हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

सोमवार, 9 सितंबर 2019

~ हाइकु कवयित्री रंजना सिन्हा "सैराहा" जी के हाइकु ~


हाइकु कवयित्री 

रंजना सिन्हा "सैराहा"


हाइकु 

1.
पाषाण फोड़
मंजिल बनी धुन
सरिता चली ।

2.
हरसिंगार
पग उषा किरण
पुष्प अर्चन ।

3.
सूर्य किरण
अलोकिक बंधन
उषा के संग ।

4.
पल्लव प्रेम
कलियां कुसुम की
गुदगुदाएं ।

5.
सुबह संझा
धूप छांव की रेकी
धरा ने देखी ।

6.
मृत्तिका शिल्प
कुम्भकार का आंवां
आकृति रची ।

7.
पर्यावरण
खिलाफत पवन
धरा दोहन ।

8.
सुबह संझा
धूप छांव की रेकी
धरा ने देखी ।

9.
बयार गाये
पल्लव सरगम
बहार राग ।

10.
मन की माटी
महके देशांतर
भाव अंकुर ।
~ • ~

□  रंजना सिन्हा "सैराहा" 
बांदा (उ.प्र.)

~ हाइकुकार वृन्दावन वर्मा जी के हाइकु ~


हाइकुकार 

वृन्दावन वर्मा

हाइकु 


1.
फूस का घर
आग हमसफर 
टूटा कहर ।

2.
लेकर आया 
मधुर मधुमास 
नया विश्वास ।

3.
बोले दादुर 
पावस नहीं दूर 
नाचे मयूर ।

4.
जीवन पथ 
धूप-छांव का खेल 
नैय्या तू ठेल ।

5.
चाहते आम 
बोते बबूल हुए 
कांटे तमाम ।

6.
 पूस की रात 
चिपका नवजात 
माँ कृष गात । 

7.
मन है हर्षा 
महक उठी माटी 
आ गई वर्षा ।

8.
दिग दिगंत 
सुगंध ही सुगंध 
लाया वसंत ।
~ • ~

□  वृन्दावन वर्मा 
जलालपुर घई, जनपद - रायबरेली
(उत्तर प्रदेश)

हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

डॉ. सुरंगमा यादव 


हाइकु 

1.
जो हैं उन्मन
विश्वास से भर दें
उनका मन

2.
अपनी छोड़ो
औरों के हित बढ़ो
पग दो पग

3.
तम की इच्छा 
एक दीप जला दो
राह दिखा दो

4.
तम में दीप
काली चादर पर
तरल सोना

5.
पीर पराई 
समझी गहराई
खुद पे आयी ।
~ • ~

□  डॉ. सुरंगमा यादव

~हाइकुकार डॉ. रामनारायण पटेल जी के हाइकु~


हाइकुकार 

डॉ. रामनारायण पटेल 


हाइकु 


1
पत्ते झरते 
गुनता है किसको
खिले तो झरे ।

2.
मनु की चिंता 
हिमगिरि अटकी
दरार पड़ी ।

3.
उड़ी चिड़िया 
नीड़ बनाऊँ नया
ठूँठ ही मिले ।

4.
सिंदूरी संध्या 
पंछी चहके नीड़ 
शोर में भोर ।

5.
सावन आया 
दादुर ठोंके ताल
झिंगुर गाए ।

6.
हठी बसंत 
घर आए बताऊँ 
गेंदा, गुलाब ।

7.
स्वारथ आरी
मित्रता बड़ी प्यारी 
गले में छूरी ।
~ • ~

□ डॉ. रामनारायण पटेल 

ठाकुरदिया, जिला - रायगढ़

(छत्तीसगढ़)

~ हाइकुकार राम निवास "पंथी" जी के हाइकु ~


हाइकुकार 

राम निवास "पंथी"


हाइकु 


1.
जाप करते
सरसराते पत्ते 
अलस्सुबह ।

2.
शिल्प रचती 
इल्म का समंदर
बया भरती ।

3.
काल सापेक्ष 
क्षणों की रिद्म में 
बहती नदी ।

4.
झिलमिलाता 
सघन गुल्मों में  
अटका चाँद ।

5.
पथ भागते
खामोश है शहर 
बिम्ब बाँचते ।

6.
अपने कंधों 
उम्र भर ढोना है
प्रीति पत्थर ।
~ • ~

□  राम निवास "पंथी"

उधनपुर, रायबरेली (उ.प्र.)

