हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

चित्र आधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता (अप्रैल-2021)

 ~ चित्र आधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता ~

हाइकु ताँका प्रवाह 

माह - अप्रैल 2021, क्र. 12 

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प्रविष्टि के कतौता
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1.
इनके जैसे
बन जाओ जग में
ना करें कोई  तंग ।

पत्थर पृष्ठ 
बन गए  ऐसे ही
नहीं हम में जान ।

कीमत मिले
घर जाऊँ मैं फिर
मिटे भूख हमारी ।

कविता कौशिक

2.
झेल रही है
अस्तित्व का संकट
ये संस्कृति विकट ।

अंतिम सांसें
ले रही लोक कला
बंदा सोच में पड़ा ।

भवरें भरी
जीवन पतवार
नहीं मानुंगा हार ।
                  
नीलम शुक्ला

3.
हाथों  का  खेल 
हुआ  जीविका  मेल 
यही  रेलमपेल ।

भाग्य का  लेखा 
रहता  अनदेखा 
विधान  चक्र रेखा ।

भटकता  मैं 
कठपुतली  हुआ 
नहीं  रैन  बसेरा ।

निर्मला पाण्डेय

4.
नाच न सत्य
कठपुतलियों की 
नचैया ही है सत्य ।

जादूगर ही
सत्य, झूठा मगर
उसकी जादूगरी ।

ईश्वर सत्य
पर सत्य नही न 
अजब मायापुरी ।

देवयानी बनर्जी

5.
काठ पुतली
डोर से बँध कर
इशारो पर नाचे ।

कठपुतली
सूझबूझ न जाने
कहे मन की बात ।

किसके हाथ
बंधी तार की डोर
आज तक न जानी ।

रेशम मदान

6.
दीवारें हंसीं
मूक पुतली देखें
रोजी के रंग फीके ।

नैनन बोली
डोर में बँध जाऊं
तेरी रोटी कमाऊँ ।

बेटी सी लगो
रिश्तों की डोर बंधी
वो दूजे घर डोले ।

शर्मिला चौहान

7.
तू क्यों न जागे
इशारों पे क्यों भागे
अब  तोड़  ये  धागे ।

भाग्य है बली
दुनिया   रंगमंच
हम कठपुतली ।

भूल जाता है
हर  खेलने  वाला
वो भी एक खिलौना ।

राकेश गुप्ता

8.
रंग बिरंगी
ये कठपुतलियाँ
रोजी रोटी साधन ।

मानव सदा
बना कठपुतली
जगत रंगमंच ।

झूठ का दौर
नाचे कठपुतली
नचाये कोई ओर ।

मधु सिंघी

9.
सुनो दास्तान
होती जुंबा हमारी 
कह देते मन की ।
            
हम माध्यम 
लोक-कलाओं हेतु
योजना प्रसार का ।
              
दर्द जानता 
तुझ बेजुबान का
सवाल पेट ‌का है ।

रति चौबे

10.
लोककलाएं
खामोश आज क्यों है
जीवन दर्शन है ।

धर पुतली
सूत्रधार सोचता
उदर कैसे भरूँ ।

सूत्रधार हो
बाँध  धागों मे मुझे
सजीव बना डालो ।

रूबी दास

11.

तमाशे बंद,
बिखरती खुशियाँ 
काठ कठपुतली ।

कोरोना डर
दूर हुई संस्कृति
मौन कठपुतली ।

परेशान हूँ
खामोश है जिंदगी
कठपुतलियां भी ।

पूनम मिश्रा

12.

रूह बेजान
बुत बाँटे मुस्कान
खींचे डोर सुजान ।

मैं  काष्ठ जिस्म
तू माटी का मानुष
नाच रहे हैं दोनों ।

अधीनस्थ मैं
चैतन्य ये दुनिया
पर पीर क्या जाने !

