हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

मंगलवार, 11 मई 2021

चित्र आधारित ताँका सृजन प्रतियोगिता (मई-2021)


 ~ चित्र आधारित ताँका सृजन प्रतियोगिता ~

हाइकु ताँका प्रवाह 

माह - मई 2021, क्र. 13 


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चित्र

*प्रविष्टि के ताँका*


01. निर्मला पांडेय


सिर  पे बोझ 

मनुजता  का  लिए 

चला  फरिश्ता 

जीव  जान बचाने 

ढूंढे  नए  ठिकाने ।

++++++++


2. हरीश रंगवानी 


कोरोना काल 

कृष्ण जन्म सा जग 

प्राण बचाते 

वासुदेव डाक्टर  

करे मौत से जंग ।

++++++++


3. ए.ए.लूका


सुरक्षा देते

जोखिम वो उठाते

सेवा करते

योद्धाओं को नमन

करते जो जतन ।

++++++++


4. शीला तापड़िया


चला मसीहा 

लिए आस टोकरी

दुख भंजक

मानवता का व्रती

उतरायेगा पार ।

++++++++


5. राजश्री राठी 


चैन को त्यागे  

लगा प्राण की बाजी 

धरा पे ईश 

रखे है सम दृष्टि 

देते जीवनदान ।

++++++++


6. कविता कौशिक 


सैलाब  आया

भयभीत  संसार 

तेरा आधार 

पार लगा दें नैया

एक तेरा सहारा ।

++++++++


7. प्रकाश कांबले 


कृष्ण आएंगे

वे लाज बचाएंगे

भूलें तो ठीक 

कर्णधारों सजग 

कर्ण बन के कर ।

+++++++++


8. अमिता शाह 


कोरोना बाढ़

रोग फैला प्रगाढ़

पार लगाते

चिकित्सक दे सेवा

बने हैं वासुदेवा ।

++++++++


9. मधु सिंघी 


बड़ा हमला

बचे मानव जाति 

फैला कोरोना

संकट की घड़ी है

मुँह बाये खड़ी है ।

+++++++++


10. विद्या चौहान 


रोग सलिला

करवाते हैं पार

निभाते फर्ज़

ईश के अवतार

बचा रहे संसार ।

++++++++


11. गंगा प्रसाद पांडेय "भावुक"


कोरोना योद्धा

सतत लड़ रहा

बचाने हेतु

कीजिये सहयोग

निर्मूल हो विषाणु ।

+++++++++


12. पूर्णिमा सरोज


कैसे हो पार?

विषाणु का सागर

मानव बचे 

चिकित्सक के पांव

लगा जीवन दांव ।

+++++++++


13. सुषमा अग्रवाल 


पार कराते

कोरोना वैतरणी

बन के ब्रम्ह

वैद्यनाथ हमारे

खुद हुए शिकार ।

++++++++


14. निर्मला हांडे 


देवदूत हूँ

जीताकर जाऊंगा

परीक्षा कैसी

सिर पे मेरे बच्चे

कोरोना दैत्य नीचे ।

+++++++++


15. देवयानी बनर्जी 


कोरोना कंस 

पार कराये वैद्य

गरल नदी

सृष्टि बीज की रक्षा

कृष्ण नाम सुरक्षा ।

++++++++


16. शर्मिला चौहान 


आक्रांत जन

विषाणु जलजला

पार ले चला

वसुदेव हौंसला

डाॅक्टर लिए बढ़ा ।

++++++++


17. रति चौबे 


आकुल दृग 

तिथी ना बन जाएं

व्याकुल मन 

घिरा  वायरस  से 

पहन मानवता ।

++++++++


18. रूबी दास


करोना काल

महासंग्राम शुरू

विश्व बेहाल

लिये जा रहे तुम

शस्त्रहीन  मानव ।

++++++++


19. पूनम मिश्रा "पूर्णिमा"


