हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

शनिवार, 20 जून 2020

हाइकुकार सूर्यदेव पाठक "पराग" जी के हाइकु

हाइकुकार 

सूर्यदेव पाठक "पराग"

हाइकु 
--0--

माता की साँस 
शिशु की धड़कन 
पाती जीवन ।

फूलों की गंध 
कंटकों की चुभन 
यही जीवन ।

चाँद सलोना 
रजनी मुख पर
लगा डिठौना ।

खिली चमेली 
खुशबू अलबेली 
नई नवेली ।

धरती पर
ममता सदा रोती 
माँ जो न होती ।

नन्हाँ सा शिशु 
माँ का दिया संस्कार 
घुट्टी में पाता ।
---0---

□ सूर्यदेव पाठक "पराग"
मढौरा, जिला- सारण (बिहार)
पिन - 841418

शुक्रवार, 19 जून 2020

~ हाइकुकार शंम्भू सिंह रघुवंशी जी के हाइकु ~

हाइकुकार 

शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
हाइकु

मासूम कली
सदा दबी मसली
फिर भी फली ।

कलिका चली
भगवान को भली
पीढियां जलीं ।

सुमन कली
पाशविकता खली
सरिता गली ।

मैं रामकली
उदर में मचली
आई धवली ।

फुलबगिया
परिवार कलिका
अश्रुछलिका ।

तट हमारा
ढूंढते पतवार
तुम्हारे द्वार ।

नदी किनारे
संगम इतराएं
गंगा नहाते ।

देखते कूल
समय प्रतिकूल
जीवन धन ।

जीव विकट
असमंजस तट
ये मरघट ।

दूर किनारा
अखिलेश सहारा
फिरता मारा ।
---0---

□ शंम्भू सिंह रघुवंशी "अजेय"
 मगराना, गुना (म. प्र.)

~ हाइकुकार दिनेश रस्तोगी जी के हाइकु ~

हाइकुकार


दिनेश रस्तोगी 

हाइकु 
--0--

मानव वन
करुणा,प्रेम,दया
ईश सर्वत्र ।

साफ रखिये
हृदय का दर्पण
हरि दर्शन ।

देश अपना
लुटेरे भी अपने
यही तो रोना ।

मचले तन
कसमसाता मन
लगी लगन ।

सूरज अस्त 
संध्या हो रही मस्त 
दोनों अभ्यस्त ।

मोह के पत्ते
सूख सूख गिरते
वृक्ष बुढ़ापा ।

तितलियों के
फूलों से थे इशारे
हम तुम्हारे ।
---0---

□ दिनेश रस्तोगी

~ हाइकुकार राजकुमार चौहान जी के हाइकु ~

हाइकुकार

राजकुमार चौहान "भारतीय"

हाइकु 
---0---

धरा थी मौन
घेरा है विपदा ने
दोषी है कौन ।

कहा सलाम
हैं साजिशें दिल में
प्यार धड़ाम ।

ये तानाबाना
रखा ही रह जाना
भजो राम रे ।

तू दयालु है
उबारेगा बला से
मैं अकिंचन ।

भूला नहीं मैं
याद मुझे तू रख
मत परख ।

तम धड़ाम
पूर्व से सूरज का
हुआ सलाम ।

उगा सूरज
एक आस जगी है
भागेगा तम ।

सुख औ दुख
दो किनारे हैं साथ
सिखाते ज्ञान ।
---0---

□ राजकुमार चौहान "भारतीय"
शिवपुरी (म.प्र.)

