हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

बुधवार, 31 जनवरी 2018

हाइकु मञ्जूषा जनवरी 2018 के चयनित हाइकु


हाइकु मञ्जूषा

जनवरी - 2018 के चयनित हाइकु

{ श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन }

संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", एवं "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" समूह से साभार । )


01.
साल  ये  नया
हरारत  भरी  है
हेमंती  हवा ।

✍सुधा राठौर

02.
श्रम की डोर
बाँधे नव उत्कर्ष
लाई है भोर ।

✍वीणा राघव

03.
अच्छे  संस्कार
जीवन में  खोलते
खुशी  के  द्वार ।

✍बलजीत सिंह

04.
नन्हा सा वर्ष
लिहाफ में लिपटा
मुस्कुराया है ।

✍सुशील शर्मा

05.
नव सृजन
बने नव वर्ष में
जीवन नया ।

✍सतीश राठी

06.
रवि वंदन
रश्मि और प्रकृति
शुभ मिलन ।

✍सविता बरई

07.
शीतल वात
गात पर आघात
पूस की रात ।

✍अनिल शुक्ला

08.
सह न सका
बत्ती का दुःख देखा
मोम पिघला ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

09.
चिंटियाँ करें
पर्वत रेखाकंन
कर्म वंदन ।

✍शैलमित्र अश्विनीकुमार

10.
नूतन वर्ष
माघ की ठिठुरन
गुड़ गजक ।

  ✍मृदुला मिश्रा

11.
है शरारती
शाख की चिलमन
चाँद बेपर्दा ।

✍सुधा राठौर

12.
नया जो साल
खुशियों के अंबार
भर लो थाल ।

✍कश्मीरी लाल चावला

13.
वर्ष नवल
हृदय बह गया
गीत सजल ।

✍पुष्पा सिंघी

14.
झरते पत्ते
चली वक्त की आँधी
ख्वाब टूटते ।

✍रामेश्वर बंग

15.
रातरानी का
मदमस्त यौवन
सजा है मन ।

✍प्रकाश कांबले

16.
खाट पे दादी
चश्मे से देख रही
ठूँठ तुलसी ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

17.
प्रेम के रंग
सद्भावना संग
छाये उमंग ।
    
✍रवीन्द्र वर्मा

18.
प्रभु वन्दन
करलें प्रातः हम
दिन सुगम ।

✍ए. ए. लूका

19.
भोर से आस
साँझ से शिकायत
यही ज़िंदगी ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

20.
खड़ा कोहरा
लिये ठण्ड की लाठी
छूपा सूरज ।

✍देवेन्द्र सगर

21.
रात महकी
चाँदनी ने उडेला
चाँद का इत्र ।

✍सुधा राठौर

22.
खूब निखरा
पत्तों पर प्रसरा
घना कोहरा ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

23.
तिमिर घना
झाँक रहा चंद्रमा
है अनमना ।

✍सुधा राठौर

24.
दाम्पत्य घड़ी
पति पत्नी दो कांटे
प्रेम है धुरी ।

✍ऋतुराज दवे

25.
घड़ी की घंटी
सुधि भाव भर दे
सुप्त मन में ।

✍मनीभाई"नवरत्न"

26.
खुशी के फूल
महकाये जीवन
निखारे मन ।

✍रामेश्वर बंग

27.
स्वयं का भान
अंतस में हो ध्यान
ईश का ज्ञान ।

✍निर्मला सुरेन्द्रन

28.
श्लोक का जाप
गागर में सागर
धुलते पाप ।

✍राधा अय्यर 'सवि'

29.
सर्द मौसम
अलाव से जज़्बात
किसे पुकारूँ ।

✍राजेश पाण्डेय

30.
भभक उठा
हवाओं की फूँक से
रवि का हुक्का ।

✍सुधा राठौर

31.
खिड़की खुली
कच्ची सी धूप मिली
ओस में घुली ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

32.
घर में बेटी
माँ देखती खेत में
सरसो फूल।

✍विष्णु प्रिय पाठक

33.
सारी दौलत
बेटों में गयी बंट
मां मर्माहत ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

34.
हँसे पलाश
आज फागुन मन
इठला उठा ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

35.
प्रेम की डोर
देख चाँद चकोर
मन विभोर ।

✍भीष्मदेव होता

36.
पहाड़ी ओट
साँझ सबेरे रवि
झाँकता रोज ।

✍नरेश जगत

37.
दर्द के अश्रु
मोती बन बिखरे
नैनों से झरे ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

38.
वृक्ष भी अड़ा
वर्षा की प्रतीक्षा में
सूखे से लड़ा ।

✍ऋतुराज दवे

39.
माघ आया है
धुँध सजी सरसों
जाड़ा छाया है ।

✍डॉ. बीना

40.
मन को हाँके
यादों की खिड़कियाँ
बुढ़ापा झाँके ।

✍ऋतुराज दवे

41.
बूढ़े ललाट
उम्र की सलवटें
कथा समेटे ।

✍ऋतुराज दवे

42.
बूढ़े , वृक्ष से
आशीष फल लदे
स्नेह से भरे ।

✍ऋतुराज दवे

43.
गिर जाते हैं
समय की शाख से
उम्र के पन्ने ।

✍अमन चाँदपुरी

44.
तेरा मिलना
मरु के तरु जैसा
शीतल छाँव ।

✍सुधा चौधरी

45.
शिशिर ऋतु
श्री हीन विटपों पे
पर्ण श्रृंगार  ।

✍मंजु शर्मा

46.
उम्र का घडा
मिट्टी के महल में
वक्त से टूटा ।

✍ऋतुराज दवे

47.
मेघ बरसे
जलमग्न है धरा
किसान झूमे ।

✍क्रान्ति

48.
शीत शर्बरी
रतिपति चलाये
कुसुम बाण ।

✍सूर्य करण सोनी

49.
बाँट दी मैंने
थोड़ी सी गर्माहट
रिश्तों के बीच ।

✍सुधा राठौर

50.
काँपते गात
कोहरा हिमपात
ठंडे लिहाफ ।

✍बिमला देवी

51.
धुँध कहर
सड़कों के हादसे
थमे पहर ।

✍बिमला देवी

52.
कोहरा पड़ा
खेतों में गेहूँ पका
किसान हँसा ।

✍बिमला देवी

53.
जीवन धूप
पिता का समर्पण
छाते का रूप ।

✍ऋतुराज दवे

54.
चुभती ठंड,
छिन्न भिन्न घमंड,
रूठी लुगाई ।

✍अजय श्रीवास्तव

55.
शुभ्र प्रभात
धुंध के लिहाफ में
सूर्य का गात ।

✍सुधा राठौर

56.
धूप निकली
क्षणभंगुर ओस
हुई बेहोश ।

✍सुधा राठौर

57.
हवा बेहाल
पत्तों की मर्ज़ी पर
बिगड़ी चाल ।

✍सुधा राठौर

58.
जलती रही
लालटेन उदास
जोहती बाट ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

59.
पेड़पौधों पे
शीत मारता चाँटे
धूप ममता ।

✍आरती परीख

60.
खुशबू तेरी
यहाँ तक पहुँची
महका मन ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

61.
धूप के दाने
सुबह चुग लेगी
पेट भर के ।

✍शुचिता राठी

62.
अरुण गात
सूरज का ललना
झूले पलना ।

✍सुधा राठौर

63.
समेट ली है
रात ने चुपके से
काली चादर ।

✍सुधा राठौर
        
64.
किरण परी
छलकाए गगरी
जागी नगरी ।

✍सुधा राठौर

65.
हवा के तीर
दूब के नयनों में
ओस का नीर ।

✍सुधा राठौर

66.
पतंग कटी
ऊँची उड़ान टूटी
धरा पे लुटी ।

✍आर. के. निगम 'राज़'

67.
मेरी पतंग
आसमान में उड़े
बदले रंग ।

✍आर. के. निगम 'राज़'

68.
मुड़ा भास्कर
उत्तरायण गति 
हुई संक्रांति ।

✍मनी लाल पटेल

69.
बंधी पतंग
मांझा-डोरी के संग
लिए उमंग ।

✍नीरू मोहन

70.
नव उत्कर्ष
बयारित पवन
बसंत स्पर्श ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

71.
जख्म गहरा
खलिहान बंजर
सूखा दरिया ।

✍भीष्मदेव होता

72.
कर लें हम
उपासना प्रभु का
रहें प्रसन्न ।

✍ए. ए. लूका

73.
प्रेम सुगंधी
महके द्वय मन
मैं और तुम ।

✍नरेंद्र मिश्रा

74.
दुल्हन बन
कई रंगों के संग
रंगी पी रंग ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

75.
हुई उदास
पेड़ की झुकी डाली
देख कुदाली ।

✍रामेश्वर बंग

76.
छुप रहा है
अस्ताचल की ओट
निस्तेज रवि ।

✍मधु सिंघी

77.
गाँव की यादें
प्रेम भरे चेहरे
आँगन गूँजे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

78.
माँ की ममता
आँचल की तलाश
छलकी आँखे ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

79.
मिलोगे तुम
ऐसी उम्मीद जगी
इन्तज़ार है ।

✍ए. ए. लूका

80.
गजरा चोटी
पहाड़ी में चिपके
बर्फ सफेद ।

✍नरेश जगत

81.
बिजली तार
दुनिया में पसरा
मीठा बाजार ।

✍जगत नरेश

82.
यामिनी आई
घर में दीप जले
तिमिर मिटे ।

✍सविता बरई

83.
यारों का यार
बैठा है छिप कर
पालन हार ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

84.
भोर सुहानी
उगता हुआ सूर्य
लाता संदेश ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

85.
तरु  है  दादा
परिवार  का  मूल
नेक  इरादा ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

86.
जीवन मेरा
पिता का आशीर्वाद
छाँव का घेरा ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

87.
मूरत माँ की
ममता का आँचल
तीरथ झाँकी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

88.
बहन की राखी
स्नेह भरी रसरी
उड़ती पाखी ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

89.
चाँदनी रातें
घुंघट में दुल्हन
मनोहरता ।

✍सुमिधा हेम सिदार

90.
भोर प्रभाग
सूरज का संगीत
किरण-राग ।

✍अविनाश बागड़े

91.
सर्द मौसम
पवन के सिर पे
बर्फ गठरी ।
   
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

92.
नभ में जंग
पाने क्षेत्राधिकार
लड़े पतंग ।

✍अभिषेक जैन

93.
उफनी नदी
तोड़ती सारे बंध
ये जलावृष्टि ।

गंगा पाण्डेय "भावुक"

94.
बाँधवी प्रेम
लिपटी सरसों से
मटर बेल ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

95.
रक्षा कवच
ममता का आँचल
देता ममत्व ।

✍रामेश्वर बंग

96.
थरथरायी
शज़र की पत्तियाँ
देख कुल्हाड़ी ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