विद्या चौहान

13.
काठ की गुड्डी
अधमरी सी बैठी
सूत्रधार बेजान ।

राणा उदास
उंगली पे पुतली
जिंदगी है वीरान ।

विपन्न स्थिति
हताशा की इंतहा
कला भी हुई तन्हा ।
 
निर्मला हांडे

14.
स्त्री की नियति
जड़ा मुँह पे ताला
कठपुतली बनी ।

स्वाभिमानी हूँ
इशारों पे क्यों नाचूँ
क्या मैं कठपुतली ?

बाज़ारी वस्तु
इसीलिए सजाया
कठपुतली हूँ ना ।

सुधा राठौर

15.
धागों से बंधी 
तकदीर हमारी
है दुनिया नचाती  ।

हे सूत्रधार
तुम हमे नचाते
पेट नचाता तुम्हें ।

डोरी में बंधी
रंगीन कतरनें
किस्से कई सुनाए ।

शीला तापड़िया

16.
तू मेरी कृति
मैं तेरा शिल्पकार
हुए दोनों लाचार ।

बीते वो दिन
जब जमाते रंग
अब सब बेरंग ।

बिन हाथ मैं
डोर बिना हुई तू
दोनों हुए लाचार ।

सुषमा अग्रवाल

17.
कठपुतली
साज़न की जुबानी
नाचे बोल कहानी ।

डोरी वो धरे
नाच ऐसे नचाये
सज़ा कला कहाये ।

मर्जी ना चले
जैसा भी हो पात्र
निभाए सारे गात्र ।

अमिता शाह "अमी"

18.
कठपुतली
लिये हाथ सोचता
डोर किसके पास ।

मानव स्वयं
एक कठपुतली
डोर ईश्वर हाथ ।

कठपुतली
भरती नये स्वांग
जैसा चाहे नियंता ।

गंगा प्रसाद पांडेय 'भावुक'

19.
कठपुतली
विलुप्त होती कला
जीया में जलजला ।

थामेगा कौन
तेरी मेरी ये डोर
मुखरित है मौन ।

बिना नर्तन
हो गई है दुबली
हर कठपुतली ।

अल्पा जीतेश तन्ना 

20.

कठपुतली
जीवन का निर्वाह
लाचार है मनुज ।

ऊपर वाला
रखे अपने हाथ
डोर, नचाये, हमें ।

हम सब ही
प्रभु के हाथ की ही
कठपुतली हुए ।

मीरा जोगलेकर

21.
नियति तेरी
मेरे इशारों पर 
नाच कठपुतली ।

सौंप दे डोर
गिरने नहीं देंगी
कुशल उंगलियाँ ।

कठपुतली
दुनिया एक मंच 
नृत्य तेरा प्रारब्ध ।

रमा प्रवीर वर्मा
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आपके प्रतिभाव

विश्व का प्रथम कतौता संग्रह
विश्व की प्रथम चित्राधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता का श्रेय प्रदीप कुमार दाश जी आपके नाम है। यह आनंददायी एवं अविस्मरणीय है।
     अविनाशजी की विधागत निष्ठा, पटल को सतत गतिशील बनाये रखने का उपक्रम एवं रचनाधर्मियों को स्नेह सूत्र में पिरोए रखने की कला बेजोड़ है।
    प्रसन्नता का विषय यह है कि समस्त कतौताकारों ने सहभागिता तो की ही, हर निर्णय का स्वागत खुले दिल से किया । ऐसा अन्यत्र कम ही नज़र आता है।
      "हाइकु ताँका प्रवाह "
निरंतर सरस प्रवाहों से सृजन को नर्म कोमल मर्मरी संवेदन सौंप रहा है।
     लाजवाब तस्वीर
इस बार अनिवार्यतः उल्लेख करना चाहूंगी कि प्रत्येक हस्ताक्षर ने चित्र का मर्म जाना तथा अनुरूप कतौता पेश किया।
कठपुतलियों का भौतिक कलेवर एवं डोरियां
राणा की ऊंगलियों का करतब अंततः ईश्वर और मानव संबंधों को व्यंजित कर गया।
   समस्त विजेताओं का हृदय से  अभिनंदन/आभार ।