~ हाइकु कवयित्री साधना कृष्ण जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

साधना कृष्ण 


हाइकु 
--0--

सावन आया
विहँसे भू पहन
हरा वसन ।

उदास पाखी
तलाश रही पानी
सुखी नदियाँ ।

जीवन गति
मौन अनवरत
करती काम ।

सपने मेरे
शीश महल सम
टूटे बिखरे  ।

गीतिका गंध
मदहोश अंतस
भावाविभोर ।

नेह का धन
बेसुमार पास जो
कैसी गरीबी ।

बहती नदी
बस यही कहती
चलते रहो ।

उफनी नदी
कहती रही सदा
धीर रे मन ।

सूखी नदियाँ
जल में प्यासी
भोगती सजा ।

पड़ते रज
बोल उठा पाषाण
ताड़े मुझको ।

सोचे  पाषाण
कलकल नदियाँ
प्यास बुझाती ।

ख्वाहिश बुने
परिंदे बैठ अपने
सुघर नीड़ ।

नन्ही चिड़िया
उडती गगन में
सोती घोंसला ।

नयन करे
बेहद मनमानी
हो बदनामी ।
     
रीत पुरानी
रखना बचा कर
आँखों का पानी ।

बाली धान की
खेतों में खुशहाली
हुलसे मन ।

मंद पवन 
बहे  चहुँ ओर ही
कम्पित तन ।

उतरी प्राची
बिखरी चहुँ ओर
स्वर्णकिरण ।

□ साधना कृष्ण

~ हाइकुकार बलजीत सिंह जी के हाइकु ~

हाइकुकार
बलजीत सिंह 

हाइकु

---0---

         
मांस न अंडा
शाकाहारी भोजन
कलेजा ठंडा ।

          
अंधविश्वास
सामाजिक बुराई
घर का नाश ।

       
चाकू न छुरी
बड़ी ख़तरनाक
               नज़र बुरी ।                  

           
बहानेबाजी
जैसे टूटी प्लेट में
सब्जियां ताजी ।

     
घोड़े न हाथी
जीवन की गाड़ी को
धकेले साथी ।

    
लंगड़ा-अंधा
रोटी ही करवाये
सबसे धंधा ।

     
फूल न डाली
जब कटा बगीचा
रो पड़ा माली ।

    
चाचा-भतीजा
स्वार्थ के चूल्हे पर
पकाये पिज्जा ।

      
सोना न चांदी
समय बलवान
रानी को बांदी ।

   
नेक इंसान
खरीद कर जख्म
बांटे मुस्कान ।
---00---

□ बलजीत  सिंह
ग्राम / पोस्ट - राजपुरा  ( सिसाय )
जिला -  हिसार (हरियाणा) पिन - 125049
Email-- baljitsinghrajpura77@gmail.com
------------------------------------------------------

हाइकुकार आरविलि आशेन्द्र लूका जी के हाइकु

हाइकुकार

आरविलि आशेन्द्र लूका 

हाइकु 
--0--

न बिखरना
ज़िंदगी को आज़मा
रख हौसला ।

दिल के रिश्ते
किस्मत से बनते
सम्भालें इसे ।

तकते नैन
विरह की अगन
आओ सजन ।

प्रेम गागरी
करुणा रस भरी
स्नेहिल मातृ ।

टूटे सपने
रूठे सब अपने
मनाऊं कैसे ?

प्रभु हमारा
दुःख भंजनहारा
तारणहारा ।

झांकता सूर्य
अलसाई सी धूप
मेघों के बीच ।

मां की ममता
गई है लाने दाना
चूज़ा है भूखा ।
---0---

□ आरविलि आशेन्द्र लूका
ओम नगर, जरहाभाटा बिलासपुर 
(छत्तीसगढ़)

गुरुवार, 18 जून 2020

हाइकु कवयित्री आशा लता सक्सेना जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

आशा लता सक्सेना 

हाइकु 
--0--

वह  गुलाब 
मैं कंटक उसका 
बचे रहना ।
--0--

प्यार दुलार 
पर्यायवाची लगे 
प्रेम स्नेह के ।
--0--

नहीं भ्रमित 
टूट गया बंधन 
अनुराग का ।
--0--

स्नेह माता का 
अनुराग प्रिया का 
जाने न देता ।
--0--

सागर सीपी 
एक स्थान पर हैं  
मोती है खरा ।
--0--

पानी मोती का 
नूर चेहरे का है 
सच्चा परखा ।
--0--

□ आशा लता सक्सेना

~ हाइकु कवयित्री शर्मिला चौहान जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