97.
लहू का रंग
ईर्ष्या द्वेष से तंग
बदले ढंग ।

✍अर्चना कोचर

98.
कोहरे मध्य
सूरज दिख रहा
चाँदी का थाल ।

✍शशि त्यागी

99.
थका व हारा
ठंड से ठिठुरता
भोर का तारा ।

✍मनीष त्यागी

100.
रजनी तवा
सूरज ने बनाई
चाँद की रोटी ।

✍ऋतुराज दवे

101.
मौन पसरा
पंछी का कलरव
चुराती हवा ।

✍सुधा राठौर

102.
मन के शून्य
ईश्वर का स्वरूप
गहरा मौन ।

✍रामेश्वर बंग

103.
ओस की आस
गुलाबी अहसास
सूर्ख लिबास ।

✍अविनाश बागड़े

104.
रस टपके
आम के पुहूपों से
मन बहके ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

105.
सुखी संसार
घर बने मंदिर
माँ का सपना ।

✍सुमिधा हेम सिदार

106.
शहीद फूल
तिरंगा मे लिपटा
माँ का लाडला ।

✍भीष्मदेव होता

107.
अतीत देखा
बीते वक्त ना आये
फिसले  रेत ।

✍सुमिधा हेम सिदार

108.
हवा बहकी
महुआ है महका
रवि दहका ।

✍सुधा राठौर

109.
आया बसंत
कुहकती कोयल
मनवा डोले ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

110.
इंद्रधनुष
रंगीन गुलदस्ता
मन मोहता ।

✍भीष्मदेव होता

111.
डायन  मौत
जिंदगी  परेशान
लगती  सौत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

112.
दिल को भाना
ऋतुराज का आना
गुनगुनाना ।

✍मधु गुप्ता

113.
वस्त्र हो पीले
गाए पीक सुरीली
बेर रसीले ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

114.
नई उमंग
हर्ष से भर आए
सूने नयन ।

✍उषा शर्मा "साहिबा"

115.
मन अधीर
परदेस में पिया
जाने ना पीर ।

✍राधा अय्यर 'सवि'

116.
जद्दोजहद
भूख और प्यास की
तोड़ती हद ।

✍जाविद हिदायत अली

117.
हल्दी के रंग
वक्त के साथ मिटे
गहरे जख्म ।

✍जगत नरेश

118.
उड़ती चील
अपने लक्ष्य पर
पैनी नज़र ।

✍भीष्मदेव होता

119.
बनना फूल
जीवन पथ पर
बन न शूल ।

✍रामेश्वर बंग

120.
जीवन गीत
है प्रेम का संगीत
तुम्हारी प्रीत ।

✍तृप्ति

121.
सूना जीवन
रिमझिम फ़ुहार
ख़्याल आपका ।

✍तृप्ति

122.
नाचता मोर
देखता पग ओर
रुदन ज़ोर ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

123.
टूटी न जूडी
सास-बहूकी जोड़ी
रेल पटरी ।

✍आरती परीख

124.
दुखता दिल
बहते नेत्रजल
हरते पीर ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

125.
रवि का पथ
उष्मा से लथपथ
धूप सतत ।

✍सुधा राठौर

126.
नदी का पथ
मोड़ना आसां कहाँ
दिल आहत ।
                         
✍प्रकाश कांबले

127.
कुसूमासव
एकता की मिसाल
मधुमक्खियाँ ।

✍भीष्मदेव होता

128.
पवन बही
भ्रमर हैं चूमते
सुमन मुख ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

129.
बौराया आम
पीत वर्ण सरसों
बासंती गान ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

130.
आमों के बौर
बने अलि के ठौर
आया बसंत  ।

✍कपिल जैन

131.
पिया हों संत
फिर कैसा फागुन
कैसा बसन्त ।

✍डाॅ. यतीश चतुर्वेदी "राज"

132.
सरसों फूली
चहुँ ओर अनन्त
आया बसन्त ।

✍डॉ. यतीश चतर्वेदी "राज"

133.
बसंत ऋतु
दिन पतंग हुये
रात सरसों ।
    
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

134.
बासंती धूप
ऋतुराज निखारे
सौंदर्य रूप ।

✍मनीभाई

135.
हे मां शारदे
हमको दो आशीष
नवाते शीष ।

✍पुरुषोत्तम होता

136.
गीत पँक्तियाँ
आह गढ़ती रही
अश्रु के संग ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

137.
बौराया आम
कुंचाया है महुआ
भीनी सुगंध ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

138.
ॠतुराज है
कोयल कूकी फूली
आम्र मंजरी ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

139.
बिखेर देता,
सुगंध की सत्ता को,
भू, में वसंत ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

140.
स्वप्न की साधें,
याद आती पुरानी,
जागती रातें ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

141.
सरसों फूल
बासंती परिधान
ओढ़ी धरती ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

142.
पुष्प लिबास
स्वर्ण रजत घास
मधु का मास ।

✍राकेश गुप्ता

143.
धूप बिछाती
बिछौने पीले हरे
धरा शर्माती ।

✍राकेश गुप्ता

144.
चंद्रमा झाँके
गगन गोटेदार
सितारे  टाँके ।

✍राकेश गुप्ता

145.
गेंहूँ की बाली
सरसों पर लट्टू
बजाती ताली ।

✍राकेश गुप्ता

146.
दिल पतंग
मिलन आस ताजा
नजर माँझा ।

✍राकेश गुप्ता

147.
गाँव शहर
वसंत मुखरित
अवनि पर  ।  

✍अविनाश बागड़े   
                  
148.
वासन्ती गाँव
पीत वर्ण आनन
मुग्ध कानन ।

✍सुधा राठौर

149.
वासंती टेर
भँवरे का प्रणय
कली हृदय ।

✍अविनाश बागड़े

150.
प्रणय दाह
सिंगार वसंत का
भरता आह ।

✍विवेक कवीश्वर

151.
हवा दहकी
वासन्ती हरारत
पिघला मन ।

✍सुधा राठौर

152.
पराग-गंध
सम्मोहित अनंग
लिखता छंद ।

✍सुधा राठौर

153.
वासंती गीत
गाता हुआ समीर
नदिया तीर ।

✍अविनाश बागड़े

154.
बाजे मृदंग
यूँ ताथैय्या ताथैय्या
नाचे कदम ।

✍रति चौबे

155.
सूरज लिखे
धरा के आँचल पे
बासंती छंद ।

✍रीमा दीवान चड्ढा

156.
पी उर जागी
नेह की भागीरथी
मैं बड़भागी ।

✍विवेक कवीश्वर

157.
बसंत आया
लगी फूलों की हाट
भटका भौंरा ।

✍डाॅ. सुरंगमा यादव

158.
ये पतझड़
झरनों की तरह
गिरते पात ।

✍मधु गुप्ता

159.
कोयल गाती
फागुन अगुवाई
करे बसंत ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

160.
बसंत आया
महके जर्रा जर्रा
हर्षित धरा ।

✍आरती परीख

161.
कटते पेड़
धरती की पुकार
टूटती साँस ।

✍ऋतुराज दवे

162.
मेरे भीतर
है सबके अंदर
वही ईश्वर ।

✍मनिषा वाणी मेने

163.
लो खुल गया
सूरज का पिटारा
दौड़ीं रश्मियाँ ।

✍सुधा राठौर

164.
सूखता गया
पन्नों में दबकर
प्रेम गुलाब ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

165.
ऋतु वसंत
नवल भू यौवन
खिले आकंठ ।

✍सुशील शर्मा

166.    
माता का दूध
बड़ा होकर भूला
उसका पूत ।         
  
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

167.
कटते वृक्ष
फटे धरती वक्ष
प्रश्न है यक्ष ।

✍महेन्द्र देवांगन माटी

168.
कपोत उड़े
आजादी का उत्सव
उमंग भरे ।

✍सविता बरई

169.
खिलते फूल
गंध जग मे लुटा
झर मिटते ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

170.
हुआ बिहान
करलो स्तुतिगान
प्रभु महान ।

✍ए. ए. लूका

171.
जय भारत
हो वन्दे मातरम
सबकी आन ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

172.
देश की शान
गणतंत्र दिवस
दिन महान ।

✍मनीभाई

173.
पुण्य दिवस
लहराता तिरंगा
राष्ट्र की आन ।

✍पुरुषोत्तम होता

174.
सबका हक
हमारा गणतंत्र
सबकी हद ।
  
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

175.
खड़ी शान से
छब्बीस जनवरी
सीना तान के ।

✍अभिषेक जैन

176.
कभी तो होगा
सुखद गणतंत्र
हृदयासीन ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

177.
वक़्त बदला
अबला नहीं रही
आज की नारी ।

✍उषा शर्मा

178.
झंडा हमारा
सुख शांति ऐश्वर्य
प्रतीक प्यारा ।

✍डाॅ. मीता अग्रवाल

179.
लहलहाए,
सोने की चिडिया है
भारत देश ।

✍पूनम मिश्रा

180.
सूरज ढला
साँझ सजने लगी
दीपक जला।

✍मनिषा वाणी

181.
तिरंगा शान
प्रतीक स्वाभिमान
गौरव गान ।

✍ऋतुराज दवे

182.
गर्व समाया
तिरंगे में लिपटी
गौरव गाथा ।

✍ऋतुराज दवे

183.
हो गई भोर
करे भाव विभोर
खगों का शोर ।

✍अविनाश बागड़े

184.
भोर सुहानी
नित नई कहानी
रश्मि की बानी ।

✍पूर्णिमा सरोज

185.
देश की शान
शहीदों का लिखना
विजय गान ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

186.
पलकें उठी
लजाई सी कलियाँ
पास भ्रमर ।

✍अविनाश बागड़े

187.
पलकें उठी
झुकी थी एक पल
जैसे कमल ।

✍प्रकाश कांबले

188.
स्नेह की गंध
महकाते जीवन
खुशी के फूल ।

✍रामेश्वर बंग

189.
सरहद पे
तैनात हैं  सैनिक
देश रक्षित ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

190.
प्रीत में बंधे
धरा और बसंत
मुलाकातों में ।

✍सुधा राठौर

191.
ढाई आखर
वसंत लिख रहा
पात-पातों में ।

✍सुधा राठौर

192.
वीर जवान
देशप्रेम कवच
ध्वज प्रेरणा ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

193.
डूबे सूरज
नयी उम्मीद लिये
उगे सूरज ।

✍अयाज़ ख़ान

194.
स्त्री की राह में
उड़ने न दो धूल
बिछा दो फूल ।

✍शुचिता राठी

195.
सौम्य स्वरूप
प्रभात की किरणें
भोर की धूप ।

✍शुचिता राठी

196.
दूर अँधेरा
करता दिनकर
लाता सवेरा ।

✍शुचिता राठी

197.
आँसू के मोल
बिक रहीं उम्मीदें
दिल दूकान ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

198.
मन सपेरा
जादू से भरी बीन
लोभ के नाग ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

199.
ढूँढते ठाँव
धूप से डरकर
शीत के पाँव ।

✍सुधा राठौर

200.
धूप महकी
टहनियाँ लहकी
हवा बहकी ।

✍सुधा राठौर

201.
बाहर सख्त
साधु मानो श्रीफल
अंतः कोमल ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

202.
चूल्हे में तवा
लगी आग खेत में
बाजार गर्म ।

✍नरेश जगत

203.
रात सयानी
लोरी सुनाती मैय्या
झिंगुर राग ।

✍नरेश जगत

204.
रेल इंजन
नजरों को खिंचते
सरसों फूल ।

✍जगत नरेश

205.
सत्ता है दास
जिसकी सरकार
करे संताप ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

