हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

HINDI HAIKU & ORIYA TRANSLATION

हिन्दी हाइकु एवं ओड़िया अनुवाद


✍🅿प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हिन्दी हाइकु
----------------
01.
संसार मौन
गूंगे का व्याकरण
पढेगा कौन?

02.
बह जाने दें
ये आँसू ही धोते हैं
मन के मैल ।

03.
चुप्पी क्रांति है
आवाज के विरुद्ध
एक आवाज ।

04.
आओ तोड़ने
रुढ़ियों का आकाश
लगा फैलने ।
05.
दुल्हा बना हूँ
और स्मृतियाँ मेरी
बनी दूल्हन ।

06.
झरी मोतियाँ
मुस्का रहा बादल
सावन आया ।

07.
बता दो तुम
शान्ति ढूँढ रहा हूँ
कहाँ मिलेगी ?

08.
पीड़ाएँ मेरी
भेद पाओगे नहीं
ये हैं अभेद्य ।

09.
संयम छंद
महके ज्यों संबंध
हुआ स्वच्छंद ।

10.
ज्ञान का सूर्य
अज्ञान का अंधेरा
करता दूर ।

11.
धूप की थाली
बादल मेहमान
सूरज रोटी ।

12.
सत्यता जहाँ
खुदा रहता वहाँ
ढूँढता कहाँ ?

13.
आदमी-पंक्ति
मन एक हाइकु
छंद-प्रकृति ।

14.
काँटे तो नहीं
चूभने लगे अब
कोमल फूल ।

15.
रखो आईना
आत्मकथा अपनी
फिर लिखना ।

16. शाश्वत सच
सिक्के के दो पहलू
जन्म व मृत्यु ।

17.
चोट लगी है
यकीनन भीतर
टीसता दर्द ।

18.
भूख से लड़ा
पर ताकतवर
वही निकला ।

19.
व्यवस्था साँचा
ढल न पाया उर
टूटने लगा ।

20.
दूर से फैला
रुढ़ियों का आकाश
कहाँ से तोड़ें ।

21.
घुटता दम
देश अशांत देख
टूटता मन ।

22.
हँसा अतीत
रुलाये वर्तमान
भविष्यत को ।

23.
उड़ती हाय
अभिलाषा की धूल
जलता उर ।

24.
मानव पीटा
मानवता की पीठ
छल्ली हो गयी ।

25.
आँसू छलके
हँसे, फिर पीड़ा के
गीत सुनाये ।

26.
मुस्कान रोए
ठिठौली कर रहे
आँसू मुझ पे ।

27.
काल यंत्र में
मानवता पिरती
गन्ने की भाँति ।

✍🏻🅿प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

ओड़िया अनुवाद : -----
अनुवादक : - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

उड़िया अनुवाद  ଓଡିଆ ଅନୁବାଦ  Oriya translation

01)
ଜଗ ମଉନ
ମୂକର ବ୍ୟାକରଣ
ପଢିବ କିଏ ?

02)
ଭାସିବାକୁ ଦିଅ
ଏଇ ଅଶ୍ରୁ ଧୋଇବ
ମନର ମଳି ।

03)
ମଉନ ହିଁ କ୍ରାନ୍ତି
ଧ୍ବନିର ବିରୁଦ୍ଧରେ
ଗୋଟିଏ ଧ୍ବନି ।

04)
ଆସ ଭାଙ୍ଗିବା
ଅନ୍ଧବିଶ୍ୱାସର ଆକାଶ
ହୁଏ ବିସ୍ତୃତ ।

05)
ବର ସାଜିଛି
ଓ ସ୍ମୃତି ସବୁ ମୋର
ଆଜି କନିଆଁ ।

06)
ଝରିଲା ମୋତି
ମେଘ ହଁସେ ମୁରୁକି
ଆସେ ଶ୍ରାବଣ ।

07)
କହିଳ ତମେ
ମୁଁ  ଖୋଜୁଅଛି ଶାନ୍ତି
ମିଳେ କେଉଁଠି ?

08)
ବେଦନା ମୋର
ପାରିବ ନାହିଁ ଭେଦି
ଏ ଯେ ଅଭେଦ।

09)
ସଂଯମ ଛନ୍ଦ
ସୁବାସିତ ସମ୍ବନ୍ଧ
ହେଲା ସ୍ୱଚ୍ଛନ୍ଦ ।

10)
ଜ୍ଞାନ ସୂରୁଜ
ଅଜ୍ଞାନର ତିମିର
କରଇ ଦୂର ।

11)
ଖରାର ଥାଳି
ମେଘ ମାନେ ଅତିଥି
ସୂରୁଜ ରୁଟି ।

12)
ସତ୍ୟ ଯେଉଁଠି
ଭଗବାନ ସେଇଠି
ଖୋଜୁ କେଉଁଠି ?

13)
ମଣିଷ ଧାଡି
ମନ ଏକ ହାଇକୁ
ଛନ୍ଦ ପ୍ରକୃତି ।

14)
କଣ୍ଟା ନୁହଁନ୍ତି
ଗଡିଲେଣି ଏବେ
କଁଅଳ ଫୂଲ।

15)
କାଳର ଯନ୍ତ୍ର
ମାନବତା ଖଞ୍ଜୁଛି
ଆଖୁ ସଦୃଶ ।

16)
ଦର୍ପଣ ରଖ
ଆତ୍ମକଥା ନିଜର
ପରେ ଲେଖିବ ।

17)
ଶାଶ୍ଵତ ସତ୍ୟ
ମୁଦ୍ରାର ଦୁଇ ପାଖ
ଜନ୍ମ ଓ ମୃତ୍ୟୁ ।

18)
ମାଡ ବାଜିଛି
ନିଶ୍ଚିତ ଅନ୍ତରାପୃଷ୍ଠ
ବଢେ ଦରଦ ।

19)
ଭୋକ ସଂଗରେ
ଲଢିଲି, କିନ୍ତୁ ଏକା
ସେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ।

20)
ବ୍ୟବସ୍ଥା ଛାଞ୍ଚ
ଗଢି ହେଲା ନି ହୃଦୟ
ଭାଙ୍ଗି ଚାଲିଲା ।

21)
ଦୂର ବ୍ୟାପକ
ଅନ୍ଧବିଶ୍ୱାସର ନଭ
ଭାଙ୍ଗିବା କେଉଁଠୁ ?

22)
ରୁଦ୍ଧ ଜୀବନ
ଦେଶ ଅଶାନ୍ତି ଦେଖି
ଭାଙ୍ଗୁଛି ମନ।

23)
ହସିଲା ଗତ
କନ୍ଦାଏ ବର୍ତ୍ତମାନ
ଅନାଗତ କୁ ।

24)
ଉଡୁଛି ହାୟ
ଅଭିଳାଷାର ଧୂଳି
ଜଳୁଛି ଛାତି ।

25)
ମଣିଷ ବାଡଇ
ମଣିଷତାର ପିଠି
ଫାଟି ଉଠିଛି ।

26)
ଅଶ୍ରୁ ଛଳଛଳ
ହସେ, ପୁଣି ବେଦନାର
ସୁଣାଏ ଗୀତ ।

27)
କାନ୍ଦୁଛି ହସ
କରନ୍ତି ଉପହାସ
ମୋତେ ଯେ ଲୁହ ।

□ ପ୍ରଦୀପ କୁମାର ଦାଶ "ଦୀପକ"

☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆

HINDI HAIKU & SANTALI TRANSLATION

  1. हिन्दी हाइकु एवं संताली अनुवाद

✍🅿 प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हिन्दी हाइकु
----------------
01.
संसार मौन
गूंगे का व्याकरण
पढेगा कौन?

02.
बह जाने दें
ये आँसू ही धोते हैं
मन के मैल ।

03.
चुप्पी क्रांति है
आवाज के विरुद्ध
एक आवाज ।

04.
आओ तोड़ने
रुढ़ियों का आकाश
लगा फैलने ।
05.
दुल्हा बना हूँ
और स्मृतियाँ मेरी
बनी दूल्हन ।

06.
झरी मोतियाँ
मुस्का रहा बादल
सावन आया ।

07.
बता दो तुम
शान्ति ढूँढ रहा हूँ
कहाँ मिलेगी ?

08.
पीड़ाएँ मेरी
भेद पाओगे नहीं
ये हैं अभेद्य ।

09.
संयम छंद
महके ज्यों संबंध
हुआ स्वच्छंद ।

10.
ज्ञान का सूर्य
अज्ञान का अंधेरा
करता दूर ।

11.
धूप की थाली
बादल मेहमान
सूरज रोटी ।

12.
सत्यता जहाँ
खुदा रहता वहाँ
ढूँढता कहाँ ?

13.
आदमी-पंक्ति
मन एक हाइकु
छंद-प्रकृति ।

14.
काँटे तो नहीं
चूभने लगे अब
कोमल फूल ।

15.
रखो आईना
आत्मकथा अपनी
फिर लिखना ।

16. शाश्वत सच
सिक्के के दो पहलू
जन्म व मृत्यु ।

17.
चोट लगी है
यकीनन भीतर
टीसता दर्द ।

18.
भूख से लड़ा
पर ताकतवर
वही निकला ।

19.
व्यवस्था साँचा
ढल न पाया उर
टूटने लगा ।

20.
दूर से फैला
रुढ़ियों का आकाश
कहाँ से तोड़ें ।

21.
घुटता दम
देश अशांत देख
टूटता मन ।

22.
हँसा अतीत
रुलाये वर्तमान
भविष्यत को ।

23.
उड़ती हाय
अभिलाषा की धूल
जलता उर ।

24.
मानव पीटा
मानवता की पीठ
छल्ली हो गयी ।

25.
आँसू छलके
हँसे, फिर पीड़ा के
गीत सुनाये ।

26.
मुस्कान रोए
ठिठौली कर रहे
आँसू मुझ पे ।

27.
काल यंत्र में
मानवता पिरती
गन्ने की भाँति ।

✍🅿प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

संताली अनुवाद : -----
अनुवादक : चन्द्रमोहन किश्कू

1)
ᱥᱚᱝᱥᱟᱨ ᱛᱷᱤᱨᱛᱷᱟᱨ
ᱠᱚᱸᱫᱟ ᱠᱚᱣᱟᱜ ᱨᱚᱱᱚᱲ
ᱯᱟᱲᱦᱟᱣᱟᱭ ᱚᱠᱚᱭ?

2)
ᱡᱚᱨᱚ ᱦᱚᱪᱚᱣᱟᱜ ᱢᱮ
ᱱᱚᱣᱟ ᱢᱮᱫ ᱫᱟᱜ ᱜᱮᱭ ᱟ.ᱨᱩᱵᱟ
ᱢᱚᱱᱮ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱢᱟ.ᱭᱞᱟ. |

3)
ᱱᱤᱥᱩᱱ ᱦᱩᱞ ᱠᱟᱱᱟ
ᱟᱲᱟᱝ ᱵᱤᱨᱩᱫ ᱨᱮ
ᱢᱤᱫᱴᱟᱝ ᱟᱲᱟᱝ |

4)
ᱦᱤᱡᱩᱜ ᱢᱮ ᱨᱟ.ᱯᱩᱫ
ᱟᱸᱫᱷᱟ ᱯᱟ.ᱛᱭᱟ.ᱣ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱥᱮᱨᱢᱟ
ᱯᱟᱥᱱᱟᱣᱚᱜ ᱠᱟᱱᱟ |

5)
ᱡᱟᱸᱣᱟᱭᱤᱧ ᱵᱮᱱᱟᱣ ᱟᱠᱟᱱᱟ
ᱟᱨ ᱩᱭᱦᱟ.ᱨ ᱠᱚ ᱤᱧᱟᱜ
ᱵᱮᱱᱟᱣ ᱟᱠᱟᱱᱟᱭ ᱵᱟ.ᱦᱩ ᱠᱩᱲᱤ |

6)
ᱡᱟ.ᱲᱤ ᱠᱟᱛᱮ ᱢᱳᱛᱤ
ᱞᱟᱸᱫᱟᱭᱮᱫᱟᱭ ᱨᱤᱢᱤᱞ
ᱥᱟᱱ ᱦᱮᱡ ᱮᱱᱟ |

7)
ᱢᱮᱱ ᱢᱮ ᱟᱢ
ᱥᱟᱱᱛᱤᱢ ᱯᱟᱸᱡᱟᱭᱮᱫᱟ
ᱟᱠᱟᱨᱮ ᱧᱟᱢᱚᱜ-ᱟ |

8)
ᱦᱟᱸᱥᱩ ᱠᱚ ᱤᱧᱟᱜ
ᱵᱟᱢ ᱛᱟᱯᱟᱵ ᱫᱟᱲᱮᱭᱟᱜ-ᱟ
ᱱᱚᱣᱟ ᱫᱚ ᱵᱟᱝ ᱛᱟᱯᱟᱵᱟᱱᱟᱜ ᱠᱟᱱᱟ |

9)
ᱥᱚᱝᱭᱚᱢ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱪᱷᱟᱸᱫᱟᱣ
ᱫᱚᱲᱦᱚᱜ-ᱟ ᱥᱟ.ᱜᱟ.ᱭ ᱡᱟᱸᱦᱟᱛᱮ
ᱦᱩᱭᱮᱱᱟ ᱯᱷᱩᱨᱜᱟ.ᱞ |

10)
ᱜᱮᱭᱟᱱ ᱨᱤᱱᱤᱡ ᱵᱮᱲᱟ
ᱚᱜᱮᱭᱟᱱ ᱨᱮᱱᱟᱜ ᱧᱩᱛᱟ.ᱛ
ᱞᱟᱜᱟ ᱯᱷᱟᱨᱟᱠᱟᱭ

11)
ᱥᱤᱛᱩᱢ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱛᱷᱟ.ᱨᱤ
ᱨᱤᱢᱩᱞ ᱯᱮᱲᱟ
ᱵᱮᱲᱟ ᱨᱩᱴᱤ |

12)
ᱥᱟ.ᱨᱤ ᱡᱟᱸᱦᱟᱨᱮ
ᱠᱷᱩᱫᱟ ᱛᱟᱸᱦᱮᱱᱟᱭ ᱚᱸᱰᱮ
ᱯᱟᱸᱡᱟᱭᱮᱠᱟᱱᱟᱢ ᱚᱠᱟᱨᱮ?

