हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

गुनगुनी सी धूप (ताँका संग्रह)

 गुनगुनी सी धूप  

(ताँका संग्रह)

गुनगुनी सी धूप (ताँका संग्रह)
प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
● GUNGUNI SI DHOOP (गुनगुनी सी धूप) 
      (A COLLECTION OF TANKA POEM)
●  Ayan prakashan, Delhi 
● Edition First :2020
● Price : ₹ 220/--
● ISBN : 9789389999426


 विवरण


        वर्णिक जापानी छन्द रूपराशि का इन्द्रजाल रचते हैं । सहेज लेते हैं लघु में विराट का हर स्पंदन । अनुभूति की बूँद आखर-सीपी में ढलती है और आबदार मोती बनकर बाहर निकलती है । दमक उठती है अनूठी आभा से ।
        प्रकृति की अश्रुत ध्वनियों की पकड़ बड़ी मजबूत होती है।आँखों को कान बनाकर सुनना पड़ता है । वे स्वयं ही शब्दों का पीछा करती हैं । और करती हैं अनुकूल लय का अनुसंधान । समंदर की हर भंगिमा को जिसने जी भरकर देखा है वह तांका के मोहपाश से मुक्त नहीं हो सकता । जापान में इसे "लघु गीत" की संज्ञा दी गई है ।
         इतिहास का रुख करें तो पता चलता है कि सन् 1952 में "प्रो. आदित्यप्रताप सिंह" के सृजन से तांका ने भारत भू पर कदम रखे । कथितव्य है कि "कवीन्द्र रवीन्द्र" ने अपनी जापान यात्रा के दौरान एक तांका लिखा था । सन् 2000 से तांका विधा ने निर्झर सी सतत प्रवाहमानता पाई । सर्व श्री सतीशराज पुष्करणा, डाॅ मिथिलेश दीक्षित, भागवत दुबे, रामनिवास मानव ,आदि के क्रम में "प्रदीप कुमार दाश" जी तांका शैली को अपने अभिनव स्पर्श से संवारने को संकल्पित हुये ।
       5-7-5-7-7 वर्णक्रमवाला" पंचपदी तांका छन्द "रूपानुरागी प्रकृति, जीवन संघर्ष और अंततोगत्वा दार्शनिक परिणति के संकेतों तक विस्तृत है ।अनछुए प्रतीकों और बिंबों में मुखर होती सौंदर्य चेतना को अंकित करने में दाशजी सिद्धहस्त हैं । आठ कृतियों , 2 अनूदित संग्रहों एवं 13 सहयोगी संकलनों के साथ उनका रचना संसार अभिभूत करता है । 35 से अधिक सम्मान और पुरस्कार उनके सृजनात्मक वैभव के साक्षी हैं । विश्व के प्रथम रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश" के संपादन का श्रेय भी उन्हीं के नाम है । साथ ही ""तांका की महक "" में 271 रचनाकारों के 1421 तांकाओं के संचयन-संपादन का गौरव भी उन्होंने पाया है । उनका प्रणयन प्रणयी के जुनून, छायावाद के सूक्ष्मग्राही संस्कार और अध्यात्म के अलौकिक संकेतों की त्रिवेणी है ।
          साठोत्तरी ग़ज़ल ने जैसे महबूब की बांहों से छूटकर खुरदुरे धरातल पर चलना सीखा । पाँव के छालों की चुभन,वो टीस, वो कसक महसूस की उसी भाँति प्रकृति के रम्य अनुप्राणों से आगे तांका विधा में जीवन का हर रंग हर स्फुरण समाने लगा ।
           जापानी काव्य "सौंदर्य चेतना" को चुंबक की तरह आकृष्ट करता है । प्रकृति का ऐसा कोई उपादान नहीं जो प्रदीप जी का अनुगामी नहीं । जीवन दर्शन से जुड़े सारे "प्रतीक प्रतिमान" उनके तीव्र संवेदनों से संचालित हैं ।
           उनके कितने ही "तांका" "चाँद का परिक्रमा पथ" सजाते हैं । उसका मानवीकरण रूप अंतस्तल छू लेता है । चाँद रोया रात भर/भोर ओस पी गई जैसी अप्रतिम व्यंजना वाह करने पर मजबूर कर देती है । चाँद शरद का रूमान रचता है,सिसकता है, दरिया की लहरों को नाव बनाकर उस पर सवार होकर अलगोजे की धुन छेड़ता है, तो कभी "नर्सिसस" सा अपने ही रूप पर रीझ उठता है ।
