हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)
卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐
बुधवार, 9 दिसंबर 2020
बुधवार, 28 अक्टूबर 2020
~ हाइकु कवयित्री उषा चतुर्वेदी जी के हाइकु ~
हाइकु कवयित्री
उषा चतुर्वेदी
हाइकु
-0-
गुलाबी सर्दी
सूरज सुहावन
हिया मुदित ।
--0--
रवि उदय
चहुँ ओर लालिमा
ताप सुहाना ।
--0--
मग निहारे
कजरारे नयन
प्रेम दीवानी ।
--0--
यमुना कूल
कदम्ब तरुवर
खिले प्रसून ।
--0--
मही हरित
फसल लहरायी
कृषक खुश ।
--0--
नभ गरजा
कृषक अकुलाया
तृप्त वसुधा ।
--0--
गीली लकड़ी
सुलगी धुँआ देती
रुलाती भी है ।
--0--
चमका रवि
हँसे सूरजमुखी
हुलसा माली ।
--0--
रवि रिसाय
तपती वसुधा
राही विकल ।
--0--
चंचल मन
चिन्तातुर रहता
हिया बेचैन ।
--00--
उषा चतुर्वेदी
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020
~ हाइकुकार भैरव प्रसाद जी के हाइकु ~
हाइकुकार
भैरव प्रसाद
हाइकु
डूबता देश
बगुलों ने बदला
अपना वेश !
--0--
नन्हा सा द्वीप
तैर रहा कछुआ
मन के बीच !
--0--
मन के बिल
शक का छछूंदर
फंसा अंदर !
--0--
प्यासा पीपल
झाँकता कूप-जल
पपीहा वन !
--0--
प्रेम सुगंध
उड़ गयी तितली
इंद्रधनुष !
--0--
टूटी टहनी
कुछ टूटा भीतर
तुम क्या जानो ?
--0--
मुँह मरोड़
बैठी है पिछवाड़े
खिन्न खटिया !
--0--
गेहूँ गरीब
पक रहीं रोटियां
तपती धूप !
--0--
गेहूँ फकीर
फटी छाती लेटा है
मंडी की भीड़ !
--0--
जरा सी बात
लाल हो गई, री
मूरख मिर्ची !
--00--
□ भैरव प्रसाद
रविवार, 20 सितंबर 2020
~ हाइकुकार स्व. राधेश्याम जी के हाइकु ~
हाइकुकार
स्व. राधेश्याम जी
(जन्म - 14 जनवरी 1922)
(देहावसान - 18 अप्रैल 2015)
स्व. राधेश्याम जी के हाइकु
हाइकु
--0--
धरा का ताप
देख न सके मेघ
रोना आ गया ।
--0--
खोल नयन
जो देखा दरपन
चुभते मन ।
--0--
बन्धन खुले
केश हवा में हिले
मन मचले ।
--0--
वन उदास
बुढ़ापा आसपास
फूला रे कास ।
--0--
रात अकेली
गिनती रही तारे
पिया न आये ।
--0--
हर अदाएँ
नज़ाकत की रस्में
गाती है नग्मे ।
--0--
तेरे सपने
बने मेरे अपने
प्रेम के संग ।
--00--
□ राधेश्याम (स्व.)184/2, शील कुंज, आई.आई.टी. कैम्पस, रुडकी-247667, जिला - हरिद्वार (उ.खण्ड)
स्व. राधेश्याम जी
(जन्म - 14 जनवरी 1922)
(देहावसान - 18 अप्रैल 2015)
स्व. राधेश्याम जी के हाइकु
हाइकु
--0--
धरा का ताप
देख न सके मेघ
रोना आ गया ।
--0--
खोल नयन
जो देखा दरपन
चुभते मन ।
--0--
बन्धन खुले
केश हवा में हिले
मन मचले ।
--0--
वन उदास
बुढ़ापा आसपास
फूला रे कास ।
--0--
रात अकेली
गिनती रही तारे
पिया न आये ।
--0--
हर अदाएँ
नज़ाकत की रस्में
गाती है नग्मे ।
--0--
तेरे सपने
बने मेरे अपने
प्रेम के संग ।
--00--
□ राधेश्याम (स्व.)
