हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)
卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐
रविवार, 15 अक्टूबर 2017
प्रकृति की गोद में (हाइकु संग्रह)
प्रकृति की गोद में
हाइकु संग्रह
- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रकाशन वर्ष - 2017
समीक्षा–प्रकृति की गोद में (हाइकु-संग्रह) प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’
प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’ एक युवा हाइकुकार हैं | वे अपना एकांत जब प्रकृति के साथ बिताते हैं तो उनकी रचनात्मक ऊर्जा हाइकु लिखने के लिए उन्हें मानों बाध्य करती है- “एकांत मन /लिख रहा हाइकु /प्रकृति संग” | दीपक जी ने अपने सद्य-प्रकाशित हाइकु संग्रह में एक से बढ़कर एक प्रकृति विषयक हाइकु-रचनाएं प्रस्तुत की हैं | इनमें प्रकृति का सौंदर्य तो है ही, मानवी भावनाओं को प्रकृति के ऊपर आरोपित कर, जहां प्रकृति को एक ओर जीवन्तता प्रदान की गई है, वहीं दूसरी और प्रकृति के बहाने मानव मन को भी खूब खंगाला गया है | यह तो हम सभी जानते हैं कि झरने और नदियाँ कहीं दूर ऊपर पहाड़ से धरती पर आते हैं लेकिन इसी बात को कवि ने अपने अंदाज में किस तरह प्रस्तुत किया है | ज़रा देखिए –
फैलाए डैने / पहाड़ की कोख से / फूटे झरने
गिरी कोख से / जन्मीं जल-परियां / लगी नाचने
पहाड़ की कल्पना हम अधिकतर एक पुरुष के रूप में ही करते आए हैं, (मेरे हिमगिर मेरे विशाल) लेकिन दीपक जी ने उसे एक स्त्री के रूप में प्रस्तुत किया है जिसकी ‘कोख’ से झरने और नदियाँ जन्म लेती हैं ।
महानगरों में प्रकृति के समीप जाना बहुत कठिन होता जा रहा हैं | लेकिन प्रदीप जी को इस बात का गर्व है कि “पेड़ों की छाँव / प्रकृति की गोद में / है मेरा गाँव”, -जहां मुट्ठी में धूप लिए सूर्य सभी को सुख बांटता है; जहां घास की नोक पर सिसकते हुए चंद्रमा के आंसू गिरते हैं और ओस सिहर जाती है; जहां सूर्य की पहली रश्मि अपनी प्यास मिटाने ओस को ही पी जाती है; जहां झुरुमुट में चिड़ियाँ चहकती हैं और कवि का मन पंछी अवाक् देखता रह जाता है; जहां जब अंकुर फूटते हैं तो मंद-मंद हवाएं उन्हें झूला झुलाती हैं; जहां मतवाली गेहूँ की बालियाँ झूमती और गाती हैं –
देना चाहता / मुट्ठी में लिए धूप / सूर्य भी सुख
सिसका शशि / घास की नोक पर / ओस सिहरी
प्यास मिटाने / पहली सूर्य रश्मि / पी गई ओस
अंकुर फूटा / मंद मंद हवाएं / झुलाती झूला
नाचती गाती / झूमी वो मतवाली / गेहूँ की बाली
चहक रहा / मन झुरुमुट में / पंछी अवाक् (२६)- (अक्षर दोष से बचने के लिए कृपया ‘अवाक्’ को ‘अवाक’ पढ़ें)
प्रकृति का चित्रण हो और हम भारत की आधी दर्जन ऋतुओं को भूल जाएं ऐसा हो नहीं सकता | भारत इस अर्थ में बड़ा संपन्न देश है जहां तीन नहीं, चार नहीं, छः छः ऋतुएँ निश्चित समय पर दस्तक देती है | ग्रीष्म ऋतु पानी सोख लेती है और प्यास जगाती है | दीपक जी इसी प्यास का वर्णन करते हुए कहते हैं –
सूखे पोखर / छाती फटी धरा की / तृषित प्राण
उत्कट प्यास / प्राण हुए कंठ में / बूंदों की आस
वर्षा ऋतु भी अपना दुःख और अपना ही आनंद लेकर उपस्थित होती है |
पावस आया / गाने लगे झींगुर / गीत मल्हार
फटते मेघ / उगल रही झाग / गुस्से में नदी
और-और जगहों पर वर्षा के बाद बेशक शीत ऋतु ही आती होगी, लेकिन भारत में हमें जाड़ों के तीन रूप दिखाई देते हैं | शरद, शिशिर और हेमंत --
शरद रात / नभ से लाया चाँद / सुधा की सौगात
आया शरद / मोती बिखर पड़े / रोया है चाँद
शिशिर रात / खांसता रहा चाँद / तारे उदास
शरद और शिशिर के बाद हेमंत ऋतु शीत काल की बिदाई की घोषणा है | और इसके बाद ऋतुओं का राजा वसंत आता है | भारत में वसंत और पतझड़ को अलग अलग नहीं माना गया है जैसा अन्य देशों में होता आया है जहां ‘स्प्रिग’ और ‘औटम’ दो अलग मौसम समझे गए हैं | भारत में तो, जैसा कि प्रदीप जी कहते हैं ये दोनों “प्रेमी जीवन / कभी पतझड़ / तो कभी वसंत” की तरह हैं | ‘प्रकृति की गोद में’ कुछ बहुत सुन्दर वसंत के चित्र हैं | आस्वादन कीजिए –
वसंत आया / हल्की सी सिहरन / आम्र बौराया
फूले पलाश / वासंती गीत गाए / अमलतास
चूमा वसंत / महकने लगी है / अब मंजरी इत्यादि ......