206.
बिखरी रातें
सो गयी है चांदनी
टूटती सांसे ।

✍पूनम मिश्रा

207.
भाव निष्प्राण
संवेदना ने फूँकी
मुर्दे में जान ।

✍ऋतुराज दवे

208.
रस घोलते
पंछियों के कलरव
गीत सुनाते ।

✍उषा साहिबा

209.
नभ से गिरा
टहनी में अटका
उनींदा चाँद ।

✍सुधा राठौर

210.
मधुप हास
फूल कली श्रृंगार
है मधुमास ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

211.
धूप के गाँव
लड़खड़ाते हुए
शीत के पाँव ।

✍आरती परीख

212.
नभ रंगोली
सूर्य देता विदाई
साँझ रंगीली ।

✍मीनाक्षी भटनागर

213.
नागफनियाँ
काँच हुए टुकड़े
सजी दीवारें ।

✍जगत नरेश

214.
मन की नदी
फागुनी हवा चली
लहर उठी ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

215.
हवा चलती
मैना डाली पे बैठी
झूला झूलती ।

✍सविता बरई

216.
हुआ अजूबा
झील के नयनों में
चंद्रमा डूबा ।

✍सुधा राठौर

217.
मन कोमल
सहेजे अविरल
स्वप्न कोंपल ।

✍पूर्णिमा सरोज

218.
मन की व्यथा
हम किसे सुनाएँ
सभी बेगाने ।

✍ए. ए. लूका

219.
ऋतु वसंत
आम्रमञ्जरी संग
बौराया मन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

220.
झूठे वहम
मिट्टी के घरोंदे का
मालिक अहं ।

✍ऋतुराज दवे

221.
शमशान में
मुर्दे समझा रहे
जीवन अर्थ ।

✍ऋतुराज दवे

222.
चाँदनी रात
दरिया का किनारा
तेरी जुस्तजू ।

✍हाॅरून वोरा

223.
सिसके रिश्ते
पड़े तनहाई में
माँ बाप बूढ़े ।

✍कमलेश कुमार वर्मा

224.
चाँदनी रात
चमकते सितारे
नीर के झाग ।

✍जगत नरेश

225.
दूधिया बल्ब
उज्ज्वलमय निशा
पूर्णिमा तिथि ।

✍जगत नरेश

226.
घायल उर
पर वंशी का स्वर
होता मधुर ।

✍सुधा राठौर

227.
माना ग्रहण
रूपवान चन्द्रमा
लज्जा से लाल ।

✍अंशु विनोद गुप्ता

रविवार, 28 जनवरी 2018

रेंगा

 

विश्व के प्रथम रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश" एवं संग्रह के संपादक 

आ. प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी की 

उपलब्धियों की शान में आयोजित रेंगा सृजन ।

        प्रस्तुति : अविनाश बागड़े

    संचालक : हाइकु ताँका प्रवाह

         13 जनवरी 2018

        ●●●●●●●

दीपक सदा
प्रकाशित ही रहा
राह दिखाते  - अविनाश बागड़े
नित नवीन पथ
कल्पनाएँ साकार  - सुधा राठौर
एक दीपक
हमको मिल गया
सम्भाले इसे  - अविनाश बागड़े
स्नेह साथ विश्वास
कस्तूरी की तलाश - प्रदीप कुमार
हम सब है
पांच सात व पांच
सात - सात है  - अविनाश बागड़े
हां साथ साथ चलें
साहित्य पथ रचें  - हेमलता मानवी
सृजन पथ
होता रहे विस्तृत
पूर्ण आश्वस्त  - सुधा राठौर
शब्द ब्रम्ह चढ़ाएं
अक्षत चंदन से  - हेमलता मानवी
हाइकु ताँका
कहीं पे रेंगा रचें
चोका भी साथ  - सुधा राठौर

मिल कर कदम

बढ़ाएँ साथ-साथ  - प्रदीप कुमार
समूह बढे,
हाइकु पहचान,
फैलता जाल  - पूनम
शाम की यह बेला
रेंगा ये अलबेला  - अविनाश बागड़े
चला अथक
मिलते गए राही
बना कारवाँ  - सुधा राठौर

महक चला पथ

 मिले हमसफर  - प्रदीप कुमार
शब्द बुनते,
रेंगा बनते चले
 साहित्य रूचि  - पूनम
कल्पना व साधना
कृति की आराधना  - निर्मल सुरेन्द्र
शब्दों के मोती
चुनते चलें  सभी
बुनें सृजन  - पूर्णिमा
कुछ भाव पिरोएँ
कुछ बिम्ब सजाएँ  - सुधा राठौर
कुछ अक्षर
थोड़े बहुत शब्द
भाव प्रवल - अविनाश बागड़े
होते गहरे अर्थ
देते हमें रोशनी  - रामेश्वर बंग
दीप निःस्वार्थ
जला करे जाँबाज
तम परास्त  - राकेश गुप्ता
मिटता है अँधेरा
मिलता है प्रकाश  - रामेश्वर बंग
ज्ञान प्रदीप्त
बने आकाशदीप
आत्मा उज्ज्वल  - मधु सिंघी
मन करे शीतल
महकता चंदन - रामेश्वर बंग
सुखानुभूति
सदा रहे स्वीकृति
होती प्रगति  - मधु सिंघी

निरंतर चलना
सुखद अनुभूति  - प्रदीप कुमार

शब्दो की माला,
पांच सात पांच ये,
अर्थ है पूर्ण  - पूनम
हाइकु और रेंगा
प्रवाह बना रहे  - अविनाश बागड़े
मन सरिता
शब्द शब्द के मोती
कृति है काव्य  - रामेश्वर बंग
ऊर्जावान बनाये
ये प्रदीप दीपक - अविनाश बागड़े
शिक्षार्थी हम
गुरुजन सम्मुख
नतमस्तक  - सुधा राठौर
गुरु देते आशीष
शब्द शब्द का ज्ञान - रामेश्वर बंग
ज्ञान की पूँजी
अमूल्य धरोहर
करें अर्जित  - सुधा राठौर
निखारे मन भाव
जीवन मे आलोक - रामेश्वर बंग
जीवन पथ
भर देता उजास
ज्ञान -प्रकाश - सुधा राठौर
देता नव चेतना
खिले खुशी के फूल - रामेश्वर बंग
वैश्विक रूप
कस्तूरी की तलाश
मिला स्वरुप - अविनाश बागड़े
रचा है इतिहास
विश्व पटल पर - रामेश्वर बंग
होवे प्रशस्त
सृजन का ये पथ
नित सतत - सुधा राठौर
मिल जाये कस्तूरी
तलाश हो सफल - अविनाश बागड़े
     ■

रविवार, 31 दिसंबर 2017

हाइकु मञ्जूषा दिसम्बर माह 2017 के चयनित हाइकु

                                           हाइकु मञ्जूषा

                             दिसम्बर - 2017 के चयनित हाइकु

                                  {श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन}

                            संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" एवं "हाइकु की सुगंध" समूह से साभार । )

01.
नदी का कर्ज
सागर भेजे मेघ
निभाये फर्ज ।

✍ऋतुराज दवे

02.
सर्दी की धूप
वनवासी कन्या का
उजला रूप ।

✍अयाज़ ख़ान

03.
चाँद उलझा
बादलों की राह में
रात का साया ।

✍अविनाश बागड़े

04.
खेत में आग
पुवाल का टुकड़ा
चिड़ि ले फ़ुर्र ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

05.
तितली-पंख
पीने लगे चोरी से
फूलों के रंग ।

✍सुधा राठौर

06.
तुम्हारे लिए
रेत पर उकेरे
मन के भाव ।

✍सुशील शर्मा

07.
नहाती रोज
उल्फत की फसलें
बहता लहू ।

✍रामेश्वर बंग

08.
निशा अतिथि
कलानिधि चंचल
सखी कौमुदी ।

✍अंकिता कुलश्रेष्ठ

09.
पाषाण खण्ड
किनारे से निकला
सफेद दूब ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

10.
बाँस की पोरी
छिन्न-भिन्न हृदय
गाती है लोरी ।

✍सुधा राठौर

11.
कर्म कल्मष
गुलाब कण्टक सा
दिल को छेदे ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

12.
गुलाब कली
शूलों संग पलती
सुगंध भली ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

13.
विमल रूप
कुहासे से निकली
स्वर्णाभ धूप ।

✍पुष्पा सिंघी

14.
पीपल पर्ण
रेखाएं कर्म ऋण
चुका उऋण ।

✍हेमलता मिश्र

15.
कोहरा कहाँ
मन में या बाहर
ढूँढ़ो तो सही ।

✍सतीश राठी

16.
द्वारे पे आई
बेटी को दी बिदाई
फूटी रुलाई ।

✍डाॅ. वीणा मित्तल

17.
बेटी का बाप
झेलता अभिशाप
दहेज़ सांप ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

18.
सुबह-शाम
हो गया आसमान
लहु-लूहान ।

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य'

19.
छुई मुई सी
सिकुड़ती जा रही
पूस की धूप ।

✍किरण मिश्रा

20.
यामिनी लाई
सितारों की चुनरी
सजी धरित्री ।

✍सविता बरई

21.
ढलती साँझ
पुराने कागज पे
नये तराने ।

✍पुष्पा सिंघी

22.
मन का द्वार
तू प्रेम की झाड़ू से
सदा बुहार ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

23.
सर्दी की रात
खरोंच रहा बूढ़ा
ठंडा अलाव ।

✍दिनेश चंद्र पांडेय

24.
बनी कहानी
महकी रात भर
रात की रानी ।

✍आर. के. निगम "राज़"

25.
सर्द हालात
कंपकंपाती रात
ठिठुरे गात ।

✍दाता राम पूनिया

26.
ये खलिहान
किसानों की मुस्कान
सोने की खान ।

✍सुमिधा "हेम" सिदार

27.
प्रभु मिलन
ये आत्मा बंजारन
छोड़ती तन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

28.
सरिता थी वो
कल कल करती
गुम हो गई

✍जाविद अली

29.
लाख टका है
तेरी वाणी का मोल
तोल के बोल ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

30.
सत्संग हॉल
लाउडस्पीकर में
शांति का पाठ ।

✍अभिषेक जैन

31.
टूटते रिश्ते
अस्तित्व को ढूँढता
बुजुर्ग पेड़ ।

✍रामेश्वर बंग

32.
एक किरण
नाप गई क्षितिज
कांपे नयन ।

✍पूनम मिश्रा

33.
जीव है रथी
हाँकता देह रथ
काल सारथी ।

✍देवेन्द्रनारायण दास

34.
सूरज उगा
काली घनी रात को
देकर दगा ।

✍अमन चाँदपुरी

35.
चलती रात
सुबह की मंज़िल
तिमिर साथ ।

✍अविनाश बागड़े

36.
ख्याली पुलाव
बना रहा मानव
चाँद पे घर ।

✍किरण मिश्रा

37.
छोड़ो तनाव
मैत्री  मानव भाव
मिटते घाव ।

✍एन. एस. गोहिल

38.
धूप नहाई
प्रातः अंगड़ाई ले
धरा मुस्काई ।

✍ऋतुराज दवे

39.
तुम्हारी याद
सूखे फूल का स्पर्श
कोयल कूक ।
   
✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

40.
भोर की लाली
सुनहरे सपने
ले कर आई ।

✍मधु गुप्ता

41.
प्रण है प्राण
जीवन अभियान
करो प्रयाण ।

✍संजीव कुमार पाणिग्राही

42.
मन सागर
सीप सी थाह सोच
देती है मोती ।

✍रामेश्वर बंग

43.
पूस की ठंड
रात खोजती रही
सूर्य दुशाला ।

✍नरेन्द्र श्रीवास्तव

44.
ख़्याली पुलाव
वायदों की रेवड़ी
आया चुनाव ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

