हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

हाइकु : श्रीमती रंजना श्रीवास्तव

हाइकु कवयित्री 

रंजना श्रीवास्तव 


हाइकु 


                               कलि में नाश                                 
                          बल वीर्य का ह्रास                           
ओज निकास  ।


लुप्त सद्ग्रन्थ
                   आस्था बनी अनास्था                     
 कलि व्यवस्था  ।


                                हिंसा संघर्ष                                   
                        युद्ध स्थिति सर्वत्र                            
                 कलियुगीन  ।                    


अधिक वर्षा
जलप्लावन बढ़ा
ताण्डव मचा  ।


बारह रवि
                           घोर कलि की छवि                           
  ताप असह्य  ।


भीषण वर्षा 
जलमग्न धरती
काल मायावी  ।


                                संगम वेला                                    
                             युग परिवर्तन                                 
               यौगिक रेला  ।                 


तीव्र मुमुक्षा
दसवाँ अवतार
कल्कि प्रतीक्षा  ।


                                धवल वाजि                                
                      कल्कि आयुध राजि                      
                     सन्धि का काल ।                  


वैष्णव तन्द्रा
जागृत योग निद्रा
पुण्य सत्कर्मी 


□ रंजना श्रीवास्तव

हाइकु : डॉ. रेखा जैन

हाइकु कवयित्री 

डॉ. रेखा जैन


हाइकु 


बन के पंछी
उड़ता गगन में
बावरा मन ।

है प्रश्न मौन
चिन्तन का विषय
ईश्वर कौन ।

नाजुक नार
उठाये न उठता
यौवन भार ।

बकरी का गुण
खाती कीकर काँटे
दूध मधुर ।

अन्ध विश्वास
नाली में बहा दूध
बच्चे भूखे हैं ।

दिवारें दिल
उठती पहले हैं
धरा बाद में ।

कपड़ा नहीं
ध्वज है मेरी शान
तीन रंग में ।

जब जागते
होता तभी सवेरा
कहते ज्ञानी ।

□ डॉ. रेखा जैन

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

हाइकु : सतीश राठी

हाइकुकार

सतीश राठी

हाइकु 


1.
संस्कार मिले
बनता प्रतिबिम्ब
पुत्र पिता का ।

2.
सजल रहो
जल बनाए वन
जीवन को भी ।

3.
पूरी थाली को
भरता है स्वाद से
पत्नी का हाथ ।

4.
जीवन गीत
गाते गाते आ गए
साठ के पार ।

5.
ताल की खुशी
खाली रहना नही
भर जाना है ।

6.
पत्थर कूल
बहते हैं फिर भी
कितने आँसू ।

7.
मिलन रात
समय उड़ गया
चिड़िया बन ।

8.
घर आँगन
बिखरा है बसंत
आई बिटिया ।

9.
चिड़िया हँसी
चूजे को दाना दूँ
उड़ेगा दूर ।

10.
पहाड़ टूटा
तेरे जाने के बाद
तेरी याद का ।
-0-

□ सतीश राठी

हाइकु : ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"

हाइकुकार 

ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

हाइकु 

उम्र बढी है
लौटा है बचपन
बूढ़ा है तन ।

खोई मस्तियाँ
बड़प्पन में मेरी
डूबी कश्तियाँ ।

हूँ पचपन
हरकत ऐसी है
ज्यों बचपन ।

मैँ भी हूँ जवाँ
उम्र घटती जाती
बढ़ती कहाँ ?

डूबता सूर्य
स्वागत करे चाँद
आ जा तू वर्ष ।

​मत्त फसलें
रच दें इतिहास
यादों के दिन
​​​नई सौगातें
बाँटता चला गया
नया था वर्ष ।
​क्षण ने बोई
दिन की जो फसलें
वर्ष ने काटी ।
​क्षण की आँधी
निगल गई वर्ष
यादों के साथ ।