एक विषाणु

धरा पर तांड़व

करे तबाही 

कहानी हर घर

बचा रहे डॉक्टर ।

++++++++++


20. राकेश गुप्ता 


तूफां में नाव

हँसते गाते बच्चे

जाएँगे  पार

साथ  जब  ईश्वर

माँ कहें या डॉक्टर ।

+++++++++++++


प्रथम अंतर्राष्ट्रीय वर्चुअल हाइकु सम्मेलन

 मनुमुक्त 'मानव' ट्रस्ट द्वारा अंतर्राष्ट्रीय  हाइकु सम्मेलन आयोजित

चौदह देशों के दो दर्जन हाइकुकारों ने की सहभागिता

       नारनौल। मनुमुक्त 'मानव' मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा 'वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय हाइकु-सम्मेलन' का आयोजन 09 मई 2021 को किया गया, जिसमें छह महाद्वीपों और भारत, नेपाल, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूएई, मॉरीशस, रूस, बल्गारिया, जर्मनी, ट्रिनिडाड, अमेरिका और कनाडा सहित चौदह देशों के लगभग दो दर्जन हाइकुकारों ने सहभागिता की। चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास 'मानव' के प्रेरक सान्निध्य तथा डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में संपन्न हुए इस ऐतिहासिक हाइकु-सम्मेलन में केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, भारत सरकार, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष अनिल जोशी ने बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए कहा कि हाइकु लिखने से पूर्व इसके मूल स्वरूप को समझना आवश्यक है। लखनऊ (उत्तर प्रदेश) की वरिष्ठ हाइकुकार, साहित्यकार तथा समीक्षक डॉ मिथिलेश दीक्षित ने, हाइकु का उद्गम-स्थल भारत को बताते हुए, अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि भारत का 'ध्यान' शब्द जापान में जाकर 'जेन' हो गया तथा बाद में इन्हीं जेन संतों द्वारा जापान में हाइकु प्रचलित हुआ। उन्होंने अनेक हाइकु भी प्रस्तुत किए। उनका एक हाइकु था- रस झरता/जीवन में जब हो/समरसता। इससे पूर्व विषय-प्रवर्तन करते हुए चीफट्रस्टी डॉ रामनिवास 'मानव' ने स्पष्ट किया कि भारतीय परिवेश में ढलकर ही हाइकु भारत में लोकप्रिय हो सकता है।


        इस अवसर पर प्रिंस्टन (अमेरिका) के विख्यात कवि अनूप भार्गव ने स्पष्ट किया कि हाइकु जैसी छोटी विधा के माध्यम से भी बड़ी बात कही जा सकती है। उनका एक हाइकु देखिए-धरती ओढ़े/बरफ की चादर/सूरज फाड़े। हिंदी सांस्कृतिक केंद्र, टोक्यो (जापान) की अध्यक्ष तथा 'हिंदी की गूंज' पत्रिका की संपादक डॉ रमा पूर्णिमा शर्मा ने हाइकु द्वारा  मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति की बात कही। उनका चर्चित हाइकु था-बहन दूर/ले हाथों में राखी/तकती राह। मॉरीशस हिंदी अकादमी, मौका के अध्यक्ष डॉ हेमराज सुंदर ने 'सीना छलनी/गोली खाते सिपाही/देश हो कोई' कहकर पुलिस के बलिदान को रेखांकित किया, वहीं ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) की ई-पत्रिका 'भारत दर्शन' के संपादक रोहितकुमार 'हैप्पी' ने अम्मा का महत्त्व कुछ यूं बताया- आंखों में नमी/बेगाना लगे घर/अम्मा की कमी। टोरंटो (कनाडा) की प्रमुख हाइकुकार डॉ शैलजा सक्सेना का विशिष्ट हाइकु था-छोटी-सी बात/कागज पर उतरी/बन हाइकु। कोलोन (जर्मनी) की डॉ शिप्रा शिल्पी का उन्मुक्त प्रेम के संबंध में कहना था- कुटिल मन/नाबालिग यौवन/रोंदता तन। सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) की रेखा राजवंशी ने मां के प्यार-दुलार का महत्व स्पष्ट करते हुए कहा- मां का दुलार/खील और बताशा/जीने की आशा। नारनौल (हरियाणा) प्रख्यात हाइकुकार डॉ रामनिवास 'मानव' ने वर्तमान हालात पर कुछ यू चिंता प्रकट की-हालात ऐसे/सत्यमेव जयते/कहें तो कैसे। रायगढ़, (छत्तीसगढ़) के हाइकुकार प्रदीप कुमार दाश ने माँ की महिमा का उल्लेख किया- लिखा माँ नाम/कलम बोल उठी/है चारों धाम । पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड) की आशा मोर का भी एक हाइकु देखिए- शिला अहिल्या/ इंतजार राम का/जड़ चेतन।