शर्मिला चौहान 

हाइकु 
---0---

मेघ बरसे
भीगी धरा गमके
प्रेम महके ।

बरसे पानी
नवांकुर फूटते
चूनर धानी ।

पेड़ लगाएँ
पाले सींचे बढ़ाएँ
धरा बचाएँ ।

जीवन भर
देते वायु भोजन
ऋणी है जन ।

जिंदगी चली
लेकर कई बलि
कमियां खली ।

वर्ष बीतेंगे
अपनों से दूरियां
दिल रीतेंगे  ।

दुनिया सारी
मृगतृष्णा सी ढूंढे
राह निराली ।

मन की प्यास 
दिन गिना करता
शुभ की आस ।

परीक्षा घड़ी
जिंदगी सहमी सी
व्यथित खड़ी ।
---0---

□ शर्मिला चौहान

~ हाइकु कवयित्री मधु शुक्ला जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

मधु शुक्ला 

हाइकु 
--0--

चिंता सताये
हैरान परेशान
बेटी की शादी ।
---0---

प्रतियोगिता
कृत्रिम व्यवहार 
चिंता प्रदाता ।
---0---

बेरोजगारी
ये चिंता का विषय 
शिक्षा व्यवस्था ।
---0---

लाॅक डाउन
काम काज ठप्प है 
रोटी की चिंता ।
---0---

स्वार्थपरता
अपने में मगन
देश की चिंता ।
---0---

जीवन शैली
बदले मान दंड
कल की चिंता । 
---0---

चिंता चिता है
सुलगता इंसान
रहो सजग ।
-----0-----

□ मधु शुक्ला
सतना (मध्यप्रदेश)

~ हाइकु कवयित्री कविता कौशिक जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

कविता कौशिक 

हाइकु

1) 
बीजारोपण
उगेगा  वृक्ष  रूप
देगा जीवन ।
-----------------------
2) 
फूँक दी जान
न आयी  बूँदें फिर
उदास  मन ।
-----------------------
3) 
धरा  संभालो
लहरायेंगे ये  पेड़ 
झूमेगा मन ।
-----------------------
4) 
धधकी ज्वाला
आग झुलसा रही 
प्यासी है धरा ।
-----------------------
5)
महका मन
मिल गया  चमन
सौंधी सुगंध ।
-----------------------
06) 
संत कबीर 
झाँके अंतरमन 
खोजे बुराई ।
-----------------------
07) 
रक्षक मेरा
सेना देश की शान
दूजा किसान ।
-----------------------
08) 
मुट्ठी  में  रेत 
झूठी आशाएँ साथ
व्यर्थ आभास ।
-----------0-----------