13)
ᱢᱟ.ᱱᱢᱤ ᱞᱟ.ᱭᱤᱱ
ᱢᱚᱱᱮ ᱢᱤᱫᱴᱟᱝ ᱦᱟᱭᱠᱩ
ᱪᱷᱚᱱᱫᱚ ᱥᱟᱪᱟᱨᱦᱮ |

14)
ᱡᱟᱱᱩᱢ ᱛᱚ ᱵᱟᱝ
ᱯᱟᱜ-ᱴᱤ ᱠᱟᱱᱟ ᱱᱤᱛᱚᱜ
ᱩᱯᱟ.ᱞ ᱵᱟᱦᱟ |

15)
ᱫᱚᱦᱚᱭ ᱢᱮ ᱟ.ᱨᱥᱤ
ᱡᱤᱭᱚᱱᱠᱟᱛᱷᱟ ᱟᱢᱟᱜ
ᱤᱱᱟ.ᱛᱟᱭᱚᱢ ᱚᱞ ᱢᱮ |

16)
ᱠᱷᱟᱸᱴᱤ ᱥᱟ.ᱨᱤ
ᱥᱤᱠᱠᱟ. ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱵᱟᱨᱭᱟ ᱯᱟᱦᱴᱟ
ᱡᱟᱱᱟᱢ ᱟᱨ ᱜᱩᱨ |

17)
ᱵᱟᱡᱟᱣ ᱟᱠᱟᱱᱟ.ᱧ
ᱥᱟ.ᱨᱤ ᱩᱛᱟ.ᱨ ᱵᱷᱤᱛᱨᱤ ᱨᱮ
ᱨᱟᱠᱟᱵ ᱠᱟᱱᱟ ᱦᱟᱸᱥᱩ |

18)
ᱨᱮᱸᱜᱮᱡ ᱥᱟᱞᱟᱜ ᱤᱧ ᱞᱟ.ᱲᱦᱟ.ᱭ ᱠᱮᱜ-ᱟ
ᱢᱮᱱᱠᱷᱟᱱ ᱫᱟᱲᱮᱭᱟᱱ ᱫᱚ
ᱩᱱᱤᱜᱮᱭ ᱜᱚᱴᱟᱭᱮᱱᱟ |

19)
ᱵᱮᱵᱚᱥᱛᱷᱟ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱯᱷᱟᱨᱢᱟ
ᱵᱟᱭ ᱥᱟᱦᱚᱵ ᱫᱟᱲᱮᱭᱟᱜ-ᱱᱟ ᱨᱤᱫᱚᱭ
ᱨᱟ.ᱯᱩᱫ ᱮᱱᱟ |

20)
ᱥᱟ.ᱜᱤᱧ ᱠᱷᱚᱱᱟᱜ ᱯᱟᱥᱱᱟᱣ
ᱟᱸᱫᱷᱟ ᱯᱟ.ᱛᱭᱟ.ᱣ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱥᱮᱨᱢᱟ
ᱚᱠᱟ ᱠᱷᱚᱱᱟᱜ ᱤᱧ ᱨᱟ.ᱯᱩᱫᱟ |

21)
ᱩᱠᱵᱩᱠᱟ.ᱜ ᱢᱚᱱᱮ
ᱫᱤᱥᱚᱢ ᱚᱥᱟᱱᱛᱤ ᱧᱮᱞᱛᱮ
ᱨᱟ.ᱯᱩᱫᱚᱜ-ᱟ ᱢᱟᱥᱮ |

22)
ᱞᱟᱸᱫᱟ ᱠᱮᱜ-ᱟᱭ ᱱᱟᱜᱟᱢ
ᱨᱟᱜᱦᱚᱪᱚ ᱠᱮᱫᱮᱭᱟᱭ ᱱᱤᱛᱚᱜ
ᱟᱜᱟᱢ |

23)
ᱚᱴᱟᱝᱚᱜ ᱠᱟᱱ ᱦᱟᱭᱪᱚᱜ
ᱥᱟᱱᱟ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱫᱷᱩᱲᱤ
ᱟᱛᱟᱨᱚᱜ ᱠᱟᱱ ᱨᱤᱫᱚᱭ |

24)
ᱢᱟ.ᱱᱢᱤᱭ ᱫᱟᱞ ᱦᱚᱪᱚᱭᱮᱱᱟ
ᱢᱟ.ᱱᱣᱟ.ᱨᱤ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱫᱮᱭᱟ
ᱯᱚᱴᱟᱜ ᱩᱛᱟ.ᱨᱮᱱᱟ |

25)
ᱢᱮᱫ ᱫᱟᱜ ᱡᱚᱨᱚᱭᱮᱱᱟ
ᱞᱟᱸᱫᱟ ᱠᱮᱜ-ᱟᱭ, ᱛᱟᱭᱱᱚᱢ ᱛᱮ
ᱦᱟᱸᱥᱩ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱮ ᱥᱮᱨᱮᱧ ᱠᱮᱜ-ᱟ |

26)
ᱢᱩᱞᱩᱡ ᱮ ᱨᱟᱜ ᱠᱮᱜ-ᱟ
ᱴᱤᱴᱠᱟ.ᱨᱤᱧ ᱠᱟᱱᱟᱭ
ᱢᱮᱫ ᱫᱟᱜ |

27)
ᱠᱟᱞ ᱨᱮᱭᱟᱜ ᱭᱚᱱᱛᱨᱚ ᱨᱮ
ᱢᱟ.ᱱᱣᱟ.ᱨᱤ ᱯᱤᱥᱟ.ᱜ-ᱟ
ᱟᱸᱠᱷ ᱞᱮᱠᱟ |

--------●●●-------

संताली अनुवादक : -----

नाम :-  चंद्र मोहन किस्कू
जन्म:-  22.02.1982
शिक्षा:-  स्नातक
प्रकाशित कृतियां :----
सबरनाखा (हिंदी कविता पुस्तक ईबुक & पेपरबैक्स)
फूलों की खेती (  हिंदी कविता पुस्तक & ईबुक)
मुलुज लांदा (  संताली कविता पुस्तक )
फेसबुक (  संताली कहानी संग्रह )
सिदू कान्हू  तिकिनाग होहोते (  महाश्वेता देवी कृत बांग्ला उपन्यास का संताली अनुवाद )
आँगरा (  जसिंता केरकेट्टा कृत हिंदी कविता पुस्तक का संताली अनुवाद )
व्यवसाय :-  रेल कर्मचारी
डाक पता :-
ग्राम :-  बेहड़ा, पोस्ट - हल्दाजुड़ी , जिला - पूर्वी सिंहभूम , झारखण्ड - 832303

---------------------●●●●●●--------------------

HINDI HAIKU & PUNJABI TRANSLATION

हिन्दी हाइकु एवं पंजाबी अनुवाद
  ✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


मूल हिन्दी हाइकु
---------------------
01.
संसार मौन
गूंगे का व्याकरण
पढेगा कौन?

02.
 बह जाने दें
ये आँसू ही धोते हैं
मन के मैल ।

03.
चुप्पी क्रांति है
आवाज के विरुद्ध
एक आवाज ।

04.
आओ तोड़ने
रुढ़ियों का आकाश
लगा फैलने ।

05.
दुल्हा बना हूँ
और स्मृतियाँ मेरी
बनी दूल्हन ।

06.
झरी मोतियाँ
मुस्का रहा बादल
सावन आया ।

07.
 बता दो तुम
शान्ति ढूँढ रहा हूँ
कहाँ मिलेगी ?

08.
 पीड़ाएँ मेरी
भेद पाओगे नहीं
ये हैं अभेद्य ।

09.
संयम छंद
महके ज्यों संबंध
हुआ स्वच्छंद ।

10.
ज्ञान का सूर्य
अज्ञान का अंधेरा
करता दूर ।

11.
धूप की थाली
बादल मेहमान
सूरज रोटी ।

12.
सत्यता जहाँ
खुदा रहता वहाँ
ढूँढता कहाँ ?

13.
आदमी-पंक्ति
मन एक हाइकु
छंद-प्रकृति ।

14.
काँटे तो नहीं
चूभने लगे अब
कोमल फूल ।

15.
रखो आईना
आत्मकथा अपनी
फिर लिखना ।

16.
शाश्वत सच
सिक्के के दो पहलू
जन्म व मृत्यु ।

17.
चोट लगी है
यकीनन भीतर
टीसता दर्द ।

18.
भूख से लड़ा
पर ताकतवर
वही निकला ।

19.
व्यवस्था साँचा
ढल न पाया उर
टूटने लगा ।

20.
दूर से फैला
रुढ़ियों का आकाश
कहाँ से तोड़ें ।

21.
घुटता दम
देश अशांत देख
टूटता मन ।

22.
हँसा अतीत
रुलाये वर्तमान
भविष्यत को ।

23.
उड़ती हाय
अभिलाषा की धूल
जलता उर ।

24.
 मानव पीटा
मानवता की पीठ
छल्ली हो गयी ।

25.
आँसू छलके
हँसे, फिर पीड़ा के
गीत सुनाये ।

26.
मुस्कान रोए
ठिठौली कर रहे
आँसू मुझ पे ।

27.
काल यंत्र में
मानवता पिरती
गन्ने की भाँति ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