   सहभागिता : अब तक के विश्व के इस सबसे बड़े हाइकु-सम्मेलन में टोक्यो (जापान) की डॉ रमा पूर्णिमा शर्मा, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) की रेखा राजवंशी, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार 'हैप्पी', (मौका) मॉरीशस के डॉ हेमराज सुंदर और इंद्रदेव भोला, दुबई (यूएई) के डॉ नितिन उपाध्ये, चितवन (नेपाल) की रचना शर्मा, मास्को (रूस) की श्वेतासिंह 'उमा', सोफिया (बल्गारिया) की डॉ मोना कौशिक, कोलोन (जर्मनी) की डॉ ‌ शिप्रा शिल्पी, पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड) की आशा मोर, अमेरिका से कैलिफोर्निया की डॉ अनीता कपूर और अर्चना पांडा, न्यूयॉर्क की डॉ रजनी भार्गव और प्रिंस्टन के अनूप भार्गव तथा भारत में नई दिल्ली की डॉ नीलम वर्मा, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) के प्रदीपकुमार दाश, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) की डॉ मिथिलेश दीक्षित तथा हरियाणा से हिसार के डॉ राजेश सरदाना 'जीवंत' और‌ नारनौल के डॉ रामनिवास 'मानव' ने, हाइकुकार के रूप में, सहभागिता की।


 विशिष्ट उपस्थिति : लगभग अढाई घंटों तक चले इस महत्त्वपूर्ण हाइकु-सम्मेलन में विश्वबैंक, वाशिंगटन डीसी (अमेरिका) की अर्थशास्त्री डॉ एस अनुकृति और कंसलटेंट प्रो सिद्धार्थ रामलिंगम, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू की पत्रिका 'समकालीन साहित्य' के संपादक डॉ पुष्करराज भट्ट, पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड) के साहित्यकार दिनेश मोर, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली के सहायक निदेशक डॉ दीपक पांडेय, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के प्रतिष्ठित साप्ताहिक 'विश्व-विधायक' के संपादक मृत्युंजयप्रसाद गुप्ता, नई दिल्ली के प्रख्यात पत्रकार राहुल देव, ट्रस्ट की दिल्ली प्रभारी उर्वशी अग्रवाल 'उर्वी',  ट्रस्टी डॉ कांता भारती, शिमला (हिमाचल प्रदेश) की उज्ज्वल राठौड़, जयपुर (राजस्थान) की सुषमा भार्गव, सतना (मध्य प्रदेश) के अरविंदकुमार शुक्ल, सोलन (हिमाचल प्रदेश) की सुनीता चांदला, इंदौर (मध्य प्रदेश) के राजीव नामदेव, नई दिल्ली की डॉ पूर्णिमा कात्यायनी, सुरेंद्र गंभीर, सुनीता पाहुजा, जया आर्य, रेखा शर्मा और चित्रा गुप्ता तथा नारनौल (हरियाणा) के डॉ जितेंद्र भारद्वाज, कृष्णकुमार शर्मा, एडवोकेट आदि की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही ।

रविवार, 9 मई 2021

हाइकु कवयित्री विद्या चौहान जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

विद्या चौहान 

हाइकु 

--0--

माँ

१.