"कवीन्द्र रवीन्द्र" नदी के रूप पर मुग्ध थे । निराला बादलों पर रीझे  तो भवानीप्रसाद मिश्र जंगलों की रूप सुषमा के दीवाने थे । अमृता प्रीतम को लपट अंगारों आदि से लगाव रहा तो "रमानाथ अवस्थी ", चंदन, चाँदनी पर मोहित हुये । अज्ञेय, अहेरी, मछली द्वीप जैसे बिंबों को हेरते रहे, टेरते रहे । दाशजी को चाँद चाहिए । चाँद बिना उनका गुजारा नहीं । धरती से मात्र 59% अपना रूप दिखलाने वाले चाँद का पूरा रूप किसी ने नहीं देखा पर उन्होंने उसके बहुविध दर्शन से छंदों की तिजोरी भर ली है ।
पलाश, हरसिंगार, अमलतास, कास घास के फूल, गुलाब, जूही, सूरजमुखी जैसे फूल अनुभूतियों की रेशमी डोर में गूँथे गये हैं "सर्वहारा की प्रवक्ता दूब" भी उपस्थित है । आँसुओं का रहस्य समझानेवाली "ओस" भी ।
         निसर्ग का हर आंदोलन संगीन क्षणों की कारा से मुक्त कर जिजीविषा जगाता है । महामायावी विश्व में आत्मतत्व की कस्तूरी इतस्ततः ढूंढनेवाले मानव की नादानी पता है उन्हें । मिट्टी का तन मन लिये पानी के बुलबुले सी जीवन की सत्ता तांका श्रृंखला में साकार हुई है ।
         जीवन की रंगशाला में कवि अपनी भूमिका को तत्परता से निभाने में संलग्न हैं । "वज्रादपि कठोर मृदूनि कुसुमादपि "जीवन के दोनों छोर उनकी दृष्टि के केन्द्र में हैं । "शब्दचित्र गढ़ने में महारत है "उन्हें-------- "ठूंठ के तन/आई कोंपलें देख/टटोले मन/चूम चली अधर/हवा बंजारन।"
--'--"दूल्हा मेंढक/दुलही है मेंढकी/बेला शादी की/पेड़ बाँचे नेवता/मेघ आओ बाराती/""
--''''-दार्शनिक निष्कर्ष सौंपता हुआ ये तांका द्रष्टव्य है-'-
--"धीरज धर/सफलता के शीर्ष/पंछी जानते/नभ में नहीं होती/बैठने की जगह/":"
जीवन का फलसफा इससे अधिक खूबसूरत शब्दों में कोई क्या समझा पाएगा---
---जेब में छेद/पहुंचाता है खेद/सिक्के से ज्यादा/गिरते यहां रिश्ते/अचरज ये भेद/"""
               रसार्द्र रंगों के मिश्रण से आकृत सार्थक उत्प्रेक्षाएं उनकी भाषायी संपन्नता की द्योतक हैं । बेटी के लिये "दीपशिखा" और "चिड़िया" सी उपमा मन के नाज़ुक रेशों से बनी है !
खून का रंग एक है फिर धर्म को अलग से परिभाषित करने की गरज क्या है--मनुष्यता के हक में ये बेहद उम्दा सवाल पूछा है उन्होंने । समसामयिक संदर्भ चाहे गलवान घाटी हो पुलवामा , पर्यावरण, कोरोना , कन्या रक्षा, स्त्री विमर्श, किसान, कबीर दर्शन, कुछ भी तो नहीं भूले ।
भौतिकवादी आग्रहों ने सहज मानवीय संवेदनों को घायल कर दिया है । अपार क्षति पहुंचाई है । आँसू और मुस्कान दोनों नकली हैं ।
          शिव की भाँति तम पीने का हुनर सिखलाता "दीपक "स्वयं उनके नाम में स्थित है । किरणों के ताने बाने से अनगिन तांका सूरज बुनते हुये कवि रात की मुट्ठी में बंद सबेरे को निकाल लाने को कृतसंकल्प हैं ।
वृक्षों की "बोन्साई शैली" जैसे जापानी छन्द समूचे अस्तित्व को झंकृत करते हैं। "ओस में समंदर" समा जाने जितनी सुरीली कल्पना छांदस सृजन में प्रतिबिम्बित  होती है । 
         तांका के इतिहास में स्वर्णाक्षरित यह "गुनगुनी सी धूप" पाठकों को खुशी की खनक सौंपेगी और मौन को बाँसुरी बना देगी । कीर्ति पताका/लहराये नभ में/मंजुल तांका/दिशि दिशि गुंजित/मुस्काए मधु राका ।।