पंजाबी अनुवाद :-----
अनुवादक :
जसदीप मोहन जी

01)
ਸੰਸਾਰ ਮੌਨ
ਗੂੰਗੇ ਦਾ ਵਿਆਕਰਣ
ਪੜੇਗਾ ਕੌਣ
------
02)
ਵਗ ਜਾਣ ਦੇ
ਇਹ ਹੰਝੂ ਹੀ ਧੋੰਦੇ ਨੇ
ਮਨ ਦੇ ਮੈਲ
------
03)
ਮੌਨ ਇੱਕ ਕ੍ਰਾੰਤੀ
ਆਵਾਜ਼ ਦੇ ਖਿਲ਼ਾਫ਼
ਇੱਕ ਆਵਾਜ਼
-------
04)
ਆਓ ਤੋੜੀਏ
ਰੂੜੀਆੰ ਦਾ ਅਕਾਸ਼
ਫੈਲਦਾ ਜਾੰਦਾ
-----
05)
ਲਾੜਾ ਬਣ ਬੈਠਾ
ਤੇ ਯਾਦਾੰ ਮੇਰੀਆੰ
ਬਣੀਆੰ ਲਾੜੀ
-----
06)
ਵਰਸੇ ਮੋਤੀ
ਹੱਸਦਾ ਹੈ ਬੱਦਲ
ਸਾਵਣ ਆਇਆ
-----
07)
ਦੱਸੋ ਖਾੰ
ਲੱਭ ਰਿਹਾ ਹਾੰ ਸ਼ਾੰਤੀ
ਕਿੱਥੋੰ ਮਿਲੂ
-------
08)
ਪੀੜ ਮੇਰੀ
ਤੇਰੇ ਵੱਸ ਦੀ ਨਹੀੰ
ਇਹ ਹੈ ਅਪਾਰ
-------
09)
ਸੰਜਮ ਛੰਦ
ਮਹਿਕੇ ਜਿਉੰ ਸੰਬੰਧ
ਹੋਕੇ ਮਸਤਾਨਾ
-------
10)
ਗਿਆਨ ਦਾ ਸੂਰਜ
ਅਗਿਆਨ ਦਾ ਹਨੇਰਾ
ਦੂਰ ਕਰੇ
-------
11)
ਧੁੱਪ ਦੀ ਥਾਲੀ
ਬੱਦਲ ਪ੍ਰਾਹੁਣਾ
ਸੂਰਜ ਰੋਟੀ
------
12)
ਸੱਚਾਈ ਜਿੱਥੇ
ਰੱਬ ਰਹੇ ਉੱਥੇ
ਲੱਭਦਾ ਕਿੱਥੇ?
------
13)
ਆਦਮੀ -ਵਾਕ
ਮਨ ਇੱਕ ਹਾਈਕੂ
ਛੰਦ-ਸੁਭਾਅ
-------
14)
ਕੰਡੇ ਤਾੰ ਨਹੀੰ
ਚੁੱਭਣ ਲੱਗੇ ਹੁਣ
ਕੋਮਲ ਫੁੱਲ
-----
15)
ਛੱਡ ਸ਼ੀਸ਼ਾ
ਜੀਵਨੀ ਆਪਣੀ
ਫੇਰ ਲਿਖੀੰ
-------
16)
ਅਟੱਲ ਸੱਚਾਈ
ਸਿੱਕੇ ਦੇ ਦੋ ਪਹਿਲੂ
ਜੀਵਨ ਤੇ ਮਰਨ
------
17)
ਸੱਟ ਲੱਗੀ ਏ
ਸੱਚੀੰ ਅੰਦਰੋ
ਉੱਠਦੀ ਦਰਦ
-------
18)
ਭੁੱਖ ਨਾਲ ਲੜਿਆ
ਤਾਕਤਵਰ ਵੀ
ਓਹੀ ਖੜਿਆ
-------
19)
ਪ੍ਰਬੰਧ ਸੱਚਾ
ਹਿਰਦਾ ਢਲ ਨਾ ਸਕਿਆ
ਟੁੱਟਣ ਕਿਨਾਰੇ
-----
20)
ਮੀਲਾੰ-ਬੱਧੀ ਫੈਲਿਆ
ਰੂੜੀਆੰ ਦਾ ਅਕਾਸ਼
ਕਿਵੇੰ ਤੋੜੀਏ
-----
21)
ਮਨ ਘੁਟਦਾ
ਦੇਖਕੇ ਅਸ਼ਾਤ ਦੇਸ਼
ਮਨ ਟੁੱਟਦਾ
------
22)
ਅਤੀਤ ਹੱਸਿਆ
ਰਵਾਉੰਦਾ ਵਰਤਮਾਨ
ਭਵਿੱਖਤ ਨੂੰ
-------
23)
ਉੱਡਦੀ ਹਾਅ
ਆਸਾੰ ਦੀ ਧੂੜ
ਸਾੜਦੀ ਹਿਰਦਾ
-------
24)
ਦੂਰਦ਼ਸ਼ਾ
ਮਨੁੱਖਤਾ ਦੀ ਪਿੱਠ
ਛੱਲਣੀ ਹੋਈ
--------
25)
ਹੰਝੂ ਛਲਕੇ
ਹੱਸੇ, ਫਿਰ ਦਰਦਾੰ ਦੇ
ਗੀਤ ਸੁਣਾਏ
-------
26)
ਮੁਸਕਾਨ ਰੋਵੇ
ਠੱਠਾ ਕਰ ਰਹੇ
ਹੰਝੂ ਮੇਰੇ ਵੱਲ
-------
27)
ਕਾਲ ਯੰਤਰ ਵਿੱਚ
ਮਾਨਵਤਾ ਪੀੜਦੀ
ਗੰਨੇ ਦੇ ਵਾੰਗਰਾੰ
----------

देवनागरी लिप्यंतरण : ------

01)
संसार मौन
गूंगे दा विआकरण
पड़ेगा कौण ?
--------
02)
वग जाण दे
ऐह हंझू ही धोंदे ने
मन दे मैल
---------
03)
मौन इक क्रान्ति
आवाज़ दे खिलाफ
इक आवाज़
---------
04)
आओ तोड़िए
रूड़ियां दा अकाश
फैलदा जांदा
--------
05)
लाड़ा बण बैठा
ते यादां मेरिआं
बणीआं लाड़ी
---------
06)
बरसे मोती
हस्सदा है बद्दल
सावण आया
--------
07)
दस्सो खां
लभ्भ रेहा हां शान्ति
कित्थों मिलू ?
---------
08)
पीड़ मेरी
तेरे वस्स दी नहीं
ऐह है अपार
---------
09)
संजम छन्द
महके ज्यों सम्बन्ध
होके मसताना
----------
10)
ज्ञान दा सूरज
अज्ञान दा हनेरा
दूर करे
---------
11)
धुप्प दी थाली
बद्दल पराहुणा
सूरज रोटी
--------
12)
सच्चाई जित्थे
रब्ब रहे उत्थे
लभ्भदा कित्थे
----------
13)
आदमी-वाक
मन इक हाईकू
छन्द सुभाअ
-----------
14)
कण्डे ता नहीं
चुभ्भण लग्गे हुण
कोमल फुल्ल
---------
15)
छड्ड शीशा
जीवनी आपणी
फेर लिखीं
---------
16)
अट्टल सच्चाई
सिक्के दे दो पैहलू
जीवन ते मरन
----------
17)
सट्ट लग्गी ऐ
सच्चीं अन्दरों
उट्ठदी दरद
-----------
18)
भुक्ख नाल लड़ेया
ताकतवर भी
ओही खड़ेया
----------
19)
प्रबन्ध सच्चा
हिरदा ढल ना सकेआ
टुट्टण किनारे
-------------
20)
मीलां बध्धी फैलेया
रूड़ियां दा अकाश
किवें तोड़िऐ
------------
21)
मन घुटदा
देखके अशाँत देश
मन टुटदा
-------------
22)
अतीत हस्सेया
रवाउंदा वरतमान
भविक्खत नूँ
------------
23)
उडदी हाअ
आसां दी धूड़
साड़दी हिरदा
-------------
24)
दुरदशा
मनुक्खता दी पिट्ठ
छल्लणी होई
------------    
25)
हँझू छलके
हस्से, फिर दरदां दे
गीत सुणाए
---------  
26)  
मुसकान रोवे
ठट्ठा कर रहे
हँझू मेरे वल्ल
-------------
27)
काल यंतर विच्च
मानवता पीड़दी
गन्ने दे वांगरां ।
-----●●●-----

अनुवादक : जसदीप मोहन जी    
पिता का नाम : श्री राम सरन मोहन
जन्म : 03.04.1971
शिक्षा : -------
     एम.ए.(हिन्दी,पंजाबी,राजनीति शास्त्र) एम.एड.,एम.फिल.,पी-एच.डी.(हिन्दी)
प्रकाशित कृतियाँ : -------
कविता साधना
लेख साधना
शेख़ फरीद-एक पुन:पाठ
मेरी अविस्मरणीय यादें (अनूदित)
व्यवसाय : ------
         कार्यकारी प्रिंसीपल
लायलपुर खालसा सीनियर सैकण्डरी स्कूल
जालन्धर, पंजाब
पोस्टल पता : ------
          लक्की जनरल स्टोर
लाम्बड़ा, ज़िला : जालन्धर (पंजाब)

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PRADEEP KUMAR DASH (HAIKU BOOK)

PRADEEP KUMAR DASH

01.)

Pradeep Kumar Dash "Deepak"
● Mainshe ke peera ( मइनसे के पीरा )
First Chhattishgarhi Haiku book of India [2000]
● Publisher : Chhattishgarh lekhak sangh saria, (c.g.) INDIA
● Price :  ₹ 25
● Availability :
          • pkdash399@gmail.com
          • download PDF online
          • read online  (kavitakosh)
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02.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Haiku Chatushk (हाइकु चतुष्क)
Hindi, Oriya, Chhattishgarh & Sambalpuri haiku  (2000)
● Publisher : Rashtradeep prakashan sankara (c.g) INDIA
● Price : ₹ 20
● Availability :
         • pkdash399@gmail.com
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03.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Rudhiyo ka aakash ( रुढ़ियों का आकाश)
First senryu book of Hindi [2003]
● Publisher : Mandavi prakashan gajiabad (U.P.)
● Price : ₹ 35
● Availability :
     • pkdash399@gmail.com
     • mandavi prakashan gajiavad.
     • Download PDF online.
     • Read online.
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04.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Haiku Vatika ( हाइकु वाटिका )
   A great collection of 371 haiku poet from India. [2004]
● Publisher : mandavi prakashan gajiavad.
● Price : ₹ 100
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • mandavi prakashan gajiavad.

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05.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Haiku Saptak ( हाइकु सप्तक )
    Haiku, Introductions & thought of Seven gratest hindi haikukar. [2006]
● Publisher : mandavi prakashan gajiavad.
● Price : ₹ 100
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • mandavi prakashan gajiavad.
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06.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Prakriti ki god me (प्रकृति की गोद में)
   Hindi haiku book [2017]
● Publisher : Ayan prakashan Delhi
● Price : ₹ 240
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • Ayan prakashan Delhi
      • Download PDF online
      • read online  (Kavitakosh)
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07.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Jhankta Chand ( झाँकता चाँद )
    A haiku collection of 40 hindi haikukar  [2017]
● Publisher : Ayan prakashan Delhi
● Price : ₹ 200
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • Ayan prakashan Delhi
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08.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Kashturi ki Talash ( कस्तूरी की तलाश )
    First renga book in world. [2017]
● Publisher : Ayan prakashan Delhi
● Price : ₹ 300
● Availability :
     • pkdash399@gmail.com
     • Ayan prakashan Delhi.
     • haikumanjusha.blogspot.in
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09.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Tanka Ki Mahak ( ताँका की महक )
   A great collection of 271 hindi Tanka poet. [2017]
● Publisher : Ayan prakashan Delhi
● Price : ₹ 500
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • Ayan prakashan Delhi

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10.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Haiku manjusha ( हाइकु मञ्जूषा )
    A great collection of 489 Hindi haiku poet. [2018]
● Publisher : Utkarsh prakashan Delhi.
● Price : ₹ 500
● Availability :
      • pkdash399@gmail.com
      • Utkarsh prakashan Delhi.
      • PDF copies available in online.
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11.)

Pradeep kumar Dash "Deepak"
● Chhattishgarh ki Haiku Sadhna ( छत्तीसगढ़ की हाइकु साधना )
   A collection of 113 haiku poet on Chhattishgarh [2018]
● Publisher : Utkarsh prakashan Delhi.
● Price : ₹ 300
● Availability :
     • pkdash399@gmail.com
     • Utkarsh prakashan Delhi.
     • PDF copies available in online
     • Read online.

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रविवार, 27 मई 2018

ताँका की महक (साझा ताँका संग्रह)

                          ताँका की महक (साझा ताँका संग्रह) 

                                 प्रकाशक : अयन प्रकाशन

                प्रकाशन वर्ष - 2018                पुस्तक मूल्य - 500/--

                           संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


आपके प्रतिभाव : -------

     सादर शुभ संध्या सर..
          आज "ताँका की महक " मिली.. आपके परिश्रम के हर शब्द शब्द में हस्ताक्षर दिखे.. बेहद खूबसूरत मुखपृष्ठ एवम अत्यंत उच्च गुणवत्तायुक्त  printing व  paper.. कुछ पन्ने  पढ़े अभी पूरी पढ़ना बाकी है..मेरे अति  सद् भाग्य कि इतने अत्यंत सुंदर संकलन में मेरे सृजन को स्थान मिला.. अंतर्मन से खूब बधाइयां एवम अनेक धन्यवाद.. नमन.....

                     - अल्पा जीतेश तन्ना

"तांका की महक" प्रदीप जी के इस ऐतिहासिक  श्रमसाध्य कार्य को हार्दिक नमन । शुभकामनाएं ! यह पुस्तक मील का पत्थर बने !!
                     - राकेश गुप्ता

मनमोहक
साझा ये संकलन
हुआ प्रदीप्त
पसरने लगी है
हाँ, ताँका की महक

हार्दिक बधाई आदरणीय प्रदीप भाई...

               - सुधा राठौर

ताँका महक
बने मील पत्थर
शुभकामना ।

        - राकेश गुप्ता

तांका संग्रह
प्रदीप परिश्रम
लाया रंग है
बधाई पात्र आप
लाये  साथ खुशियां ।

            - निर्मला पांडेय

        आदरणीय प्रदीप जी तांका की महक आपके अथक प्रयास का प्रतिफल है।आपको बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएं।हमे इसमें शामिल किया ये हमारे लिए  गौरव की बात है।सादर आभार । आपको नमन.....

                       - पूर्णिमा सरोज

         बहुत बहुत बधाई आदरणीय प्रदीप कुमार दाश दीपकजी एवं अनेक शुभकामनाएं आप उत्तरोत्तर प्रगति करते जाएं यही कामना।
                              - प्रकाश कांबले

       आदरणीय श्री. प्रदीप कुमार दाश "दीपक" सर जी,
          आज "तांका की महक" का अति सुंदर साझा संकलन देखकर बहुत प्रसन्नता हुई।
आपको एवं सभी गुणी रचनाकारों को तहे दिल से बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ!