मनुष्य का मन बड़ा चंचल है | बड़ी मनमानी करता है | आखिर कल्पनाएँ तो हम मन में ही करते हैं ! लगभग सभी हाइकुकारों ने मन की इस भटकन को देखकर इसे अपनी रचनाओं का विषय बनाया है | प्रदीप कुमार डास भी अपवाद नहीं हैं | मन विषयक कुछ रचनाएं दृष्टव्य हैं –
हारा न मन / उड़ा आसमान में / सारा जीवन
भटक रहा / वासना के वन में / मृग सा मन
मन का मृग / निकल पड़ा पाने / कस्तूरी गंध
चाँद और दीपक- ये दो प्रतीक ‘दीपक’ जी के मन-पसंद प्रतीक हैं | इन्हें उन्होंने खुले मन से इस्तेमाल किया है | प्रदीप जी ने अपन्मा उप-नाम “दीपक” यों ही नहीं रख लिया है | प्रदीप जी चाँद के बहाने प्यार की अनुभूतियाँ अभिव्यक्त करने में खूब आनंद लेते हैं |
चांदनी रात / रात भर जगता / दीवाना चाँद
तरु की ओर / झांकता रहा चाँद / चिड़िया चुप
ज्ञान और उजाले का प्रतीक है दीपक | ज्ञान थोड़ा ही क्यों न हो, दीपक छोटा ही क्यों न हो, अज्ञान और तमस को मिटाने में सक्षम है | --
विकट रात / एक दिया बताए / उसे औकात
जल दीपक / अज्ञानता चीरते / बुझना मत
जैसी कि कहावत है, ‘दीपक तले अन्धेरा’ | यह वास्तविकता भी है और प्रतीक रूप में भी उतनी ही सही बात है | हम सभी ने सच्चे और सदाचारी सेवकों के नाक के नीचे भ्रष्टाचार पलते देखा है | तभी तो प्रदीप जी कहते हैं –
दूर नहीं होती / दीए तले पलती / ये अंधियारी
लाख भगाए / दीप तले अँधेरे / छाए ही रहे
परम्परा गत रूप से जापान में हाइकु और सेनरियु में भेद किया गया है | हिन्दी काव्य ने इस अंतर को झुठला दिया है | जापान में भी अब इसे बहुत महत्व नहीं दिया जाता; परन्तु प्रदीप जी ने सेनरियु और हाइकु में भेद करते हुए अपना एक सेनरियु-संग्रह अलग से निकाला | पर ऐसा लगता है की वे इस अंतर पर टिके नहीं रह सके,और मुख्य धारा में आ गए हैं | अपने हाइकु संग्रह, ‘प्रकृति की गोद में’ आपको अनेक सेनरियु मिल जावेंगे जिनमें सामाजिक कुरीतियों, राजनैतिक विडंबनाओं और दूषित पर्यावरण को उभारने और उनपर व्यंग्य करने से परहेज़ नहीं किया गया है | ये रचनाएं स्पष्ट ही हाइकु की परम्परागत कोटि में नहीं आतीं |
जीवन और जगत के बारे में रचनाकारों ने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए अनेक हाइकु प्रस्तुत किए है, दीपक जी ने भी प्राय: इस सम्बन्ध में एक संतुलित दृष्टि अपनाते हुए ठीक ही कहा है “अश्रु व हास / जीवन जगत में / श्वास-प्रश्वास” | किन्तु यदि ध्यान से देखें तो जीवन के सन्दर्भ में उनकी दृष्टि दुःख और नकार को अधिक बल देती हुई प्रतीत होती है –
धूप ही धूप / जीवन के पड़ाव / कहीं न छाँव
बादल छाया / जीवन के सफ़र में / छंटी न धूप
अश्रु बरसे / व्यथाओं के बादल / छाए ही रहे
दर्द मौसम / नहीं खिलते फूल / चुभते कांटे
लेकिन मानना यह भी पड़ेगा कि वे जीना चाहते हैं और उनकी महत्वाकांक्षा सदैव ऊपर उठने और आगे बढ़ने की ही रही है -
संघर्ष गीत / नदी गुनगुनाती / जीना सिखाती
शायद छू लें / आओ कोशिश करें / चाँद छूने की
प्रदीप जी छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं | हिन्दी की एक बड़ी खूबी यह है कि वह स्वयं को किसी भी वातावरण से संयोजित कर लेती है और परिवेश विशेष में बोले जाने वाले शब्दों और लहजे को अपना लेती है | अत: यदि आप प्रदीप जी की रचनाओं में छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली ‘हिन्दी’ का स्पर्श न पाते तो यह एक आश्चर्य की बात होती | दीपक जी ने कुछ स्थानीय शब्दों का तथा वहां की संस्कृति का बड़ी चतुराई से अपने हाइकुओं में इस्तेमाल किया है | इस संग्रह के अंतिम हाइकु में जिन शब्दों का प्रयोग हुआ है वे निश्चित ही स्थानीय ही रहे होंगे | "पेड़ पुराने / कोंपी संवेदनाएं / नई कोपलें” | ‘कोंपी’ मानक हिन्दी के शब्द तो नहीं हैं, और इनके अर्थ का केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है | इसी प्रकार दीपक जी ने कई जगह “पंछियाँ” शब्द, पक्षी के बहुवचन के रूप में, इस्तेमाल किया है | हो सकता है स्थानीय लोगों में यह प्रचलित हो किन्तु मानक हिन्दी में ‘पंछियाँ’ शब्द नहीं मिलता | इसी प्रकार एक शब्द, ‘ददरिया’ (५४) भी प्रयोग में आया है जिसका अर्थ शायद दर्द झेलने वाले से हो | यह भी स्थानीय ही लगता है | दीपक जी अपने आसपास की संस्कृति से भी परिचय कराते चलते हैं | “दीवारों” के गीत, “रुजू ठुंगरू” (५१) तथा ‘राऊत गीत’ (५५) से परिचय पाकर पाठक अपना ज्ञान बढाता है | कई रचनाओं में इस प्रकार के सन्दर्भ सहज ही मिल जाते हैं | घोटुल, पंडवानी, मुरिया नृत्य आदि, के सन्दर्भ इसके उदाहरण हैं |
युवा साहित्यकार,प्रदीप कुमार डास ‘दीपक’ का प्रथम हाइकु-संग्रह छत्तीसगढ़ी भाषा में केवल २१ वर्ष की उम्र में आ गया था | और तब से वे हाइकु लेखन में बराबर सक्रिय हैं | अब तक उनकी रचित और संपादित आधे दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | हिन्दी जगत उनमें एक बड़े साहित्यकार होने की संभावनाएं देखता है |
- डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)
१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड
इलाहाबाद -२११००१
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"प्रकृति की गोद में" प्रकृति बोध से सम्पन्न, संवेदना के उच्च धरातल पर रचित प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी का हाइकु संग्रह ।
समीक्षिका : --- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित
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हिन्दी काव्य - परम्परा में हाइकु कविता सर्वाधिक चर्चित लघु कविता है । गहन अनुभूति की सरल-सहज और संक्षिप्त हाइकु कविता लय, ध्वनि लक्षार्थ, बिम्ब, विशिष्ट प्रयोजन से अधिक प्रभावपूर्ण हो जाती है ।अभिव्यक्ति - सौन्दर्य की दृष्टि से प्रदीप जी की हाइकु कविताएँअपने लक्षार्थ में अत्यंत जीवंत और सम्प्रेषणीय हैं । "प्रकृति की गोद में" प्रकृतिपरक हाइकु का महत्वपूर्ण संकलन है ।अधिकांश संकलित हाइकु बिम्बों के नूतन प्रयोगों के कारण अधिक प्रभावी हो गये हैं । विवरण अथवा वर्णन की अपेक्षा इनमें प्रकृति का चित्रण लाक्षणिक और संश्लिष्टात्मक अधिक है ।
प्रदीप जी के अनेक हाइकु जीवंतता का संदेश देते हैं । रात का अंधकार चाहे जितना गहरा हो, एक नन्हाँ दीपक अपने उजाले से उसकी औकात बता देता है ।नदी अपनी संघर्षरत लहरों के साथ भी गुनगुना उठती है और जीने की सीख देती है ।यहाँ व्यंजना का सुंदर निर्वाह हुआ है । लहरें पीड़ा की प्रतीक हैं । नदी कल - कल ध्वनि से जीवन के गीत गाती है और अपनी गतिमयता से आगे बढ़ने का हौसला देती है । 'दिया' और 'नदी' ऐसे प्रतीक हैं जो अपने अस्तित्व और प्रवाह से मनुष्य को जिजीविषा का संकेत देते हैं।