सर पे हाथ

स्नेहिल माँ का स्पर्श

सुखदायी था ।

    

२.

मीठी सी बोली

सूरत माँ की भोली

सुख की झोली ।

     

३.

आँचल छाँव

अंबर सा विशाल

माँ बेमिसाल ।


४.

कड़ी है धूप

बन छाया अनूप

माँ सुख रूप ।


५.

दिल की बात

समझती जज़्बात

माँ है निष्णात ।


६.

छोटी दुनिया

बसती है उसमें

माँ की ख़ुशियाँ ।


७.

ठंडी बयार

माँ का प्यार दुलार

देती आधार ।


८.

घर की नींव

कांधे बने फ़ौलाद

माँ बुनियाद ।


९.

संध्या का दीप

एहसास दिलाता

माँ है समीप ।


१०.

करूँ प्रणाम

हे नयनाभिराम

माँ सुखधाम ।

---00---


~ विद्या चौहान

   09.5.2021

शनिवार, 8 मई 2021

हाइकु कवयित्री मंजु महिमा जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

मंजु महिमा


हाइकु 

--0--


1.

ग्रीष्म तपन

गुलमोहर हँसे

रक्ताभ ओष्ठ ।


2.

सूरज तपे

सूखे नदिया-नाले

भीगा है तन ।


3.

मानव मन

शुष्क ग्रीष्म सरीखा

करुणा लुप्त ।


4.

विकल मन

तपे तन विरहा

मेहा बुलाए ।


5.

अमलतास

दे रहा अहसास

बसंत जैसा ।


6.

धूप-छाँव की

देखी आँख-मिचौली

छाँव ना मिली ।


7.

ताश के पत्ते

बिछे चादर पर

ग्रीष्म-सौगात ।


8.

गुलमोहर 

रोमांचित पाकर

सूर्य उष्णता ।


09.

रसीली ऋतु

लाई फलों के रस

तन शीतल ।


10.

सूर्य दिन में

कितना भी कुपित

शाम को शांत ।


11.

शाम शीतल

चांदनी का चंदोवा

तना धरा पे ।

---00---


 □ मंजु महिमा

बुधवार, 5 मई 2021

हाइकु कवयित्री अमिता शाह "अमी" जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

अमिता शाह "अमी"


हाइकु 

--0--


1.

सुबह जगी

पंछी गीत गा रहे

होंठ मुस्काए ।


2.

आसमाँ कहे

होंठ के सिरे फैला

हँसीं बिखेर ।


3.

नज़रें घुमा

खुशियाँ चारों ओर

रंगीन फिज़ा ।


4.

दयालु दाता

बरसाओ आशीष

सुखी हों सभी ।


5.

उड़ चला रे

मन बादलों पार

चाँद पियाजी ।


6.

प्रेम भरा है

अमृत रस मिला

कुंभ छलका ।


7.

मिट्टी में चले

आसमाँ तक उठे

उसी में मिले ।


8.

छोटी सी कश्ती

मटमैला सा पानी

बाल कहानी ।


9.

छन के आतीं

पत्तों बीच चाँदनी

दूधिया रात ।


10.

जाना है तय

जमा कर लो प्रेम

जन्म सफल ।

---00---


~ अमिता शाह "अमी"

मेलबाॅर्न, (ऑस्ट्रेलिया)

मंगलवार, 4 मई 2021

~ हाइकु कवयित्री सुधा राठौर जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री 

सुधा राठौर 

हाइकु 

--0--


1.

सुख के पल

ढूँढते हैं बाहर

स्व के भीतर ।


2.

क्यों हो क़ातर

लगन से पढ़िए

ढाई आखर ।


3.