                      - रामेश्वर बंग

         दाश सर ..पुस्तकें सधन्यवाद प्राप्त हुई। आभारी हूँ ।
         सुंदर संपादन हेतु अनेकानेक बधाई । प्रबुद्ध लेखकों के बीच स्वयं को पाकर प्रसन्न हूँ ।
                            - निर्मला सुरेन्द्रन

            प्रदीपजी अनेकानेक धन्यवाद पुस्तक का प्रिंट कागज़ कलेवर कवर सभी बेहद खूबसूरत है असली में तो आप ही बधाई के पात्र है  जिन्होंने इसका संयोजन के इतना प्रयास किया ।

                    - निर्मला पाण्डेय

        आदरणीय प्रदीप जी, नमन.... "तांका की महक"...दो प्रतियाँ प्राप्त हुई...पुस्तक बहुत सुंदर बनी है...आपका कार्य सदा ही सराहनीय रहा है।हम सबका साथ इसी तरह बना रहे और लेखन कार्य में सदैव उन्नति करते रहें...धन्यवाद ।

                         - मधु सिंघी

आदरणीय श्री. प्रदीप कुमार दाश दीपक सर जी, आज "तांका की महक" का अति सुंदर साझा संकलन देखकर बहुत प्रसन्नता हुई।
आपको एवं सभी गुणी रचनाकारो को तहे दिल से बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ !

काव्य सुमन
साझा तांका संग्रह
महके गंध
संपादक  प्रदीप
महकाये वाटिका ।

        - रामेश्वर बंग

आदरणीय प्रदीप जी ,"तांका की महक" प्राप्त । बहुत बहुत आभार। आपकी कठोर मेहनत परिलक्षित है ।

          - डाॅ. अखिलेश शर्मा

प्रदीप जी प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुई
तांका की महक सुंदर कलेवर में  प्राप्त हुई
आपको ,आपके परिश्रम को धन्यवाद ।

                    - मीनाक्षी भटनागर

        आ. प्रदीप कुमार  सर जी, "ताँका की महक" आज ही दो प्रति प्राप्त हुई  बहुत बहुत दिल से आभार ! मूझे  बहुत  खुशी हुई है। मेरा मराठी में लिखना स्वाभाविक  है। परन्तु  हिन्दी में  ताँका लिखने का जो भी मैंने प्रयास किया है, इसका सम्पूर्ण श्रेय दीपक सर जी आपको ही जाता  है। आप हम सभी के प्रेरणा स्त्रोत है । धन्यवाद !! आपको नमन...

                 - डाॅ. तारा चौधरी

[9/5, 4:43 PM] राजीव नामदेव "राना लिधौरी": प्रदीप हमें तांका की महक की प्रतियां आज मिल गयी
धन्यवाद
संग्रह बहुत बढिया छपा है
आपका संपादन बधाई के काबिल है।
आपने बहुत मेहनत की है।

              - राजीव नामदेव

आदरणीय, प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी
      सादर अभिवादन.....
आप द्वारा प्रेषित 'ताँका की महक'  पुस्तक कल प्राप्त हुई, आकर्षक कलेवर ,सुन्दर छपाई, पुस्तक का आकार व  आपका कुशल सम्पादन मन मोह गया । प्रकाशन की हार्दिक बधाई।

                    - डाॅ. आनन्द प्रकाश शाक्य

       आदरणीय प्रदीप कुमार दाश जी आज सुंदर कलेवर में "ताँका की महक " की दो प्रतियां प्राप्त हो गईं। हार्दिक धन्यवाद।
आपके अथक परिश्रम को साधुवाद है।
          आशा करती हूं कि शीघ्र ही "हाइकु मञ्जूषा" भी प्रकाशित होगी । अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं......

                              - शशि त्यागी

लेखन में नित नवीन प्रयोग कर आश्चर्यचकित कर देने वाले आपके अदम्य साहस से मैं अभीभूत हूँ।ईश्वर सदैव आपका सहयोग करे।

नव प्रयास
रचा है इतिहास
आ गया  रास
ये "ताँका की महक"
प्रदीपजी जनक ।

        आदरणीय प्रदीपजी, नमन । "तांका की महक"...दो प्रतियाँ प्राप्त हुई...पुस्तक बहुत सुंदर बनी है...आपका कार्य सदैव सराहनीय रहा है...धन्यवाद ।

                         - मधु सिंघी

प्यारा सन्देश
प्रदीप प्रज्ज्वलन
महके तांका
विस्तार हो सर्वत्र
शुभकामना " दीप "

         -- मँजु शर्मा

बधाई मिले
तांका की महक
सुगंध लायी
सबके मन भाई
प्रदीप दीप जला।।

- गंगा प्रसाद पांडेय "भावुक"

शुभकामनाएं !
यह पुस्तक मील का पत्थर बने !!

           - राकेश गुप्ता

तांका की महक प्राप्त हुई है आदरणीय
बहुत बहुत धन्यवाद अनेक शुभकामनाओं के साथ बहुत बहुत बधाई । तांका की महक ने
सब को हर्षित किया आपको पुनः बहुत बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएं ।

                            - प्रकाश कांबले

भाई प्रदीप बहुत दिनों बाद साझा ताँका संकलन की पुस्तक हाथ में आई, मेहनत का फल देर से मिलता है। ईश्वर की इच्छा पर ही कर्म फल निर्भर करता है। केवल हम कर्म कर सकते हैं । बधाई और शुभकामनाएं । अगले कर्म की प्रतीक्षा में। ईश्वर कब देते हैं । तुम्हारा अग्रज.......

            - देवेन्द्रनारायण दास बसना।

नमन आदरणीय प्रदीप कुमार दास , दीपक जी , अत्यंत हर्ष का अवसर है , आपको भी बहुत बहुत बधाई हो । "तांका की महक" में आपकी मेहनत पुनः रंग लाई है ,एक बार फिर हृदयतल से बधाई ।

                   - गोपीकिशन शर्मा

"ताँका की महक"
         साझा संकलन-
  जापानी काव्य विधाओं के लिए आ प्रदीप कुमार दाश दीपक जी की लगन की जितनी भी तारीफ की जाए कम ही रहेगी ।
लाज़वाब संकलन, बेहतरीन सम्पादन, शानदार पेपर, सब कुछ बहुत बहुत खूबसूरत ....
                   
                   - चंचला इंचुलकर सोनी

Dear 'Deepak',
                 Received a copy of your Tanka Ki Mahak.Went through it eagerly and found it
      interesting.The high quality tankas are a pleasure to read.Please accept hearty congratulations.
            and best wishes for your next ventures.Thanks.
           With regards,
           sincerely,
           
          - S.K.Trivedi,Fatehpur,U.P.

खुद को जानना है तो...अपने ही गढ़े शब्दों को पढ़ो.......
          चिर प्रतीक्षित...तांका की महक...को छूकर....पढ़कर आज यह  अहसास..हुआ......
              दोस्तों जापानी काव्यविधा की तांका रचनाओं का अनुपम संकलन....है तांका की महक...छोटी छोटी...महज पाँच लाइन..31अक्षर  से गढ़ी..तांका रचनायें...मन मोह लेती हैं......दिल नहीं भरता पढ़ते ही जाओ.........खूबसूरत प्रयास...आदरणीय प्रदीप कुमार दाश "दीपक"जी के..संपादन में...एक और अनमोल...तोहफा....समस्त सह रचनाकारो को हार्दिक बधाई....
          दिल से आभार प्रदीप कुमार दाश दीपक जी......
                              - किरण मिश्रा

        प्रतीक्षा के पल अंततः समाप्त हुए, ख़ूबसूरत कलेवर में  "ताँका की महक" को देख कर अत्यंत प्रसन्नता हुई .. ।
         हार्दिक अभिनंदन और बहुत बहुत बधाई आदरणीय प्रदीप भाई ... आपका उत्कट प्रयास फलीभूत हुआ ।

हुई दस्तक
है ताँका की महक
मिली पुस्तक ।

     सुंदर कलेवर में,  आज ही प्राप्त हुई "ताँका की महक".... सम्पूर्ण मनोयोग से सम्पादित इस पुस्तक के लिये आदरणीय प्रदीप भाई का हार्दिक अभिनंदन और बहुत बहुत बधाई  !!!

सभी सहयोगी ताँका सृजनकर्ताओं को अनेकों बधाइयाँ ....

                               - सुधा राठौर
                              08/05/2018

         आदरणीय प्रदीप जी,
"ताँका की महक" साझा संकलन आपके अथक परिश्रम का प्रतिफल है । आपको इस उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई एवं उत्तरोत्तर प्रगति की शुभकामनाएँ ।

                          - पुरुषोत्तम होता

        भाई प्रदीप कुमार दाश आपके परिश्रम से पल्लवित व पुष्पित "तांका की महक" साझा संकलन के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामना ।
        आपके अतुलनीय सार्थक प्रयास के कारण ही यह सम्भव हो सका । मुझे इस बात की हार्दिक प्रसन्नता है कि मुझे भी इसमें सम्मिलित होने का गौरव प्राप्त हुआ । सभी रचनाकार साथियों को भी हार्दिक बधाई ।

                 - अशोक शर्मा "भारती"

"ताँका की महक" के सम्मानित सम्पादक प्रकाशक महोदय व सभी सहभागी रचनाकारों को तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद और आभार ।
      मेरी रचनाओं को स्थान देने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया ।

                      - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

~ हाइकु मञ्जूषा फरवरी 2018 के चयनित हाइकु ~

हाइकु मञ्जूषा

फरवरी - 2018 के चयनित हाइकु
{ श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन }
संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", एवं "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" समूह से साभार । )


01.
सुरम्य शोभा
जगत सुरभित
भोर की आभा ।

✍पूर्णिमा सरोज

02.
बसन्त दूत
बौर देख करती
कुहू का शोर ।

✍सविता बरई

03.
लगा ग्रहण
उम्मीदों ने निखारा
चमका चाँद ।

✍रामेश्वर बंग

04.
देवदास सा
झूमता समीर है
पी मकरंद ।

✍के.के.वर्मा

05.
चहके पंछी
सागर लहराया
रवि उदित ।

✍रति चौबे

06.
रंगीला फाग
नाचती तितलियाँ
कूकता बाग ।

✍ऋतुराज दवे

07.
अमिया डाल
गाती कोयल काली,
विरह गीत ।

✍पूनम मिश्रा

08.
निखर उठा
काले उबटन से
शशि सलोना ।

✍रति चौबे

09.
रौशन देश
दीपक फिर बुझा
सरहद में ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

10.
शूल के पथ
कर्म करता चल
होगा सफल ।

✍रामेश्वर बंग

11.
बेटी बिदाई
बहे अश्रु की धारा
आँगन सूना ।

✍सविता बरई

12.
रवि आरोही
चल पड़ा है छूने
नभ-शिखर ।

✍सुधा राठौर

13.
राह भटकी
भू खनन से रोती
त्रस्त नदियाँ ।

✍वीणा शर्मा

14.
डंडे की चोट
बंदर का नाचना
है मजबूरी ।

✍क्रान्ति

15.
यादें सुहानी
जिंदगी की कहानी
करती बयां ।

✍क्रान्ति

16.
चंद्र साम्राज्य
तारे खिलखिलाते
मुस्काती निशा ।

✍रति चौबे

17.
चाँदी के बूटे
रजनी की चूनर
तारों ने टाँके ।

✍सुधा राठौर

18.
निभा कर्तव्य
चमके भाग्य रेखा
स्वर्णिम कल ।

✍रामेश्वर बंग

19.
मन उलझा
अनसुलझा रहा
कैसे सुलझे ?