विकट रात/एक दिया बताये/उसे औकात ।
संघर्ष गीत/नदी गुनगुनाती/जीना सिखाती ।
कठिन जीवन के लम्बे सफर को बड़ी सावधानी से तय करना होता है । चाँद को छूना भले ही असंभव हो, परंतु कोशिश जरुरी है ।
लम्बा सफर/टूटती जिन्दगानी/सँभल चल ।
शायद छू लें/आओ कोशिश करें/चाँद छूने की ।
कविता में स्मृति, कल्पना आदि का भी महत्व होता है । अनेक हाइकु स्मृतियों के मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं, तो अनेक हाइकु कल्पना के द्वारा बिम्बों को सजीव कर देते हैं । कहीं - कहीं उच्च कोटि का दर्शन भी व्यक्त हुआ है ।
गहन वन/स्वयं को ढूंढ रहा/अस्थिर मन ।
भारतीय काव्य साहित्य में, मानवीय परिप्रेक्ष में प्रकृति चित्रण की सुदीर्घ परम्परा रही है । प्रकृति चित्रण में ऋतु-संकेत का सुनियोजन जापानी हाइकु में भी प्रमुखता से हुआ है । प्रदीप जी के प्रकृतिपरक हाइकु में पर्याप्त ऋतु-संकेत हैं । सूर्य, धूप, चाँदनी, झरने, नदी, पक्षी, फूल-पत्तियाँ, लता, वृक्ष, कोंपलें, चाँद, तारे आदि के मानवोचित् क्रिया व्यापारों की कलात्मक प्रस्तुति इनके अनेक हाइकु में दृष्टिगत हो रही है ।
उलीच रही/आँसुओं को आँखों से/धूप अकेली ।
फैलाये डैने/पहाड़ की कोख से/फूटे झरने ।
शिशिर रात/खाँसता रहा चाँद/तारे उदास ।
जानते दुःख/झरे हुए पत्ते ही/पतझर का ।
सीमाएँ टूटीं/नयी पत्तियाँ अब/इठला फूटीं ।
इसप्रकार हाइकुकार ने प्रकृति के अनेक पदार्थों को नये-नये प्रतीकों से, बिम्बों से, उपमानों से सज्जित किया है । धरती को लालिमा बाँटता सूर्य, परियों को थपकियाँ देती चाँद की धूलि, आँखों से आँसुओं को उलीचने वाली एकाकी धूप, प्रभात को बुलाने के लिए स्वागत-गीत गाता हुआ सूरज, सुबह से पहले ही धूप बीनने वाला पर्वत, वृक्षों के कक्षों से इठला कर फूटने वाली नयी कोंपलें, पहाड़ की कोख से फूटते हुए झरने, सूखे हुए तालाब, धरती के तृषित प्राण, माँ की गोद में अग-जग भूलने वाला सूर्य-शिशु, टूटी हुई शाखों पर बसेरा ढूंढती चिड़ियाँ, लोकगीत की लय चुराने वाला पवन, विदा के गीत गुनगुनाते टूटते पत्ते, बादलों के छा जाने पर रूठे चाँद-सूरज को मनाती हुई हवा, मुट्ठी में धूप लिये सबको सुखी करने वाला सूर्य, परिमल बाँटने वाला मलय आदि-आदि मानव की समान्तरता में ही अपने अस्तित्व का प्रकटन करते हैं ।
अन्त में, आशा, विश्वास और नैरन्तर्य को संकेतित करता हाइकुकार का एक उत्कृष्ट हाइकु दृष्टव्य है --
नयी कोंपलें
लगी है निकलने
जगी उम्मीदें ।
प्रकृति-बोध से सम्पन्न, संवेदना के उच्च धरातल पर रचित 'प्रकृति की गोद में' संग्रह के हाइकु अपने कथ्य एवं शिल्प में विशिष्ट हैं, जिनका हिन्दी काव्य साहित्य में, निश्चित ही, महत्वपूर्ण स्थान रहेगा । ऐसी प्रस्तुति के लिए श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" बधाई के पात्र हैं । अनेकानेक मंगलकामनाओं के साथ ।
--- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित
जी - 91, सी, संजय गाधी पुरम
लखनऊ -226016 (उ.प्र.)
मो. 9412549904
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हाइकु मंजूषा (पत्रिका)
हाइकु मंजूषा
समसामयिक हाइकु संचयनिका
त्रैमासिक हाइकु पत्रिका
संपादक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रकाशन वर्ष - 2006
हाइकु मंजूषा में रचनाकारों को प्रकाशित करने का उद्यम
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समकालीन हाइकु
1. डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव
बजती कहीं
छिपी पंख बाँसुरी
गूँजे अरण्य ।
लगे साँकल
पथ के पग रुके
लक्ष्य विफल ।
चाँदनी स्नात
विजन में डोलता
मन्द सुवात ।
फूलो जो खिले
बहार सज गयी
दुल्हन जैसी ।
2 डॉ. राजेन्द्र बहादुर सिंह
पवन संग
नाचते गाते पौधे
उर उमंग ।
स्वार्थ की नदी
अपने में समेटे
सदी की सदी ।
लू के थपेड़े
लगते तन में ज्यों
गरम कोड़े ।
मंगलामुखी
ऊपर से प्रसन्न
मन से दुखी ।
3. सत्यप्रकाश त्रिवेदी
जीवन जीना
विसंगतियों में है
गरल पीना ।
हुआ बेदर्द
जमाने ने दिया है
अनेखा दर्द ।
विवश नारी
जीवन की डगर
खोजती फिरी ।
बेटे का लोभ
छीन लिया बेटी को
जन्म से पूर्व ।
4. डॉ. राजेन जयपुरिया
कारी बदरी
बरसी, बह गई
कोरी-गगरी ।
उड़े तीतर
खड़-खड़ संगीत
डूबा पीपर ।
कनखियों से
हेर गये साजन
झरे सावन ।
द्वार का नीम
बन गया हकीम
रोग ना झाँके ।
5. डॉ. रामनारायण पटेल
शिला कंधों से
ढो रहा दिनकर
थका, लुढ़का ।
अदृश्यलय
भीतर सुनता हूँ
मैं न मेरा हूँ ।
मेघ की पाती
चातक चोंच छुए
प्रेम-अर्पण ।
काश ! मिटता
दरार पड़े हिम
राम-रहीम ।
6. मुकेश रावल
खुली खिड़की
प्रकृतिका सौन्दर्य
चमका सूर्य ।
आँखों के मोती
देखकर पाया था
अपनापन ।
अकेला घड़ा
पनघट की याद
निभाती साथ ।
तुम नहीं तो
चूड़ियों की खनक
संगीत चुप ।
7. डॉ. भगवतशरण अग्रवाल
टूटे अक्षर
गहराये सन्नाटे
काँपते हाथ ।
पंख बिना भी
उड़ती रही आयु
धरती पै ही ।
देखा औ सुना
पढ़, भोगा और गुना
काम न आया ।
स्वार्थ के लिए
रिश्ते बाँधते हम
पत्थरों से भी ।
8. मनोज सोनकर
यादें विपक्ष
सुने नहीं दलील
शोर में दक्ष ।
बाज न आए
मदमस्त बाजरा
सूँड हिलाये ।
राजा तो हटे
ससके कुरसियाँ
वंश आ उठे ।
टूटन बड़ी
सफर बड़ा लंबा
सामने अड़ी ।
9. प्रो. आदित्य प्रताप सिंह
हँसता जन्मा
रोता सानंद जिया
हँसता गया ।
यह वजूद
पकड़ते रहिए
पारे की बूँद ।
मौन घाटियाँ
उल्टी सीधी पल्थियाँ
निकट... दूर...।
हिम में कूक...
कहाँ ? प्रिया कंठ में...
गर्म हवा रे ।
10. नरेन्द्र सिंह सिसोदिया
प्रजातंत्र ही
लूटतंत्र बना है
बोले कौन है ।
सत्य-असत्य
झंझावात मन के
परेशान क्यों ?
कौन मानता
कुरान का आयतें
इस्लाम में ।
उलझन में
बेचैन रहती है
मानस बुद्धि ।
11. पूनम भारद्वाज
शीतन छाँव
है क्षणिक सुखों सी
मिलती कहाँ ।
नभ के तारे
असंख्य होकर भी
तम से हारे ।
ओढ़ निलका
सतरंगी दुशाला
इन्द्रधनुष ।
ग़ज़ल बन
सजते होंठों पर
कितने गम ।
12. वाई. वेदप्रकाश
चलते हुए
मैं भी नहीं था यहाँ
कोई है कहाँ ?
आर या पार
लड़ाई का मैदान
जीत या हार ।
मिलेगा तुझे
सपनों में आता जो
मन का मीत ।
हँसते हुए
गाता रहा हूँ मैं
जीवन गीत ।
13. भूपेन्द्र कुमार सिंह
तन पतंगा
मिटने को तत्पर
देख दीपक ।
मन दर्पण
टूटा फिर कैसे हो
कुछ अर्पण ।
होते बिछोह
रुलाता है बहुत
किसी का मोह ।
कारण हठ
हुआ न फिर मन
कभी निकट ।
14. रामनरेश वर्मा
सत्य की बात
अटपटी हो तो भी
लाए मिठास ।
कहे विद्वान
हिन्दुस्तान की जान
हिन्दी महान ।
दुष्ट गुर्राया
कुछ बड़बड़या
शान्ति भगाया ।
निर्भय बनो
अन्याय के विरुद्ध
संघर्ष करो ।
15. बद्रीप्रसाद पुरोहित
नेता समझें
देश को चारागाह
चरें जी भर ।
आधि व्याधि से
घिरी दुनिया सारी
बचा ही कौन ?