💜💕💜

□  इंदिरा किसलय 

शनिवार, 6 मार्च 2021

चित्र आधारित हाइकु सृजन प्रतियोगिता (मार्च - 2021)

 चित्र आधारित हाइकु सृजन प्रतियोगिता 

हाइकु ताँका प्रवाह

(माह - मार्च-2021, क्र. 11)

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प्रविष्टि के हाइकु

१.
कलाबाजियां
मन का संतुलन
पंछी निपुण ।

प्रकाश कांबले

२.
आया फागुन 
बालियों पे गुलाल
मैं ही अछूती ।

रति चौबे

३.
सन्देश देती
संतुलित जीवन
जीना सिखाती ।

ए.ए.लूका

४. 
खग आचार
संतुलन आधार
जीवन सार ।

मधु सिंघी

५. 
भरी उडान
रोक कर दिखाए 
कोई तो आये ।

अमिता शाह "अमी"

६. 
विकास पथ 
ठाँव बना सुमन
नीड़ ध्वस्त ।

रूबी दास

७. 
फोटोग्राफर
क्लिक माय फोटोज
उत्तम पोज ।

पूनम मिश्रा

८. 
तन औ मन
अद्भुत संतुलन
तुला चिरैया ।

विद्या चौहान

९. 
घास के फूल
पंखों पर विश्वास
रहा है झूल ।

विनय मोहंता

१०.
फूलों की गेंड़ी
चिरैया संतुलित
निदाघ झेले ।

शर्मिला चौहान

११. 
रुकूँ या उडूँ
दो फुनगी पे डटी
सोचे गौरैया ।

रमा वर्मा

१२.
छोटी सी आशा
घोसला कभी नभ
दाणे की चाह ।

डाॅ. सुमिता

१३.
करती योगा
बनाती संतुलन
उड़ती ऊॅंचा ।

सुषमा अग्रवाल

१४.
लघु आकार
दैवीय उपहार
वन की शान ।

अंजुलिका चावला

१५. 
मैं हूँ गौरैया
विलुप्ति के कगार
पुष्प सवार ।

गंगा पांडेय 'भावुक'

१६.
बेचारी है वो
उन्मुक्त रहती है
सभी के साथ ।

अनिल मालोकर

१७. 
गाती चिड़िया
लहराती फ़सलें
नई ये नस्लें ।

अल्पा जीतेश तन्ना 

१८.
हौसला  मेरा
थामू सारा आकाश
संतुलन से ।

मीरा जोगलेकर

१९.
विषम स्थिति 
संतुलन ज़रूरी
पाखी की सीख ।

सुधा राठौर

२०.
नन्ही सी जान
पंखों से दी सलामी
खड़े होकर ।

निर्मला हांडे

२१.
एक ही  आस
न  करो  परिहास 
आओ  न  घर ।

निर्मला पाण्डेय

२२.
आत्मविश्वासी
हुनर कलाबाजी
धनी ये ज्ञानी ।

नीलम शुक्ला

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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