शनिवार, 7 सितंबर 2019

सुप्रसिद्ध हाइकु कवयित्री डॉ. मिथिलेश दीक्षित जी के प्रतिनिधि हाइकु


हाइकु कवयित्री 

डॉ. मिथिलेश दीक्षित 


हाइकु 


01.
चित्र उभरा
चित्त में उतरी जो
गहरी याद ! 

02.
जैसे बसती
सुरभि सुमन में
स्मृति मन में ! 

03.
बिना ममता
घर भी घर जैसा
कहाँ लगता ! 

04.
ठहर गयी
बरगद की छांव
मन के गांव ! 

05.
अश्रु नहीं ये
बूढे नयनों की हैं
धुंधली यादें ! 

06.
देखा सुमन 
छा गया मधुमास
मन के वन ! 

07.
खिल गया है
फूल कोई बाग में
रंग मैं उठी ! 

08.
कोहरा छाया
हवाओं को देख लो
पसीना आया ! 

09.
ली है शपथ
रुक नहीं सकता
हमारा पथ ! 

10.
प्रभु के लिए
जीवन भर जले
पूजा के दिये ! 
~ • ~

□  डॉ. मिथिलेश दीक्षित

हाइकुकार निमाई प्रधान "क्षितिज" जी के हाइकु


हाइकुकार 

निमाई प्रधान "क्षितिज"


हाइकु


[१]
मेरा एकांत 
सहचर-सर्जक 
उर्वर प्रांत !

[२]
दूर दिनांत
तरु-तल पसरा 
मृदु एकांत !

[३]
वो एकांतघ्न 
वातायन-भ्रमर 
न रहे शांत !

[४]
दिव्य-उजास
शतदल कमल 
एकांतवास !

[५]
एकांत सखा
जागृत कुंडलिनी 
प्रसृत विभा !
~ ● ~

□  निमाई प्रधान "क्षितिज"

रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

~हाइकुकार शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी के हाइकु~


हाइकुकार

शेख़ शहज़ाद उस्मानी


हाइकु 


1.
जड़ें ज़मीं में
शेष वृक्ष स्वतंत्र
पाते बसंत ।

2.
संस्कृति-वृक्ष
जड़ें ज़मीं में जमीं
कटें ! न मिटें !

3.
जड़ों की चीखें
विरासतें बचाने
कटते पेड़ ।

4.
धन नर्तक
स्वतंत्रता बहकी
तन घुंघरू ।

5.
पता, लापता
घोटालों के रहस्य
प्रकृति-चक्र ।
~ • ~

□  शेख़ शहज़ाद उस्मानी

शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

डॉ. सुरंगमा यादव 


हाइकु 


भूल तपन
छाँव बन सघन
ओ मेरे मन !

विदा की बेला
नयनों में उमड़ा
मेघों का मेला ।

यादों का साया
तपते जीवन को
देता है छाया ।

बड़े चंचल
ठहरते ही नहीं
सुख के पल ।

सुनाते नैन
हृदय का क्रन्दन
अधर मौन ।
~ • ~

□  डॉ. सुरंगमा यादव

~ हाइकुकार डॉ. सुशील शर्मा जी के हाइकु ~

हाइकुकार

डॉ. सुशील शर्मा 

हाइकु 


फूस मड़ैया
मकई के खेत मे
हारिल पक्षी ।

सुर्ख गुलाब
मुन्नी की चोटियों में
तिरंगे फीते ।

सेव के बाग
अंगीठी में सिकते
मकई भुट्टे ।

दादा की दाढ़ी
खेत की मेढ़ पर
फूला है कांस ।

वृक्ष वल्लरी
पिता के कंधे पर
लटकी बेटी ।

□ डॉ. सुशील शर्मा

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

हाइकु कवयित्री डॉ. सुरंगमा यादव जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