184/2, शील कुंज, आई.आई.टी. कैम्पस,
रुडकी-247667, जिला - हरिद्वार (उ.खण्ड)
रविवार, 21 जून 2020
हाइकुकार श्रवण चोरनेले 'श्रवण' जी के हाइकु
हाइकुकार
श्रवण चोरनेले 'श्रवण'
पितृ-दिवस
पिता पर समर्पित हाइकु
~ १ ~
नव जीवन
सुख की परछाई
पिता बनना
~ २ ~
सुखी संसार
बाहों भरे खुशियाँ
वात्सल्य प्यार ।
~ ३ ~
पथ दर्शक
रक्षक - संरक्षक
पिता शिक्षक ।
~ ४ ~
आत्म विश्वास
एक ही अहसास
बेटी की आस ।
~ ५ ~
साथ रहते
सहारा पल पल
सदा करते ।
~६ ~
आपका हाथ
सारे तम हरते
हमारे साथ ।
~ ७ ~
पिता के लिए
होते दोनों समान
बेटी या बेटा ।
~ ८ ~
दिल में रहे
लालन पालन की
जुगाड़ करे ।
~ ९ ~
कुटुंब प्यारा
ले के सबको साथ
तटस्थ हाथ ।
~ १० ~
कदम सारे
पर्यवेक्षक बन
पिता निहारे ।
~ ११ ~
पिता नाम है
मेहनती शान है
चारों धाम है ।
---0---
□ श्रवण चोरनेले 'श्रवण'
रायपुर (छत्तीसगढ़)
~ हाइकुकार विवेक कवीश्वर जी के हाइकु ~
हाइकुकार
विवेक कवीश्वर
हाइकु
--0--
धूप का गौना
धूप को लजाने का
मिला बहाना ।
--0--
बिजुका देखे
लहलहाते रंग
हुआ मलंग ।
--0--
मन बादल
तन मोरपंख सा
भाव तरल ।
--0--
अश्व रवि के
थके हैं; चुके नहीं
फिर दौड़ेंगे ।
--0--
कुटिल नभ
यायावर सन्दर्भ
साज़िश गढ़ी ।
--0--
रक्तबीज हैं
दिशाहीन धरने
और उगेंगे ।
--0--
पैरों के चिन्ह
सब हुए बैरागी
बस, जाने के ।
--0--
भूख से मरे
पिता का श्राद्ध हुआ
कौवा है तृप्त ।
--0--
सिर्फ़ वो लम्हे
जो ना थे कभी मेरे
रहे नूरानी ।
--0--
जीवन रेत
मृगतृष्णा वहन
पूर्णविराम ।
---0---
□ विवेक कवीश्वर
39-बी, सूर्या अपार्टमेन्ट्स
नई दिल्ली, पिन - 110019
शनिवार, 20 जून 2020
हाइकुकार डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही" जी के हाइकु
योग दिवस विशेष
हाइकुकार
डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही"
हाइकु
1.
रखना ध्यान
कांतिवर्धक योग
स्वस्थ शरीर ।
2.
भारत देश
पुरातन संस्कृति
दिखता योग ।
3.
योग दिवस
भारतीय गौरव
विश्व संदेश ।
4.
निरोगी तन
प्रसन्नचित्त मन
स्वास्थ्य है धन ।
4.
वेद-पुराण
मिलते है प्रमाण
योग कल्याण ।
5.
भारत देश
सनातन संस्कृति
योग विधान ।
6.
औषधि योग
तन-मन की पीड़ा
करता दूर ।
7.
दूर तनाव
नियमित व्यायाम
कर लो योग ।
8.
रक्त संचार
सक्रिय सब अंग
दूर बुढ़ापा ।
9.
जरूरी ज्ञान
अनेक योगासन
ध्यान सुविधा ।
10.
दूर हो भ्रम
योग एक माध्यम
स्वस्थ जीवन ।
---0---
□ डाॅ. राजेन्द्र सिंह "राही"
बस्ती, (उ. प्र.)