नाम सेवा का
काम है कसाई सा
खाली कमाई ।
आनंद पाना
हर कोई चाहता
पाता विरला ।
16. कु. नीलम शर्मा
शब्द श्रृंगार
कविता है दुल्हन
कागज शेज ।
जीवन डोर
बहुत कमजोर
हम पतंग ।
आँसू कहते
आँखों से बहकर
मन की व्यथा ।
माँ का आँचल
स्नेह से सराबोर
देता है छाँव ।
17. डॉ. राजकुमारी शर्मा
देवी-गरीबी
सदियों से जवान
होगी न बूढ़ी ।
क्षुब्ध हो बढ़ा
पूर्णिमा का रीत को
सागर-जल ।
ईश्वर सच
बाईबिल, कुरान
गीता भी सच ।
सर्वनाम ही
साजिशें रचते हैं
संज्ञा के लिए ।
18. डॉ. शरद जैन
लोग दोगले
आदर्श खोखले हैं
स्वर तोतले ।
बरसे मेघ
कूक उठी कोयल
मन घायल ।
ये प्रजातंत्र
बंदर की लंगोटी
एक कसौटी ।
शस्त्रों की होड़
बमों में है शायद
शांति की खोज ।
19. नलिनीकान्त
बुझेगा दीप
अंचरा न उघारो
पूरबा मीत ।
धूप का कोट
पहनकर खड़ा
होरी का बेटा ।
सिन्धु से सीखा
गरजना मेघों ने
यही संस्कार ।
सराय नहीं
आसमान में कहीं
बादल लौटो ।
20. अशेष बाजपेयी
गम इसका
नश्वर संसार में
कौन किसका ?
सूर्य ढला है
अंधेरे ने छला है
दुखा पला है ।
फूल जो खिला
घर के आंगन में
भाग्य से मिला ।
यह जीवन
है कठिन प्रमेय
रेखा अज्ञेय ।
21. सूर्यदेव पाठक पराग
यश की ज्योति
अनन्त काल तक
चमक देती ।
ओ प्यारे बीज !
अगर जमना है
मिट्टी से जुड़ो ।
गीता की वाणी
कर्म की संजीवनी
जग-कल्याणी ।
उषा सहेली
हौले से गुदगुदाती
कली मुस्काती ।
22. ओ.पी. गुप्ता
जुड़ना अच्छा
रिश्ते देते सहारा
समीप – आओ ।
दाग लगता
हर बदन पर
पग धरते ।
नून तेल का
भाव बता नहीं है
मौज करेंगे ।
चढ़ोगे यदि
उतरना भी होगा
जीना-मरना ।
23. सदाशिव कौशिक
भोले सूर्य को
निकलते ही फांसे
बबूल झाड़ी ।
पानी बरसें
टपरे वाले लोग
भूखे कड़के ।
उड़ने लगे
पहाड़ हवा संग
राई बन के ।
फूल महके
पौधे बेखबर थे
हवा ले गई ।
24. डॉ. सुधा गुप्ता
दाना चुग के
उड़ते गए पाखी
आँगन सूना ।
कौन पानी पी
बोलती री चिड़िया
इतना मीठा ।
हँसा तमाल
श्याम का स्पर्श हुआ
बजी बाँसुरी ।
पहाड़ी मैना
टेरती रुक-रुक
जगाती हूक ।
25. मनोहर शर्मा
साँप दूध पी
उगले न जहर
संभव नहीं ।
जिंदगी जीना
आसान काम नहीं
वेदना पीना ।
संवेदनायें
हो रहीं अवधूत
हुए हैं भूत ।
आधी गागर
छलकत जाये रे
गधा गाये रे ।
26. शैल रस्तोगी
सोई है धूप
तलहटी जागती
थकी लड़की ।
फूले कनेर
महकी यादें, मन
टीसती पीर ।
लिखती धूप
फूल फूल आखर
भागती नदी ।
आँखें पनीली
धुँधलाया आकाश
दिखे ना चांद ।
27. रमेश कुमार सोनी
मौत तो आयी
जिंदा कोई न मिला
वापस लौटी ।
याद रखना
भीड़ पैमाना नहीं
कद माप का ।
अकेला चाँद
साथ मेरे चलता
रात में डरे ।
पत्थर पूजा
ईश्वर मानकर
कुछ न मिला ।
28. कमलेश भट्ट
गर्मी बढ़ी तो
बढ़ा ली पीपल ने
हरियाली भी ।
आग के सिवा
और क्या दे पाएगा
दानी सूरज ।
खुद भी जले
धरा को जलाने में
ईर्ष्यालु सूर्य ।
टंगे रहेंगे
आसमान में मेघ
कितनी देर ?
29. डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल
पत्थर भी क्या
सज सकते कभी
डालियों पर ।
हाथ से गिरे
मोती कूदते हुए
दूर हो गये ।
रेत समेटे
गिलहरियाँ घूमे
राम न चूमे ।
नदी थी नीली
अब नाला हो गई
पाप धो गई ।
30. रमेशचन्द्र शर्मा
धँसा सो फँसा
दलों का दलदल
मुक्ति कठिन ।
लीला वैचित्र्य
पल-पल प्रसन्न
प्रभु के भक्त ।
वर्जित शब्द
गूढ़ रहस्य मृत्यु
अस्तित्वहीन ।
आतंकवाद
बेटा ही बाप बना
गले की फाँस ।
31. डॉ. मिथिलेश दीक्षित
चाँद शिशु है
चाँदनी में है खिली
उसकी हँसी ।
बुझ न जाएँ
टिमटिमाते दीप
जागो जिन्दगी ।
पानी की कमी
आँसू टपका रही
पानी की टंकी ।
मानव तन
क्षित, जल, पावक
वायु, गगन ।
32. उर्मिला कौल
शीशा वो शीशा
टूटता आदमी भी
कण चुगूँ मैं ।
बीज अंकुरा
पात-पात पुलका
आया पावस ।
यादों के मोती
चली पिरोती सुई
हार किसे दूँ ?