□ कविता कौशिक
नागपुर (महाराष्ट्र) पिन - 440018

हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 
डाॅ. सुरंगमा यादव

हाइकु 
--0--

पत्र विहीन
सहमीं-सी डालियाँ 
लगतीं दीन ।

मौन क्रंदन 
सुनता प्रतिध्वनि 
व्याकुल मन ।

दुःख पहाड़ 
अभिव्यक्तियाँ मौन
झरते नैन ।

रेत में पाँव 
वेगवती लहरें 
टक्कर मारें ।

लिखो तो सही
संवेदना के गीत
गायेगी सदी ।

रखते वीर
तरकश में तीर
सोच के साधें ।

अधिक मीठा 
कड़वा-सा लगता
थोड़ा हो तीखा ।

झड़ीं पत्तियाँ 
अनमनी डालियाँ 
सूनी है गोद ।
--0--

□ सुरंगमा यादव

मंगलवार, 16 जून 2020

~ हाइकुकार ऋतुराज दवे जी के हाइकु ~

हाइकुकार
ऋतुराज दवे 

हाइकु 

(1)
मोती से भाव  
शब्दों के सागर में
तैरें विचार ।

(2)
नौकाएँ बन
आसमाँ के सागर
तैरते घन ।

(3)
भटकी राह
ईच्छाओं के सागर
मन की नाव ।

(4)
रत्नों से भरे
सागर या जीवन
दोनों गहरे ।

(5)
रवि को देख
सागर की बाहों में
फिसले मेघ ।

(6)
प्रेम  कीमती 
हृदय के सागर 
भावों के मोती ।

(7)
सागर भेजे 
बादल उपहार 
धरा के पास ।

(8)
सागर सार 
रत्नो का उपहार 
निगला खार  ।

(9)
शर्म का बोध
पश्चाताप सागर
डूबता क्रोध ।

(10)
तैरते सारे 
काले सागर में 
दीपक तारे ।
---0---

□ ऋतुराज दवे

गुरुवार, 11 जून 2020

~•~ हाइकुकार वीरेन्द्र जैन जी के हाइकु ~•~

हाइकुकार

वीरेन्द्र जैन 

हाइकु 

--0--


अंतिम श्वास 
गंगाजल से भरी
दवा की शीशी ।
--0--

ब्रेल लिपि में
लिखा घाटी पे बोर्ड 
अंधा घुमाव ।
--0--

सूखे पत्ते पे
लिखा अधूरा ख़त 
बंद संदूक ।
--0--

हिना का रंग
रच गया हाथों में 
ख़त पिया का ।
--0--

खिड़की पर
तोते की आंख लगी 
मिर्ची का पौधा ।
--0--

इंडिया मुक्त
भारत हो अपना
सोन चिरैया ।
--0--

गूंजती ध्वनि
मंदिर के प्रांगण
बाजे मृदंग ।
--0--

गिरा दरख़्त
सूना पड़ा आंगन
अंतिम यात्रा ।
--00--

□ वीरेन्द्र जैन 

लक्ष्मीनगर, नागपुर (महाराष्ट्र)

रविवार, 7 जून 2020

हाइकुकार डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही" जी के हाइकु

हाइकुकार 

 डॉ. राजेन्द्र सिंह "राही"


हाइकु

--0--


1.
तपती धूप 
सड़क पे श्रमिक
चूता पसीना । 

2.
आया संकट 
सुरक्षित महल 
उड़ी झोपड़ी । 

3.
चलता राजा
शतरंज की बाजी 
लड़ते प्यादे । 
--00--

□ डाॅ. राजेन्द्र सिंह "राही"

शनिवार, 9 मई 2020

~ हाइकुकार पद्ममुख पंडा जी के हाइकु ~

हाइकुकार 

पद्ममुख पंडा

हाइकु
-0-

1.
प्रचण्ड ग्रीष्म
मानव जीवन को
देता है कष्ट ।

2.
मजदूर को
मिलती है मजूरी
गर्मी खाकर ।

3.
कटते वन
जगती भर अब
बढ़ा आतप ।

4.
विवश सब
दिहाड़ी मजदूर
पेट की ज्वाला ।

5.
कोरोना रोग
जो है संक्रामक
तन दाहक ।
--0--

□  पद्म मुख पंडा

शुक्रवार, 1 मई 2020

श्रमिकों पर हाइकुकार राकेश गुप्ता जी के हाइकु

हाइकुकार 

राकेश गुप्ता 

हाइकु 

ये मेहनतकश


लौह  धमक
खुद्दार स्वेद कण
फौलादी मन ।

चमक स्वर्ण
सीने पे सलवटें
निरोग  तन ।

मेहनतकश
मांसपेशियाँ तप्त
ढीठ खनक ।

ज्योत  निराले
शान्त सुप्त जंगल
बहते नाले ।

खुशियाँ पीते
खुद के जख्म सीते
चैन से जीते ।
--0--

□  राकेश गुप्ता

~ श्रम दिवस के उपलक्ष्य श्रमिक पर हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

पूर्णिमा साह


हाइकु 
--0--

1.
कोरोना काल
मजदूर बेहाल
रोटी सवाल ।

2.
श्रम का दान
श्वेद नहाया तन
कर्म महान ।

3.
श्रमिक दर्द
गाँव को पलायन 
ढूँढता कर्म ।

4.
सड़क घर
अभिशाप गरीबी
श्रमिक दर्द ।

5.
श्रम निराश
कोरोना का संत्रास
क्षुब्ध है आस ।

6.
उद्योग बंद
मजदूरी पाबंद
अंतस द्वंद ।
---00---

□  पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल 

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