हाइकुकार प्रवीण कुमार दाश जी के हाइकु

हाइकुकार 

प्रवीण कुमार दाश 


हाइकु


नदी बहती 

धरा खुश हो रही 

पीड़ा निकली ।


नेह का बीज 

उर की भूमि पर 

फूटा अंकुर ।


मोती चुगता 

क्षीर नीर विवेक 

हंस सिखाता । 


बिटिया रानी 

जाएगी पी के घर 

हुई सयानी ।


जोड़ तू तृण

घोंसले चहकेंगे 

सृजन पूर्ण ।


संत आगम 

शिशिर अगुवानी 

चली हेमंत ।


मेहंदी रची 

गाल हो गये पीले 

देखो चांद के ।


सूरज उगा 

चाहत जीवन में 

होता प्रभात ।


प्रकाश सोया 

सज उठी बगिया 

धूप की शैया ।


मेघ मुस्काया 

तरबतर धरा 

बीज हर्षाया ।


माँ की ममता 

धरा बन सहती 

प्रसव पीड़ा ।


ऑंखें युगल 

काजल का श्रृंगार 

मन सजल । 


राम का स्पर्श 

धन्य हुई अहिल्या 

शाप से मुक्ति ।


सूर्य की आग 

अवनि की ओर में 

बढ़ाए ताप ।


धरा की कोख 

बीज बोता किसान 

फल संतान ।


प्रकृति राह 

शजर से जीवन 

यही नियम ।


पौधे जीवन 

वयता जड़ तन 

प्रभु शरण ।


ताल में बड़ 

डटे अकड़ कर 

जड़ पकड़ । 


लड़ती रही 

बाधाएं पार कर 

सरिता बढ़ी । 


खग चातक 

स्वाति बूंद की आस 

निहारे नभ । 


सुंदर वन 

मोह लेते हैं मन 

वृक्ष चंदन ।


प्रवासी पंछी

मन न लगा वहाँ 

लौटा वतन ।


पंख सहारे

शीत से बचाती माँ   

नन्हें चूजों को ।

--0--


प्रवीण कुमार दाश 

साँकरा, जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

हाइकुकार सुभाष शर्मा जी के हाइकु


हाइकुकार 

सुभाष शर्मा 

हाइकु 

--0--


पानी की बूंद

आसमान से गिरी

माटी मे मिली ।


जीवन खिला

हरित क्रांति आई

खुशियाँ लाई ।


पानी का मोल

जीवन अनमोल

वृक्ष बचाओ ।


पछताओगे

सूखेंगे जब ताल

पंछी बेहाल ।


बसंत आया

चली हवा बासंती

आम बौराया ।


बयार चली

कोंपल इतराए

टेसू मुस्काए ।


जिया तरसे

पिया न आए पास

मिलन आस ।


बैरी मौसम

लगाए कैसी अगन

करो जतन।


पिया मिलन

गौरी क्यों शरमाए

नैना झुकाए ।

---0---


- सुभाष शर्मा

610 A , महालक्ष्मी नगर 

इन्दौर (म.प्र.)

चित्र आधारित चोका लेखन प्रतियोगिता (फरवरी-2021)

चित्र आधारित चोका लेखन प्रतियोगिता

हाइकु ताँका प्रवाह

(माह : फरवरी - 2021, क्र. 10)

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1.

आया प्रभात

स्वर्णिम सा उजास

खिलती कली

कुहासे संग ढली

खोलती मुख

मिल जाये प्रकाश

आयेगा अलि

मकरंद की चाह

लेगा पराग

सुवासित पवन

बहेगी हौले

इतनी सी चाहत

फिर माली तोड़ ले ।


गंगा पांडेय 'भावुक'


2.

कांटो से लड़ी

शबनम में भीगी 

भोर में खिली 

मासूम सी है कली

बासन्ती रंग

अधखिला बदन 

धीमी खुशबू

छिप रहा यौवन

धड़के मन

छेड़ रहा पवन

गाये भंवरा

मंडराए तितली

खिलता रूप

शर्माती पंखुड़ियां

हरीतिमा ने

थामा मेरा जीवन

पीला गुलाब

खुशी और सौभाग्य

का है प्रतीक

देता एक सन्देश

परमप्रिय

ध्यान रखे अपना

सामाजिकता

मित्रता का प्रतीक

पीला गुलाब

सुप्रभात में तारा

चमके सदा

सन्देश देती कली ।


निर्मला हांडे


3.

ब्रम्ह मुहुर्त

ओस का आलिंगन

प्रसन्न पुष्प

मुस्कान बिखेरता

सीख कर्म का

देने लगा अनोखा

मिली प्रेरणा

हँसी नन्ही कलियाँ

पाखी ने छोड़ा

घोसलों में बिछौना

शंखनाद के स्वर

भोर के कर्ण

सिंदुरिया दामन

लहराकर

वसुंधरा प्रांगण

अनंत ऊर्जा

लाई संग सौगात

हँसा पंकज

देता रवि को अर्ध्य

श्रद्धा का पर्व

देख भोर बिसात

गूँजता सुप्रभात !!!