​नहाए दिन
बन ठनके लाएँ
नया उत्कर्ष ।

​वर्ष के पृष्ठ
लिखेगा इतिहास
यादों का पेन ।

बुढ़ा गया है
सोलह का यौवन
आ जा सत्रह ।

यादों के बीज
समय की भूमि पे
रचे साहित्य ।

हाथों से रेत
फिसल गए दिन
यादों के बिन ।

वधू लगाए
हाथों पर मेहंदी
वर मुस्काए ।

मेहंदी रचे
मन की हथेली पे
खिले चेहरा ।

□ ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

हाइकु : प्रकाश कांबले


हाइकुकार 

प्रकाश कांबले 

हाइकु 


धर्म - अधर्म
सिक्के के दो पहलू
कैसे सह लूँ ।

सारी जनता 
असमंजस में हैं
कैसा है तंत्र ।
   
सूर्य किरणें
छुप गयी हैं कहीं
बादल ओट ।
    
मौत का खौफ 
सांसें चल रही हैं
कब आ जाए ।
         
बढ़ रही है 
जकड रहीं अब
बेड़ियां हमें ।

□ प्रकाश कांबले

हाइकु कवयित्री अलका पाण्डेय जी के हाइकु


हाइकु कवयित्री 

अलका पाण्डेय

हाइकु


मेघ गरजे
मन झूम के नाचे
पैर थिरके ।

प्यासी धरती
गले मिली बूँदों से
चैन है पाया ।

ऋतु वंसत
हंस रही कलियाँ
धरा शोभित ।

पड़ती बूँदें
धरा के होठ तृप्त
पृथ्वी थिरके ।

सब पे भारी
क़लम है चिंगारी
सच दर्शाती ।

धरा उजाड़
ग़ायब हरियाली
विरान जग ।

कड़क धूप
घूँघट में जलता
छोरी का रुप ।

जेठ का माह
अंगार बरसते
प्रचंड घाम ।

पारा है चढ़ा
झुलसायी शाम है
रात अंधेरी ।

जलता तन
गरम लू बहती 
तीर सी लगे ।

गर्मी प्रचंड
सिसकती धरती
जीव लाचार ।

बरसों मेघ
तृप्त हो वसुंधरा
तरु डोलते ।

शुद्ध समीर
झुला झुलायें हवा
जीवन डोर ।

बहारें आई
महकती पवन
उल्लास छाया ।

आंतकी वार
दहशत  की जंग
शत्रु संहार ।

मन का भय
जीने न दे चैन से
लब है मौन ।

शीत लहर
ओस मोती बिखरे
कोहरा छाया ।

सूरज सोया
जल रहे अलाव
ठिठुरी रातें ।

गिरती ओस
दाँत कटकटाते
शीत प्रहार ।

धुँध घनेरी
ओस बनाये मोती
शीतल भोर ।

सर्द हवायें
गर्म चाय का प्याला
मिठी चुभन ।

शीत यामिनी
साजन का मिलन
लजाती ठंड ।

शरदऋतु
कोहरे की चादर
अंधेरी रात ।

पूस की रात
कड़कड़ाती आंते
गर्मी को चाहे ।

यादों के लम्हे
पीपल छांव तले
बावरा मन ।

ठंड की रात
आसरा फुटपाथ
चिंता की बात ।

शीत मौसम
त्रस्त हुआ जीवन
अलाव जला  ।

गर्मी की भोर
बढ़ाती जाती ताप
तन बेहाल ।

चिलचिलाती
धूप गर्म हवा ये
प्राण हरित ।

तपता तन
भास्कर है प्रचंड
धधके मन ।

शुभ्र चाँदनी
अमृत बरसाये
पूर्णिमा आई ।

□ अलका पाण्डेय

हाइकु : सूर्यकरण सोनी "सरोज "


हाइकुकार 

सूर्यकरण सोनी "सरोज"