✍वृन्दा पंचभाई

20.
बेटी पढ़ती
सदा आगे बढ़ती
राह गढ़ती ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

21.
चाँद मुस्काया
आकाश में बिखरी
चाँदनी छटा ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

22.
साथ चलते
नदी के दो किनारे
पर न मिले ।

✍वृंदा पंच भाई

23.
मीत बनाएँ
कटुता मिटा कर
प्रीत बढ़ाएं ।

✍परमेश्वर अंचल

24.
रख उर में
मधु मधुर रस
महके रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

25.
चिंतन पथ
व्यथित भावनाएं
कथित सत्य ।

✍अविनाश बागड़े

26.
चुग रहे हैं
हवाओं के पखेरू
धूप की उष्मा ।

✍सुधा राठौर

27.
बाल की खाल
बनी ढोल न ढाल
कैसा कमाल ।

✍गंगा पाण्डेय भावुक

28.
सूरज हँसा
किरणे मुस्कुराई
भोर मुखर ।

✍अविनाश बागड़े

29.
अबला नारी
ना कह सकी पीर
दुःख की मारी ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

30.
धरा की छाती
फाड़ता है किसान
उगाता अन्न ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

31.
चने के खेत
चुग रही है धूप
ओस के हीरे ।

✍मंजु शर्मा

32.
उम्र की शाख़
झरने लगे पात
वक़्त के साथ ।
     
✍सुधा राठौर

33.
चाँद न तारे
अभिलाषा के पुष्प
सबसे प्यारे ।

✍बलजीत  सिंह

34.
शहरी फ्लैट
बिखरे परिवार
टूटते रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

35.
सूरज उगा
धरती के तम को
पल मे चुगा ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

36.
बसंत आया
अंग अंग समाया
मन बौराया ।

✍मधु सिंघी

37.
खेत विरान
कट गयी फसलें
बाकी लगान ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

दर्द सी रहा
कब तक सहता
अब जी रहा ।

✍मनीलाल पटेल

39.
जीवन रंग
सूखे पत्तो में ओस
जख्म का सीना ।

✍भीष्मदेव होता

40.
हर घर में
है सुगबुगाहट
फाग आहट ।
                
✍सुधा राठौर

41.
रिश्ते अचूक
स्वार्थ की पगडण्डी
रही विमुख ।

✍भीष्मदेव होता

42.
सर्वस्व दान
गौ माता वरदान
पशु महान

✍ऋतुराज दवे

43.
माँ की सूरत
आईना बेटियों की
नेक नियत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

44.
बासंती सोच
महकाती जीवन
लाती बहार ।

✍रामेश्वर बंग

45.
चमक रहा
तृण तृण में ओस
ओस में सूर्य ।

✍आरती परीख

46.
माटी की काया
माटी में मिल जाए
फिर भी दर्प ।

✍अयाज़ ख़ान

47.
टेसू दहका
वसंत के आंगन
मन महका ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

48.
सूरज जागा
पंछी चहचहाएं
प्राची के गाँव ।

✍सुधा राठौर

49.
प्रीत तुम्हारी
महक रहा मन
गुलाब क्यारी !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

50.
तेरी नेमत
चलती हुई साँस
मेरी किस्मत ।

✍अविनाश बागड़े

51.
दोहरी नीति
श्वेतपोश खेलते
गरीब ठगे ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

52.
महल दुःखी
काँटो में रहकर
गुलाब सुखी ।

✍ऋतुराज दवे

53.
पुराना धन
"स्मृतियों" के सन्दूक
झाँकता मन ।

✍ऋतुराज दवे

54.
अक्षत आशा
मन का जख्म भरे
ज्ञान पिपासा ।

✍भीष्मदेव होता

55.
बहे सरिता
करने उपकार
धरा पुनिता ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

56.
सूखते पात
तन्हा हैं टहनियाँ
वक़्त के साथ ।

✍सुधा राठौर

57.
सहेजा प्यार
दिल की किताब में
यादें गुलाब ।

✍ऋतुराज दवे

58.
दोस्ती के क्षण
खट्टी -मीठी सी यादें
पराग कण ।

✍वीणा शर्मा

59.
बिखरी आभा
भोर है सुशोभित
जग हर्षित ।

✍पूर्णिमा सरोज

60.
नयन नीर
आँखों से बह चले
सुनाते पीर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

61.
सरसों फूली
ओढ़ चादर पीली
धरा सज ली ।

✍वृन्दा पंचभाई

62.
धुंधली संध्या
जलते नेह दीप
चिंतित तम ।

✍पूनम मिश्रा

63.
धरा के रंग
खिले सरसों संग
पीले हैं अंग ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

64.
खिली है धूप
बसंती बयार ने
दी है दस्तक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

65.
मौन ये वन
पराग भरा पथ
भोर पावन ।

✍पूनम मिश्रा

66.
धरती पीली
सरसों ज्यों महकी
बेटी चहकी ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

67.
रंग है पीला
खेतों में है बिखरा
तन निखरा ।

✍मधु गुप्ता "महक"

68.
होली के रंग
तनमन भिगोये
बसंत संग ।

✍तेज राम नायक

69.
सरसों फूल
अठखेलियाँ करे
पवन संग ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

70.
रंग बिरंगे
प्रसूनों से सजके
प्रकृति झूमे ।

✍सविता बरई

71.
गुलाब जैसा
कांटों के संग जीना
हमने सीखा।।

✍देवेन्द्रनारायण दास

72.
चली  बयारें
लिये  फाल्गुन  राग
जग  रंगीली ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

73.
मछली रोती
कैसे दिखाए आँसू
पानी में होती ।

✍मुकेश शर्मा

74.
मिट्टी  न  धूल
विश्वास  से  महके
रिश्तों  के  फूल ।

✍बलजीत  सिंह

75.
मन चमन
महकता पराग
शब्द सुमन ।

✍रामेश्वर बंग

76.
घाव गंभीर
समय मरहम
घटाये पीर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

77.
उठी न डोली
भर सका न बाप
दूल्हे की झोली ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

78.
गुलाब रोया
शहीद से लिपट
सुपुत्र खोया ।

✍स्नेहलता वर्मा

79.
परसा फूले
फागुन रंग खिले
वन प्रांत में ।

✍नरेश कुमार जगत

80.
कहाँ है रब?
सुनता क्या अजान?
मैं अनजान ।

✍मनीभाई

81.
शान्ति की खोज
घण्टा में छिपकली
बैठती रोज ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

82.
सरसों फूल
वसुधा का श्रृंगार
पीत बहार ।

✍भीष्मदेव होता

83.
सखि बसंत
पिय के संग झूमे
मन बावरा ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

84.
वन की आग
टेसू गुनगुनाए
वासंती राग ।

✍भीष्मदेव होता

85.
हुआ अजान
अल्ला हू अकबर
रब को जान ।

✍मधु गुप्ता "महक"

86.
सीमित चाह
किसान स्वप्न जोहे
बादल राह ।

✍ऋतुराज दवे

87.
प्रेम प्रतीक
विरह में दहका
खिला पलाश ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

88.
सब है एक
मंदिर या मस्जिद
माथा तो टेक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

89.
बहा ले जाती
दुःख दर्द समेटे
माँ है नदिया ।

✍ए. ए. लूका

90.
छिपी किरणें
किसका अनुराग,
उडे पराग ।

✍पूनम मिश्रा

91.
राह रोक ली
बदलियों ने मिल
सूरज फ़ंसा ।

✍अविनाश बागड़े

92.
भटके नभ
सूरज खोता मार्ग
बरसे नैन ।

✍पूनम मिश्रा

93.
भोली सूरत
हृदय में बसती
माँ की मूरत ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

94.
निष्फल चोट
माँ सुरक्षा कवच
आंचल ओट ।

✍ऋतुराज दवे

95.
बेटी बेचारी
अभावों की दुलारी
मां की लाचारी ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

96.
जीवन धूप
पिता का समर्पण
छाते का रूप ।

✍ऋतुराज दवे

97.
माँ का चमन
फूल और खुशबू
भाई - बहन ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

98.
पिता का मन
मधुर नारियल
बाहर सख्त ।

✍सुरंगमा यादव

99.
एक दूजे के
पूरक नर नारी
न प्रतिद्वंद्वी  ।

✍सुरंगमा यादव

100.
आधुनिक  स्त्री
श्रद्धा इड़ा का रूप
प्रगतिशील ।

✍सुरंगमा यादव

101.
फूल बेबस
तितली को कसक
भौंरे पे शक ।

✍राकेश गुप्ता

102.
गालों पे गड्ढे
पड़ते हैं उनके
गिर जाता मैं ।

✍राकेश गुप्ता

103.
निशा ने बांधे
चांदनी के नुपूर
नाचें अनंग ।

✍हेमलता मिश्र

104.
चंद्र बिंदिया
सुहाग भरी निशा
घूंघट किया ।

✍हेमलता मिश्र

105.
जगत माता
ऐ नारी तुम बिन
सब अधूरा ।

✍क्रान्ति

106.
बहक मत
संभलकर सदा
ढलता चल ।

✍परमेश्वर अंचल

107.
साँकल बजी
आत्म-मुग्धा कामिनी
द्वार पे खड़ी ।

✍पुष्पा सिंघी

108.
देते हैं दिशा
जीवन पथ पर
हमारे पिता ।

✍रामेश्वर बंग

109.
वरदहस्त
पिता सघन छाया
ज्यों वट वृक्ष ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

110.
विश्वास पूंजी
पति पत्नी के बीच
रिश्तों की डोरी।

✍मनीभाई"नवरत्न"

111.
मोती झरते
नयनों के निर्झर
भीगे कपोल ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

112.
आंखों का पानी
जीवन की कहानी
पीर पुरानी ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

113.
बेटी की विदा
आँसुओं की बारात
आँखों के द्वार ।

✍ऋतुराज दवे

114.
एक से लगे
झूठे आँसू लूटेरे
मासूम ठगे ।

✍ऋतुराज दवे

115.
मन निचोड़ा
यादों भरी कोठरी
आँसू से धोया ।

✍ऋतुराज दवे

116.
टूटते स्वप्न
उदास मन झरे
नयन नीर ।

✍रामेश्वर बंग

117.
गोरखधंधा
नाम नयनसुख
आँख का अंधा ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

118.
चांद सी रोटी
दिखते स्वप्न कई
ना होते पूरे ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

119.
राजमहल
नींद से जाग उठा
सपना टूटा ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

120.
लौटेगा पुत्र
जलाये नेत्र ज्योति
वह बूढ़ी माँ ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

121.
प्रणय गीत
लिखती रहीं आँखें
अश्रु लेखनी ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

122.
स्वप्न से भरा
आंखों में तैर कर
अश्रु क्यों गिरा ।

✍सुशील शर्मा

123.
आँसू व व्यथा
रोके नहीं रुकते
कहते कथा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

124.
नयन नीर
आँखों से बह गये
सुनाते पीर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

125.
अश्रु में डूबे
जख्म सारे धो गये
नयन मेरे ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

126.
उषा ठिठुरी
काँपती दुपहरी
निशा सिहरी ।

✍सुधा राठौर

127.
नारी की हठ
जैसे लक्ष्मण रेखा
दृढ़ अकाट्य ।

✍मनीलाल पटेल

128.
छवि तुम्हारी
माँ है बहुत प्यारी
लगती न्यारी ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

129.
जगत माता
ऐ नारी तुम बिन
सब अधूरा ।

✍क्रान्ति

130.
मोह में अंधी
सिंहासन लालसा
माता कैकयी ।

✍कमल शर्मा 'बेधड़क'

131.
लाल सिंदूरी
सुबह का सूरज
आभा अनोखी ।

✍सरला सिंह शैल कृति

132.
चूड़ी सुहाग
जीवन भरे साज
मधुर राग ।

✍वीणा शर्मा

133.
खनका रहा
अनबुने सपने
मन गुल्लक ।

✍आरती परीख

134.
कोयल राग,
खिलते झूमे बौर,
घुलती मिश्री ।

✍पूनम मिश्रा

135.
दुबका बैठा
बादल ये बेचारा
रवि से हारा ।

✍सुधा राठौर

136.
"गुरु" कुम्हार
भीतर हाथ ओट
बाहर चोट ।

✍ऋतुराज दवे

137.
गुरु का ज्ञान
जीवन पथ पर
देता प्रकाश ।

✍रामेश्वर बंग

138.
स्वार्थ के गुरू
दक्षिणा में अंगूठा
माँगते मिले ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

139.
आँखें खोलती
मन की पाठशाला
रस घोलती ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

140.
स्व शिष्य मोह
एकलव्य से छल
कैसा गुरुत्व ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

141.
यह जिन्दगी
एक खुली पुस्तक
पढ़े तो कोई ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

142.
ज्ञान की वूटी
जीवन उपहार
मिटे विकार ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

143.
जीवन पोथी
श्वेत पृष्ठ है कोई
कोई धूमिल ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

144.
बने सुलेख
गुरु-चरण बैठ
लिखूँ जो लेख ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

145.
बिकती शिक्षा
अभिशप्त व्यवस्था
शिष्यत्व शून्य ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

146.
मन पुस्तक
कठिन है पढ़ना
रहस्य गूढ़ ।

✍संजीव नाईक

147.
गुरु शरण
विनयी पुष्प मन
सदा बसन्त ।

✍पुष्पा सिंघी

148.
बसन्त गीत
प्रेम की पाठशाला
पढ़ते मीत ।

✍किरण मिश्रा

149.
गुरु तराशे
अनगढ़ पत्थर
पूजे जगत ।

✍पुष्पा सिंघी

150.
बोते हैं ज्ञान
पाठशाला में गुरू
उगे भविष्य ।

✍किरण मिश्रा

151.
झरते पत्ते
दे जाते नव आशा
सृष्टि का सार ।

✍रामेश्वर बंग

152.
धीर-अधीर
लाल-गुलाब-भाषा
आशा-प्रत्याशा ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

153.
दर्प दर्पण
अतिकृत उत्कंठा
नष्ट प्रतिष्ठा ।

✍नीरू मोहन 'वागीश्वरी'

154.
मुट्ठी में आशा
कठिन डगर है
घना कुहासा ।

✍सुशील शर्मा

155.
हवा न आग
उम्मीदों के सहारे
जले चिराग ।
     
✍बलजीत  सिंह

156.
भ्रमित मन
लालसा मरीचिका
भटके तन ।

✍ऋतुराज दवे

157.
श्रृंगार नहीं
पुष्प की अभिलाषा
शहीदी पथ ।
    
✍मुकेश शर्मा

158.
खिला कमल
प्रेम की अभिलाषा
पुष्प हृदय ।

✍किरण मिश्रा

159.
आशा निराशा
सिक्के के दो पहलू
अंध उजास ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