कुहासा भरा
मन, कहाँ झुकूँ मैं
मंदिर गुम ।
33. कमलाशंकर त्रिपाठी
माँ की छवि मैं
क्या कुछ अन्तर है
कोई कवि में ।
पावस घन
उतरे नीलाम्बर
हरषे मन ।
आ गये कंत
पावस के संग ज्यों
आया बसंत ।
कामना वट
आश्रय पाते आये
तृष्णा के खग ।
34. डॉ. इन्दिरा अग्रवाल
भारत ! राम
विजय सुनिश्चित
पाक ! रावण ।
गीता का स्वर
तरंग जल स्वर
स्निग्ध मधुर ।
मेरा जीवन
ज्वालामुखी का फूल
आग ही आग ।
मन भटके
यत्र-तत्र-सर्वत्र
तृषा न बुझे ।
35. जवाहर इन्दु
महुआ बाग
रस पीती कोयल
पंचम राग ।
तृषा अधूरी
कब होती है पूरी
हमेशा दूरी ।
मौसम गाये
गली-गली महकी
पाहुन आये ।
नदी बहेगी
आँसू नहीं अमृत
दर्द सहेगी ।
(इन हाइकुओं का संकलन सृजन-सम्मान के सरिया विकासखंड (रायगढ़ जिला) के अध्यक्ष श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ने अपनी पत्रिका 'हाइकु मंजूषा' में किया है । वे छत्तीसगढ़ के युवा हाइकुकार हैं ।
- जयप्रकाश मानस
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
30/03/2006 आलेख
हाइकु सप्तक (हाइकु ग्रंथ)
हाइकु सप्तक
हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ सात हाइकुकार
सम्पादक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रकाशन वर्ष - फरवरी 2006
हाइकु सप्तक : संपादक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
[ हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ हाइकुकारों का परिचय, हाइकु एवं उनके हाइकु संबंधी विचार ]
प्रकाशक : माण्डवी प्रकाशन, गाजियावाद [ उ. प्र. ]
प्रकाशन वर्ष : फरवरी - 2006 मूल्य : 100/-----
समीक्षक : ----- प्रो. आदित्य प्रताप सिंह
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सहज पके सो मीठा । यह सहजता ही कठिन है । सार्थक ध्वन्यात्मकता ही हाइकु की जान है । यह सहज - कला आते आते आती है ।
हाइकु वाटिका के बाद हाइकु सप्तक का भी प्रकाशन श्री प्रदीप कुमार दाश 'दीपक' के अचुक साहस का निर्देशन है । यहाँ सात हाइकुकार रचनाओं , विचारों के साथ हाजिर और नाजिर हैं । उनकी आलोचना करना मेरा उद्देश्य नहीं है ।
ढेर सारे संकलनों के बीच यह हाइकु का नवतर तारसप्तक है । रहेगा । संकलन में 24×7=168 सागरी बूँदों से समर है यह सप्तक । समर पुत्रों को मेरा प्रणाम है ।
त्रिपथगा ( गंगा ) की ये बूँदें प्रदीप कुमार दाश 'दीपक' की साधना को सूचित करती है । वे सदा हाइकु जगत के नव भागीरथ के रूप में स्मरण किए जाते रहेंगे । सदा...
इधर हाइकु जगत में एक शोरीदा सन्नाटा छा गया था । प्रो. सत्यभूषण चले गए । हाइकु भूषण खो गया । हाइकु के नामी पक्षधर भगवतशरण कंपवात से ग्रस्त हो गए । मैं 76-77 का हो गया । रात बचूँगा तो सुबह देखूँगा । जन्म क्रमानुसार यहाँ हाइकु साधकों का चयन और यह संकलन सन्नाटों को तोड़ता है । कहा है -----
खामोशी बज्म का दस्तूर हुई जाती है ।
बोलो तो कुछ हंगामा हो ।।
यह कोलाहलों का नहीं । रचनात्मक साहसों का हंगामा है । मौन भी, मुखर भी । दोनों को समोता है हाइकु । 'दीपक' जी ऐसे दीपक हैं जिसके तले अँधेरा नहीं । प्रकाश है / हाइकु का प्रकाश ।
हाइकु सूरज के बीज हैं । हों । होते - रहें - नित नए ( हाइकु हायकू ) रिचाएँ ( ऋचाएँ )
इति आदि शुभम् ।
-- प्रो .आदित्य प्रताप सिंह
चिरहुला, रीवा (म.प्र.) Pin - 486001
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हाइकु सप्तक ; संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
(हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ सात हाइकुकारों के हाइकु, परिचय एवं उनके विचार)
प्रकाशक : माण्डवी प्रकाशन गाजियावाद lSBN-81-8212-089-6
प्रथम संस्करण : फरवरी 2006 पुस्तक मूल्य : 100/-------
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हाइकु - विधा को पूर्णतः समर्पित कृतिकारों में तेजी से उभर रहा नवीनतम नाम श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" का है । "हाइकु वाटिका" में पौने चार सौ हाइकुकारों को सफलतापूर्वक सजाकर यशभागी होने के बाद वे "हाइकु सप्तक" ले कर आये हैं । इसमें हिन्दी के सात ख्यातिलब्ध हाइकुकारों को उनके चौबीस-चौबीस हाइकुओं के साथ प्रस्तुत किया गया है । इन हाइकुकारों की श्रेष्ठता विवाद से परे है और कोई भी हाइकु संग्रह या हाइकु ग्रंथ इनके योगदान एवं उल्लेख के बिना पूर्ण नहीं हो सकता । क्रम का आधार वय को बना कर संपादक ने अपनी रक्षा भी की है ; अन्यथा इन सर्वश्रेष्ठों में श्रेठतम कौन ? का धर्म संकट भी उत्पन्न होता । हिन्दी हाइकु के पितामह प्रोफेसर सत्यभूषण वर्मा को समर्पित इस ग्रंथ को सर्वांग सम्पन्न बनाने के लिए तीन खण्डों में विभक्त किया गया है । परिचय खण्ड, सृजन खण्ड एवं विचार खण्ड नामक ये तीनों खण्ड पुरोधाओं के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं विचार संपदा से समृद्ध हैं ।
अब समय आ गया है कि हिन्दी हाइकु का देश - काल वातावरण परक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हो, उसे एक अजूबा न मान कर एक विधा, एक छंद या शैली मान कर चला जाय । अपने ही योगदान अथवा उद्धरणों की चर्चा पाठक को विरक्त कर सकती है । दूसरों को जाने बिना कोई स्वयं का विश्लेषण भी नहीं कर सकता, मूल्यांकन दूर रहा । "दीपक" जी इसके अपवाद हैं । वे चाहते तो सरलता से इन्हीं सप्त पुरोधाओं में सम्मिलित हो कर यशः प्रार्थी बन जाते पर बड़े तटस्थ भाव से उन्होंने स्वयं को नेपथ्य में रख कर हाइकु की सेवा को ही प्राथमिकता दी है, जो अत्यंत श्लाघ्य है । "हाइकु वाटिका" भी उनकी वस्तुनिष्ठ दृष्टि का उत्तम उदाहरण है, जो उनके सौंदर्य बोध की अच्छी संभावनायें प्रस्तुत करता है । प्रस्तुत कृति के अंत में दी गई देश व्यापी सम्मतियाँ उनके श्रम को सार्थक करती हैं और उन्हें समर्थ साधक सिद्ध करती हैं । मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि यह ग्रंथ भी उनके यश की श्रीवृद्धि करेगा और उनकी भावी योजनाओं को सफलता के सर्वोच्च शिखरों तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होगा । मुझे इसका भी विश्वास है कि सुधी रचनाकार सदा इन श्रेष्ठों से प्रेरणा प्राप्त करेंगे और मात्रा से अधिक गुणवत्ता को प्रश्रय देंगे ।
□ श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी
द्वीपान्तर, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग
फतेहपुर (उ.प्र.) 212601
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हाइकु वाटिका (साझा हाइकु संग्रह)
हाइकु वाटिका
साझा हाइकु संग्रह
प्रकाशक : माण्डवी प्रकाशन गाजियावाद (उ.प्र.)
संपादक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रकाशन वर्ष - फरवरी 2004
हाइकु वाटिका [साझा हाइकु संग्रह] संपादक - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रकाशक : माण्डवी प्रकाशन, गाजियावाद (उ.प्र.)