                                         - इन्दिरा किसलय



बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

~ हाइकु कवयित्री उषा चतुर्वेदी जी के हाइकु ~

 हाइकु कवयित्री

उषा चतुर्वेदी 


हाइकु 

-0-


गुलाबी सर्दी

सूरज सुहावन

हिया मुदित ।

--0--


रवि उदय

चहुँ ओर लालिमा

ताप सुहाना ।

--0--


मग निहारे

कजरारे नयन

प्रेम दीवानी ।

--0--


यमुना कूल

कदम्ब तरुवर

खिले प्रसून ।

--0--


मही हरित

फसल लहरायी

कृषक खुश ।

--0--


नभ गरजा

कृषक अकुलाया

तृप्त वसुधा ।

--0--


गीली लकड़ी

सुलगी धुँआ देती

रुलाती भी है ।

--0--


चमका रवि 

हँसे सूरजमुखी

हुलसा माली ।

--0--


रवि रिसाय

तपती वसुधा

राही विकल । 

--0--


चंचल मन

चिन्तातुर रहता

हिया बेचैन ।

--00--


उषा चतुर्वेदी

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

~ हाइकुकार भैरव प्रसाद जी के हाइकु ~

 हाइकुकार 


भैरव प्रसाद 


हाइकु 


डूबता देश

बगुलों ने बदला

अपना वेश  !

--0--


नन्हा सा द्वीप 

तैर रहा कछुआ

मन के बीच !

--0--


मन के बिल

शक का छछूंदर 

फंसा अंदर !

--0--


प्यासा पीपल

झाँकता कूप-जल

पपीहा वन !

--0--


प्रेम सुगंध

उड़ गयी तितली

इंद्रधनुष !

--0--


टूटी टहनी

कुछ टूटा भीतर

तुम क्या जानो ?

--0--


मुँह मरोड़

बैठी है पिछवाड़े

खिन्न खटिया !

--0--


गेहूँ गरीब

पक रहीं रोटियां

तपती धूप !

--0--

गेहूँ फकीर

फटी छाती लेटा है

मंडी की भीड़ !

--0--


जरा सी बात

लाल हो गई, री 

मूरख मिर्ची !

--00--


□ भैरव प्रसाद

रविवार, 20 सितंबर 2020

~ हाइकुकार स्व. राधेश्याम जी के हाइकु ~

 हाइकुकार



स्व. राधेश्याम जी 

(जन्म - 14 जनवरी 1922)
(देहावसान - 18 अप्रैल 2015)


स्व. राधेश्याम जी के हाइकु 


हाइकु 
--0--
धरा का ताप
देख न सके मेघ
रोना आ गया ।
--0--


खोल नयन
जो देखा दरपन
चुभते मन ।
--0--


बन्धन खुले 
केश हवा में हिले
मन मचले ।
--0--


वन उदास 
बुढ़ापा आसपास 
फूला रे कास ।
--0--


रात अकेली
गिनती रही तारे
पिया न आये ।
--0--


हर अदाएँ 
नज़ाकत की रस्में 
गाती है नग्मे ।
--0--


तेरे सपने 
बने मेरे अपने
प्रेम के संग ।
--00--

□ राधेश्याम (स्व.)
184/2, शील कुंज, आई.आई.टी. कैम्पस, 
रुडकी-247667, जिला - हरिद्वार (उ.खण्ड)


रविवार, 21 जून 2020

हाइकुकार श्रवण चोरनेले 'श्रवण' जी के हाइकु

हाइकुकार

श्रवण चोरनेले 'श्रवण'