160.
न हो निराश
अंधकार में प्रात
छिपाये गात ।

✍सुरंगमा यादव

161.
मन धरती
नव आशा अंकुर
लहक उठी ।

✍सुरंगमा यादव

162.
बड़ी लालसा
व्याकुल मन प्राण
क्षितिज दूर ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

163.
अभिलाषा है
बने देश हमारा
जगत गुरू ।

✍संजय डागा

164.
उर के भाव
सुन्दर रुप मिले
हर पन्नों पे ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

165.
आशा के दीप
चहुं ओर प्रदीप्त
रेत के सीप ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

166.
आशा सींचती
जीवन की बगिया
सदा खिलती ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

167.
आशा-सुमन
महके-मुरझाये
यही जीवन ।

✍पुष्पा सिंघी

168.
सबल आशा
जीवन परिभाषा
भावी प्रत्याशा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

169.
सितारों जड़ी
फलक की चुनरी
चाँद ने ओढ़ी ।

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

170.
रजनी सजी
ओढनी सितारों की
दुल्हन लगी ।

✍वीणा शर्मा

171.
लटका चाँद
क्षितिज छोर पर
हँसिया जैसा ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

172.
तारों का रेला
टहनी पर अटका
चाँद अकेला ।

✍मीनाक्षी भटनागर

173.
चाँदनी छाई
धरती पे चांदी की
पर्त  बिछाई ।
                                 
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

174.
श्रेष्ठ  विधान
सूरज  से  मिलता
दिशा  का  ज्ञान ।

✍बलजीत  सिंह

175.
टूटे जो तारे
करें मनोकामना
दुखी बेचारे ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

176.
हँसी रजनी
उजास बाँट रही
चन्दा चिमनी ।

✍पुष्पा सिंघी

177.
भोर का रवि
बाँटे ऊर्जा के बीज
मन की जमीं ।

✍ऋतुराज दवे

178.
किरण हार
सूरज के घोड़े पे
रश्मि सवार ।

✍ऋतुराज दवे

179.
धूप टोकरी
सूरज माथे पर
दौड़ती भूख ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

180.
तेरा चेहरा
आसमान में चांद
आंखे हैं तारे ।

✍सुशील शर्मा

181.
रात का तम
चांद का मलहम
भरते ज़ख़्म ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

182.
किसे ब्याहने
सितारों की बारात
लाया है चाँद ।

✍सुरंगमा यादव

183.
रवि किरणें
बिखरी धरा पर
आई मिलने ।

✍आर्विली आशेन्द्र लूका

184.
करते श्रम
उगते रवि संग
फैले उमंग ।

✍वृन्दा पंचभाई

185.
चांदनी रात
नदी खिलखिलाके
दिखाये दांत ।

✍मनीलाल पटेल "मनीभाई"

186.
सूरज उगा
घना तिमिर भगा
जगत जगा ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

187.
सूरज ढला
चाँद का आगमन
सन्ध्या मुस्काई ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

188.
दिखे सितारे
विटप में लटके
जूगनू प्यारे ।

✍भीष्मदेव होता

189.
कर्म तप है
मधुमय साधना,
भू कर्म क्षेत्र ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

190.
तन जर्जर
बढ़ी तृष्णा भँवर
मन कातर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

191.
कर्म की पूजा
उन्नति का है मन्त्र
राह न दूजा ।

✍किरण मिश्रा

192.
भ्रमित दशा
जगत मरीचिका
माया की तृषा ।

✍ऋतुराज दवे

193.
जीवन सार
कर्म के हाथों खुले
मोक्ष के द्वार।

✍वीणा शर्मा

194.
राह भटके
तृषा की मरीचिका
कष्ट दिलाए ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

195.
चढ़ अटारी
माया खूब नचाती
रचे नौटंकी ।

✍मीनाक्षी भटनागर

196.
भवसागर
नौका परोपकार
किनारा मोक्ष ।

✍संजीव नाईक

197.
जीवन धर्म
हस्त रेखीय कर्म
भाग्य का मर्म ।

✍डॉ राजीव पाण्डेय

198.
कर्म ही धर्म
फल मिले न मिले
स्वयं दीपक ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

199.
सबकी चाह
प्रत्यक्ष या परोक्ष
केवल मोक्ष ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

200.
तन जर्जर
बढ़ी तृष्णा भँवर
मन कातर ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

201.
तृषा की अग्नि
ईर्ष्या की लकड़ियां
माया पवन ।

✍सुशील शर्मा

202.
मोक्ष की तृषा
माया-काया जाल में
शिकारी हँसा ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

203.
माया नगरी
ढोता फिरे मानव
लोभ गठरी ।

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

204.
धन का लोभ
मरीचिका औ तृषा
अमिट चाह ।

✍स्नेहलता "स्नेह"
  
205.
मृग की तृषा
अदृश्य मरू जल
घोर प्रत्याशा ।

✍मधु गुप्ता "महक"

206.
नेक ईरादा
दया व कर्म खोले
मोक्ष का द्वार ।

✍क्रान्ति

207.
मोक्ष के द्वार
मुक्त हुए कैद से
पंच विकार ।
                
✍भीष्मदेव होता

208.
कर्म किए जा
फल की न हो  इच्छा
फूल खिलेगा ।

✍अनिता मंदिलवार सपना

209.
मेरे समीप
दूर तक फैले हैं
पीड़ा के द्वीप  ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

210.
युद्ध सदैव
है अकल्याणकारी
विनाशकारी ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

211.
बनें प्रबुद्ध
हे! सम्यक् सम्बुद्ध
करें न युद्ध ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

212.
जग उत्थान
मन  प्रेम कस्तूरी
शांति आह्वान

✍मीनाक्षी भटनागर

213.
शांति कपोत
हुआ लहूलुहान
बुझती ज्योति ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

214.
युद्ध का दंश
सदियां अपभ्रंश
झेलता वंश

✍डॉ राजीव पाण्डेय

215.
युद्ध विनाश
संस्कृतियों का नाश
मनुज ह्रास !

✍किरण मिश्रा

216.
पीड़ा ने लिखी
आंसू की कलम से
भाग्य को चिठ्ठी ।
      
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

217.
सूखा सावन
पीड़ा का महाकाव्य
रचते आंसू ।

✍पुष्पा सिंघी

218.
रोटी महिमा
वही गाये जो जाने
भूख की पीड़ा ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

219.
सुखद पीड़ा
प्रस्फुटित अंकुर
धरा की कोख ।

✍सुरंगमा यादव

220.
रक्त जो सींचे
खिले स्वेद के पुष्प
कर्म बगीचे ।

✍ऋतुराज दवे

221.
विरोधाभास
शांति के नाम पर
युद्ध हुँकार ।

✍ऋतुराज दवे

222.
रक्त से लाल
समर की मेदिनी
बिछती लाशें ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

223.
समर-कथा
कौन शमन करे
मनुज-व्यथा ।

✍पुष्पा सिंघी

224.
कलह ज्वार
बैर का ज्वालामुखी
करे विनाश ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

225.
मीडिया रचे
पीड़ाओं के प्रपंच
बिकते पंच ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

226.
मन की पीड़ा
सुनकर गुनोगे
उठाओ बीड़ा ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

227.
पावन काम
नव प्राण संचार
शोणित दान ।

✍भीष्मदेव होता
        
228.
युद्ध है जारी
ममता को कोसती
भ्रूण बेचारी ।
       
✍भीष्मदेव होता

229.
गुलाब रोया
शहीद से लिपट
सुपुत्र खोया ।

✍स्नेहलता वर्मा

230.
परसा फूले
फागुन रंग खिले
वन झाड़ में ।

✍नरेश कुमार जगत

231.
चली बयार
लिये फागुन राग
जग रंगोली ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

232.
खिली है धूप
वासंती बयार ने
दी है दस्तक ।

✍मधु गुप्ता

233.
रंग-बिरंगे
प्रसूनों से सज के
प्रकृति झूमे ।

✍सविता बरई

234.
हुआ अजान
अल्ला हू अकबर
रब को जान ।

✍मधु गुप्ता "महक"

235.
सब है एक
मंदिर या मस्जिद
माथा तो टेक ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

236.
कहाँ है रब ?
सुनता क्या अजान ?
मैं अनजान ।

✍मनीलाल पटेल

237.
चहके कुंज,
गूंजे चिडिया स्वर,
बुनते नीड ।

✍पूनम मिश्रा

238.
प्रात: समीर
छूती कोमल भोर
हंसता कुंज ।

✍पूनम मिश्रा

239.
फूल ये कहें
काटाें के संग हम
प्रेम से रहें ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

240.
प्रेम है त्याग
वासना का संसार
जलाता आग ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

241.
प्रेम कपास
है बुने चदरिया
प्रीत उजास ।

✍मीनाक्षी भटनागर

242.
नवल सृष्टि
संदली पहचान
प्रेमिल दृष्टि ।

✍मीनाक्षी भटनागर

243.
प्यार की धारा
जीवन की नैया को
देती सहारा ।

✍बलजीत  सिंह

244.
प्रेम का भ्रूण
गर्भपात दग़ा से
लक्ष्य वफ़ा से ।

✍शेख शहज़ाद उस्मानी

245.
मौसम लिखे
प्रकृति पत्र पर
प्रेम के छंद ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

246.
सुमन शय्या
समर्पण की रात
हँसे प्रभात ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

247.
मन भिगोए
स्मृतियों के बादल
दिल पे छाए ।

✍ऋतुराज दवे

248.
चुप हैं शब्द
प्रेम का मौन स्पर्श
छू लेता मन ।

✍ऋतुराज दवे

249.
पहला प्यार
अप्राप्य उपलब्धि
स्मृतियां शेष ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

250.
एक स्वरूप
प्रेम ही परमात्मा
दूजा न रूप ।

✍किरण मिश्रा

251.
महकी रूह
खिला मन आँगन
प्रेम सुमन ।

✍किरण मिश्रा

252.
प्रेम से बुना
बिखरा हुआ स्वप्न
स्मृति के धागे ।

✍सुशील शर्मा

253.
तुम्हारी स्मृति
पीत अमलतास
झरते फूल ।

✍सुशील शर्मा

254.
स्मृति दिलाये
हर राह गुजरी
आँखों में नमी ।

✍तुकाराम पुंडलिकराव खिल्लारे

255.
प्रेम जो खिला
जीवन रेगिस्तान
मन भी हरा ।

✍वीणा शर्मा

256.
स्मृति - बयार
छुकर गुजरी तो
चुभी शूल-सी ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

257.
चमक उठी
नैनों में बन मोती
प्रेम की ज्योति ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

258.
शलभ जले
रौशनी भ्रमजाल
प्रेमांध कीट ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

259.
बीते लमहा
यादों का पुलिंदा है
रखो सहेज ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

260.
प्रिय बिछोह
करे व्यथित मन
अश्रु धार दे ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

261.
नभ से धरा
सूरज की किरणें
आती मिलने ।

✍केवरा यदु "मीरा "

262.
ये बाल स्मृति
भुलाए न भूलती
साथ रहती ।

✍सविता बरई

263.
पिता की स्मृति
वट वृक्ष की छाया
है सुखदायी ।
     
✍मधु गुप्ता "महक"

264.
प्रेम का बीज
उग रही स्मृतियां
हृदय चीर !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

265.
प्रेम दिवस
दिखावा भरपूर
प्रेम काफूर ।

✍पुष्पा सिंघी

266.
तस्वीर देख
पुरानी छत रोती
स्मृति बपौती ।

✍पुष्पा सिंघी

267.
वियोग-जेल
स्मृतियों की बेड़ियाँ
नियति-खेल ।

✍पुष्पा सिंघी

268.
क्षितिज गाँव
धरा-नभ मिलन
नेहिल छाँव ।

✍पुष्पा सिंघी

269.
जगायें भक्ति
सम्भव प्रभु मिलन
मिटे आसक्ति ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

270.
प्रेम सुमन
उदास जीवन में
लाए बसंत ।

✍रामेश्वर बंग

271.
प्रेम प्रसंग
उर स्पंद मृदंग
मन मलंग ।

✍दाताराम पुनिया

272.
बेटी वसंत
टेसू भरा आँगन
श्वास पर्यन्त ।

✍वीणा शर्मा

273.
बसन्त आया
कुहू कुहू कोयल
प्रसन्न चर्या ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे       

274.
बसंत आया
सुगन्धि नाच उठी 
जग बौराया ।
                                   
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"             
           
275.
मन बसंत
खिला स्नेह की कली
महके रिश्ते ।

✍रामेश्वर बंग

276.
लुटा बसंत
कामुक था महंत
जीवन अंत ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