45.
मनभावन
ऊगता हुआ रवि
रश्मि के संग ।

✍शुचिता राठी

46.
दुंदुभि बजी
नव ऊर्जा संचार
लो भोर आयी ।

✍मधु सिंघी

47.
सूक्ष्म शरीर
मन की चंचलता
चांद के पार ।

✍मनीलाल पटेल "नवरत्न"

48.
बाँटें खुशियाँ
बन के तितलियाँ
भोली बेटियाँ ।

✍अनिल शुक्ला

49.
बेटी चिरैया
कर्तव्य तिनके से
बुने घरौंदा ।

✍ऋतुराज दवे

50.
सोन चिरैया
अंगना में बिटिया
धन पराया ।

✍हेमलता मिश्र

51.
यत्न प्रबल
प्रारब्ध को बदल
नर सबल ।

✍दाता राम पुनिया

52.
भाव विभोर
हँसती हरियाली
रक्तिम भोर ।

✍अविनाश बागड़े

53.
वह सरिता
वजुद समर्पित
सिन्धु को सदा ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

54.
ज्ञान के स्रोत
गोता लगाते ज्ञानी
भाव विभोर ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

55.
स्वर्ण बिखरा
झील की देह पर
कमल हँसा ।

✍सुशीला जोशी

56.
नवल पत्ते
प्रकृति के श्रृंगार
पुष्प हँसते ।

✍जगत नरेश

57.
मन सरिता
बहे निर्मल धार
शुद्ध विचार ।

✍रामेश्वर बंग

58.
चूजे प्रसन्न
ममता का आगोश
नेह का घोष ।

✍मधु सिंघी

59.
धरा स्तन से
फूटती जल धार
जीवनाधार ।

✍सुशीला जोशी

60 .
उलझीं तो क्या
खोल के सुलझा लो
जिन्दगानियाँ ।

✍राकेश गुप्ता

61.
नदिया प्यासी
सिमटी सी बगिया
फैली उदासी ।

✍राधा 'सवि'

62.
जीवित आस
रिश्ते होते हैं ख़ास
प्राप्ति आभास ।

✍विनय कुमार अवस्थी

63.
जिंदगी आब
कलकल बहती
झरते ख्वाब ।

✍किरण मिश्रा

64.
श्वेत पर्वत
ध्यानरत सन्यासी
मौन का व्रत ।

✍मनीष त्यागी

65.
धूप कनक
बिखर गई अब
धरा मोहक ।

✍पूनम मिश्रा

66.
बाबा का श्राद्ध
कबाड़ी खरीदता
पुरानी खाट ।

✍पुष्पा सिंघी

67.
शुक्ल का चाँद
दिनोदिन बढ़ता
घटे कृष्ण में ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

68.
विस्तृत नभ
मौन और निस्तब्ध
है हतप्रभ ।

✍सुधा राठौर

69.
अति है बुरी
नीयत क्या समझी
छवि गँवाई ।

✍विनय कुमार अवस्थी

70.
मन गगन
सपनों में खो गये
बंद नयन ।

✍सविता बरई

71.
श्वेत कफ़न
वो भी बन न सका
अंतिम धन ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

72.
चाँद निखरा
बादलो का लिबास
धुंध श्रृंगार ।

✍शुचिता राठी

73.
वक्त के साथ
मिट जाते अक्सर
घाव गहरे ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

74.
रवि सदन
करती है किरण
अभिवादन ।

✍अविनाश बागड़े

75.
झुर्रियाँ कहे
दुनिया बदली है
वृद्घाश्रम में ।

✍रति चौबे

76.
प्रदोष चाँद
उग आया गगन,
शुभ्र है साज ।

✍पूनम मिश्रा

77.
पूस की रात
कंपित दीप की लौ
दादी के हाथ ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

78.
बही बयार
मुस्काई है प्रकृति
गाए मल्हार ।

✍नीरु मोहन

79.
माटी मितान
अन्धाधुंध कटाई
रोए किसान ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

80.
झाँकता रवि
धुन्ध की चादर से
रक्तिम भोर ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

81.
सिंदूरी शाम
चाँद के आगोश में
शीतल छाँव ।

✍अल्पा जीतेश तन्ना

82.
कटी पतंगें
सजा बूढ़ा पीपल
आयी खिचड़ी ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

83.
बर्फीली शिखा
हवा छूकर चली
सूरज दिखा ।

✍शैलमित्र अश्विनीकुमार

84.
मन की पाँखें
अनुपम उड़ान
अम्बर नापें ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

85.
बागी दरिया
हतबल नौकाएँ
टेर लगाएँ ।

✍इंदिरा अग्रवाल

86.
बर्फीली हवा,
सुई सी चुभोती है
पूस की रात।

✍देवेन्द्र नारायण दास

87.
मन तरंग
लेती जब हिलोरें
बढ़े उमंग ।

✍डाॅ. आनन्द शाक्य

88.
स्निग्ध पूरब
स्तब्ध प्रकृति यहाँ
शीत लहर ।

✍राजेश पाण्डेय

89.
दुबका रवि
ओढ़ कर फिर से
निशा रजाई ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

90.
सजग रहो
सुख दुख सबमें
प्रणत रहो ।

✍डाॅ.मीना कौशल

91.
बीता समय
झरने लगे फूल
ठूँठ जीवन ।

✍ऋतम्भरा

92.
भोर के संग
दिवाकर ले आये
आस उमंग ।

✍चंचला इंचुलकर सोनी

93.
श्रेष्ठ  विधान
सूरज  से  मिलता
दिशा  का  ज्ञान ।

✍बलजीत सिंह

94.
सुबह हुई
रवि धुनिया धुने
रश्मि की रुई ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

95.
मैके की याद
छोंक रही है बहु
दाल के साथ ।

✍अभिषेक जैन

96.
मित्रों के संग
बदल जाते सदा
जीवन रंग ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

97.
चंद्र किरण
धरती पे उतरी
जग मगन ।

✍रेनू सिंघल

98.
बेटी बिदाई
कलेजे का टूकड़ा
होती पराई ।

✍मधु गुप्ता

99.
भागी सहम
माँ के काले टीके से
बुरी नज़र ।

✍ऋतुराज दवे

100.
खिलती धूप
हँसते  है सुमन
सजती धरा ।

✍पूनम मिश्रा

101.
कोमल स्पर्श
मखमल सी धूप
निराला रूप ।

✍शुचिता राठी

102.
श्वेत बादल
नभ में भरे रंग
हवा के संग ।

✍रामेश्वर बंग

103.
ईश का पता
रिश्तों के शिखर पे
माता व पिता ।

✍ऋतुराज दवे

104.
बच्चे हैं न्यारे
ममता के मूरत
जमी के तारे ।

✍डॉ. संतोष चौधरी

105.
नदी पठार
प्रकृति के आकार
धरा आधार ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

106.
ऊषा जो आई
रजनी ने समेटी
काली रजाई ।

✍ऋतुराज दवे

107.
बच्चे हमारे
नभ के जैसे तारे
ईश के प्यारे ।

✍नीरू मोहन

108.
हमसफ़र
जीवन के डगर
सुन्दर पल ।

✍नीलम शुक्ला

109.
पीला है पर्ण
रंगहीन जीवन
ढूँढता ठौर ।

✍रामेश्वर बंग

110.
ठंडी ही होती
रजनी की थाली में
पूनो की रोटी ।

✍ऋतुराज दवे

111.
सूरमेदानी
साँझ की अँखिया है
बड़ी सुहानी ।

✍शुचिता राठी

112.
कुर्सी के ठाठ
चुनावी ठेले पर
बंदर बाँट ।

✍इंदिरा किसलय

113.
निशा के खेत
जुगनू बने तारे
दौड़ते सारे ।

✍ऋतुराज दवे

114.
मन का मौन
बदलता जीवन
देता है पथ ।

✍रामेश्वर बंग

115.
आँसू न बहा
हिम्मत से काम ले
साहस दिखा ।

✍परमेश्वर अंचल

116.
रिश्तों की कली
स्नेह प्यार से खिले
फूल महके ।

✍रामेश्वर बंग

117.
ओस नहाई
दूब ने बटोर ली
शीत-कमाई ।

✍सुधा राठौर

118.
प्यासे पत्थर
बहते निर्झर से
पी रहे जल ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

119.
भानु लाड़ली
ओढ़े चुनरी लाली
भोर नवेली ।

✍पूर्णिमा सरोज

120.
छटा पहरा
हट गया कोहरा
सूरज दिखा ।

✍कपिल जैन

121.
किस दौड़ में
घिसते कलपुर्जे
मानव यंत्र ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

122.
सूर्य किरण
पृथ्वी पे यूँ दौड़ी ज्यों
स्वर्ण हिरण ।
       
✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

123.
चाँदनी  भोली
तारों  संग  खेलती
आँख  मिचौली  ।

✍बलजीत सिंह

124.
चाँद चूमता
धरती की चौखट
चाँदनी फैली ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

125.
जीवन रंग
सजीव हो चले हैं
प्रकृति संग ।

✍प्रकाश कांबले

126.
चहके खग
भोर हुई साथियों
चेतन जग ।

✍एन एस गोहिल

127.
गाती थी धुन
बाग से निकल के
चिड़िया गुम ।

128.
पत्तों की बातें
पंछियों के तराने
बाग में जाने ।

✍ऋतुराज दवे

129.
हिन्दू न मुल्ला
मानव बुलबुला
केवल हवा ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

130.
रश्मि गगरी
लुढ़की धरा पर
ज्योति बिखरी ।

✍कृष्णा श्रीवास्तव

131.
शीत लहर
ढा रही है कहर
बनी जहर ।

✍प्रबोध मिश्र 'हितैषी'

132.
है सतरंगी
कहे दिल की बात
मन गुलाब ।

✍रामेश्वर बंग

133.
शीत के शूल
निशा की गलियों में
उगा बबूल ।

✍सुधा राठौर

134.
साफ हृदय
तरू बरगद का
भगाये भय ।

✍एन एस गोहिल

135.
धरा है दंग
मौसम गिरगिट
बदले रंग ।

✍ऋतुराज दवे

136.
ठिठक गई
देहरी पे आकर
साँवली साँझ ।

✍सुधा राठौर

137.
चाँद ने खींचा
सर्दी से डर कर
ओस का पर्दा।

✍मनीष त्यागी

138.
श्रापित हुई
बनी शिला अहिल्या
जोहती स्पर्श ।

✍गंगा पांडेय "भावुक"