डॉ. सुरंगमा यादव 

हाइकु 


1.
प्रेम के किस्से 
दर्द की जागीर है 
हमारे हिस्से ।

2.
पीड़ा के गीत
बन गये अब तो
साँसों के मीत ।

3.
प्रेम की कमी 
मन की धरा पर
दरारें पड़ी ।

4.
जन्मों का साथ 
तभी तुम लगते 
मुझको खास ।

5.
बुझा है मन
उजाले देने लगे
अब चुभन ।

6.
मन निहार
खुशियों का विस्तार 
है आसपास ।

7.
मन पुकार 
पहुँचेगी निश्चय 
क्षितिज पार ।

8.
आँसू ने धोया
नयनों का भवन 
आओ सजन ।
~ • ~

□  डाॅ. सुरंगमा यादव

~ हाइकुकार डॉ. सुशील शर्मा जी के हाइकु ~

हाइकुकार

डॉ. सुशील शर्मा 


हाइकु 


01.
पीपल वट
दादी माँ की अस्थियां
घड़े में बंद ।

02.
वट का वृक्ष
सुहागनों का सूत
रंग बिरंगा ।

03.
नीड़ में चूजा
दरवाजे पर मुन्नी
उदास बैठी ।

04.
विल्व का पेड़
कोटर में उलूक
घूरती आँखें ।

05.
तुलसी कोट
आटें भरी शक्कर
ढोती चीटियाँ ।
~ • ~

डॉ. सुशील शर्मा

हाइकु कवयित्री मंजू सरावगी "मंजरी" जी के हाइकु

हाइकु कवयित्री 

मंजू सरावगी "मंजरी"


हाइकु 


1.
खिले कमल
निर्मल सरोवर
तृप्त नयन ।

2.
लाल कमल
लक्ष्मीजी का आसन
पाक दामन ।

3.
मोती दमके
कमल फूल पर
भोर किरण ।

4.
जल जीवन
स्वतंत्र विचरण
सुंदर तन ।

5.
जल सम्मान
सरोवर की शान
पुष्प कमल ।
~ • ~

□  मंजू सरावगी "मंजरी"
रायपुर (छतीसगढ़)

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

~~ • ~~ शिक्षक दिवस पर हाइकु ~~ • ~~


हाइकुकार 

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु 

1.
गुरु कुम्हार 
रौंद मिट्टी का लौंदा 
लाये निखार ।

2.
नादान शिष्य
ठोंक-पीट शिक्षक  
निखारे घट ।

3.
गुरु का ज्ञान 
अंधकूप से मुक्ति 
शंका निदान ।

4.
गुरु आशीष 
निराकार ईश्वर
मिले सान्निध्य ।

5.
गुरु महान
शिष्य को करा गये
ईश्वर भान ।

6.
गुरु महान 
जीवन को दिशा दें 
ज्ञान निधान ।

7.
गुरुता गूढ़ 
अज्ञान का अँधेरा
पल में दूर ।
~ • ~

□  प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

बुधवार, 4 सितंबर 2019

हाइकु कवयित्री मनोरमा जैन "पाखी" जी के हाइकु


हाइकु कवयित्री 

मनोरमा जैन "पाखी"


हाइकु 


1.
सर्द सी रात
रजाई में दुबके
काँपते गात ।

2.
मन मंदिर 
सुबह को पूजन
शाम आरती ।

3.
उठा कोहरा
नदी की गहराई
बादल सम ।

4.
बरसे नीर 
धरा बनी दर्पण
नभ की छाया ।

5.
छायो बसंत 
दहके पलाश भी 
अंगार सम ।
~ • ~

□  मनोरमा जैन "पाखी"