नीलम शुक्ला


4.

अधखिली सी

ओस ओढ़े पंखुड़ी

भिगोती फूल

राह में पंक रोड़े

या मिले शूल

वो खिलना ना भूले

जाड़ा या धूप

सहिष्णु गुण मूल

हो अनुकूल

या वक़्त प्रतिकूल

टूटा, बिखरा

हर पीड़ा क़बूल

शाख़ को छोड़

झर के जाना कूल

एक बसंत

क्षणिक है जीवन

सजा लो शीश

या चरणों की धूल

रंग बिखेरे

पर हित उसूल

जीना सिखाते फूल ।


विद्या चौहान


5.

भ्रमर राग

मुद मंगल गान

अवनि जाग

शुभ नव विहान

स्वर्ण रश्मियाँ

उज्जवल वितान

चटकी कली

अधरन मुस्कान

ओस ठिठके

मखमली संज्ञान

हरित पर्ण

प्रकृति नव प्राण

शुभ्र जलज

सरोवर की शान

सुरम्य ऊषा

छेड़े जीवन तान

चित्त बैरागी

फिरे  सब जहान

जाग मनुज

दृढ़ कर संधान

प्रकृति का आह्वान ।


शर्मिला चौहान


6.

पीत पुष्प हूँ 

विकसित प्रवृति

खुश्बू बिखेरूं

होता मनभावन

आदर्श बना

आशा से परिपूर्ण

शीश चढ़ता

प्रभुजी के मस्तक

धन्य हो जाता

स्व अस्तित्व रखता

मेरी नियति

परोपकार करूं

सबको  भाता

सबके घर आता

न भेदभाव

न गरीब अमीर

सभी है मेरे

मै रहता सबका ही

हरीतिमा फैलाऊँ ।

 

निर्मला पांडे


7.

टपकी रात 

ओस की बूंदे सारी

फूल औ पाती

भीगी है फुलवारी..

आँसू से सींचा

चमन लागे न्यारा

मोती बिखरे

कैसा श्रृंगार प्यारा..

अश्क किसी के

ले के कोई खिलता

सुगंध फैला

मुस्कुरा के मिलता..

ये खेल सारा

किस्मत पे ठहरा

लगता पार

कोई डूबे गहरा..

खुश रहना

मेरे फूल हरदम

उड़ जाउंगी

धूप के पड़ते ही

प्रेम न होगा कम ।


अमिता शाह "अमी"


8.

ओस ने छुआ

कली कुनमुनाई

पाँखुरी खिलीं

कपोल से फिसलीं

पारद बूँदें

निष्कलुष सौंदर्य

पीताभ छवि

हरित परिधान

सृजन का उन्वान ।


सुधा राठौर


9.

नयन खोल

अलसाए भोर में

पद्म कलिका

श्वेत रंग मे रंगी

मदमस्त  हो

निहार दल चूमे

रवि स्पर्श से

हौले हौले खिलता

मै अम्बुज हूँ

अनुपम सृष्टि हूँ 

सुन्दरतम्

सांकेतिक  रचना

राष्ट्रीय फूल 

शुद्धता सुंदरता

पंक निलय

सलिल मे खिलता

जग निहारूं 

पौराणिक वृतान्त

विधाता देव

प्रसून पंकज से

अमल पुष्प

विष्णुप्रिया आसीन

देते आशीष

समृद्धि फलें फूले

संकुल वन

अलिकुल झूमते 

बिखेरे राग 

मधुर ताल लिये

कर्म बिया का

भरपूर औषधी 

फल आहार

अनुपम अनूठा

नीचे लहरें 

ऊपर स्थिर खड़ा

ठाकुर द्वार

शोभायमान होता

अमूल्य धरोहर ।


रूबी दास

              


10.