हाइकु 


गूँगे की पीर
दिल में चुभ गई
बन के तीर ।

बुरा है दौर
लूट के चल दिये
दिन में चोर ।

दीन-अनाथ 
मिले जब पथ में
दे देना साथ ।

है पंचभूत
क्षिति,जल,पावक
नभ-मारुत ।

करे त्राटक
स्वाती बूँद को पाने
पक्षी चातक ।

क्रोध गरल
पीकर ही जीवन
होगा सरल ।

रेत के धोरे
तेज पवन संग
उड़ने दौड़े ।

देसी हकीम
कड़वा है कुनैन
करेला-नीम ।

कीट-पतंग
प्रणय में जलते
दीपक संग ।

ज्ञान का घड़ा
भीतर लिए होता
सागर बड़ा ।

बात निराली
फल लगने पर
झुकती डाली ।

भरने पेट
छोटू ढ़ाबे पे धोता
कप व प्लेट ।

खेतों में खाद
उपज बढ़ी पर
अन्न बेस्वाद ।

कफन श्वेत
चढ़ने से पहले
मनवा चेत ।

क्षत-विक्षत
संदूक में हो गए
प्रेम के खत ।

ताल को पाट
दलालों ने बिछा दी
अपनी खाट ।

सूर्य का रथ
जगती को बताये
मृत्यु का अर्थ ।

सत्य चिरायु
क्षण भर की होती
झूठ की आयु ।

समुद्री द्वीप
बलखाती लहरें
मित्र समीप ।

क्षितिज बिंदु
गगन से मिलता
विशाल सिंधु ।

विशिष्ट ज्ञान
पत्तियाँ विटपों की
है पहचान ।

जीवन गाड़ी
सबको चढ़ना है
ऊँची पहाड़ी ।

दाने की खोज
गिलहरी करती
श्रम से रोज ।

पेड़ बबूल
तन पर लिये है
हज़ारों शूल ।

पत्तियाँ प्यारी
सौंदर्य की रक्षक
घृतकुमारी ।

धान की बाली 
भरती कृषक की
झोली व थाली ।

क्षणिक कोप
पल में हो जाता
बुद्धि का लोप ।

सबसे आला
जगती में केवल
प्रेम का प्याला ।

शिक्षा की धूप
मानव को बनाती
देव स्वरूप ।

□ सूर्यकरण सोनी
'सरोज'

हाइकु : हेमंत लोढ़ा


हाइकुकार 

हेमंत लोढ़ा

हाइकु 


रावण हारा
मिटे जब वासना
जीत राम की ।

रावण हारा
विनाश हो क्रोध का
जीत राम की ।

रावण हारा
मोह जब रहे ना
जीत राम की ।

रावण हारा
लोभ का नाम नही
जीत राम की ।

रावण हारा
दफन घमंड हो
जीत राम की ।

रावण हारा
जले चिता ईर्ष्या की
जीत राम की ।

रावण हारा
स्वार्थ समझे नही
जीत राम की ।

रावण हारा
अन्याय करे नहीं
जीत राम की ।

रावण हारा
मानवता समझे
जीत राम की ।

रावण हारा
अहंकार भस्म हो 
जीत राम की ।

□ हेमंत लोढ़ा

हाइकु : चंचला इंचुलकर सोनी

हाइकु कवयित्री
चंचला इंचुलकर सोनी 

हाइकु 

01.
जल प्रवाही 
सहज बह चली 
निर्झर रूप ।

02.
तपती धरा
रखा नीर सकोरा
पंछी मित्रता ।

03.
नीर लहर
प्रभात आलिंगन
हँसा मिहिर ।

04.
कुम्भ सुतपा
शीतल नीर सुधा
माटी संकल्पा ।

05.
श्रावण पाती
बदरा हरकारा
नीर भू थाती ।

06.
तपे प्रमान
भू जल रसातल
मेघ जमान ।

07.
सार्थक पूजा
भू जल वायु पेड़
अमोल धन ।

08.
भू जल गोल 
शून्य भीतर शून्य
रीता खगोल ।

09.
नीर हिंडोला
झूले सूर्य रश्मियाँ
इंद्रधनुष ।

10.
तपती मही
सलिल लब्ध नारी
कुटुंब मोही ।

□ चंचला इंचुलकर सोनी

हाइकु कवयित्री अंशु विनोद गुप्ता जी के हाइकु


हाइकु कवयित्री

अंशु विनोद गुप्ता 


हाइकु

--0--


01.
विहँसे पद्म
निज पंकिलता में
ताल तलैया ।
02.
ताल न नीर
पावस में अधीर
दादुर पीर ।
03.
कुआँ मुंडेर
बातें न पनघट
बदला गाँव ।
04.
ताल तलैय्या
दरख़्त नहीँ छाँव
बदला गाँव ।
05.
जल अभाव
ताल सरिता टूटा
प्रणय भाव ।
06.
बदरी सूखी
मर गया सबकी
आँख का पानी ।
07.
पोखर पानी
बोल मेरी मछली
गाती न रानी ।
08.
प्लास्टिक कूड़ा
जलाशयों से पाते
भूख मिटाते ।
09.
कुआँ बीहड़
दादुर चुप सुनता
प्रतिध्वनियाँ ।
10.
मेघ न रोता
धरती पर सूखा
जीवन प्यासा ।
     ¤¤¤   