277.
फूल रंगोली
है धरा कैनवस
रचे प्रकृति ।

✍मीनाक्षी भटनागर

278.
मासूम कली
घर आँगन खिली
लगती भली ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

279.
भ्रमर गूँजें
मकरंद लालसा
पुष्प मित्रता ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

280.
कुच कलश
थरथराने लगे
काम के पुष्प ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

281.
प्रकृति नटी
मधुमय उमंग
हँसे सुमन ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

282.
बिटिया कली
मन आँगन खिली
चाहत मिली ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

283.
खिली कोंपल
मासूम सी किल्कारी
गूंजा आँगन ।

✍उषा साहिबा

284.
पीली सरसों
केशरी है पलाश
पुष्प सुवास ।

✍सुशील शर्मा

285.
रंग अनंत
चित्रकार बसंत
सजा दिगंत  ।

✍सुशील शर्मा

286.
बासन्ती भोर
पलाश दिनकर
क्षितिज कोर ।

✍किरण मिश्रा

287.
नैन भ्रमर
मुकुलित कँवल
मनस सर !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

288.
डाली का फूल
नाजुक सी जिन्दगी
करे कबूल ।

✍बलजीत सिंह
     
289.
तितली  रानी
रंगीन  फूलों  पर
हुई  दीवानी ।
     
✍बलजीत  सिंह

290.
फूलों की बातें
हवा हौले-से सुने
कहानी बुने ।

✍पुष्पा सिंघी

291.
भौंरा गुंजारे
जैसे कोई तपस्वी
मन्त्र उच्चारे ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

292.
पत्तियां देखें
पुष्प, भौंरे, बसंत
बनके संत ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

293.
नवोढा कली
बिखरी अधखिली
भाग्य का खेल ।

✍सुरंगमा यादव

294.
रजनी भागी
किरणों की थपकी
कलियाँ जागी ।

✍ऋतुराज दवे

295.
भंवरा गाये
कलियों को रिझाये
पराग पाये ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

296.
अल्हड़ कली
सहमी सी संभली
उर में अलि ।

✍दाता राम पुनिया

297.
आया बसंत
धरती आच्छादित
फूले रसाल ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

298.
न तोड़ कली
जग में आने तो दो
खुशियाँ देगी ।

✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

299.
खिले सुमन
इठलाए चमन
पुलके मन ।
    
✍रविबाला "सुधा" ठाकुर

300.
बसंत राग
कोयल गाती कैसे ?
बनके कैदी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

301.
बसंत ऋतु
सभी के मन भाए
जी भरमाए ।

✍मधु गुप्ता "महक"

302.
छाये बसन्त
हर मन तरंग
फूले पलास।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

303.
फूल को देख
अलि गुनगुनाये
बाग में झूमे ।

✍सविता बरई

304.
ऋतु बसंत
कुहुकिनी कुहूके
डाल में झूले ।

✍सविता बरई

305.
आया बसंत
आम्र  कुंज महके
फूले पलाश ।

✍केवरा यदु

306.
ऋतु बसंत
कामदेव ने भेजा
खुशी अनंत ।

✍भीष्मदेव होता
       
307.
सरसों फूले
बसंत आगमन
चेहरे खिले ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

308.
वसुधा ओस
बटोरती किरणें
जागती भोर ।

✍पूनम मिश्रा

309.
रू-ब-रू लिखा
दो शब्द के मध्य में
हू-ब-हू लिखा ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

310.
जिंदगी दक्ष
नया कल देकर
छीनती उम्र ।

✍क्रान्ति

311.
आया सूरज
ले किरनों का रंग
भागा तिमिर ।

✍केवरा यदु 'मीरा

312.
आँगन मध्य
पिंजरे में तरसा
मिट्ठू चहका ।

✍शशि त्यागी

313.
मन के द्वार
खिलखिलाता प्यार
हो मनुहार ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

314.
जीवन-ज्योति
मिट्टी के दीये में ज्यों
रौशनी होती ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

315.
कालिख खोह
पत्थर अनमोल
मिलते हीरे ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

316.
पत्थर पर
शिल्पी की नजरें ही
देखती मूर्ति ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

317.
मिट्टी के लोग
पत्थर बन कर
धूल में मिले ।

✍सुशील शर्मा

318.
ईश रचता
मानव होते भिन्न
माटी अभिन्न ।

✍मीनाक्षी भटनागर

319.
कड़वी बात
पत्थर पे खरोंच
टिकती याद ।

✍ऋतुराज दवे

320.
छानता धूल
कर्म ही होता मूल
बनता फूल ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

321.
नदी का स्नेह
पत्थर बन रेत
रहता साथ ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

322.
खड़े पर्वत
अडिग अविचल
तपस्यारत ।

✍अभिषेक जैन

323.
पत्थर थामे
मिट्टी जमीन पर
नर्मी की शक्ति ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

324.
मिट्टी की काया
कर जीवन कर्म
छोड़ अहम ।

✍रामेश्वर बंग

325.
विस्तृत नभ
क्षमताओं के पंख
उड़ते सब ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

326.
माथे पे लिखा
कैसे पढ़ती आँखें
भाग्य विधान ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

327.
नवप्रभात
ललछौही किरणें
धूप व छाँव ।

✍पूनम मिश्रा

328.
कुहू का डेरा
मंजरियों का गाँव
कूकों ने घेरा ।

✍इंदिरा किसलय

329.
मुग्ध आकाश
मखमली सेमल
रचाए रास ।

✍इंदिरा किसलय

330.
टूटे पिंजरे
सुख दुख से परे
परिन्दे उड़े ।

✍राकेश गुप्ता

331.
बड़ी सुरीली
भौंरों की शहनाई
पड़ी सुनाई ।

✍इंदिरा किसलय

332.
मस्ती के धागे
इश्क चादर बुन
आया फागुन ।

✍राकेश गुप्ता

333.
फाग के ढंग
खेल रहा अनंग
फूलों के संग ।

✍सुधा राठौर

334.
खिले सुमन
बही हवा सुगंध
हर्षित मन ।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

335.
बादल फटा
बिखरे हैं जमीं पे
टूटे आईना ।

✍भीष्मदेव होता

336.
झरना कहे
जिंदगी परिभाषा
जर ठहर ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

337.
नाचते गाते
उछल-उछल के
झरना झरे ।

✍केवरा यदु "मीरा"

338.
सूरज चला
एक नये सफर
नव प्रभात ।

✍पुरूषोत्तम होता

339.
पूजे जाते हैं
पत्थर के देवता
इंसान भूखे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

340.
अस्ताचल में
सूरज खेले होली
मले गुलाल ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

341.
महुआ खिला
जीवन का अंदाज़
फागुन आया ।

✍अविनाश

342.
इश्क खुमार
तैरा सो डूब गया
डूबा  सो पार ।

✍राकेश गुप्ता

343.
फागुनी गीत
पलाशी हुई प्रीत
होली की रीत ।

✍सुधा राठौर

344.
पलास फूल
जंगल लगे आग
केसर रंग ।

✍सरला सिंह "शैलकृति"

345.
जल भंडार
सागर तट पर
मेघों की टोली ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

346.
भोर की बेला
अंबर में घुमेगा
सूरज छैला ।

✍आरती परीख

347.
अंधेरा भागा
इरादों का सूरज
मन में जागा ।

✍आरती परीख

348.
गीत विहग
चेतन अचेतन
पार्थिव राग ।

✍शैलमित्र अश्विनी कुमार

349.
शर्म का बोध
पश्चाताप सागर
डूबता क्रोध ।

✍ऋतुराज दवे

350.
किरणें हँसी
खिले जड़-चेतन
मिली ताजगी ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

351.
आवारा मेघ
नकाब में चंद्रमा
डरी चाँदनी ।

✍भुपिंदर कौर

352.
आया अरूण
भू ने खोला घूंघट
खिला कमल ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

353.
सुबह संझा
धूप-छांव की रेकी
धरा ने देखी ।

✍रंजना सिन्हा "सैराहा"

354.
वसुधा ओस
बटोरती किरणें
जागती भोर ।

✍पूनम मिश्रा

355.
दुर्गम पथ
आकाश हिमालय
फिर भी चढ़ ।

✍कमल नयन

356.
विधि-विधान
जीवन सुरक्षित
बीज में बंद ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

357.
वक्त की आंधी
टूटे शाख से पत्ते
ढूंढते ठौर ।

✍रामेश्वर बंग

358.
संध्या समय
कतारबद्ध पंछी
घर की ओर ।

✍कमल शर्मा "बेधड़क"

359.
एक जीवन
बनाये उपवन
कर जतन ।

✍अविनाश बागड़े

360.
जीवन सार
कर्म के हाथों खुले
मोक्ष के द्वार ।

✍वीणा शर्मा

361.
आँखें मिलती
झुक कर उठती
मौन स्वीकृति ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

362.
बेचते मोक्ष
आधुनिक ईश्वर
ठगें परोक्ष ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

363.
कटी पतंग
बाट जोहते प्राण
ढलती साँझ ।

✍अंशु विनोद गुप्ता

364.
नीम चमेली
गिलहरी फुदके
बिखरे गंध ।

✍पूनम मिश्रा

365.
तितली आगे
जिंदगी की दौड़ है
भंवरा पीछे ।

✍कश्मीरी लाल चावला

366.
हैरान धरा
उगाई थी फसलें
उगे मकान ।

✍अंजु गुप्ता

367.
राजमहल
नींद से जाग उठा
सपना टूटा ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

368.
धरा ने खेला
अम्बर संग रंग
मचा धमाल ।

✍सीमा सिंघल

369.
तेज लपटें
उड़ते हैं स्फुलिंग
जैसे जुगनू ।

✍इंदिरा किसलय

370.
अधीर धरा
किरण कलश से
है रंग झरा ।

✍इंदिरा किसलय
---00---

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

~ हाइकु पुरोधा, परम आदरणीय, श्रद्धेय, स्वर्गीय डाॅ. भगवतशरण अग्रवाल जी को हाइकु श्रद्धांजलि ~

हाइकु श्रद्धांजलि 

 

बूँद में समा

सागर और सूर्य

हवा ले उड़ी ।


मर जाऊँगा
यकीन नहीं होता
फिर क्या होगा ?

सत्य ने छला
झूठ ने छला होता
दुख न होता ।

कहानी मेरी
लिखी किसी और ने
जीनी मुझे है ।

जब भी मिले
कहना कुछ चाहा
कहा और ही ।

बोए सपने
सींचे इन्द्रधनुष
फले कैक्टस ।

उनके बिना
दीवारें हैं‚ छत है
घर कहाँ है ?

मैं था ही कहाँ ?
जन्म भर व्यर्थ ही
ढूँढ़ता रहा ।

  - डाॅ. भगवतशरण अग्रवाल

 

  * परिचय *

जन्म : २३ फरवरी १९३०‚ फतेहगंज पूर्वी‚ जिला बरेली‚ उत्तरप्रदेश।

देहावसान :  06 फरवरी 2018

शिक्षा : बी.ए. आॅनर्स (हिन्दी), एम.ए.‚ पी.एच.डी. लखनऊ विश्वविद्यालय।

कार्यक्षेत्र :
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर –इन–चार्ज‚ गुजरात विश्वविद्यालय हिन्दी अनुस्नातक केन्द्र‚ एल.डी. आर्टस कॉलेज‚ अहमदाबाद। विजिटिंग प्रोफेसर एवं पी.एच.डी. निर्देशक‚ गुजरात विश्वविद्यालय।

सम्मानोपाधि :
साहित्य महामहोपाध्याय–हिन्दी साहित्य सम्मेलन‚ इलाहबाद, साहित्यालंकार, साहित्य शिरोमणि, महाकवि जायसी सम्मान तथा अपने कार्य के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित ।

प्रकाशित महत्वपूर्ण कृतियाँ :
01. शाश्वत क्षितिज  (1985)
02. टुकड़े- टुकड़े आकाश (1987)
03. अकह  (1994)
04. अर्घ्य  (1995)
05. सबरस (1997)
06. इन्द्रधनुष  (2000)
07. हूँ भी; नहीं भी (2004)
हाइकु संग्रह, काव्य संग्रह, गीत संग्रह, कहानी संग्रह, हास्य व्यंग्य शोध समीक्षा और कई संपादित ग्रंथ प्रकाशित ।

संपादन :
हिन्दी कवयित्रियों की हाइकु साधना (2002)
हाइकु काव्य विश्वकोश (विश्व में प्रथम - 2009)
संपादक : हाइकु–भारती (त्रैमासिक पत्रिका)

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 ~•~ श्रद्धांजलि के हाइकु ~•~

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श्रद्धा के फूल
हे ! दिवंगत आत्मा
करें क़ुबूल ।

आँखें रो रही
आज हाइकु ज्योति
कहीं खो गयी ।

स्मृति नमन
भगवत शरण
धन्य जीवन ।

हाय खो गया
हाइकु आभूषण
ईश शरण ।

श्रद्धा सुमन
अर्पित दिवंगत
तव चरण ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