प्रकाशन वर्ष : फरवरी 2004 मूल्य : 100/----
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समीक्षक : -- डाॅ. भगवत शरण अग्रवाल
सम्पादक : हाइकु भारती
हाइकु वाटिका : हिन्दी हाइकु के बढ़ते चरण
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हिन्दी काव्य क्षेत्र में पिछले 05,06 वर्षों में हाइकु - विधा का विकास जिस तीव्रता से हुआ है, उसे देख कर मुझे आश्चर्यमिश्रित आनंद का अनुभव हो रहा है । यह और बात है कि शुद्ध-हाइकु कम और हाइकु छंद अधिक लिखे जा रहे हैं । किन्तु हाइकु छंद लिखने वाले समर्थ कवि कभी न कभी, कुछ न कुछ शुद्ध हाइकुओं की रचना भी करेंगे, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है ।
अपार हर्ष की बात है कि हिन्दी के अनेक समर्थ कवि इस विधा की ओर आकर्षित हुए हैं । हाइकु लेखन के इस संक्रांतिकाल में हाइकु रचनाओं का प्रकाशन कर हाइकुकारों को प्रोत्साहन तथा नव हाइकुकारों दिशानिर्देशन देने का प्रयास, मैं हाइकु-भारती पत्रिका के माध्यम से किया है, किन्तु वह काफी नहीं है ।
हाइकु का एक छंद के रूप में स्वीकार कर, अनेक हाइकुकारों ने हाइकु छंद में प्रबंध काव्य , गीत, भँवरगीत, गजल, मुक्तकादि की सुंदर रचनाएँ भी की हैं और फिर संक्रातिकाल में सभी रचनाओं से, विधा के सभी लक्षणों की पूर्ति की अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिए । अभी हाइकु विधा को अनेक यज्ञ की ज्वालाओं में तप कर निखरना बाकी है, और इस प्रयास में उठाये गये प्रत्येक कदम का हमें स्वागत करते हुए सराहना करनी चाहिए । साँकरा जैसे एक कस्बे से श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जो स्वयं भी एक सुंदर हाइकुकार हैं, के द्वारा "हाइकु वाटिका" का प्रकाशन उसी लक्ष्य की ओर बढ़ता एक कदम है और मैं इसका हार्दिक स्वागत करने का प्रस्ताव आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ ।
प्रस्तुत ग्रंथ के प्रारंभ में उन्होंने अकारादि क्रम में 54 हाइकुकारों का सचित्र परिचय तथा प्रश्नोत्तरी के माध्यम से हाइकु संबंधी उनके कुछ विचारों का परिचय देने के पश्चात प्रथम खंड में उनके चुने हुए कुछ हाइकु दिए हैं । दूसरे खंड में 68 हाइकुकारों की रचनाएँ संकलित की हैं और तृतीय खंड में अन्य 249 हाइकुकारों की रचनाएँ हैं । इस चयन का आधार वरिष्ठता के आधार पर न हो कर, सामग्री की उपलब्धता के आधार पर किया गया लगता है । मैं इस तथ्य का साक्षी हूँ कि प्रदीप कुमार जी ने सामग्री प्राप्त करने के लिए पत्रिकाओं के माध्यम से अनुरोध किये, व्यक्तिगत संपर्क किये और तब भी कुछ हाइकुकारों ने अपनी व्यस्तता, अस्वस्थता अथवा आलस्य के कारण सामग्री न भेज पाने के परिणाम स्वरूप कुछ महत्वपूर्ण हाइकुकार प्रथम खंड के स्थान पर दूसरे अथवा तीसरे खंड में आ गये हैं । इतने सारे हाइकुकारों के नाम, पते, रचनाएँ इकट्ठा करना कम श्रमसाध्य कार्य नहीं है । इसके लिए संपादक श्री प्रदीप कुमार जी ने विभिन्न पत्रिकाओं, संकलनों आदि से भी सामग्री एकत्र की है । फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि अब तक के प्रकाशित सभी संकलनों से अधिक हाइकुकारों का संकलन "हाइकु वाटिका" बन गया है ।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दी हाइकु-जगत में इस संकलन का हार्दिक स्वागत होगा और हिन्दी हाइकु के बढ़ते चरणों को गतिशील करने में प्रदीप कुमार दाश "दीपक" का यह प्रदान महत्वपूर्ण सिद्ध होगा ।
-- डाॅ. भगवत शरण अग्रवाल
सम्पादक : हाइकु भारती
396, सरस्वती नगर, अहमदाबाद - 380015
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रूढ़ियों का आकाश (सेनरियू संग्रह)
रूढ़ियों का आकाश
- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
[ हिन्दी का प्रथम सेनरियू संग्रह ]
प्रकाशन वर्ष - अगस्त 2003
समीक्षा : रुढ़ियों का आकाश
"रुढ़ियों का आकाश" प्रदीप जी द्वारा रचित हिन्दी का प्रथम सेनरियू संग्रह
सेनरियूकार : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" समीक्षक : डाॅ. सुधा गुप्ता
प्रकाशन : माण्डवी प्रकाशन प्रकाशन वर्ष : 2003 पुस्तक मूल्य : 35/----- रुपये मात्र
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हाइकु विषयक गम्भीर अध्ययन के अभाव में हाइकु और सेनरियू का अन्तर स्पष्ट नहीं था । अस्तु !
ईस्वी सन् 2003, अगस्त माह में श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" का सेनरियू संग्रह "रुढ़ियों का आकाश" प्रकाशित हुआ । तरुण हाइकुकार ने अपनी संक्षिप्त भूमिका "स्वकथन" में जो कुछ कहा है, उससे सुस्पष्ट है कि दीपक जी को हाइकु-सेनरियू का वस्तु-बोध सम्बन्धी अन्तर 'हस्तामलकवत' है, वह पूर्णतया निभ्रांत हैं, सेनरियू-संग्रह का शीर्षक तथा शीर्षक सेनरियू भी यही उद्घोष करते हैं :आओ तोड़ने/रूढ़ियों का आकाश/लगा फैलने ।
"दीपक" जी ने 'स्वकथन' में एक बिन्दु पर और भी बल दिया है ---- "यहाँ एक बात मैं कहना चाहूँगा कि एक अच्छा व्यंग्य जहाँ हृदय को सीधा चोट करता है, वहाँ उसमें पीड़ा व करुणा के भाव भी सन्निहित रहते हैं । इस तरह देखा जाए तो एक अच्छा सेनरियूकार केवल हास्य-व्यंग्य से ही सेनरियू नहीं लिखता, अपितु वह पीड़ा-बोध अथवा करुणता-भाव से भी सेनरियू रच सकता है ।"
"दीपक" जी के सेनरियू-संग्रह में व्यंग्य के तीखे प्रहार हैं :
हा.. गणतंत्र / रोता रहा है गण / हँसता तंत्र ।
लाश ही लाश/मरी आदमीयत/आदमी ज़िन्दा ।
कुत्ते ने भौंका/सिखा दिया भौंकना/आदमी को भी ।
कानूनी घोड़ा/जिधर फेंको पैसा/उधर दौड़ा ।
देश की राजधानी में दिन-प्रतिदिन बढ़ते अनाचार से क्षुब्ध हृदय का तीखा व्यग्य :
दिल्ली को हम/मानते दिल, पर/साँपों का बिल ।
दिल्ली में चैन/संविधान खामोश/लोग बेचैन ।
महँगाई की मार से अल्प आय वर्ग का बुरा हाल करुणा उपजाता है :
जेब है खाली/राशन की तारीख़/आयी दिवाली ।
सब के गाल / मँहगाई की मार / हो गये लाल ।
राजनीति के दूषित वातावरण तथा देश के नेताओं के 'गिरगिट चरित्र' ने सेनरियूकार को बहुत पीड़ा पहुँचाई है :
नेता से सीखा/थूक कर चाटना/ये भी है कला ।
नेता रावण / लोकतंत्र सीता का / किया हरण ।
संसद के अजीबोग़रीब हालात देख-सुन कर सेनरियूकार कह उठता है :
उछल रहे / सड़क से संसद / भालू-बंदर ।
तथा ----
ख़ूनी सड़कें/धृतराष्ट्र कानून/सज़ा दे किसे ।
साम्प्रदायिकता एवं जातिवाद के कारण समाज लहूलुहान है । "धर्म" की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा है :
बने ज़ालिम / भाइयों को लड़ाने / राम-रहीम ।
आजादी के छप्पन वर्ष बाद भी सर्वहारा वर्ग की क्या दुरावस्था है, यह किसी से छिपा नहीं । स्कूल जाने, पढ़ने और जीवन का निर्माण करने वाली उम्र में शैशव का संताप जिन्हें झेलना पड़ रहा है, कोई उनकी करुण गाथा नहीं बाँचता :
देश के बच्चे/कचरों के ढेर पे/भविष्य ढूँढे ।
इस सेनरियू - संग्रह में एक सौ बारह सेनरियू हैं । सभी सशक्त, प्रभावशाली एवं अपने उद्देश्य में सफल हैं ।
["पानी माँगता देश" से साभार]
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- समीक्षक : डाॅ. सुधा गुप्ता
"काकली" 120 बी/2 , साकेत
मेरठ - 250003 (उ.प्र.)