139.
गाँव की गोरी
अर्घ्य सुर्य तुलसी
ममता लोरी ।

✍एन एस गोहिल

140.
आत्मा अटकी
अधर में लटकी
मुक्ति जरूरी ।

✍विनय कुमार अवस्थी

141.
घना कोहरा
ठिठुरता बदन
माघी पहरा ।

✍भीष्मदेव होता

142 .
नूतन वर्ष 
जीवन में उत्कर्ष
कर संघर्ष ।

✍किरण मिश्रा

143.
कल्पित मन!
ठिठुरता बसेरा
कलपे जन ।

✍एन एस गोहिल

144.
नूतन वर्ष
खुशियाँ हों या हर्ष
जीव उत्कर्ष ।

✍कुमार आदेश चौधरी 'मौन'

145.
भोर का प्यार
किरण की थपकी
कली मुस्काई ।

✍ऋतुराज दवे

146.
दौड़ाते साथ
उम्र के पड़ाव पे
नूतन ख्वाब ।

✍ऋतुराज दवे

147.
कसमसाई
धूप है अलसाई
गुनगुनाई ।

✍शगुफ्ता यास्मीन काज़ी

148.
बिछड़ा वर्ष
यादों की झरोखा दे
शुभ विदाई ।

✍मनीभाई "नवरत्न"

149.
भेद अंधेरा
निकला है सूरज
नए वर्ष का ।

✍राजीव गोयल

150.
वर्ष नूतन
सूर्य रश्मियों संग
भर दे रंग ।

✍रामेश्वर बंग

151.
वर्ष नवल
पूरण हों सभी के
शुभ संकल्प ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

 ●●●●●●●●

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

देहरी पे सूरज (हाइकु मुक्तक संग्रह की समीक्षा)

  मन को सहज उद्वेलित करता हाइकु मुक्तक संग्रह "देहरी पे सूरज"

                                    कृतिकार : - देवेन्द्र नारायण दास   

प्रकाशक : पूजा ग्राफिक्स बसना       प्रकाशन वर्ष - नवम्बर 2017

पुस्तक मूल्य 100/------                                           68 पृष्ठ

___________________________________________________________________________________

समीक्षक : - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


     हाइकु मूलतः जापानी काव्य विधा है, जिसका शिल्प विधान भारतीय काव्य साहित्य में 05,07,05 वर्णक्रम के क्रम की त्रिपदी लघु काव्य के रुप में स्वीकार किया गया है । भारत में जापान की प्रसिद्ध साहित्यिक विधा हाइकु, ताँका, सेदोका, चोका, हाइबन व रेंगा में लेखन चलता आ रहा है । यह निरा सत्य है कि भारत में "हाइकु" 17 वर्ण की मुकम्मल एक संपूर्ण कविता का रूप है । जापान में इस पर किसी भी प्रकार का प्रयोग अब तक स्वीकार्य नहीं है, परंतु भारत में इस विधा का भारतीयकरण के प्रयास में इसे एक छंद रुप में भी स्वीकार कर कई प्रयोग किये जा चुके हैं व किये जा रहे हैं । हाइकु विधा पर इन प्रयोगों की प्रारंभिक कड़ी में आ. नलिनीकांत जी, डाॅ. सुधा गुप्ता जी, डाॅ. मिथिलेश दीक्षित जी, शैल जी, आ. रामनारायण पटेल जी का नाम अग्रिम पंक्ति में है । प्रयोग अच्छी बात है, परंतु ध्यान की आवश्यकता है कि इन प्रयोगों से हाइकु की आत्मा पर किसी प्रकार का कुठाराघात न हो ।

        हाइकु विधा में प्रयोग के दौरान इस पर कविता, गीत, गजल, रुबाई आदि पर  संप्रेषणीयता के साथ लेखन किये जा रहे हैं, इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ हाइकुकार देवेन्द्रनारायण दास जी का 68 पृष्ठीय हाइकु मुक्तक संग्रह "देहरी पे सूरज" का प्रकाशन निश्चय ही हाइकुकारों में सुखद अनुभूति का संचार करता है । पूजा ग्राफिक्स बसना द्वारा  पुस्तक की बेहतरीन छपाई एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ मन मोह रहा है । संग्रह में रचनाकार द्वारा बड़ी तल्लीनता से रचे गये 136 उत्कृष्ट हाइकु मुक्तक सन्निहित हैं । संग्रह को हाइकु जगत की विदूषी वयोवृद्ध हाइकु कवयित्री आ. सुधा दीदी का आशीष प्राप्त होना भी संग्रह के सौभाग्य का विषय है । सत्साहित्य की साधना में लीन, संघर्षशील रचनाकार आदरणीय देवेन्द्रनारायण दास जी के श्रम की मुक्तक रचनाएँ अपूर्व शांति पहुँचाते हुए पाठक के मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ती हैं ।

        संग्रह में बहुत से मुक्तक बेहद प्रभावी बन पड़े हैं, जो मन को सहज उद्वेलित कर रहे हैं । 

मुक्तक की एक बानगी देखें ------

   जलती रही/सुधियों की कंदील/तुम न आये ।

   सितारों वाली/रात ढलती रही/तुम न आये ।

   सावनी रात/सुलगती रहती/प्राण की बाती ।

   याद आती है/तुम्हारी प्यारी बातें/तुम न आये ।।

        (पृ.क्र. 02, मुक्तक क्र. 03)

      संग्रह की मुक्तक रचनाओं में रचनाकार के वैयक्तिक भाव से ले कर सामाजिक व राष्ट्रप्रेम की भावनाओं के साथ साथ रचनाकार की अंतः पीड़ाएँ, उनके सिसकते हुए मन की दशा, उनके अंतः मन की आवाज, उनकी लेखकीय तन्मयता, प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर मानवीकरण, नित नवीनता का समर्थन, ईश्वरीय सौदर्य तथा ईश्वर के प्रति उनकी गहरी आस्था, कहीं आशा तो कहीं निराशा,  समाज को मानवता के संदेश, दिलों में प्रेम संचार, स्मृतियों की महक के प्रसार, मौसम के मनमोहक अनुबंधों के साथ मादक छंदों के सृजन, शब्द ब्रह्म के प्रति कवि की निष्ठा प्रदर्शन, आदि-आदि रचनाकार के मुखरित स्वर संग्रह को जीवट प्रदान करने हेतु पूर्ण सक्षम हैं ।

       निष्कर्षतः सार रुप में कहना चाहूंगा कि "देहरी पे सूरज" आदरणीय देवेन्द्रनारायण जी द्वारा रचित उत्कृष्ट मानसिक व प्राकृतिक बिम्बों की भरपूर रचनाओं का महत्वपूर्ण संग्रह है । हाइकु मुक्तक के इस सफल संग्रहण के रचनाकार परम आदरणीय देवेन्द्रनारायण दास जी को उनके इस उत्कृष्ट व अनुपम संग्रह के प्रकाशन की ढेर सारी शुभकामनाएँ व बधाई देते हुए पाठक वर्ग से अपने ज्ञान की वृद्धि हेतु इस पुस्तक को अवश्य पढ़ने की अपील करता हूँ ।

   प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

  साहित्य प्रसार केन्द्र साँकरा,

   जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

  पिन - 496554

   pkdash399@gmail.com

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

हाइकु मुक्तक

  ~ हाइकु मुक्तक ~


जग कल्याण / प्रभु अवतरित / आप श्रीराम ।

स्तब्ध चेतना / देख यह  आपका / न्याय प्रमाण ।

वियोग कष्ट / झेलती रही नारी / हुई विवश ,

मात के संग / चल पड़ी बिटिया / धाम प्रयाण  ।। 01 ।।

●●●●●●●●

परीक्षा नाम / नारी का अपमान / मर्यादा राम ।

देश-समाज / भटका देख कर / आपका काम ।

धरा की गोद / समाती रहीं सीता / देती परीक्षा ,

मनु उत्तम / पर धिक् दे न सके / नारी को मान ।। 2 ।।

   ✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

https://hindi.sahitapedia.com/हाइकु-मुक्तक-92930#

 

 

धन के नाते / बदल गये रिश्ते / अब राखी के ।

नहीं ठिकाने / बदले मौसम में / वनपाखी के ।

अपने पैरों / अब तक चलना / सीखें वे कैसे,

जिधर गये / पर साथ रहे हैं / वे वैसाखी के ।।

  ●●●●●●●●

"चलायें हम / इसी मझधार में / टूटा सफ़ीना ।

सहम कर / पत्थरों के जिस्म से / छूटे पसीना ।

कहाँ हमको / डिगा सकते हैं ये / तूफ़ान-आँधी,

अगर दिल / साफ है तो हैं यहीं / काशी-मदीना ।।"  

   ✍डाॅ. मिथिलेश दीक्षित

 

 

साल ये नया / हरारत भरी  है / हेमंती हवा ।

बदल रहे / सूरज के तेवर / दहकी  हवा ।

गर्म लिबास / मांग रहे बिदाई / छूटी रजाई ,

कोहरा छँटा / मुखरित भास्कर / खुल के हँसा ।।

    ●●●●●●●●

दरख़्त तले/मुँह छिपाने लगे/पेड़ों के साये

क्लान्त पखेरू/अपने ही परों में/सिमट आए

ढलती साँझ/लौट चला पथिक/थके पगों से,

डूबने चला/क्षितिज में सूरज/शीश झुकाए ।।

   ✍सुधा राठौर

 

 

तन्हा ये  मन / गाए गुनगुनाए / यादों के गीत ।

मिले -बिछड़े / जीवन की  राहों में / कितने मीत ॥

तुम यूँ  मिले /नयनों  से हो दूर / मन के पास,

थामना हाथ / समय की आँधी में / निभाना प्रीत ॥

●●●●●●●●●

कही भी जाऊँ / परछाई चलती / तेरी यादों की ।

मन में घुली / मीठी सी ये मिसरी /  तेरी वादों की ।

मुस्कुरा उठी / मद्धिम  -सी रोशनी / सूरज बनी,

छोड़ना न साथ / है यही फ़रियाद / फ़रियादों की ।। 

✍कमला निखुर्पा 

 

 

 सँभले जब / पता चला हमको / क्यों टूटा मन ।

झूठे चेहरे/ पास खड़े थे जान / गया दर्पन ॥

हम अकेले/ नदी किनारे  संग / रोती लहरें,

कितनी व्यथा !/ चीरती धारा जाने/ सान्ध्य- गगन ।।

●●●●●●●●

ढूँढ़ा हमने / सपनों तक में भी / खोज न पाए ।

तुम तो सदा / हमारे थे फिर क्यों / हुए पराये ।

जान तो लेते /हम किस हाल में / जीते -मरते,

सब सन्देसे / खो गए गगन में/ हाथ न आए ॥     

    ✍रामेश्वर कांबोज "हिमांशु"

 

 बर्षा की बूँदें  /महकाएँ   सभी के  / ये अंतर्मन

यही बूँदें तो /है किसान के लिए /उसका  धन

धरा हो तृप्त /हर्षाए ,भर जाए /घर का कोना ,

नये वस्त्र से /सज जाएँगे अब /सभी  के तन।

    ●●●●●●●●

बरसे नैना /सावन  में प्रतीक्षा  / करे बहना

कब आएँगे/ भैया ,राह तके वो  / दिवस- रैना

बिन गलती / परदेस में  भेजा / काहे बाबुल ,

भैया मिलन  /नैना तरसे अब   /दुःख  सहना ।

                                         ✍रचना श्रीवास्तव

 