नमन तुम्हें
हाइकु के पुरोधा
शत प्रणाम  ।

अर्पित  तुझे
श्रद्धांजली के पुष्प
शत नमन ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

उड़ा अकेला
कहाँ पहुँचा पंछी
कोई जाने ना ।

आँसू न बहा
'हा. विश्वकोश काव्य'
सदा अमर ।

✍डाॅ. सुधा गुप्ता


करूँ नमन
श्रद्धा पुष्प अर्पण
हे ! महात्मन।

काव्य-सफर
कर चले जग में
नाम अमर ।

नम नयन
करेगा हरपल
तुम्हें स्मरण ।

✍रविबाला "सुधा"ठाकुर

तुम्हें नमन
हाइकु रचयिता
करें वंदन ।

तुम्हें अर्पित
विनम्र श्रद्धांजलि
हाइकु कृति ।

✍मीनाक्षी भटनागर

अस्त हो गया
'सूर्य' सा उदित था
आभा अभी भी ।

दैदीप्यमान..
मौत के आगोश में
रो रही मौत ।

आँसू ढुलके
भगवत जी नहीं
'हाइकु' जिंदा ।

✍रति चौबे

परम पूज्य
हाइकु पितामह
तुम्हें प्रणाम ।

✍क्रांति

छोड खजाना
हाइकु के अंबार
हुआ अमर ।

✍कश्मीरीलाल चावला

शत नमन
विनम्र श्रद्धांजलि
चुप कलम ।

✍ऋतुराज दवे

पुण्य स्मरण
भगवत शरण
स्पर्श चरण ।

स्पर्श चरण
भगवत शरण
शब्द सुमन ।

मार्गदर्शन
भगवत शरण
एक दर्शन ।

छूटा पिंजरा
उड़ गया पखेरू
दे कर ज्ञान ।

छोटी सी विधा
बड़े-बड़े विचार
आप पुरोधा ।

निसर्ग कथ्य
यह आवागमन
शाश्वत सत्य ।

अहो!आकाश
एक पुण्यात्मा आई
तुम्हारे पास ।

✍अविनाश बागड़े

ॐ शांति ओम
भगवतशरण
हाइकु व्योम ।

✍गंगा प्रसाद पांडेय "भावुक"

कोटी नमन
भगवत शरण
श्रद्धा सुमन ।

✍एन. एस. गोहिल

तुम्हें नमन
अर्पित हैं तुमको
भाव-सुमन !

✍डाॅ. मिथिलेश दीक्षित

अग्रवाल जी
सादर श्रद्धांजलि
तुम्हें नमन ।

✍मधु गुप्ता

हिवड़ै तणी
सरदाजंलि बाने
नमन घणो ।

✍गोविन्द सिंह गहलोत

आप हुए हैं
भगवत शरण
रोये हाइकु ।

✍डाॅ. आनन्द  शाक्य

लय विलीन
ऐतिहासिक योद्धा
खोया कुलीन ।

✍डाॅ.आनन्द शाक्य

श्रद्धा सुमन
बहती अश्रु धारा
है समर्पित ।

✍महेन्द्र देवांगन "माटी"

यादें हैं शेष
केवल  इतिहास
प्रेरणादायी ।

✍महेन्द्र देवांगन "माटी"

लेखनी ही थी
इनका भगवान
करे नमन ।

✍वृंदा पंचभाई

मील-पाहन
व्यक्तित्व व कृतित्व
हाइकु कृति ।

साहित्य गंगा
हाइकु की गैलेक्सी
सदा शरण ।

क़लम शांत
हाइकु हैं मुखर
हुए अमर ।

प्रदीप्त दीप
हाइकु विश्व कोश
आत्मा शाब्दिक ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मन के पुष्प
विनम्र श्रद्धायुक्त
भाव अर्पित ।

देह का त्याग
जीव की महायात्रा
प्रभु की ओर ।

देह निर्मुक्त
भव बंधन मुक्त
महा प्रयाण ।

जन्म से मृत्यु
सतत काल चक्र
जीवन सत्र ।

अंतिम धाम
प्रभु पद विश्राम
मुक्ति की आस ।

✍सुशील शर्मा

साहित्य सेवी
शब्द ब्रम्ह साधक
तुम्हें प्रणाम ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

तुम्हें अर्पित
श्रद्धा सुमन माला
आँसू की धारा ।

अस्त सितारा
अँधेरे में उजाला
करके चला ।

कर कमल
मार्गदर्शन करें
मंजिल दिखे ।

हाइकु गुरु
अश्रुपूरित श्रद्धा
हृदय बसा ।

स्वर्ग स्वागत
सत्रह स्वर्ण वर्ण
सुमन वर्षा ।

✍वीणा शर्मा

नम नयन
व्यथित अंतर्मन
विदा सज्जन ।

✍संजीव कुमार पाणिग्राही

नम हैं आँखें
भगवतशरण
नमन तुम्हें ।

हे कर्मवीर
बढ़ते चले आप
कर्म के साथ ।

शब्दसाधक
प्रेरक रहा जीवन
रहोगे याद ।

अमर आप
देश का इतिहास
रखेगा याद

सारा जीवन
साहित्य साधना का
दिया सन्देश ।

है श्रद्धांजलि
हृदय के अन्तः से
तुम्हें प्रणाम ।

बहते अश्रु
गमगीन है लोग
आओगे याद ।

सो गए सदा
चिरनिद्रा में आप
यादें ही साथ ।

✍पुरुषोत्तम होता

दुख सागर
ऐसे ही उमड़ता
नम नयन ।

अग्रवाल जी
भगवत शरण
किया वरण ।

✍प्रबोध मिश्र "हितैषी"

आत्मा अमर
सदा जीवित रहे
अंतिम सत्य ।

दिव्य लेखक
हर आखर मोती
रचे हाइकु ।

गुरू महान
रचा हाइकु जग
दिव्य है दीप ।

आखर पुष्प
हाइकु गुलदस्ता
झरे महक ।

गुरू महान
भगवत शरण
जग में नाम ।

हाइकु दीप
झरे दिव्य प्रकाश
जग रोशन ।

✍रामेश्वर बंग

देह लेकर
मृत्यु निकल पड़ा
कर्तव्य पीछे ।

✍तुकाराम पुंडलिक खिल्लारे

हाइकु फूल
हिंदी काव्य सजाये
डॉ. भगवत !

ठगनी माया
ठगे तन गठरी,
आत्मा आजाद !

हाइकु बीज
उगा हिन्दी गगन
बोये, शरण !

हिन्दी जगत
उतारे,भागवत
हाइकु गंगा !

✍किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

टूटता तारा
रोता हुआ आंगन
अऩाथ हम ।

सूना हाइकु
बिखर गया मौन
शत नमन ।

✍पूनम मिश्रा

भगवतजी
हाइकु ही आपकी
वसीयत है ।

दे गए हमें
हाइकु का जखीरा
भगवतजी ।

✍संजय डागा

जन्म व मृत्यु
सहज हो स्वीकार
यही शाश्वत ।

बीच में खिले
जीवन रूपी पुष्प
गर्व की बात ।

हर तरफ
महके उपवन
कर्म- सुगंध ।

हो सुसंस्कार
मधुर व्यवहार
जीवन भर ।

बने दिवस
भगवत शरण
मोक्ष वरण ।

✍मधु सिंघी

श्रद्धा सुमन
अर्पित है आपको
करुं नमन ।

यही है सत्य
धरा से सबको जाना
आप अमर ।

दिखा जग को
अपना ये हुनर
हो गये विदा ।

प्रणाम करें
आत्मा को मिले शांति
है श्रद्धांजलि ।

✍मधु गुप्ता "महक"

मिट्टी का चोला
कभी मिट्टी ऊपर
कभी है नीचे ।

सो गया देखो
हाइकु बुनकर
अँखियाँ मीचे ।

हाइकु तांके
वे उन्मुक्त ठहाके
स्मृति से झाँके ।

टूटे पिंजरे
सुख दुख से परे
परिन्दे उड़े ।

मुक्ति की चाह
शाश्वत है क्षितिज
लक्ष्य आकाश ।

✍राकेश गुप्ता

कोश प्रणेता
भगवत शरण
शत नमन ।

हाइकुकार
मान रहे आभार
दिव्य ज्ञान का ।

देश विदेश
हाइकु का संदेश
हुआ मुखर ।

दिव्य आरती
ये हाइकु भारती
हम सबकी ।

मौन तपस्वी
आजीवन साधना
हाइकु हित ।

✍डॉ. राजीव कुमार पाण्डेय

ईश चरण
भगवत शरण
श्रद्धा अर्पण ।

हे सिद्धहस्त
स्वर्ग आसीन भव
कामना स्वस्थ्य ।

हाइकु-पाती
वो हाइकु-भारती
बनी आरती ।

हाइकु निधि
हाइकु विश्व-कोष
उत्कृष्ट कृति ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

श्रद्धा सुमन
अर्पित करते है
यादे है शेष ।

विलीन हुए
भगवत शरण
सूर्य रश्मि  थे ।

संग्राहक थे
प्रवीण प्रणेता जो
है इतिहास ।

त्याग देह को
बसे वैकुण्ठ तुम
स्मृति है शेष ।

एकाकार हो
आत्मा से परमात्मा
हंस अकेला ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

मन के भाव
श्रद्धा रूपी शब्दों से
अर्पण पुष्प ।

कमी आपकी
पूर्ण ना होगी कभी
नमन करें ।

धन्य है आप
समर्पित जीवन
हाइकु हेतु ।

आप अमर
कलाम है जिन्दा
तन नश्वर ।

चिर निद्रा में
लीन है पंचतत्व
नवजीवन ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

सृजनकर्ता
हाइकु के प्रणेता
डॉ. अग्रवाल ।

विश्व विख्यात
हाइकु विश्व कोश
प्रथम कृति ।

रूठी नियति
चिर निद्रा में लीन
महाविभूति ।

विलुप्त ज्योति
अपूरणीय क्षति
होगी न पूर्ति ।

अश्रुपूरित
देती हूँ श्रद्धांजलि
सुमनांजलि ।

✍सुधा राठौर

वर्ण-गैलेक्सी
भगवती शरण
हाइकु ऋषि ।

✍शेख़ शहज़ाद उस्मानी

श्रेष्ठ हाइकु
भगवत शरण
नमः लेखनी ।
   
देव गमन
भगवत शरण
संताप,क्षति ।
   
श्रद्धा सुमन
भगवत शरण
ऊँ शांति शांति ।

✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

करे अर्पण
हाइकु परिवार
श्रद्धा सुमन ।

कर्म महान
मरकर भी करें
अमृत्व दान ।

विश्व वाटिका
चुन लाये सुंदर
हाइकु पुष्प ।

हाइकु कोश
देकर उपहार
किया प्रयाण ।

मन की पीर
झर रही नैन से
हो के अधीर ।

✍सुरंगमा यादव

नम नयन
भगवत शरण
शत नमन ।

✍आलोक "अनल" डनसेना

स्वर्ग गमन
ईश्वर से मिलन
श्रद्धा सुमन ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

महाप्रयाण
हाइकु  के पुरोधा
शत प्रणाम ।

स्वयं अर्पण
हाइकु समर्पण
प्रभु शरण ।

खुद जला के
हाइकु की मशाल
हाथों थमाई ।

बन आदर्श
राह करी प्रशस्त
मील पत्थर ।

✍ऋतुराज दवे

डॉ. अग्रवाल
हाइकु पुरोधा थे
माला में गूँथे ।

मोती निकाले
सागर मंथन से
दिव्य पूंज ये ।

श्रद्धांजलि दी
अश्रुपूरित नमन
आभारी मन ।

✍प्रकाश कांबले

मिट्टी से बना
मूर्ति गढ़ता रहा
मिट्टी में मिला ।

सरल भोले
लिखते रहे काव्य
अल्प शब्दों में ।

गूढ़ अर्थों में
सारगर्भित भाव
मन उजास ।

अश्रुपूरित
अर्पित श्रद्धा पुष्प
आदर संग ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

रहे अमर
भगवत शरण
हाइकुकार ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

पुष्प अर्पण
हाइकु के आचार्य
करूँ वंदन ।

✍सविता बरई

है अमानत
हाइकु ज्ञान माला
गुंथी आपने ।

गूंजा आपसे
हाइकु का संगीत
मधुर राग ।

संगीत ध्वनि
अनंत में विलीन
देव शरण ।

श्रद्धा सुमन
करती हूँ अर्पण
मेरा नमन ।

✍नीलम शुक्ला

हाइकु दीप
दमकता सितारा
ज्यों छिप गया ।

श्रद्धा पथ से
अटल बिदाई ले
सुदूर चले ।

आलोकित हैं
राहें भगवत की
निर्वाण पथ ।

जन्म निर्वाण
अविजित नियति
करें प्रणाम ।

✍हेमलता मिश्र

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बिना अनुमति से कोई अंश प्रकाशित न करें ।

- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

संपादक : हाइकु मञ्जूषा

 

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