~ हाइकुकार अजय चरणम् जी के हाइकु ~
हाइकुकार
अजय चरणम्
हाइकु
--0--
घाटी में घूम
निर्गुण गा रही है
बावली हवा ।
--0--
धरा तुलसी
आसमां बरगद
मैं नागफनी ।
--0--
भटक रही
मन की नदिया में
तन की नाव ।
--0--
काट गया जो
लकीर से लकीर
बना फकीर ।
--0--
आँखों के रास्ते
कोई गुजर गया
आँसू बन के ।
--0--
चूल्हे की आग
कितनी ठंडी होती
रोटी के बिना ।
--0--
दलित अब
सिर्फ दलित नहीं
साहित्य बना ।
--0--
हवा जो आई
गिर रहीं पत्तियाँ
साथ जाने को ।
--0--
आँखों के रास्ते
कोई गुजर गया
आँसू बन के ।
--0--
चूल्हे की आग
कितनी ठंडी होती
रोटी के बिना ।
--0--
दलित अब
सिर्फ दलित नहीं
साहित्य बना ।
--0--
हवा जो आई
गिर रहीं पत्तियाँ
साथ जाने को ।
---0---
□ अजय चरणम्
पूरब अजीम गंज, हवेली खङगपुर,
मुंगेर (बिहार) पिन - 811213
पूरब अजीम गंज, हवेली खङगपुर,
मुंगेर (बिहार) पिन - 811213
~ हाइकु कवयित्री शीला शर्मा जी के हाइकु ~
हाइकु कवयित्री
शीला शर्मा
हाइकु
--0--
शब्द दामिनी
सवलता स्वामिनी
निर्झर यही ।
--0--
परंपरा का
आध्यात्मिक दर्शन
नदी सा भाव ।
--0--
हदें निगाहें
संस्कारों से विमुख
शून्य सी स्थिति ।
--0--
स्मृति लहर
उमड़ती सी आई
डूबती गई ।
--0--
मनाया जश्न
ओढ़ लिए सैलाब
सो गए प्रश्न ।
--0--
तृण नोकों से
मुस्कराती है ओस
क्षणभंगुर ।
--0--
भू आच्छादित
अद्भुत संयोजन
ऋतु योजन ।
--0--
निखरे वही
जो बिखरा होता है
तजुर्बा यही ।
---0---
□ शीला शर्मा
नागपुर (महाराष्ट्र)
~ हाइकुकार ओ. पी. गुप्ता जी के हाइकु ~
हाइकुकार
ओ. पी. गुप्ता
हाइकु
--0--
रोया व हँसा
रोया तो मुस्काया औ
हँसा तो रोया ।
कल्पनाजीवी
धरती पर खड़े
नभ निहारे ।
सत्य कड़वा
कड़वा ही रहेगा
मीठा कैसे हो !
जज़्बा या तर्क
दुनिया ज़ज्बे संग
तर्क निस्संग ।
चढ़ोगे यदि
उतरना भी होगा
जीना-मरना ।
कौन जीता है
तर्क वितर्क जंग
दोनों हारे हैं ।
मरते रहो
अमरता है जड़
जग है धारा ।
बादल छाये
शायद वर्षा होगी
कभी न होगी ।
---0---
□ ओ. पी. गुप्ता
हाँसी रोड, शिव नगर, भिवानी
(हरियाणा)
हाइकुकार सूर्यदेव पाठक "पराग" जी के हाइकु
हाइकुकार
सूर्यदेव पाठक "पराग"
हाइकु
--0--
माता की साँस
शिशु की धड़कन
पाती जीवन ।
फूलों की गंध
कंटकों की चुभन
यही जीवन ।
चाँद सलोना
रजनी मुख पर
लगा डिठौना ।
खिली चमेली
खुशबू अलबेली
नई नवेली ।
धरती पर
ममता सदा रोती
माँ जो न होती ।
नन्हाँ सा शिशु
माँ का दिया संस्कार
घुट्टी में पाता ।
---0---
□ सूर्यदेव पाठक "पराग"
मढौरा, जिला- सारण (बिहार)
पिन - 841418
शुक्रवार, 19 जून 2020
~ हाइकुकार शंम्भू सिंह रघुवंशी जी के हाइकु ~
हाइकुकार
शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
हाइकु
मासूम कली
सदा दबी मसली
फिर भी फली ।
कलिका चली
भगवान को भली
पीढियां जलीं ।
सुमन कली
पाशविकता खली
सरिता गली ।
मैं रामकली
उदर में मचली
आई धवली ।
फुलबगिया
परिवार कलिका
अश्रुछलिका ।
तट हमारा
ढूंढते पतवार
तुम्हारे द्वार ।
नदी किनारे
संगम इतराएं
गंगा नहाते ।
देखते कूल
समय प्रतिकूल
जीवन धन ।
जीव विकट
असमंजस तट
ये मरघट ।
दूर किनारा
अखिलेश सहारा
फिरता मारा ।
---0---
□ शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
मगराना, गुना (म. प्र.)