पितृ-दिवस

पिता पर समर्पित हाइकु

~ १ ~
नव जीवन
सुख की परछाई
पिता बनना  

~ २ ~
सुखी संसार
बाहों भरे खुशियाँ
वात्सल्य प्यार ।

~ ३ ~
पथ दर्शक
रक्षक - संरक्षक
पिता शिक्षक ।

~ ४ ~
आत्म विश्वास
एक ही अहसास
बेटी की आस ।

~ ५ ~
साथ रहते
सहारा पल पल 
सदा करते ।

~६ ~
आपका हाथ
सारे तम हरते
हमारे साथ ।

~ ७ ~
पिता के लिए
होते दोनों समान
बेटी या बेटा ।

~ ८ ~
दिल में रहे
लालन पालन की
जुगाड़ करे ।

~ ९ ~
कुटुंब प्यारा
ले के सबको साथ
तटस्थ हाथ ।

~ १० ~
कदम सारे
पर्यवेक्षक बन
पिता निहारे ।

~ ११ ~
पिता नाम है
मेहनती शान है
चारों धाम  है ।
---0---

□ श्रवण चोरनेले 'श्रवण'
रायपुर (छत्तीसगढ़)

~ हाइकुकार विवेक कवीश्वर जी के हाइकु ~

हाइकुकार

विवेक कवीश्वर

हाइकु 
--0--

धूप का गौना
धूप को लजाने का
मिला बहाना ।
--0--

बिजुका देखे 
लहलहाते रंग 
हुआ मलंग ।
--0--

मन बादल 
तन मोरपंख सा 
भाव तरल ।
--0--

अश्व रवि के 
थके हैं; चुके नहीं 
फिर दौड़ेंगे ।
--0--

कुटिल नभ 
यायावर सन्दर्भ 
साज़िश गढ़ी ।
--0--

रक्तबीज हैं 
दिशाहीन धरने 
और उगेंगे ।
--0--

पैरों के चिन्ह
सब हुए बैरागी
बस, जाने के ।
--0--

भूख से मरे
पिता का श्राद्ध हुआ
कौवा है तृप्त ।
--0--

सिर्फ़ वो लम्हे 
जो ना थे कभी मेरे 
रहे नूरानी ।
--0--

जीवन रेत
मृगतृष्णा वहन 
पूर्णविराम ।
---0---

□ विवेक कवीश्वर
39-बी, सूर्या अपार्टमेन्ट्स
नई दिल्ली, पिन - 110019

शनिवार, 20 जून 2020

हाइकुकार डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही" जी के हाइकु

योग दिवस विशेष

हाइकुकार
डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही"

हाइकु

1.
रखना ध्यान 
कांतिवर्धक योग
स्वस्थ शरीर । 

2.
भारत देश 
पुरातन संस्कृति 
दिखता योग । 

3.
योग दिवस
भारतीय गौरव
विश्व संदेश । 

4.
निरोगी तन
प्रसन्नचित्त मन
स्वास्थ्य है धन । 

4.
वेद-पुराण
मिलते है प्रमाण 
योग कल्याण । 

5.
भारत देश 
सनातन संस्कृति 
योग विधान । 

6.
औषधि योग
तन-मन की पीड़ा 
करता दूर । 

7.
दूर तनाव
नियमित व्यायाम 
कर लो योग । 

8.
रक्त संचार
सक्रिय सब अंग
दूर बुढ़ापा । 

9.
जरूरी ज्ञान 
अनेक योगासन 
ध्यान सुविधा । 

10.
दूर हो भ्रम
योग एक माध्यम 
स्वस्थ जीवन । 
---0---

□ डाॅ. राजेन्द्र सिंह "राही"
बस्ती, (उ. प्र.) 