□ अंशु विनोद गुप्ता


हाइकु : सुधा राठौर

हाइकु कवयित्री 

सुधा राठौर 

हाइकु 

01.
हुआ सबेरा
मेघों की छत पर
सूर्य का डेरा ।
~•~
02.
किलकी बूँदे
सुन रही वसुधा
अँखियाँ मूँदे ।
~•~
03.
खिले सुमन
मुस्कुराई कलियाँ
हँसा चमन ।
~•~
04.
अलि-गुंजन
हवाओं की रागिनी
मन-रंजन ।
~•~
05.
मलय गंध
बिखरा मकरंद
प्रीत के छंद ।
~•~
06.
जल-सिंचन
खेतियाँ सरसाईं
नव-सृजन ।
~•~
07.
पी-पी पपिहा
प्रणय निवेदन
व्याकुल मन ।
~•~
08.
अमुवा डार
झूल रही सखियाँ
गाएँ मल्हार ।
~•~

□ सुधा राठौर

हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकुकार

 प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु

01.
सूरज उगा 
अंधेरे का साम्राज्य 
काँपने लगा ।

02.
एक बारिश 
कम कर न सकी
धरा तपिश ।

03.
बूँदें बरसीं
ओढ़ हरी चूनर 
धरा हरषी ।

04.
मेघ से प्रीत
मेंढ़क सुना रहे
पावस गीत ।

05.
मुस्काये पत्ते 
बारिश की फुहार 
धुले चेहरे ।

06.
वृक्ष के कक्ष 
करें नीड़ सृजन 
पंछी हैं दक्ष ।

07.
मेघ में फूल
सात रंगों का खिला
इन्द्रधनुष ।

08.
पावस मास
पेड़ लगाओ मनु
प्रकृति आस ।

09.
पेड़ों की आह
संभलना कठिन 
पृथ्वी तवाह ।

10.
खिले सुमन
धरती के आंगन 
फैली सुगंध ।
~ • ~

□  प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

बुधवार, 31 जुलाई 2019

~ समसामयिक हाइकु संचयन (जुलाई-2019) ~


🎋 हाइकु मंच छत्तीसगढ़ 🎋

समसामयिक हाइकु संचयनिका 

  जुलाई 2019 के श्रेष्ठ हाइकु 

~ • ~


कुएँ की खोल
घोंसले पास जगा
पीपल पेड़ ।

□ माधुरी डड़सेना

हवा चली है
खुशबू भरकर
साँसें महकीं ।

□ ऋषिकांत राव

पड़े फुहार
तन-मन निहाल
बुझती प्यास ।

□ पूनम दुबे

छाये बादल
नीलगगन पर
बिजुरी नाचे ।

□ सुधा शर्मा

खुशी के बीज
वसुधा के आंगन
बोता सावन ।

□ सुलोचना सिंह

नीली ओढ़नी
छन कर आ रही
बारीक बूंदें ।

□ नरेन्द्र मिश्रा

देखे रोटियाँ
जाति न मजहब
रोटी है रब ।

□ धनेश्वरी देवांगन "धरा"

भोर सुहानी
मेघ संग मुस्काती
भू हरियाई ।

□ पूर्णिमा सरोज

पहली वर्षा
घर में अंडे लाते
चींटी के झुंड ।
           
□ सविता बरई "वीणा"

हरितालिका-
मेंहदी देख रही
शहीद प्रिया ।
         
□ सविता बरई  "वीणा"

संवाद जाल
उलझा मन भोला
फँसी चिरैया ।

□ सुलोचना सिंह

लम्बी सी छाया
व्यथित दोपहरी
पराई काया ।

□  रंजन कुमार सोनी

पीपल वृक्ष
चमकते जुगनू
परिधि बन ।

□ सुधा शर्मा

जल बरसे
पी को मन तरसे
आया सावन ।

□ मधु गुप्ता "महक"

रवि उज्वल
शुभ दिन धवल
देता सम्बल ।

□ पूर्णिमा सरोज

बूँदें टपकीं
मेघ का उपहार
महकी मिट्टी ।

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

भरी उमस
जब चली हवाएं
मिला सुकून ।

□ मंजुलता गुप्ता

आँसू की बूँद
सुख दुख का क्षण
पावन जल ।

□ धनेश्वरी देवांगन "धरा"

लुभाते दृश्य
घने बादलों मध्य
तड़ित नृत्य ।

□ सुधा शर्मा

घन गर्जन
चपला थिरकन
झूमे सावन ।

□ सुधा शर्मा

पेड़ में खोह-
काट रहे हैं बच्चे
तोते के पंख ।

□ माधुरी डड़सेना

धरती प्यासी
मेघ नहीं बरसा~
पौधे उदास !