दुख का रेला

मिला किनारे पर

सुख का मेला ।


4.

बाक़ी है दम

हौसला पुरजोर

फिर क्या ग़म ।


5.

तम गहन

होने को है सबेरा

सूर्य का फेरा ।


6.

निराशा क्यों है 

जीते जी मर जाना

तमाशा क्यों है ।


7.

लिखी जितनी

तक़दीर में उम्र

मिले उतनी ।


8.

स्व की सुरक्षा

हमारी ज़िम्मेदारी

छोड़ें न कक्षा ।


9.

हार न मान

बहुत है आसान

हित संज्ञान ।


10.

हास्य मलय

अंतस सुवासित

सुख निलय ।

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~ सुधा राठौर

नागपुर (महाराष्ट्र)

भवानी शंकर "तोसिक" जी के हाइकु

हाइकुकार

भवानी शंकर "तोसिक"

हाइकु

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1.

चंद्र रश्मियां

धरा को निहारती

नहीं हारती ।


2.

शब्दों का काटा

घाव न कभी भरा

ताउम्र हरा ।


3.

होठों पर हँसी

मन में है कटुता

सजा मुखौटा ।


4.

सुन के रोती

पहली किलकारी

नारी माँ प्यारी ।


5.

भीतर मन

कबीर जैसा पाया

मैं मुस्कुराया ।


6.

कोमल कंधे

बस्ते का बोझ भारी

व्यवस्था हारी  । 


7.

रोजी न मिली

बच्चे भूखे सो गए

स्वप्न खो गए ।


8.

अग्नि परीक्षा

मंदिरों के देश में

नारी ही हारी ।


9.

उदय हेतु

डूबना पड़ता है

सूरज को भी ।

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- भवानी शंकर "तोसिक"

आदर्श कॉलोनी, पीसांगन, 

जिला अजमेर (राजस्थान )

पिन - 305204

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

डाॅ. कुँअर बेचैन जी के प्रसिद्ध हाइकु

~ डॉ. कुँअर बेचैन जी के प्रसिद्ध हाइकु ~

हाइकु 

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जल चढ़ाया

तो सूर्य ने लौटाए

घने बादल । 


हुई अधीर 

छुआ जब मेघ ने

नदी का नीर ।


तटों के पास

नौकाएं तो हैं, किन्तु

पाँव कहाँ हैं ? 


ज़मीन पर

बच्चों ने लिखा 'घर'

रहे बेघर । 


रहता मौन

तो ऐ झरने तुझे 

देखता कौन ? 


चिड़िया उड़ी

किन्तु मैं पिंजरे में

वहीं का वहीं ! 


तितली उड़ी

जा बैठी पर्स पर

फूल उदास ।


ओ रे कैक्टस 

बहुत चुभ लिया

अब तो बस ।


आपका नाम

फिर उसके बाद

पूर्ण विराम ! 


मेरी किताबें

भव से पार करें

वो नन्ही नावें ।


लालसाएं हैं

जब तक जीने की

साँस रहेगी ।


□  कुँअर बेचैन


कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच 

एक बड़ी दुःखद घटना

 नीरज जी के बाद मंच पर सराहे जाने वाले 

सर्वाधिक प्रिय कवि, प्रख्यात साहित्य विभूति 

डॉ. कुँअर बेचैन जी नहीं रहे । 

हाइकु मञ्जूषा परिवार की ओर से उन्हें 

अश्रुपूरित 

भावभीनी श्रद्धांजलि ....