~ हाइकुकार अजय चरणम् जी के हाइकु ~

हाइकुकार 


अजय चरणम् 


हाइकु 

--0--


घाटी में घूम 
निर्गुण गा रही है 
बावली हवा ।
--0--

धरा तुलसी 
आसमां बरगद 
मैं नागफनी ।
--0--

भटक रही 
मन की नदिया में 
तन की नाव ।
--0--

काट गया जो
लकीर से लकीर 
बना फकीर ।
--0--

आँखों  के रास्ते
कोई गुजर गया
आँसू  बन के । 
--0--

चूल्हे की आग
कितनी ठंडी  होती
रोटी के  बिना ।
--0--

दलित अब
सिर्फ दलित नहीं
साहित्य बना । 
--0--

हवा जो आई
गिर रहीं  पत्तियाँ
साथ जाने को ।
---0---

□ अजय चरणम् 
पूरब अजीम गंज, हवेली खङगपुर, 
मुंगेर (बिहार) पिन - 811213

~ हाइकु कवयित्री शीला शर्मा जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

शीला शर्मा 

हाइकु 
--0--

शब्द दामिनी 
सवलता स्वामिनी 
निर्झर यही ।
--0--

परंपरा का 
आध्यात्मिक दर्शन 
नदी सा भाव ।
--0--

हदें निगाहें
संस्कारों से विमुख 
शून्य सी स्थिति ।
--0--

स्मृति लहर
उमड़ती सी आई 
डूबती गई ।
--0--

मनाया जश्न 
ओढ़ लिए सैलाब 
सो गए प्रश्न ।
--0--

तृण नोकों से 
मुस्कराती है ओस
क्षणभंगुर ।
--0--

भू आच्छादित
अद्भुत संयोजन 
ऋतु योजन ।
--0--

निखरे वही 
जो बिखरा होता है 
तजुर्बा यही ।
---0---

□ शीला शर्मा 
नागपुर (महाराष्ट्र)

~ हाइकुकार ओ. पी. गुप्ता जी के हाइकु ~

हाइकुकार 

ओ. पी. गुप्ता

हाइकु 
--0--

रोया व हँसा 
रोया तो मुस्काया औ
हँसा तो रोया ।

कल्पनाजीवी 
धरती पर खड़े 
नभ निहारे ।

सत्य कड़वा 
कड़वा ही रहेगा 
मीठा कैसे हो !

जज़्बा या तर्क 
दुनिया ज़ज्बे संग 
तर्क निस्संग ।

चढ़ोगे यदि 
उतरना भी होगा 
जीना-मरना ।

कौन जीता है 
तर्क वितर्क जंग 
दोनों हारे हैं ।

मरते रहो 
अमरता है जड़
जग है धारा ।

बादल छाये 
शायद वर्षा होगी 
कभी न होगी ।
---0---

□ ओ. पी. गुप्ता 
हाँसी रोड, शिव नगर, भिवानी 
(हरियाणा)

हाइकुकार सूर्यदेव पाठक "पराग" जी के हाइकु

हाइकुकार 

सूर्यदेव पाठक "पराग"

हाइकु 
--0--

माता की साँस 
शिशु की धड़कन 
पाती जीवन ।

फूलों की गंध 
कंटकों की चुभन 
यही जीवन ।

चाँद सलोना 
रजनी मुख पर
लगा डिठौना ।

खिली चमेली 
खुशबू अलबेली 
नई नवेली ।

धरती पर
ममता सदा रोती 
माँ जो न होती ।

नन्हाँ सा शिशु 
माँ का दिया संस्कार 
घुट्टी में पाता ।
---0---

□ सूर्यदेव पाठक "पराग"
मढौरा, जिला- सारण (बिहार)
पिन - 841418

शुक्रवार, 19 जून 2020

~ हाइकुकार शंम्भू सिंह रघुवंशी जी के हाइकु ~

हाइकुकार 

शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
हाइकु

मासूम कली
सदा दबी मसली
फिर भी फली ।

कलिका चली
भगवान को भली
पीढियां जलीं ।

सुमन कली
पाशविकता खली
सरिता गली ।

मैं रामकली
उदर में मचली
आई धवली ।

फुलबगिया
परिवार कलिका
अश्रुछलिका ।

तट हमारा
ढूंढते पतवार
तुम्हारे द्वार ।

नदी किनारे
संगम इतराएं
गंगा नहाते ।

देखते कूल
समय प्रतिकूल
जीवन धन ।

जीव विकट
असमंजस तट
ये मरघट ।

दूर किनारा
अखिलेश सहारा
फिरता मारा ।
---0---

□ शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
 मगराना, गुना (म. प्र.)