मइनसे के पीरा (छत्तीसगढ़ी का प्रथम हाइकु संग्रह)
मइनसे के पीरा
-प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
छत्तीसगढी़ का प्रथम हाइकु संग्रह
प्रकाशन वर्ष - 2000
छत्तीसगढ़ी हाइकु संग्रह : मइनसे के पीरा : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
छत्तीसगढ़ी का प्रथम हाइकु संग्रह : प्रकाशक - छ. लेखक संघ सरिया
MAINSE KE PEERA पुस्तक मूल्य : 25 /-- संस्करण वर्ष : 2000
मइनसे के पीरा जन्य हाइकु : समीक्षक - प्रो. आदित्य प्रताप सिंह
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"पीरा" दीपक के संकलन का मेरु है । पीरा से ही मानव प्राणियों का सुमेरु है । हाइकु संकीर्ण सनकी क्षणिका मात्र नहीं , वह क्षण के सांस में विकास का , मानव का भूत वर्तमान और भविष्य का त्रिक है । त्रिपुण्ड । यथा ----
हँसा बंदर
हुआ आदमी रोया
विभू विकसा ।
यहाँ हँसा - रोया विकसा तीन क्रियाएँ हैं । मनुष्य और मनुष्यता का विकास (01) बंदर, (02) आदमी, (03) विभू में यह हाइकु का वामन समेटता है । आदमी रोया तब विभू (देव) हुआ ।
दीपक ने हाइकु लिखे हैं और सिनरियू (व्यंग्य) भी उनके कलन के केन्द्र में "पीरा" है । पीरा से ही आदमी जीवित हीरा होता है । निर्जीव हीरा से महत्तर ।
दीपक के हाइकु पढ़ने, सुनने और गुनने से लगता है कि उनमें उत्तम हायकूकार की प्रतिभा प्रच्छन्न है । हिंदी में ढेरों हाइकु संकलन हैं, पर अधिकांश हाइकु/हायकू के लिए कच्चे माल हैं, खाद हैं, वे हायकू या हाइकु नहीं । अनेक नामों से हाइकु हजारों लोगों द्वारा लिखे जा रहे हैं, पर लेवलों से क्या होता है ? हाइकु तभी सार्थक होते हैं, होंगे, जब वे दूज के चाँद में पूनों की झलक पैदा करें - मोती में समुद्र की छवि । हायकू का देवता साधारण के असाधारणत्व में है । "अरुंधती" ने इसे God of small things कहा है ।
दीपक जी ने मजे में हाइकु कहे और लिखे हैं ---
(01) बापू के फोटू
आफिस मा बुहाथे -
ओकर आँसू ।
☆☆☆
(02) गमकत हे
संगी के मया अऊ
भूईं के माटी ।
☆☆☆
(03) विकट रात
एक दीया बताथे
ओला औकात ।
☆☆☆
विकट रात - तिमिर बिम्ब है और एक दीया उसका विरोधी आलोक बिम्ब है --- जो रात को उसकी औकात बता देता है । संभवतः यह संकलन का सर्वश्रेष्ठ हायकु है : सफल और सार्थक भी । प्रायः हिंदी और गुजराती में हइकु, हायकू या हाइकु नाम से लिखे गये हैं पर उनमें विरोधी बिम्बों तीखी आँखों की भंगिमा या स्पंदों की कमी खलती है । दीपक छत्यीसगढ़ी का हायकू दीपक है । कहीं कहीं उनके मुक्तक-मुक्ता के तेवर देखते बनते हैं ----
देवता रीझे
मनखे का चीज ए,
पथरा सीझे ।
यहाँ "अरथ अमित, आखर थोरे" वाली बात है । यही तो हाइकु का मर्म है । "पथरा सीझे" क्या कहना है । बहुत खूब । यह हाइकु त्रिवाक्यांशी है ----- द्विक्रिय भी । रीझे और सीझे दो क्रियाएं हैं । सीझे शब्द में कवि बहुत सी अर्थ गूंजें बरामद कर लाया है । वह यहाँ मानव की गरिमा और महिमा स्थापित करने में सफल है । वास्तव ऐसे (हाइकु/हायकू) लिख पाना यह सूचित करता है कि दीपक का भविष्य उज्ज्वल है । यह निविड़ निशा के लिए चुनौति है । रात की आँख में किरकिरी है और उसके कवि की आँखों में "मइनसे के पीरा" की किरकिरी ( A graind of sand in eye ) है --- यह मौलिक पीरा ही उनकी प्रेरणा है । शक्ति है ।
दीपक जी ने एक वाक्य के दो वाक्यांशी और त्रिवाक्यांशी हाइकु भी लिखे हैं । त्रिवाक्यांशी हाइकु उत्तम होते हैं । दो वाक्यांशी मध्यम और एक वाक्यांशी अधम । उनके तीन क्रियाओं का ( त्रिवाक्यांशी हाइकु ) है । यथा ------
कहे मा कछू
अऊ जब देखबे
करे मा कछू ।
यहाँ कहे - देखबे और करे तीन क्रियाएँ - तीन - पदांश रचती हैं । कहीं - कहीं उनके हाइकुओं की सहज बक्रता मन मोह लेती है ----
दिल के बिल
निकरथे कविता
अरे मुसवा !
यह हाइकु अक्रिय और सक्रिय का निदर्शन है । साथ में सचित्र रुपकांश भी । दूसरा रुपकांश और लुप्तोपमा से माँ का सुप्त उत्प्रेक्षण ध्वनित और शिल्पित हुआ है ------
जाड़े मा ओस ( आँसू लुप्तोपमा )
प्रकृति महतारी ( रूपक )
बिखेर दिस । ( मानो )
दीपक कहीं-कहीं विभावना ( अलंकार ) द्वारा रौद्र ( क्रोध ) की भावना ध्वनित कर देते हैं --- सानुभाव और सहाव । ऐसी चेष्टाएँ ----- विभाव - भाव और अनुभाव को संकलित कर लाती हैं ----
अब्बड़ रोस
बिन गोड़ मा साँप
कूदय लेथे ।
ऐसे हायकु हिंदी में कम ही हैं । यहाँ अद्भूत ( भयांश ) और रौद्रांश के साथ भावना और विभावना की अकृत्रिम ( अलंकार ) ध्वनि है ।
कहीं - कहीं भावोष्णा और अनुभूत के चित्रांश "दीपक" के यहाँ प्रयुक्त हुए हैं -------
देखत रह..
बुहा जाही ऊमर
ह. ह. नदिया... ।
ह ह ( अहह ) शब्द यहाँ दंशक है ---- जिसे जापानी में "किरेजि" कहते हैं । तथाकथित हिन्दी हाइकु में जापानी हाइकु का साहित्य है । केवल उसका ट्रेडमार्क है । प्रसन्नता की बात है कि दीपक के यहाँ जापानी हाइकु के गुणों की कुछ झलकियाँ हैं । मर्म छवियाँ हैं । उनके ऐसे हाइकु / हायकू ही "गुदड़ी के लाल" हैं । हिन्दी हाइकु के कचरों के ढेर में ये दीप्त स्फुलिंग हैं । निष्कर्ष है कि हाइकु के नाम पर जो निशा स्तूप है उसमें दीपक सूर्य के सूचक हैं ।
□ प्रो. आदित्य प्रताप सिंह
रींवा ( म.प्र. ) PIN - 486001
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俳句 : हाइकु - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
दीपक राग
हाइकु
01.
आरती थाल
जीवन चक्र राग
दीप आलाप
02.
रे ! लौ संताप
सृजन का आलाप
दीपक राग ।
03.