 श्रद्धा के फूल 

हे दिवंगत कवि

करें कबूल ।

💐💐💐🙏🙏

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

चित्र आधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता (अप्रैल-2021)

 ~ चित्र आधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता ~

हाइकु ताँका प्रवाह 

माह - अप्रैल 2021, क्र. 12 

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प्रविष्टि के कतौता
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1.
इनके जैसे
बन जाओ जग में
ना करें कोई  तंग ।

पत्थर पृष्ठ 
बन गए  ऐसे ही
नहीं हम में जान ।

कीमत मिले
घर जाऊँ मैं फिर
मिटे भूख हमारी ।

कविता कौशिक

2.
झेल रही है
अस्तित्व का संकट
ये संस्कृति विकट ।

अंतिम सांसें
ले रही लोक कला
बंदा सोच में पड़ा ।

भवरें भरी
जीवन पतवार
नहीं मानुंगा हार ।
                  
नीलम शुक्ला

3.
हाथों  का  खेल 
हुआ  जीविका  मेल 
यही  रेलमपेल ।

भाग्य का  लेखा 
रहता  अनदेखा 
विधान  चक्र रेखा ।

भटकता  मैं 
कठपुतली  हुआ 
नहीं  रैन  बसेरा ।

निर्मला पाण्डेय

4.
नाच न सत्य
कठपुतलियों की 
नचैया ही है सत्य ।

जादूगर ही
सत्य, झूठा मगर
उसकी जादूगरी ।

ईश्वर सत्य
पर सत्य नही न 
अजब मायापुरी ।

देवयानी बनर्जी

5.
काठ पुतली
डोर से बँध कर
इशारो पर नाचे ।

कठपुतली
सूझबूझ न जाने
कहे मन की बात ।

किसके हाथ
बंधी तार की डोर
आज तक न जानी ।

रेशम मदान

6.
दीवारें हंसीं
मूक पुतली देखें
रोजी के रंग फीके ।

नैनन बोली
डोर में बँध जाऊं
तेरी रोटी कमाऊँ ।

बेटी सी लगो
रिश्तों की डोर बंधी
वो दूजे घर डोले ।

शर्मिला चौहान

7.
तू क्यों न जागे
इशारों पे क्यों भागे
अब  तोड़  ये  धागे ।

भाग्य है बली
दुनिया   रंगमंच
हम कठपुतली ।

भूल जाता है
हर  खेलने  वाला
वो भी एक खिलौना ।

राकेश गुप्ता

8.
रंग बिरंगी
ये कठपुतलियाँ
रोजी रोटी साधन ।

मानव सदा
बना कठपुतली
जगत रंगमंच ।

झूठ का दौर
नाचे कठपुतली
नचाये कोई ओर ।

मधु सिंघी

9.
सुनो दास्तान
होती जुंबा हमारी 
कह देते मन की ।
            
हम माध्यम 
लोक-कलाओं हेतु
योजना प्रसार का ।
              
दर्द जानता 
तुझ बेजुबान का
सवाल पेट ‌का है ।

रति चौबे

10.
लोककलाएं
खामोश आज क्यों है
जीवन दर्शन है ।

धर पुतली
सूत्रधार सोचता
उदर कैसे भरूँ ।

सूत्रधार हो
बाँध  धागों मे मुझे
सजीव बना डालो ।

रूबी दास

11.

तमाशे बंद,
बिखरती खुशियाँ 
काठ कठपुतली ।

कोरोना डर
दूर हुई संस्कृति
मौन कठपुतली ।

परेशान हूँ
खामोश है जिंदगी
कठपुतलियां भी ।

पूनम मिश्रा

12.

रूह बेजान
बुत बाँटे मुस्कान
खींचे डोर सुजान ।

मैं  काष्ठ जिस्म
तू माटी का मानुष
नाच रहे हैं दोनों ।

अधीनस्थ मैं
चैतन्य ये दुनिया
पर पीर क्या जाने !

विद्या चौहान

13.
काठ की गुड्डी
अधमरी सी बैठी
सूत्रधार बेजान ।

राणा उदास
उंगली पे पुतली
जिंदगी है वीरान ।

विपन्न स्थिति
हताशा की इंतहा
कला भी हुई तन्हा ।
 
निर्मला हांडे

14.
स्त्री की नियति
जड़ा मुँह पे ताला
कठपुतली बनी ।

स्वाभिमानी हूँ
इशारों पे क्यों नाचूँ
क्या मैं कठपुतली ?