~ हाइकुकार दिनेश रस्तोगी जी के हाइकु ~

हाइकुकार


दिनेश रस्तोगी 

हाइकु 
--0--

मानव वन
करुणा,प्रेम,दया
ईश सर्वत्र ।

साफ रखिये
हृदय का दर्पण
हरि दर्शन ।

देश अपना
लुटेरे भी अपने
यही तो रोना ।

मचले तन
कसमसाता मन
लगी लगन ।

सूरज अस्त 
संध्या हो रही मस्त 
दोनों अभ्यस्त ।

मोह के पत्ते
सूख सूख गिरते
वृक्ष बुढ़ापा ।

तितलियों के
फूलों से थे इशारे
हम तुम्हारे ।
---0---

□ दिनेश रस्तोगी

~ हाइकुकार राजकुमार चौहान जी के हाइकु ~

हाइकुकार

राजकुमार चौहान "भारतीय"

हाइकु 
---0---

धरा थी मौन
घेरा है विपदा ने
दोषी है कौन ।

कहा सलाम
हैं साजिशें दिल में
प्यार धड़ाम ।

ये तानाबाना
रखा ही रह जाना
भजो राम रे ।

तू दयालु है
उबारेगा बला से
मैं अकिंचन ।

भूला नहीं मैं
याद मुझे तू रख
मत परख ।

तम धड़ाम
पूर्व से सूरज का
हुआ सलाम ।

उगा सूरज
एक आस जगी है
भागेगा तम ।

सुख औ दुख
दो किनारे हैं साथ
सिखाते ज्ञान ।
---0---

□ राजकुमार चौहान "भारतीय"
शिवपुरी (म.प्र.)

~ हाइकु कवयित्री साधना कृष्ण जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

साधना कृष्ण 


हाइकु 
--0--

सावन आया
विहँसे भू पहन
हरा वसन ।

उदास पाखी
तलाश रही पानी
सुखी नदियाँ ।

जीवन गति
मौन अनवरत
करती काम ।

सपने मेरे
शीश महल सम
टूटे बिखरे  ।

गीतिका गंध
मदहोश अंतस
भावाविभोर ।

नेह का धन
बेसुमार पास जो
कैसी गरीबी ।

बहती नदी
बस यही कहती
चलते रहो ।

उफनी नदी
कहती रही सदा
धीर रे मन ।

सूखी नदियाँ
जल में प्यासी
भोगती सजा ।

पड़ते रज
बोल उठा पाषाण
ताड़े मुझको ।

सोचे  पाषाण
कलकल नदियाँ
प्यास बुझाती ।

ख्वाहिश बुने
परिंदे बैठ अपने
सुघर नीड़ ।

नन्ही चिड़िया
उडती गगन में
सोती घोंसला ।

नयन करे
बेहद मनमानी
हो बदनामी ।
     
रीत पुरानी
रखना बचा कर
आँखों का पानी ।

बाली धान की
खेतों में खुशहाली
हुलसे मन ।

मंद पवन 
बहे  चहुँ ओर ही
कम्पित तन ।

उतरी प्राची
बिखरी चहुँ ओर
स्वर्णकिरण ।

□ साधना कृष्ण

~ हाइकुकार बलजीत सिंह जी के हाइकु ~

हाइकुकार
बलजीत सिंह 

हाइकु

---0---

         
मांस न अंडा
शाकाहारी भोजन
कलेजा ठंडा ।

          
अंधविश्वास
सामाजिक बुराई
घर का नाश ।

       
चाकू न छुरी
बड़ी ख़तरनाक
               नज़र बुरी ।                  

           
बहानेबाजी
जैसे टूटी प्लेट में
सब्जियां ताजी ।

     
घोड़े न हाथी
जीवन की गाड़ी को
धकेले साथी ।

    
लंगड़ा-अंधा
रोटी ही करवाये
सबसे धंधा ।

     
फूल न डाली
जब कटा बगीचा
रो पड़ा माली ।

    
चाचा-भतीजा
स्वार्थ के चूल्हे पर
पकाये पिज्जा ।

      
सोना न चांदी
समय बलवान
रानी को बांदी ।

   
नेक इंसान
खरीद कर जख्म
बांटे मुस्कान ।
---00---

□ बलजीत  सिंह
ग्राम / पोस्ट - राजपुरा  ( सिसाय )
जिला -  हिसार (हरियाणा) पिन - 125049
Email-- baljitsinghrajpura77@gmail.com
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