महँगी रोटी/ भूख न छोड़े जिद/ रोता निर्धन।

दवा न दारू/ अकुलाती खटिया/ टूटा है तन।

जूझे इज्जत/ पैबंद बहकते/ गिद्ध निगाहें,

भारी अंबर/ मन झोंपड़पट्टी/ आँखें सावन॥

         ●●●●●●●●

प्यासी तितली/ रंग बाग के गुम/ कैसा बसंत।

रूठी बिंदिया/ परदेस बुरा है/ आये न कंत।

फूल चिढ़ाते/ खोई सी विरहन/ बैरी बहार,

एकाकीपन/ दंड बने जीवन/ पीड़ा अनंत॥

                                     ✍कुमार गौरव अजीतेन्दु

 

   जलती रही / सुधियों की कंदील / तुम न आये ।

   सितारों वाली / रात ढलती रही / तुम न आये ।

   सावनी रात / सुलगती रहती / प्राण की बाती ।

   याद आती है / तुम्हारी प्यारी बातें / तुम न आये ।।


   फूल खिलेंगे / सुरभि बिखरेगी / मेरे गीतों की ।

   हियरा डोले / मीठा सा रस घोले / मेरे गीतों की ।

   होगे प्रभात / सुनहरी किरणें / आयेंगी धरा ,

   मन के बोल / हर अधरों पर / मेरे गीत की ।।

                                         ✍देवेन्द्र नारायण दास

 

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

मधु कृति (हाइकु संग्रह की समीक्षा)

मधु कृति (हाइकु संग्रह)               हाइकु कवयित्री - श्रीमती मधु सिंघी

    प्रकाशक : सृजन बिंब प्रकाशन                                                        प्रकाशन  वर्ष 2017

         पृष्ठ - 88                                                                                                             मूल्य ₹150

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             हाइकु जगत में मधु जी का एक खास पेशकश हाइकु काव्य" मधु कृति"


                                      समीक्षक :  -प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


     हाइकु जगत में लेखिका मधु सिंघी जी एवं सृजन बिंब नागपुर द्वारा एक खास पेशकश के रूप में हाइकु संग्रह "मधु कृति" एक अनोखी हाइकु कृति है । मधु जी के हाइकुओं से मैं पूर्व परिचित हूँ वे बड़ी तल्लीनता से हाइकु रचती हैं एवं हाइकु विधा के प्रति उनका लगाव अनुकरणीय है । मधु जी के कई हाइकु मेरे द्वारा संपादित ऐतिहासिक हाइकु ग्रंथ "हाइकु मंजूषा" व "झाँकता चाँद" में संग्रहित है । इनके कई तांके "तांका की महक" मैं प्रकाशित हैं । मेरे द्वारा संपादित विश्व का प्रथम रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश" के रेंगा लेखन में भी वे सहभागी रही हैं इस प्रकार वे हाइकु विधा में एक सक्रिय हाइकु कवयित्री के रूप में अपनी सहभागिता प्रस्तुत कर रही हैं।
    मराठी हाइकु के क्षेत्र में जहाँ पूणे प्रसिद्ध है वहीं इसी प्रांत के नागपुर क्षेत्र की धरा हिंदी हाइकु सृजन के लिए बेहद उर्वरक साबित हुई है। नागपुर में मुख्य रुप से इस मुहिम को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय अविनाश बागड़े जी के प्रोत्साहन के फलस्वरुप कई हाइकुकार हिंदी हाइकु रचना की सही दिशा में संलग्न हैं । इस क्षेत्र के हाइकुकारों का आत्मीय सहयोग मेरे ऐतिहासिक कार्यों में मुझे निरंतर प्राप्त हो रहा है, जो मेरे लिए एक बड़े ही सौभाग्य का विषय रहा है ।
         नागपुर से मधु जी का हिंदी हाइकु संग्रह "मधु कृति" का प्रकाशन मन में अपूर्व आनंद व उत्साह का संचार करता है । मैंने पुस्तक की प्रति आद्योपांत पढ़ी। पुस्तक में कई उत्कृष्ट हाइकु संग्रहित हुए हैं। पुस्तक की साज-सज्जा के साथ स्पष्ट छपाई एवं आकर्षक आवरण पृष्ठ मन को सहज मोह रहे हैं । 88 पृष्ठों में 528 हाइकु एवं 16 रंगीन पृष्ठों में 40 हाइगा का समावेश है। कुल 104 पृष्ठों की पुस्तक "मधु कृति" में बड़े सुंदर और प्रभावी हाइकुओं एवं हाइगाओं का समावेश है। पुस्तक में बेहद उम्दा चित्रों के प्रयोग हैं जो स्वयं कवयित्री द्वारा प्रवास के दौरान खींच कर प्रस्तुत किए गए हैं । हाइकु विधा से मधु जी का खास लगाव एवं उनकी तन्मयता उनके हाइकुओं में देखते ही बनती है। "मधु कृति" में संग्रहित कुछ उत्कृष्ट हाइकु को देखें एवं रसास्वादन करें---

संग्रह के प्रथम हाइकु से ही  उत्साह का संचार हो उठता है -

     हुई सुबह /मुट्ठी में भर लेंगे /नया आकाश । ( पृष्ठ  09 )

अन्य हाइकु जो मुझे बेहद प्रभावित किए -
     उषा किरण /होता नव सृजन/ मन प्रसन्न । (पृष्ठ 09 )
     मुझमें बेटी /सदा प्रतिबिंबित /छवि इंगित ।(पृष्ठ 12)
     तपती धूप/ वृक्ष की घनी छाँव /देती ठंडक ।( पृष्ठ 17 )
     सजाई अर्थी /राग ,द्वेष व दंभ/ सधा जीवन । (पृष्ठ 19)
     प्रीत के रंग /अपनों का हो संग/मन मृदंग। (पृष्ठ 23)
     सबकी सुन /खुद ही सहेजना/ मन की धुन। (पृष्ठ 23)
     खुला आकाश /अनंत संभावना/ देता विश्वास। (पृष्ठ 26)
     भोर जो मिली /फिर खिली है कली/ ये मनचली। (पृष्ठ 28)
     द्वारे है रवि /नए कर्मों का मेला/ सुंदर छवि। (पृष्ठ 32)
     भोर रुपसी/केशरिया दुपट्टा/ओढ़ के हँसी । (पृष्ठ 32)
     बहता नीर /जब-जब आंखों से /कहता पीर । (पृष्ठ 37)
     भोर के संग /नव चैतन्य ऊर्जा /भरते रंग। (पृष्ठ 38 )
     ताल दे मेघ /बिजली करे नृत्य/ सावनी गीत। (पृष्ठ 46)
     मन की डोर /कल्पना की पतंग /ऊंची उड़ान ।(पृष्ठ 47)
     नारी व डाली /सिखाती है नम्रता/ भार सहती। (पृष्ठ 49)
     मां की ममता /होती है अनमोल /सबसे जुदा ।(पृष्ठ 55)
     रवि कमाल/घर घर जाकर /पूछता हाल। (पृष्ठ 57)
     देती हौसला/ ऊँची अट्टालिकायें /छू लो आकाश। (रंगीन पृष्ठ हाइगा)
     गुरु अनूप /कोई नहीं तुमसा /ईश स्वरूप। (पृष्ठ 68)
     आंखों से बही/अविरल सी धारा /मां याद आई। (पृष्ठ 77)
     बोल रहे हैं /सजे-धजे मकान /व्यक्ति पाषाण । (पृष्ठ 79)
     लहू का रंग/ समझाये एकता /सब समान । ( पृष्ठ 88)

     इस प्रकार विविध विषयों में रचे गए मधु जी के इन हाइकुओं में प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण ,प्रकृति के विभिन्न उपादानों का सजीव चित्रण , प्रकृति के प्रति सहज सम्मोहन, उत्कृष्ट बिंबों का प्रदर्शन ,खुले आकाश में अनंत संभावनाओं की तलाश ,मेघों की ताल से बिजली का नर्तन, मन की डोर से कल्पना की पतंग की ऊँची उड़ान, सामाजिक भाव प्रसंगों के हाइकुओं में व्यक्ति के खोखलेपन, धार्मिक विद्वेष आदि आदि को समेटते हुए उत्कृष्ट हाइकु मन को सहज प्रभावित वह सम्मोहित करते हैं। "मधु कृति" के हाइकु शैल्पिक विधान पर खरे उतरते हुए कवियत्री के मन की सहजता पाठक के मन को मोहने में बेहद सक्षम है। अस्तु पाठक वर्ग से अपील करता हूं कि इस कृति का अवलोकन कर हाइकु कवयित्री मधु जी को अपने विचार प्रदान करें।
     हाइकु जगत में मधु जी द्वारा रचित उनकी यह प्रथम हाइकु कृति "मधुकृति"का मैं जोरदार स्वागत करता हूँ, एवं हाइकु कवयित्री मधु जी से मैं आगे उम्मीद भी रखता हूँ कि इसी तरह हाइकु जगत की सेवा करते हुए अपनी उत्कृष्ट कृतियों को हमारे सामने प्रस्तुत करते रहें । इन्हीं अशेष शुभकामनाओं के साथ हाइकु कवयित्री आदरणीय मधु सिंघी जी को मैं अपने अंतर हृदय से बधाई ज्ञापित करता हूँ ।

     -प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

     साहित्य प्रसार केंद्र साँकरा
       जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
        पिन-496554
         मोबाइल नंबर 7828104111
           pkdash399@gmail.com

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

हाइकु मञ्जूषा (नवम्बर माह के चयनित हाइकु)

हाइकु मञ्जूषा

नवम्बर - 2017 के चयनित हाइकु

{श्रेष्ठ हिन्दी हाइकु संचयन}

संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


( "हाइकु मञ्जूषा", "हाइकु - ताँका प्रवाह", "हाइकु मंच छत्तीसगढ़" एवं "हाइकु की सुगंध" समूह से साभार )

01.
बुने रश्मियाँ
सूर्य लला के लिये
पीताभ वस्त्र ।

✍सुधा राठौर

02.
भोर झंकृत
प्रकृति अलंकृत
झरे अमृत ।
     
✍पूर्णिमा सरोज

03.
गाँव की नाक
लोभ ने काट दिया
आम का बाग ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

04.
गजब नूर
सुबह की मांग में
सजा सिंदूर ।

✍सुधा राठौर

05.
नहीं परायी
आंगन की तुलसी
सदा हूँ  साक्षी ।।

✍उपेन्द्र प्रसाद मेहेर

06.
विष्णु की प्रिया
शालिग्राम से ब्याही
तुलसी वृंदा ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

07.
शाल के वृक्ष
चिडियों की चहक
गूंजते वन ।

✍क्रान्ति

08.
जेठ की परी
तपती दोपहरी
दुःखी बेचारी ।

✍वासुदेव साव

09.
शहीद पिया
एकादशी त्यौहार
बिलखे दिया ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

10.
प्रेम का रस
सुमधुर सुखद
सुधा सरस ।

✍सविता बरई

11.
आश्रम चार
मनु हों शत आयु
शुद्ध आचार ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