□ अनिता मंदिलवार सपना

मस्ती उमड़ी
नौका पानी में चले
बच्चे खुश हैं ।

□ गीतांजली सुपकार

तृषित धरा
प्यासी वह तरसे
बूँद न गिरे ।

□ वृंदा पंचभाई

तपे सूरज
बंजर है धरती
रोता किसान।

□ अमिता रवि दुबे

हाय वसुधा
बूंद को तरसती
रुठी बरखा ।

□ मधु गुप्ता "महक"

कटते वन
मुरझाई प्रकृति
खुशियाँ गुम ।

□ गनेश राय

आई बारिश
मुरझाए अंखुए
मिला जीवन ।

□ शशि मित्तल

प्यार के बोल
कंठ से जो निकले
दूर शिकवे ।

□ ए.ए.लूका

~~~~~~~ • ~~~~~~~

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

परछाइयाँ : हाइकु संग्रह



                              परछाइयाँ 

          हर्फ़ पब्लिकेशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हाइकु संग्रह  "परछाइयाँ " ISBN - 978-93-87757-24-0 प्रथम संस्करण - 2018, पुस्तक मूल्य - 200/-, पृष्ठ -186

        मेरे चुने हुए उत्कृष्ट सत्ताईस हाइकुओं के सोलह भारतीय भाषाओं व विभिन्न सात बोलियों के अनुवादों का देवनागरी लिप्यंतरण व मूल लिपियों में आकर्षक हार्डबाउण्ड कवर पृष्ठ, मोटे कागज युक्त, गुणवत्ता पूर्ण छपाई, सुन्दर बाइण्डिंग से सुसज्जित पुस्तक की प्रस्तुति हेतु पुस्तक के प्रकाशक स्नेहिल मित्र आ. जलज मिश्र जी, विशेष सहयोगी मित्र सर्वभाषा ट्रस्ट के संयोजक आ. केशव मोहन पांडेय जी, पुस्तक के समस्त भाषानुवादक महानुभावों एवं आप सभी मित्रों के स्नेहिल सहयोग का मनःपूर्वक हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ ।

                  □ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

CHARU CHINMAY CHOKA

   

                      चारु चिन्मय चोका 

   साझा चोका संग्रह  : प्रकाशन वर्ष - 2018
        प्रकाशन  :  उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ

                         संपादक 
          □ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

ORIYA HAIKU BOOK : "KASHATANDEER HASHA"

            ଓଡିଆ ହାଇକୁ ସଂଗ୍ରହ  "କାଶତଣ୍ଡୀର ହସ"  

                              ପ୍ରକାଶନ ବର୍ଷ : 2019
                              ନୁଆଁ ସକାଳ ପ୍ରକାଶନ
                                 
                                    ହାଇକୁକାର

                       □ ପ୍ରଦୀପ କୁମାର ଦାଶ "ଦୀପକ"

शनिवार, 13 जुलाई 2019

सेदोका

सेदोका


01.

कांक्रीट जाल
अंधाधुंध कटाई 
पेड़ बने लाचार
करें आभार
छायादार दरख्त 
प्रकृति उपहार ।

     --00--

02.

आद्य दिवस
आषाढ़ का प्रवेश
भाव हुए व्याकुल
दिखे जो मेघ
प्रेम का अतिरेक 
भेजे यक्ष संदेश ।

     --00--

03.

बीता आषाढ़
मेघ हुए निठुर  
सूखे पड़े हैं कुएँ 
दुःखी नदिया
जल की क्षीण धार
ओह.. हुई लाचार ।

     --00--

04.

सघन वन
बरसात मौसम 
पाट के सम्मोहन 
फँसे नयन
उल्टे पानी की धार
निसर्ग पे निहाल ।
     --00--

05.

आद्य आषाढ़ 
वर्षा का जन्मोत्सव 
छाये मेघ अपार
सुधा की बूंदें
वसुधा में करतीं 
शीतल का संचार ।

     --00--

06.

आया पावस
कलकल करती
फूट पड़ी धाराएँ 
गिरि शिखर 
तोड़ चली चट्टानें 
बह उठा निर्झर ।

     --00--

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

हाइकु दिवस प्रस्तुति

हाइकु मञ्जूषा
  ~~ ● ~~


"04 दिसम्बर 2018 - हाइकु दिवस"
आज के चयनित प्रतिनिधि हाइकु
~~~~~~~ ● ~~~~~~~