जलता दिया
बुलंद हैं हौंसले
तन सहमा ।
04.
दीये जलाती
माचिस की तिलियाँ
कभी घर भी ।
05.
दीप से मिला
प्रेम की पराकाष्ठा
जला पतंगा ।
06.
दीप जो जला
अज्ञान का अंधेरा
भाग निकला ।
07.
साहसी दीप
लड़े अंधकार से
पर आदमी ।
08.
दीपक जला
पर वह तो स्वयं
तम में पला ।
09.
बत्ती जलती
मोम सह न सका
पिघल पड़ा ।
10.
दीप जलता
हृदय में उसके
प्रेम पलता ।
11.
दीप निर्मम
प्रेम करने वाले
जले पतंग ।
12.
छोटा दीपक
तिमिर हरण का
बने द्योतक ।
13.
दीपक जला
रोशन कर चला
जग समूचा ।
14.
अंधेरी रात
एक दीप बता दे
उसे औकात ।
15.
राह दिखाता
हथेली में सूरज
बन के दीया ।
16.
दीया तो नहीं
सदियों से जलते
तेल व बाती ।
17.
राह दिखाता
जगमग करता
नन्हां सा दीया ।
18.
दीप से दीप
मिल कर मनाते
ज्ञान उत्सव ।
19.
ज्योत से ज्योत
जलता जला दीया
बनी मालिका ।
20.
दीप निर्मम
मिलन के बहाने
जले पतंग ।
21.
दीया व बाती
अंधेरे से लड़ने
बनते साथी ।
22.
प्रीत पुरानी
दीया और बाती की
कथा कहानी ।
23.
निशा घनेरी
पर दीपक की लौ
चीर डालती ।
24.
दीप सम्मुख
थकी, हारी व झुकी
निविड़ निशा ।
25.
शब्दों के दीप
सुर की बातियों से
बने संगीत ।
26.
जलता रहा
रात भर दीपक
सिसक रहा ।
27.
कहता दीप
आनंद है अमृत
वेदना विष ।
28.
मोम न बनो
पिघल ही जाओगे
इस दीप से ।
29.
जल दीपक
अज्ञानता चीरते
बुझना मत ।
30.
बूढ़ा दीपक
रात भर जागता
दिन में सोया ।
31.
पर्व मनाएँ
शुभकामनाओं के
दीप जलाएँ ।
32.
दीप जलाएँ
तम को पी जाने का
हूनर सीखें ।
33.
दीये तो नहीं
सदियों से जलते
घी और रुई ।
प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
ताँका : 短歌 - प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
तांका : -----
01.
तड़ित घात
चम चम चमकी
बारिश रात
टप. टप. टपकी
लय से बूँदें आज ।
☆☆☆☆☆☆☆
02.
शैल खण्डों में
जाग उठी चेतना
आस्था से प्रीत
बहे प्राण उसके
बन निर्झर गीत ।
☆☆☆☆☆☆☆
माँ पर कुछ हाइकु
माँ
हाइकु
--0--
माँ का आँचल
छँट जाते दुःख के
घने बादल ।
माँ केवल माँ
'उप' उपसर्ग से
खोती महिमा ।
ममत्व गंध
ममता का आँचल
जीवन धन्य ।
मातु चरण
चारों धाम का पुण्य
तेरी शरण ।
लिखा माँ नाम
कलम बोल उठी
ये चारों धाम ।
---00---
- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
_____________________________________________
प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
जन्म : 10 अगस्त 1979
शिक्षा : एम.ए. द्वय [ हिन्दी साहित्य व राजनीति शास्त्र ] , बी.एड., CG SET उत्तीर्ण ।
प्रकाशित कृति :
● मइनसे के पीरा - 2000 छत्तीसगढ़ी का प्रथम हाइकु संग्रह
● हाइकु चतुष्क - 2000 [ हिन्दी, उड़िया, छत्तीसगढ़ी व संबलपुरी हाइकु संग्रह ]
● संवेदनाओं के पदचिह्न - 2002 [ काव्य संग्रह]
● रूढ़ियों का आकाश - 2003 [ हिन्दी का प्रथम सेन्रियू संग्रह ]
● प्रकृति की गोद में - 2017 [ हाइकु संग्रह ]
अनुवादित कृति :
● वंदे मातरम् - 2017 [ उपन्यास ]
सम्पादित कृति :
● प्राची - 2001 [ म.वि.वार्षिक पत्रिका ]
● जागृति - 2002 [ विद्यालयीन पत्रिका ]
● कबीर एक दृष्टि - 2003 [ समालोचना ]
● हाइकु वाटिका - 2004 [ साझा हाइकु संग्रह ]
● हाइकु सप्तक - 2006 [ हाइकु ग्रंथ ]
● हाइकु मञ्जूषा - 2006 [ हाइकु त्रैमासिक के कुल 07 अंक ]
● झाँकता चाँद - 2017 [ साझा हाइकु संग्रह ]
● ताँका की महक - 2017 [ ताँका संकलन ]
● कस्तूरी की तलाश - 2017 [ विश्व का प्रथम रेंगा संग्रह ]
● हाइकु मञ्जूषा - 2017 [ साप्ताहिक 01 - 50 अंक संचयन ]
● छत्तीसगढ़ की हाइकु साधना - 2017 [ साझा हाइकु संग्रह ]
रचनाओं का प्रकाशन : कविताश्री, हाइकु-भारती, मरु गुलशन, साहित्य अमृत, कोशल प्रहरी, राष्ट्रभाषा, अभिनव इमरोज, हाइकु 2009, शत हाइकुकार साल शताब्दी, हाइकु दर्पण, हाइकु मञ्जरी, अदबी माला, संगम संकल्पना, सीप में मोती, हिन्दी हाइकु प्रकृति-काव्य कोश, प्रवाह, हाइकु- काव्य विश्वकोश आदि राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिका, विशेषांक व विभिन्न साझा संग्रहों में प्रचुर कविताएँ, हाइकु, सेनरियू, ताँका, चोका, सेदोका, हाइबन, क्षणिकाएँ, लेख, शोध लेख, कहानी, संस्मरण आदि रचनाओं का नियमित निरंतर प्रकाशन ।
सम्मान : कोविद, दीनबंधु, राष्ट्रभाषा रत्न, राष्ट्रभाषा आचार्य, शास्त्री, लोक कवि कबीर पुरस्कार, राष्ट्रीय युवा साहित्यकार सम्मान, मैन आॅफ द इयर - 2001, राष्ट्रभाषा प्रचारक, सरस्वती प्रतिभा सम्मान, रवीन्द्रनाथ टैगोर लेखक पुरस्कार, अंबेडकर फैलोशिप सम्मान, धन्नाजी नाना चौधरी पुरस्कार, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, हाइकु मञ्जूषा रत्न सम्मान, हाइकु द्रोण सम्मान, श्रेष्ठ संपादक रत्न सम्मान, हिन्दी सेवी सम्मान, साहित्य के दमकते दीप साहित्यकार सम्मान, बालमुकुन्द गुप्त साहित्य सेवा सम्मान, राष्ट्रभाषा आचार्य में भारत में प्रथम स्थान हेतु स्वर्ण पदक प्राप्त, गुजरात विश्वविद्यालय से रजत स्मृतिचिह्न प्राप्त तथा भारत के कई हिन्दी साहित्यिक संस्थानों द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित ।
सम्प्रति : हिन्दी व्याख्याता, शा.उ.मा.वि. रजपुरी, वि.ख. - सीतापुर, जिला - सरगुजा ( छ.ग. ) PIN - 497111
स्थायी संपर्क : साहित्य प्रसार केन्द्र साँकरा, जिला - रायगढ़ ( छ.ग. ) PIN - 496554
मोबा. नं. 7828104111, 8120616061
ईमेल पता : pkdash399@gmail.com
ब्लाॅग : haikumanjusha.blogspot.in
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