बाज़ारी वस्तु
इसीलिए सजाया
कठपुतली हूँ ना ।

सुधा राठौर

15.
धागों से बंधी 
तकदीर हमारी
है दुनिया नचाती  ।

हे सूत्रधार
तुम हमे नचाते
पेट नचाता तुम्हें ।

डोरी में बंधी
रंगीन कतरनें
किस्से कई सुनाए ।

शीला तापड़िया

16.
तू मेरी कृति
मैं तेरा शिल्पकार
हुए दोनों लाचार ।

बीते वो दिन
जब जमाते रंग
अब सब बेरंग ।

बिन हाथ मैं
डोर बिना हुई तू
दोनों हुए लाचार ।

सुषमा अग्रवाल

17.
कठपुतली
साज़न की जुबानी
नाचे बोल कहानी ।

डोरी वो धरे
नाच ऐसे नचाये
सज़ा कला कहाये ।

मर्जी ना चले
जैसा भी हो पात्र
निभाए सारे गात्र ।

अमिता शाह "अमी"

18.
कठपुतली
लिये हाथ सोचता
डोर किसके पास ।

मानव स्वयं
एक कठपुतली
डोर ईश्वर हाथ ।

कठपुतली
भरती नये स्वांग
जैसा चाहे नियंता ।

गंगा प्रसाद पांडेय 'भावुक'

19.
कठपुतली
विलुप्त होती कला
जीया में जलजला ।

थामेगा कौन
तेरी मेरी ये डोर
मुखरित है मौन ।

बिना नर्तन
हो गई है दुबली
हर कठपुतली ।

अल्पा जीतेश तन्ना 

20.

कठपुतली
जीवन का निर्वाह
लाचार है मनुज ।

ऊपर वाला
रखे अपने हाथ
डोर, नचाये, हमें ।

हम सब ही
प्रभु के हाथ की ही
कठपुतली हुए ।

मीरा जोगलेकर

21.
नियति तेरी
मेरे इशारों पर 
नाच कठपुतली ।

सौंप दे डोर
गिरने नहीं देंगी
कुशल उंगलियाँ ।

कठपुतली
दुनिया एक मंच 
नृत्य तेरा प्रारब्ध ।

रमा प्रवीर वर्मा
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आपके प्रतिभाव

विश्व का प्रथम कतौता संग्रह
विश्व की प्रथम चित्राधारित कतौता सृजन प्रतियोगिता का श्रेय प्रदीप कुमार दाश जी आपके नाम है। यह आनंददायी एवं अविस्मरणीय है।
     अविनाशजी की विधागत निष्ठा, पटल को सतत गतिशील बनाये रखने का उपक्रम एवं रचनाधर्मियों को स्नेह सूत्र में पिरोए रखने की कला बेजोड़ है।
    प्रसन्नता का विषय यह है कि समस्त कतौताकारों ने सहभागिता तो की ही, हर निर्णय का स्वागत खुले दिल से किया । ऐसा अन्यत्र कम ही नज़र आता है।
      "हाइकु ताँका प्रवाह "
निरंतर सरस प्रवाहों से सृजन को नर्म कोमल मर्मरी संवेदन सौंप रहा है।
     लाजवाब तस्वीर
इस बार अनिवार्यतः उल्लेख करना चाहूंगी कि प्रत्येक हस्ताक्षर ने चित्र का मर्म जाना तथा अनुरूप कतौता पेश किया।
कठपुतलियों का भौतिक कलेवर एवं डोरियां
राणा की ऊंगलियों का करतब अंततः ईश्वर और मानव संबंधों को व्यंजित कर गया।
   समस्त विजेताओं का हृदय से  अभिनंदन/आभार ।

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□  इंदिरा किसलय 

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