हाइकुकार आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा जी के हाइकु


हाइकुकार

आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा "निशिहर"


हाइकु 

1.
लापरवाह
सफलता-सीढ़ियां
चढ़ न पाता ।

2.
कानूनी फंदा
कसने पर बंदा
फड़फड़ाता ।

3.
जल-तरंग
मुदित उछलती
अनिल-संग ।

4.
तुम तो जाते
पर वे नहीं आते
तुम्हारे घर ।

5.
चाँद-चाँदनी
साथ नहीं छोड़ते
जीवन साथी ।
~ • ~

□  आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा "निशिहर"

~ हाइकुकार डॉ. सुशील शर्मा जी के हाइकु ~

हाइकुकार

डॉ. सुशील शर्मा 

हाइकु 


1.
शिमला मिर्च 
बेला पर चलती
हरित इल्ली ।

2.
रुई के खेत
धुनकी धुनकता
बैठा जुलाहा ।

3.
हिना के पात
दुल्हन के हाथों में
बिखरे रंग ।

4.
कश्ती में छिद्र
भंवर में समाता
नदी का पानी ।

5.
मयूर नृत्य
आदिवासी बालाएं
पर्व मनाएं ।

6.
मृग कस्तूरी
बारिश फुहार में
माटी की गंध ।

7.
ओस की बूँदें
कोहरे में लिपटी
दूब फुनगी ।
~ • ~

□  डॉ. सुशील शर्मा

~ हाइकु कवयित्री अलका पाण्डेय जी के हाइकु ~

हाइकु कवयित्री  

अलका पाण्डेय 

हाइकु 

1.
मिट्टी का तन 
मत कर गुमान 
ढह जायेगा ।

2.
मिट्टी का घर 
गिनती की है सांसें 
तेरा न मेरा ।

3.
धूप ही धूप 
चढ़ गया पहाड़  
मिली मंजिल ।

4.
आस्था का दीप 
मानवता के द्वार
रोशन करे ।

5.
मिट्टी का तन 
अभिलाषा अनेक 
अंत  निश्चित ।
~ • ~

□  अलका पाण्डेय

~ हाइकुकार मनीष त्यागी जी के हाइकु ~


हाइकुकार

मनीष त्यागी

हाइकु 


1.
उजड़े खेत
नम कृषक नयन
जल ना हल ।

2.
बिखरी खेती
कूदी आँख से बूंदें 
जल ही जल ।

3.
निकला युवा
मन सपने भरा
छूटता गाँव ।

4.
बीतते साल
खोखली सी जिंदगी
सपने खर्च ।

5.
गाँव की याद
जिंदगी थी आबाद
बरसों बाद ।
~ • ~

□  मनीष त्यागी

सोमवार, 2 सितंबर 2019

~ हाइकुकार डॉ. राजेन्द्र वर्मा जी के हाइकु ~


हाइकुकार 

डाॅ. राजेन्द्र वर्मा 

हाइकु 


धुनी कपास
लिहाफ़ पे सुस्ताते 
मेघ के छौने ।

सावन लगा
वसुन्धरा को मिली
हरी चादर ।

बादल घिरे 
खोल रहा मयूर
अपने पंख ।

अंकुर फूटा
धूप लायी कलेवा
दुलारे हवा । 

गेहूँ के बीच
मटर की छीमियाँ 
झूलतीं झूला ।

शीत की भोर
चीड़ पहने खड़ा 
बर्फ़ का कोट ।

डूबता सूर्य
अलसाया  बालक
माँ की गोद में ।

सीप निराश
बूँद चल पड़ी है 
मरु की ओर ।

चन्द्रमा टेढ़ा
नज़र नहीं आती 
तारों की टोली !

पौ फट रही
सुर पाखी ने छेड़ी
राग भैरवी ।
~ • ~

□  डॉ. राजेन्द्र वर्मा

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