{1}
धान की बाली
महकती कुटिया
खुश कृषक ।

□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

{2}
कर्ज की पीड़ा
किसान की तड़प
खेतों को झाँके ।

□ पूनम आनंद

{3}
पके फसल
हर्षित है कृषक
हुआ सफल ।

निमाई प्रधान "क्षितिज"

{4}
आँधी का वेग
बरबाद फसल
रोता कृषक ।

□ डाॅ. रेखा जैन

{5}
कृषक दंग
मौसम का अंदाज
हुआ बेढंग ।

□ प्रकाश कांबले

{6}
फाड़े जो धरा
उगायें अन्न धन
वही विपन्न ।

□ गंगा प्रसाद पांडेय "भावुक"

{7}
आज कृषक
करता आत्महत्या
कर्ज में डूबा ।

□ हारुन वोरा

{8}
मौसम आग
कृषक का दुर्भाग्य
फसल राख ।

□ नवल किशोर सिंह

{9}
शीत- बरखा
कृषक के भाग्य में
रहता सूखा ।

□ सुधा राठौर

{10}

लगती प्यारी
खेतों खड़ी फसल
श्रम है भारी ।

□ संतोष खन्ना

{11}
बाग-बगीचे
खेत व खलिहान
स्तंभ किसान ।

□ माधुरी डड़सेना

{12}
पार्टी जीतती
किसान हारता है
हर चुनाव ।

□ मनीलाल पटेल

{13}
रंग लायी है
कृषक के खेत में
फसल अच्छी ।

□ ए. ए. लूका

{14]
कृषक स्वेद
सींच गई धरती
अन्न की भेंट ।

□ गीता द्विवेदी

{15}
सपने बोये
अरमानों की खाद
फसल कटी ।

□ अलका त्रिपाठी

{16}
बैल व हल
कृषक का है बल
मिलता फल ।

□ मधु गुप्ता "महक"

{17}
मिले रतन
मिट्टी पर उपजे
स्वर्ण की बाली ।

□ तेरस कैवर्त्य "आँसू"

{18}
कर्म बुआई
कृषक हाथ खाली
ऋण कटाई ।

□ पूर्णिमा साह

{19}
सूखे खेत हैं
चढ़ आए बादल
खुश कृषक ।

□ कश्मीरी लाल चावला

{20}
खड़ी फसल
मन मोहित करे
खुशी असल ।

□ श्रवण चोरनेले "श्रवण"

{21}
स्वेद की स्याही
श्रम का महाकाव्य
रचे किसान ।

□ डाॅ. सुरंगमा यादव

{22}
रोता किसान
हरजाई मौसम
बदले रंग ।

□ स्नेहलता "स्नेह"

{23}
नई फसल
किंकर्तव्यविमूढ़
कृषि निर्जल ।

□ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

{24}
रजत वर्षा
भू से उपजा स्वर्ण
कृषक हर्षा ।

□ ऋतुराज दवे

{25}
जाड़े में गाँव
अलसाया सूरज
धुएँ में नाव ।

□ सुशील कुमार शर्मा

{26}
प्रखर भानु
विश्व है विभूषित
नत जगत ।

□ पूर्णिमा सरोज

{27}
होगा सवेरा
हटा कर अंधेरा
रवि का फेरा ।

□ पद्ममुख पंडा

{28}
सर्द मौसम
सुमन पे बिखरे
ओस के मोती ।

□ सविता बरई "वीणा"

{29}
मौसम सर्द
छोड़ गया है सिर्फ़
दर्द ही दर्द ।

□ सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

{30}
सर्दी की शाम
अलाव जला तापें
दादा अकेले ।

□ मंजू शर्मा

{31}

सर्द मौसम
ले रहा अंगड़ाई
रजाई ओट ।

□ किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

{32}
करवट ली
मौसम ने, देखो न
छाई बदली ।

□ दीपाली ठाकुर

{33}
शहरोन्नति
दूब का मोल पूछे
कन्या का पिता ।

□ विभा रानी श्रीवास्तव

{34}
सावन-मन
शब्द हथेली पर
रचें हाइकु ।

□ नरेंद्र श्रीवास्तव

{35}
काव्य के वन
महकते हाइकु
चंदन बन ।

□ अभिषेक जैन

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प्रस्तुति : ----
संचालक : हाइकु मञ्जूषा
□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
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