~ हाइकुकार दिनेश रस्तोगी जी के हाइकु ~
हाइकुकार
दिनेश रस्तोगी
हाइकु
--0--
मानव वन
करुणा,प्रेम,दया
ईश सर्वत्र ।
साफ रखिये
हृदय का दर्पण
हरि दर्शन ।
देश अपना
लुटेरे भी अपने
यही तो रोना ।
मचले तन
कसमसाता मन
लगी लगन ।
सूरज अस्त
संध्या हो रही मस्त
दोनों अभ्यस्त ।
मोह के पत्ते
सूख सूख गिरते
वृक्ष बुढ़ापा ।
तितलियों के
फूलों से थे इशारे
हम तुम्हारे ।
---0---
□ दिनेश रस्तोगी
~ हाइकुकार राजकुमार चौहान जी के हाइकु ~
हाइकुकार
राजकुमार चौहान "भारतीय"
हाइकु
---0---
धरा थी मौन
घेरा है विपदा ने
दोषी है कौन ।
कहा सलाम
हैं साजिशें दिल में
प्यार धड़ाम ।
ये तानाबाना
रखा ही रह जाना
भजो राम रे ।
तू दयालु है
उबारेगा बला से
मैं अकिंचन ।
भूला नहीं मैं
याद मुझे तू रख
मत परख ।
तम धड़ाम
पूर्व से सूरज का
हुआ सलाम ।
उगा सूरज
एक आस जगी है
भागेगा तम ।
सुख औ दुख
दो किनारे हैं साथ
सिखाते ज्ञान ।
---0---
□ राजकुमार चौहान "भारतीय"
शिवपुरी (म.प्र.)
~ हाइकु कवयित्री साधना कृष्ण जी के हाइकु ~
हाइकु कवयित्री
साधना कृष्ण
हाइकु
--0--
सावन आया
विहँसे भू पहन
हरा वसन ।
उदास पाखी
तलाश रही पानी
सुखी नदियाँ ।
जीवन गति
मौन अनवरत
करती काम ।
सपने मेरे
शीश महल सम
टूटे बिखरे ।
गीतिका गंध
मदहोश अंतस
भावाविभोर ।
नेह का धन
बेसुमार पास जो
कैसी गरीबी ।
बहती नदी
बस यही कहती
चलते रहो ।
उफनी नदी
कहती रही सदा
धीर रे मन ।
सूखी नदियाँ
जल में प्यासी
भोगती सजा ।
पड़ते रज
बोल उठा पाषाण
ताड़े मुझको ।
सोचे पाषाण
कलकल नदियाँ
प्यास बुझाती ।
ख्वाहिश बुने
परिंदे बैठ अपने
सुघर नीड़ ।
नन्ही चिड़िया
उडती गगन में
सोती घोंसला ।
नयन करे
बेहद मनमानी
हो बदनामी ।
रीत पुरानी
रखना बचा कर
आँखों का पानी ।
बाली धान की
खेतों में खुशहाली
हुलसे मन ।
मंद पवन
बहे चहुँ ओर ही
कम्पित तन ।
उतरी प्राची
बिखरी चहुँ ओर
स्वर्णकिरण ।
□ साधना कृष्ण
~ हाइकुकार बलजीत सिंह जी के हाइकु ~
हाइकुकार
बलजीत सिंह
हाइकु
---0---
मांस न अंडा
शाकाहारी भोजन
कलेजा ठंडा ।
अंधविश्वास
सामाजिक बुराई
घर का नाश ।
चाकू न छुरी
बड़ी ख़तरनाक
नज़र बुरी ।
बहानेबाजी
जैसे टूटी प्लेट में
सब्जियां ताजी ।
घोड़े न हाथी
जीवन की गाड़ी को
धकेले साथी ।
लंगड़ा-अंधा
रोटी ही करवाये
सबसे धंधा ।
फूल न डाली
जब कटा बगीचा
रो पड़ा माली ।
चाचा-भतीजा
स्वार्थ के चूल्हे पर
पकाये पिज्जा ।
सोना न चांदी
समय बलवान
रानी को बांदी ।
नेक इंसान
खरीद कर जख्म
बांटे मुस्कान ।
---00---
□ बलजीत सिंह
ग्राम / पोस्ट - राजपुरा ( सिसाय )
जिला - हिसार (हरियाणा) पिन - 125049
Email-- baljitsinghrajpura77@gmail.com
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