ।
जापानी कवि किकाकु रेंगा की प्रथम तीन पंक्तियाँ 'होक्कु' को वृक्ष के तने के समान, द्वितीयांश को शाखाओं के समान, तृतीयांश को धरती के समान तथा नई-नई कड़ियां जोड़ते चले जाना कोंपलों के समान माना है ।
हाइगा
जापानी लिपि चित्रात्मक होती है, जिसे कांजी कहते हैं । वहाँ सुलेख (कैलीग्रैफी) को विशेष ध्यान दिया जाता है । जापान में काली स्याही की चित्रांकन कला को "सुमिए" कहते हैं । 17 वीं शताब्दी के प्रारंभ में सुमिए के साथ हाइकु का संयोग निखरा, जिसे "हाइगा" कहा जाने लगा । "हाइकु" में "कु" का अर्थ कविता और "हाइगा" में "गा" का अर्थ चित्र है । इस प्रकार "हाइकु" कविता चित्र के साथ व्यंजित होना हाइगा कहलाता है । "हाइगा" में चित्रांकन, रचना सृजन और हस्तलिपि तीनों महत्वपूर्ण हैं, चित्र कैलीग्रैफी एवं हाइकु तीनों का संगम हाइगा कहलाता है । हाइगा का रेखाचित्र कलात्मक होना आवश्यक नहीं, वरन भावों को चित्रित करने में समर्थ होना आवश्यक है । हाइगा का शाब्दिक अर्थ है "चित्रकाव्य" । जापान में चित्र के समायोजन से वर्णित हाइकु को हाइगा कहा गया है । इस प्रकार "हाइगा" हाइकु का उसके भावार्थ के साथ सामंजस्य पूर्ण चित्र पर प्रदर्शित रूप होता है । भारत में वर्ष 2016 में प्रकाशित "हाइगा आनंदिका" हिंदी का प्रथम हाइगा संग्रह है ।
कतौता
कतौता 5-7-7 वर्णक्रम की एक त्रिपदी जापानी काव्य रूप है, जिसमें कुल 19 अक्षर होते हैं । एक एकल कतौता रचना वास्तव में आधी-अधूरी कविता के रूप में रची जाती है, परंतु इस विधा में स्वतंत्रता कतौता के रूप में लेखन का प्रयोग हिंदी में किया जा चुका है । जनवरी 2021 में हिंदी भाषा में प्रकाशित भावों की कतरन हिंदी में ही नहीं वल्कि विश्व के प्रथम कतौता संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है । कतौता 5-7-7 वर्ण क्रम शिल्प की तीन पंक्तियों में निबद्ध, निर्दिष्ट भाव से आश्रित अपने आप में मुकम्मल रूप से स्वतंत्र और पूर्ण रचना है । जापान में इस विधा का उपयोग प्रेमी को संबोधित कविताओं के लिए किया गया था ।
हाइबुन
हाइबुन एक गद्य कविता है, इसके गद्य में पद्य के पुट रहते हैं । इसे यात्रा विवरण के रुप में लिखा जाता है । यात्रा संदर्भ में बाशो का कथन है कि - "हर दिन एक यात्रा है, और यात्रा ही घर है ।" हाइबुन का "गद्य" हाइकु का स्पष्टीकरण नहीं होता और इसमें उल्लेखित हाइकु गद्य की निरंतरता भी नहीं है । गद्य पाठ में प्रत्येक शब्द की गिनती गद्य कविता की तरह होनी चाहिए । स्तरीय हाइबुन गद्य पाठ को सीमित करता है, जैसे कि उत्तम हाइबुन में 20 से 180 शब्द एवं अधिकतम दो पैराग्राफ़ पर्याप्त हैं । इस लघु गद्य में कसावट आवश्यक है । हाइबुन में आमतौर पर केवल एक हाइकु सम्मिलित किया जाता है, जो गद्य के बाद होता है, गद्य के चरमोत्कर्ष के रूप में "हाइकु" अपनी सेवा प्रदान करते हुए हाइबुन का प्रतिनिधित्व करता है ।
गद्य और हाइकु दोनों के मिश्रण में रस ही महत्वपूर्ण है । गद्य को उस गहराई से जोड़ना चाहिए जिसके साथ हम हाइकु का अनुभव कर सकें । हाइबुन की महत्ता हाइकु को गद्य के अर्थ से सहज जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है । हाइबुन के लेखक को संवेदनशील होकर भी निरपेक्ष होना चाहिए अन्यथा यात्रा के स्थान पर यात्री के प्रधान हो उठने की संभावनाएं बढ़ जाएगी, तथा वह अभिव्यक्त यात्रा साहित्य हाइबुन न रहकर आत्म चरित्र या आत्म स्मरण बन सकता है । इस विधा के पीछे का उद्देश्य हाइबुन लेखक के रमणीय अनुभवों को हुबहू पाठक तक प्रेषित करना है । जिसके माध्यम से पाठक उस अनुभव को आत्मसात कर सके उसे अनुभव कर सके ।
जापान की ये सभी काव्य शैलियाँ अपनी काव्यात्मक कमनीयता एवं प्रभाविष्णुता से भारतीय काव्य साहित्य में घुल-मिल कर भारतीय काव्य साहित्य की श्रीवृद्धि में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं ।
- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
व्याख्याता-हिन्दी
साँकरा, जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
मो.नं. - 7828104111
भावों की कतरन (विश्व का प्रथम कतौता संग्रह)
Pradeep Kumar Dash "Deepak"
● BHAVO KI KATRAN (भावों की कतरन)
(FIRST KATAUTA COLLECTION IN WORLD)
● Ayan prakashan, Delhi
● Edition First : JANUARY-2021
● Price : ₹ 240/--
● ISBN : 978-93-89999-70-9
● Availability :
• pkdash399@gmail.com
• Ayan prakashan Delhi
सतीश राठी
आर 451, महालक्ष्मी नगर, इंदौर पिन - 452010
साहित्य वाटिका में बिखरी-'सेदोका की सुगंध’
डाॅ सुरंगमा यादव
असि0प्रो0 हिन्दी
महामाया राजकीय महाविद्यालय, महोना, लखनऊ