मैं शतदल

खिलने को आतुर

होगा सबेरा

फैलाऊॅं पंख सारे

भरूॅं उड़ान

कहूॅं शुभ प्रभात

बाॅंटू खुशियाॅं

कैसी हो कठिनाई

मानूॅं ना हार

भाल बूॅंदें श्रम की

देतीं प्रेरणा

जीतूॅंगा जग सारा

यही संदेशा प्यारा ।


सुषमा अग्रवाल


11.

अंक धरा का

पुलकित हो कर

सृजन दिव्य

जब यूं खिल जाए

मृदुल स्पर्श

मधुरिम तरंग

झूमें पवन

जल कण  हैं संग

नयन बंद

नासापुट चंचल

आत्म मुग्धता

आनंद अखण्डित

है पुष्प समर्पित ।


डॉ. शीला भार्गव


12.

आये हैं द्वारे

मन की है भावना

मनो भाव से 

करते हैं प्रार्थना

पुष्प लेकर

सुनो प्रभु  वंदना

सुखी जीवन

हो, यही है  कामना

हाथ जोड़ याचना ।


मीरा जोगलेकर


13.

ओस ने बुनी,

ऊषा संग चुनरी,

प्रत्यूषा लाली,

दुल्हन का स्वरूप,

भोर सजाती,

पंछियों का संगीत

वृंदा झूमती

फूल बने बाराती

पुरवाई का प्यार ।


पूनम मिश्रा पूर्णिमा


14.

हुई  है भोर

मै खिल रहा  जब

ओंस की बूंद 

दे रही थी पहरा

छोड़ जंजीर  ऐसी

फिर अडिग 

संबल ही था मेरा

हो रही थी सुबह

निखर रहा था मै ।


कविता कौशिक


15.

ओस की बूंदे

खिले पुष्प अधर

महके बाग

संग है हरियाली

भोर भी काली

बरसे यूँ शबनम

पंखुड़ी झांके

प्रभु चरण साजे

अर्पित करूँ

मोहब्बत पैगाम

मंदिर और धाम ।


रेशम मदान


16.

अँगड़ाई ले

खिल रहा अंबुज

अलसुबह 

भँवरे का चुंबन

दे आलिंगन

सूरज की किरणें

रूप निखारे

मोती से चमकते

तुहिन कण

अलौकिक श्रृंगार

प्रकृति का प्यार ।


रमा वर्मा

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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

हाइकु (俳句)

 हाइकु                      俳句





1.

अंधेरी रात                   暗い夜

दीपक बता रहा            深く伝える     

उसे औकात ।              彼に 状態

   

2.

शिशिर रात                  冬の夜

शीतल हैं जज़्बात         感情は寒い

पेड़ों के गात ।              木の体


3.

छठ का पर्व                  第6 お祭りの

उदीयमान सूर्य               朝日

प्रथम अर्घ्य                   最初の崇拝


4.

अमा की रात                月の夜

दीपक लड़ रहा             ディーパックは戦っている

तम के साथ ।               暗闇で


5.

नन्हा सा पौधा              小さな植物

मिट्टी, पानी व               土壌、水、空気

पोषित काया ।              保護された体格


6.

अमरबेल                      ネナシカズラ

बढ़ती जाती लता           成長するクリーパー

सत्ता लालसा ।              パワーへの憧れ


7.

टूटे हैं पत्ते                     葉が壊れている

छिपा न सके पीर           痛みを隠すことができませんでした

निर्वस्त्र पेड़ ।                 ヌードツリー


8.

छोटा सा कूप                小さな井戸

समझ लिया जग            彼の世界と同じ

खूश मंडूक ।                 幸せなカエル


9.

शीत आतंक                  コールドパニック

सरगुजिहा ठंड               スルグジャの寒さ

बिच्छू का डंक               スコーピオン刺傷


□  प्रदीप कुमार दाश

□  プラディープクマールダッシュ

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