12.
कार्तिक मास
बढ़े शीत  आभास
तुलसी  खास ।

✍प्रबोध मिश्र 'हितैषी'

13.
कपास पुष्प
फैल रहे नभ में
शरद मेघ ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

14.
हवा है मौन
पत्तों की फुनगी पे
बैठा ये कौन ।

✍सुधा राठौर

15.
प्रतीक्षारत
बुढ़ाया बरगद
सूनी चौपाल

✍शशि त्यागी

16.
तुलसी दल
हरे शरीर व्याधि
अमृत तुल्य ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

17.
पूस की रात
खिसकी खपरैल
फूस न पास ।

✍मनीष त्यागी

18.
लिख रही हैं
सूरज की किरणें
दिन की चिट्ठी ।

✍सुधा राठौर

19.
बजा न ढोल
सोच समझ कर
प्रेम से बोल ।

✍परमेश्वर अंचल

20.
देश की मिट्टी
जैसे सौंधी महकी
अम्माँ की लिट्टी ।

✍सुधा राठौर

21.
जगमगाता
अँधेरे उजालों का
बेनाम रिश्ता

✍मीनाक्षी भटनागर

22.
धरा को ताके
साँझ की चुनरी से
सूरज झाँके ।

✍ऋतुराज दवे

23.
धूप में छाया
खुशियों का खजाना
माता का साया ।

✍सविता बरई

24.
उठी ऊंगली
फितरत हमारी
यह बीमारी ।

✍अविनाश बागड़े

25.
दीवार पार
भाई का परिवार
इधर हम ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

26.
ईमान भरा
ऑफिस में खो गया
बॉस अकेला ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

27.
नन्हें-से तारे
चाँदनी की गोद में
किलकें सारे

✍सुधा राठौर

28.
थोथी निकली
स्वच्छता की मुहिम
मन की गली ।

✍अभिषेक जैन

29.
निकल भागी
पत्तों से निकल के
पीपल छाँव ।

✍सुधा राठौर

30.
पूर्वी ललाभ
प्रात प्रदीप्त हुई
आशा महकी ।

✍राजेश पाण्डेय

31.
तितली उड़ी
फूल-फूल पे बैठी
बिखरी ख़ुशी ।

✍अविनाश बागड़े

32.
रजनी में भी
रातरानी की खुश्बू
सोने न देती ।

✍निर्मला हाण्डे

33.
सिहरन सी
ओढ़ा है माँ का शाल
एक सुकून ।

✍रति चौबे

34.
हर्ष -विषाद
अनुभूति के द्वार
मन आधार ।

✍सुधा राठौर

35 .
वक्त के जाल
उम्र काँटे में फंसी
जैसे मछली ।

✍ऋतुराज दवे

36.
जलता चूल्हा
गगनचुंबी धुआं
भूखा टाबर ।

✍भुपिंदर कौर

37.
आग जो लगी
पता नही क्या हुआ
छा गया धुँआ ।

✍जाविद अली

38.
दो जून रोटी
छाई ख़ुशी अनूठी
निर्धन कोठी ।

✍नीलम शुक्ला

39.
बेटी व ख़ुशी
नाज़ो से है मिलती
सदा फलती ।

✍शुचिता राठी

40.
तितली हँसी
फूलों के अधरों पे
रख दी खुशी ।

✍सुधा राठौर

41.
अजान शुरू
मंदिर की घंटियां
बजाते गुरु ।

✍सुशील शर्मा

42.
उजली रात
चाँद मुस्कुराता है
बुलाता पास ।

✍जगत नरेश

43.
देखे चेहरे
घाव अति गहरे
कब थे हँसे ?

विनय कुमार अवस्थी

44.
संस्कृति साख
चल अमल कर
कर साकार ।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

45.
नाव की धारा
है दिशा विपरित
यात्रा मंगल ।

✍सुमिधा सिदार

46.
आज की बेला
आदमी है अकेला
स्वार्थ का खेला ।

✍धनीराम नंद

47.
क्षिति जननी
क्षितिज है जनक
मित्र दरख्त ।

✍सविता बरई

48.
रात जागती
करवट बदलें
नैन उनींदे ।

✍डाॅ. रंजना वर्मा

49.
जगत हुआ
ऊर्जा से भरपूर
सुहानी भोर ।
 
✍पूर्णिमा सरोज

50.
झरता रहे
मुख से मधु मीठा
मन किलके ।

✍रीमा दीवान चड्ढा

51.
मेरा संसार
संयुक्त परिवार
नेक विचार  ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

52.
दिल्ली में घर
कुंभीपाक की पीड़ा
भोगते नर ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

53.
सुंदर फूल
जीवन की बगिया
झरे खुशबू ।

✍रामेश्वर बंग

54.
सुलग रही
प्रदूषण की बीड़ी
धुआँ विषाक्त ।

✍सुधा राठौर

55.
मन्दिर न जा
खुद के 'भीतर' जा
तू 'भी तर' जा ।

✍राकेश गुप्ता

56.
जुल्फों की घटा
सावन याद आया
महकी फिज़ा ।

✍संतोष जी

57.
रश्मि चिड़िया
पेड़ की फुनगी पे
करे बसेरा ।

✍रंजना वर्मा

58.
भूखा बालक
माँ गई है करने
रेसिपी क्लास ।

✍अभिषेक जैन

59.
शब्द की चोट
रिश्तों की गरदन
देती है घोंट

✍सूर्य करण सोनी

60.
नवल ध्वज
प्रात पर लेकर
हम सहज ।

✍राजेश पाण्डेय

61.
पात चहके
उष्मा रवि पा खग
तृण चुनते ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

62.
सूर्य वंदन
नव्या नवेली ज्योति
धरा शोभित ।

✍सविता बरई

63.
सफर घड़ी
जीवन संघर्ष है
मेला की बेला ।

✍तेरस कैवर्त्य "आँसू"

64.
हवा बौराई
फिरती पगलाई
कहाँ चुनरी ।

✍सुधा राठौर

65.
कुरेद दिये
संतोष की चमड़ी
ईर्ष्या के नख ।

✍अभिषेक जैन

66.
कटारी नैन
लहराती अलकें
डसती चैन ।

✍किरण मिश्रा

66.
तिरछी  नोक
झालरदार  पत्ते
पेड़ अशोक  ।

✍बलजीत  सिंह

67.
वायु मलिन
फ़ेफ़ड़े गमगीन
व्याधि नवीन ।

✍संजीव नाईक

68.
भक्ति में खोना
ज्यों पारस का छूना
हुई मैं सोना ।

✍शुचिता राठी

69.
सुलझे गाँठ
बन जा मनमीत
दुनिया जीत ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

70.
मन के कच्चे
जब तक थे बच्चे
हम थे सच्चे ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

71.
मासूम बच्चे
खो गया बचपन
बोझों से लदे ।

✍अभिषेक जैन

72.
ज़िंदा है अभी
मेरे-तेरे भीतर
नन्हा सा बच्चा ।

✍सुधा राठौर

73.
अश्रु के मोल
दर्द की अनुभूति
यही भूगोल ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

74.
चाचा के ख़्वाब
टुकड़े-टुकड़े में
पीला गुलाब ।

✍विष्णु प्रिय पाठक।

75.
मोबाइल  से
खो गया बचपन
सूना आँगन  ।

✍अनिता मंदिलवार "सपना"

76.
थपकी देती
हथेलियाँ सख्त क्यों
पिता की गोद ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

77.
नोंच के फेंकी
बाल दिवस को ही
कोख से कली ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

78.
लालिमा कहे
सूर्योदय का भान
लगाओ ध्यान ।

✍पूर्णिमा सरोज

79.
अचल मेरु
एकता में पत्थर
खड़े अटूट ।

✍सुशील शर्मा

80.
मन की धरा
पानी बदले रंग
वक्त के संग ।

✍रामेश्वर बंग

81.
कुड़े में रोटी
गरीब का निवाला
भूख की मार ।

✍संजय कुमार

82.
हर्षित मन
पुलकित बदन
ख्वाब सदन ।

✍अविनाश बागड़े

83.
निःस्तब्ध वृक्ष
निर्निमेष निहारे
विहान-पथ ।

✍सुधा राठौर

84.
सर्द आहट
सिहरे तन मन
हँसा सूरज ।

✍हेमलता मिश्र

85.
विवाह स्थल
तलाकशुदा चाची
हल्दी ले खड़ी ।

✍अभिषेक जैन

86.
बुनता नभ
बादलों के कंबल
सर्द मौसम ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

87.
प्रभु के बंदे
प्रभु के नाम पे क्यों
करते दंगे ?

✍सूर्यनारायण गुप्त "सूर्य"

88.
धूल की गर्द
प्रकृति का विनाश
चेहरे जर्द ।

✍सुशील शर्मा

89.
वृद्ध आश्रम
वृद्धा के सिरहाने
बेटे की फोटो ।

✍अभिषेक जैन

90.
बर्फीले तीर
निर्धन की झोपड़ी
सहती पीर ।
       
✍सुधा राठौर

91.
नारी ह्रदय
पल्लवित पंकज
शुभ्र मलय ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

92.
चाँद बे-आब
रजनी की आँखों में
धुंधले ख़्वाब ।

✍सुधा राठौर

93.
निशा सुंदरी
ओढ़ काली चादर
खोजती चाँद ।

✍रति चौबे

94.
जल दर्पण
प्रतिबिंब देखूंगी
अंतरमन ।

✍स्नेहलता 'स्नेह'

95.
कुटिया कच्ची
थरथराती बच्ची
कहाँ रजाई ।

✍डाॅ. संजीव नाईक

96.
बहुत रोई
निज बच्चों खातिर
भूखी चिड़िया ।

✍डॉ. संतोष चौधरी

97.
शोणित दान
जीव रक्षा संकल्प
कर्म महान ।

✍स्नेहलता "स्नेह"

98.
सयानी बेटी
वैवाहिक चिंतन
खुशियाँ देती ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

99.
लाड़ न प्यार
पड़े आया की मार
बच्चा लाचार ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

100.
कण्टक पथ
राही चला अकेला
खिलाने फूल ।

✍रामेश्वर बंग

101.
ताड़ न बन
वक्त झोंके से लड़े
तृण का मूल ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

102.

103.
सर्दी की भोर
अलसाया सूरज
धुंध की ओट ।

✍ज्योतिर्मयी पंत

104.
साँझ की बेला
सूरज अलबेला
सिंदूरी आभा।

✍शगुफ्ता यास्मीन काज़ी

105.
चूल्हा जलाओ
भूखे सोये है बच्चे
रात बाकी है ।

✍देवेन्द्र नारायण दास

106.
विकास पथ
नदी बनी मैदान
कालोनी कटी ।

✍सुशील शर्मा

107.
खिला चेहरा
ज्यों सुनहरी धूप
बेटी का रूप ।

✍मधु गुप्ता

108.
बेटे की चाह
अफसोस खुद से
मिलती आह ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

109.
प्रयास पथ
देता है सफलता
चल सतत ।

✍सुधा राठौर

110.
विकास पथ
नदी बनी मैदान
कालोनी कटी ।

✍सुशील शर्मा

111.
खिला चेहरा
ज्यों सुनहरी धूप
बेटी का रूप ।

✍मधु गुप्ता

112.
बेटे की चाह
अफसोस खुद से
मिलती आह ।

✍तोषण कुमार चुरेन्द्र

113.
पेट की आग
भले कैसे बुझेगी
दमकल से ।

✍अभय सिंह सोलंकी "असि"

114.
चन्दु के पापा
लेने गये खिलौना
तारो के घर ।

✍विष्णु प्रिय पाठक।

115.
नारी सम्मान
जगत का उत्थान
मर्यादा जन्म ।

✍डॉ. राजीव पाण्डेय

116.
चिर यौवना
मधुमासी स्मृतियाँ
सजल नैना ।

✍पुष्पा सिंघी

117.
काँटो के पथ
खिले कर्म के फूल
झरे खुशबू ।

✍रामेश्वर बंग

118.
गाल पे आँसू
पेड़ से  जुदा एक
हरी टहनी ।

✍विष्णु प्रिय पाठक।

119.
जली लकड़ी
गिला सा मन लिए
धुआँ-धुआँ सा..

✍डाॅ. अनिता रानी

120.
फटी रजाई
छेदों भरा कम्बल
ठंड बैरन ।

✍डॉ. रंजना वर्मा

121.
मौन था बाँस
देह मिली बाँसुरी
सुने समाज ।

✍डाॅ. अनिता रानी

122.
बहती नदी
जल भरी अंजुरी
प्यास बुझाई ।

✍अविनाश बागड़े

123.
भाव अलाव
बदलता जीवन
नव विचार ।

✍रामेश्वर बंग

124.
जगत कुआँ
जीवन छोटी डोर
रीती गागर ।

✍अंशुविनोद गुप्ता

125.
मन के नभ
अंतर्मन के शून्य
दिव्य आलोक ।

✍रामेश्वर बंग

126.
श्रम का स्वेद
माथे पर झलके
ओस मानिंद ।

✍सुशील शर्मा

127.
पकती रोटी
फैलती खूशबू से,
लगती भूख ।

✍पूनम मिश्रा

128.
दादा की साँस
बारह पे काँपती
घड़ी की सुई ।

✍विष्णु प्रिय पाठक

129.
सेवानिवृत्त
साँझ के ढलते ही
लौटा सूरज ।

✍सुधा राठौर

130.
झरते पात
नई सम्भावनाएं
देखते पेड़ ।

✍अविनाश बागड़े

131.
सूरज चला
लड़ा अंधकार से
लाया सवेरा ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

132.
नाप रही है
नीलाकाश का छोर
नन्हीं चिड़िया ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

133.
मनभावन
पल पल दिन का
हर तिनका ।

✍अविनाश बागड़े

134.
मन नयन
करें आत्म दर्शन
ईश स्मरण ।

✍डाॅ. संतोष चौधरी

135.
वक्त के साथ
अक्सर मिट जाते
घाव गहरे ।

✍डॉ. मीता अग्रवाल

136.
प्रसव पीड़ा
जग में आता शिशु
जन्म लेती माँ ।

✍अविनाश बागड़े

137.
पुत्र रतन
बिन माँ का जीवन
बिच्छु सा दंश ।

✍सूर्य करण सोनी

138.
सूखता कुआं
अत्यधिक दोहन
टूटा दर्पण ।

✍गंगा पाण्डेय "भावुक"

139.
पंछी के गान
सुनते नहीं कान
कोठी में धान ।

✍प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

140.
ऋतु शिशिर
पाखी गुनगुनाए
प्राची के तीर ।

✍सुधा राठौर

141.
रवि सफर
सिकुड़ रहे साये    
झाँकता चाँद ।

✍मंजु शर्मा


142.
बूँदें ओस की
लागे जोगी समान
तप में लीन ।

✍भुपेन्द्र कौर

143.
छोटा सा सच
पल भर में काटे
झूठ के पर ।

✍रामेश्वर बंग

144.
शीत का गान
बुझी हुई अँगीठी
रोता किसान ।

✍सुधा राठौर

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शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

बाशो जी का प्रसिद्ध हाइकु

 

प्रसिद्ध जापानी हाइकुकार बाशो जी का प्रसिद्ध हाइकु :

[ जापानी, हिन्दी, छत्तीसगढ़ी,  ओड़िया, कोशली, अंग्रेजी, राजस्थानी, गोडवाड़ी, मारवाड़ी, मराठी, कन्नड़, मागधी, भोजपुरी, मैथली, पंजाबी, डोगरी, मालवी, अंगिका, एवं बांग्ला आस्वादन ]

The best-known Japanese haiku is Bashō's "old pond":




古池や蛙飛び込む水の音

ふるいけやかわずとびこむみずのおと
 ( transliterated into hiragana )

furu ike ya kawazu tobikomu mizu no oto
 (transliterated into rōmaji )

Japanese :

古池や
蛙飛び込む
水の音

furu ike ya
kawazu tobikomu
mizu no oto

This separates into on as:

fu-ru-i-ke ya (5)
ka-wa-zu to-bi-ko-mu (7)
mi-zu-no-o-to (5)

देवनागरी लिप्यंतरण :

फुरु इके या
कावाजु तोबिकोमु
मिजु नो ओतो  ।

हिन्दी  अनुवाद :

पुराना ताल
कूद गया मेंढक
छपाक छप ।

 अनुवादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

छत्तीसगढी अनुवाद :

जून्ना तरई
कूद देव मेंचका
छप्प अवाज ।

अनुवादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

ओड़िया अनुवाद :

पुरुणा बन्ध
बेंग गला दउड़ि
छपाक्'र स्वर ।

ପୁରୁଣା ବନ୍ଧ
ବେଙ୍ଗ ଗଲା ଦଉଡ଼ି 
ଛପାକ୍'ର ସ୍ୱର ।

- ପ୍ରଦୀପ କୁମାର ଦାଶ "ଦୀପକ"

କୋଶଳୀ ଅନୁବାଦ -

ଜୁହ୍ନା ଗୁଟେ ବଂଧ୍ 
ବେଂଗ୍'ଟା ଜାଏସି ନର୍'ଧି
ଛପାକ୍ ଛପ୍ ଆବାଜ୍ ।

- ମନୀଷା ମିଶ୍ର

Translated in eng.

Old pond
frog leaps in
water's sound .

□ Pradeep Ku. Dash

राजस्थानी अनुवाद :

जूनो जोहड़
टरड़ू कूद गयो
फदाक फद ।

Govind Singh Gehlot

राजस्थान की गोडवाड़ी बोली : ----

जूनू तराव
उलरियू भाड़कु
सपाक सप ।

मधु सिंघी

जोधपुरी मारवाड़ी बोली

जूनो तळाव
गंटो बीड़े मेंडको
धड़ाम धड़ ।

मधु सिंघी

मराठी अनुवाद

जुना तलाव
फुदकतो बेडुक
छपाक छक. ।

 - प्रकाश कांबले

मराठी अनुवाद

जुनं तलाव
उडी मारे बेडूक
छप्पाक छप

- सुधा राठौर

कन्नड़ अनुवाद...

ಹಳೆಯ ಕೊಳ -(5)
ಒಂದು ಕಪ್ಪೆ ಜಿಗಿದ -(7)
ಚಾಪ್ ಚಪ್ಪಕ್ -(5)

Haḷeya koḷa-पुराना तालाब
ondu kappe jigida-एक मेढक कूदा
cāp cappak- चोप चप्पक

- ऋता शेखर 'मधु'

बिहार की मागधी में अनुवाद

पुरान पोख्रा
कूद गेलई बेंग
छप्पक छप

- ऋता शेखर 'मधु'

भोजपुरी में अनुवाद

पुर् आन ताल
कुदळअस ढ़ाबुस
छप्पे छप्पाके ।

– विभा रानी श्रीवास्तव

 मैथली में अनुवाद

पुराणक ताल
कुदलैक जे बेंग
छप्पकाक छै।

– विभा रानी श्रीवास्तव


पंजाबी में अनुवाद

ਪਰਾਣਾ ਛੱਪੜ
ਡੱਡੂ ਦੀ ਟਪੂਸੀ
ਪਾਣੀ ਦੀ ਛਪਾਕ।

 पराणा छप्पड़
डड्डू दी टपूसी
पाणी दी छपाक।

- भुपिंदर कौर

डोगरी में अनुवाद- 

पराना तला
कुद्दी गेआ ऐ डिड्डूं
छपाक छप्प ।

- यशपाल निर्मल

मालवी  में अनुवाद -

जुनो तलाव
कुदी गयो डेडको
फट देनी से ।

- संजय डागा

अंगिका में अनुवाद -

बेंग कूदलै
पुराना पोखर में
छपाक सनी ।

- अजय चरणम्

वांग्ला में अनुवाद

पुरोनो पुकुर
ब्यांगेर लाफ
जलेर शब्द ।

- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
    
    यह जापानी हाइकु भारतीय हाइकु जगत में भी काफी चर्चित है ।


□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

haikumanjusha.blogspot.in

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

短歌 : ताँका

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

                                                        चौदह ताँका चाँद पर


01.
शरद रात
मध्य रात्रि का चाँद
हो पुलकित
दे गया पूनो को वो
पीयूष की सौगात ।
---0---

02.
रात पूनम
शरद की चाँदनी
धरा पे बिछी
कोर स्नेह गगन
आज चाँद मगन ।
---0---

03.
शरद रात
आज पूनो का चाँद
प्रेम पीयूष
खूब बरसायेगा
लिए कोमल याद ।
---0---

04.
कुनमुनाता
चल पड़ा अकेला
चाँद तनहा
झील की पगडण्डी
मुस्करा रही आज ।
---0---

05.
नभ हैरान
चहुँ ओर बादल
घने हैं छाये
पर दिखता नहीं
आज उसका चाँद ।
---0---

06.
सिसका चाँद
टपक पड़े अश्रु
दूबके ओस
मोतियाँ सुना रहीं
नेह पीर वृतांत ।
---0---

07.
नेह गगन
पीयूष बरसाने
चाँद मगन
सीपी को मिली मोती
जीवन हुआ धन्य ।
---0---

08.
सिसक पड़ी
दूबों पर चाँदनी
चमक उठी
चाँद रोया रात को
भोर ओस पी गयी ।
---0---

09.
पूनो की रात
नभ से लाया चन्द्र
सुधा सौगात
चन्द्रिका सुना रही
प्रियतम की बात ।
---0---

10.
चाँद से प्रीत
गुनगुनाती रही
चाँदनी गीत
मिलन की थी खुशी
ओस थाम ली पत्ती ।
---0---

11.
विहँसा चाँद
खिल गयी चाँदनी
महकी रात
चमकाने में लगी
काला चेहरा आज ।
---0---

12.
चाँद पे बैठी
चरखा चला रही
बुढ़िया दादी
बहु की लोरियों में
मीठी नींद बुनती ।


13.
चाँद व तारे
घूमें मौज मनाएँ
परी के वेश
गीत गाएँ खुशी से
झूमें झील प्रदेश ।
---0---

14.
चाँद जो रोया
टप. टपका अश्रु
नभ से ओस
पत्तियों ने ली थाम
कोहरा मुस्कराया ।
---0---

                                  - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

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