हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका)

卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ हाइकु मञ्जूषा (समसामयिक हाइकु संचयनिका) संचालक : प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐 ~•~ 卐

शनिवार, 3 अगस्त 2019

हाइकु : मधु सिंघी


हाइकु कवयित्री 

मधु सिंघी

हाइकु 


शब्द विराम
मौन क्षमतावान
हो जाते काम ।

काल है गति
चलना संयमित
सही हो मति ।

सुख के लम्हे
आते सबके साथ 
बिना दस्तक ।

सुस्ताई हुई
पत्तों की आगोश में
ओस की बूँदें ।
    
आपदा झेल
काँटों के संग खेल
जैसे गुलाब  ।
  
अनवरत
अहंकार जागृत
करे भ्रमित ।

कड़वा सच
उतरे नहीं गले
रिश्ता ना चले ।

रवि कमाल
घर-घर जाकर
पूछता हाल ।
  
ताल दे मेघ
बिजली करे नृत्य
सावनी-गीत ।

हों नेक कर्म
बचे मानव धर्म
जीवन मर्म ।

□ मधु सिंघी 

नागपुर (महाराष्ट्र)

हाइकु : हेमलता मिश्र


हाइकु कवयित्री 

हेमलता मिश्र "मानवी"

हाइकु 


सावन बूँद
आंचल थाम धरा
होती गर्वीली ।

दीवारें रोतीं
छतें भी बिलखतीं
देहरी भीगीं ।

कोठी खिली सी
झोपडी थर्रा रही
मकान दुखी ।

सड़कें सूनी
दीन बने गठरी
सिर्फ़ कटोरी ।

जलप्लावन
हर ओर गमन
डराता मन ।

□ हेमलता मिश्र "मानवी"

हाइकु : निर्मला सुरेन्द्रन

हाइकु कवयित्री 

निर्मला सुरेन्द्रन

हाइकु 

ईश्वर मिले
जब एकांत में हो 
एक गुहार ।

निश्छलता है
मन की खुशबू का
एक प्रारुप ।

अनुबंधिता
सुगंधित रिश्ते की
अबोध कड़ी ।

धीरे से खोलो
अपने शब्दकोश 
मौन सो रहा ।

दीप सा मन
प्रदीप्त ये प्रांगण
सांध्य कथन ।

भौरों ने रची
एक सुंदर गीत
पूर्ण संगीत ।

सूख ना जाये
भीगे नयन जरा
बाँच लो तुम ।

नटखट है
गगन का चंद्रमा 
बच्चों का मामा ।

□ निर्मला सुरेन्द्रन

हाइकु : सुशील शर्मा

हाइकुकार

सुशील शर्मा 

हाइकु 

चढ़ता पारा 
अंतस अँधियारा 
ठंडा सूरज।

प्यासा मटका 
तपती दोपहर 
रिश्ता चटका।

खाली है पेट 
मुरझा कर भूख
कुदाल थामें। 

श्रम का स्वेद 
रक्त शोषित भेद 
रोटी में छेद। 

सूरज चूल्हा 
दिखती है चाँद सी 
दो जून रोटी।

उदित सूर्य
संजीवनी जिंदगी
नवल ऊर्जा।

ऊगता चाँद
अंधेरे से विस्मित
रात गुजारे।

पूर्णिमा चाँद
भागता अंधियारा
मुस्काई रात।

चाँद कटोरा
दूध भरी चांदनी
मुन्नी निहारे।

□  सुशील शर्मा

हाइकु : डॉ. अखिलेश शर्मा

हाइकुकार

डॉ.अखिलेश शर्मा

हाइकु 

बूँदों का हास
बादल की ठिठौली
पावस ऋतु ।

प्रकृति प्रेम
मानव का प्रयास
वृक्षारोपण ।

मेघाच्छादित
गहन प्रदर्शित
नभ अदृश्य ।

बूँद नर्तन
हरित दूब पर
छनन छन ।

प्रीति प्रवेश
पवन राग पर
नेह अशेष ।

सूखी नदिया
गतिशील हो चली
फिर से भैया ।

नयन आस 
फलीभूत हुई है
कृषक खुश ।

ताल तलैया
फिर नाव चलेगी
हैया रे हैया ।

कमल खिले
सूखे पोखर बीच
भ्रमर डोले ।

तेज गर्जना
तड़कती दामिनी
डरी यामिनी ।

296, कालानी नगर,एयरपोर्ट रोड़,

इन्दौर 452005

हाइकु : रामेश्वर बंग

हाइकुकार

रामेश्वर बंग

हाइकु 

लगा ग्रहण
उम्मीदों ने निखारा 
चमका चाँद ।

शूल के पथ
कर्म करता चल
होगा सफल ।

निभा कर्तव्य
चमके भाग्य रेखा
स्वर्णिम कल ।

रख उर में
मधु मधुर रस
महके रिश्ते ।

शहरी फ्लैट
बिखरे परिवार
टूटते रिश्ते ।

बासंती सोच
महकाती जीवन
लाती बहार ।

मन चमन
महकता पराग
शब्द सुमन ।

देते हैं दिशा
जीवन पथ पर
हमारे पिता ।

टूटते स्वप्न
उदास मन झरे
नयन नीर ।

गुरु का ज्ञान
जीवन पथ पर
देता प्रकाश ।

झरते पत्ते
दे जाते नव आशा
सृष्टि का सार ।

प्रेम सुमन
उदास जीवन में
लाए बसंत ।

मन बसंत
खिला स्नेह की कली
महके रिश्ते ।

मिट्टी की काया
कर जीवन कर्म
छोड़ अहम ।

वक्त की आंधी
टूटे शाख से पत्ते
ढूंढते ठौर ।

सुंदर फूल
जीवन की बगिया
झरे खुशबू ।

मन की धरा
पानी बदले रंग
वक्त के संग ।

कण्टक पथ
राही चला अकेला 
खिलाने फूल ।

काँटो के पथ
खिले कर्म के फूल
झरे खुशबू ।

भाव अलाव
बदलता जीवन
नव विचार ।

मन के नभ 
अंतर्मन के शून्य
दिव्य आलोक ।

छोटा सा सच
पल भर में काटे
झूठ के पर ।

नहाती रोज
उल्फत की फसलें
बहता लहू ।

टूटते रिश्ते
अस्तित्व को ढूँढता
बुजुर्ग पेड़ ।

मन सागर
सीप सी थाह सोच
देती है मोती ।

मन सरिता
बहे निर्मल धार
शुद्ध विचार ।

श्वेत बादल
नभ में भरे रंग
हवा के संग ।

पीला है पर्ण 
रंगहीन जीवन
ढूँढता ठौर ।

मन का मौन
बदलता जीवन
देता है पथ ।

रिश्तों की कली
स्नेह प्यार से खिले
फूल महके ।

है सतरंगी
कहे दिल की बात
मन गुलाब ।

वर्ष नूतन
सूर्य रश्मियों संग
भर दे रंग ।

झरते पत्ते
चली वक्त की आँधी
ख्वाब टूटते ।

खुशी के फूल
महकाये जीवन
निखारे मन ।

हुई उदास
पेड़ की झुकी डाली
देख कुदाली ।

रक्षा कवच 
ममता का आँचल 
देता ममत्व ।

मन के शून्य
ईश्वर का स्वरूप
गहरा मौन ।

स्नेह की गंध
महकाते जीवन
खुशी के फूल ।

पढ़ तू मन
स्वयं दीपक बन
जग रोशन ।

स्वयं निखर
सूरज सा बिखर
फैले प्रकाश ।

दिव्य उजास
जग करे रोशन
मन दीपक ।

श्रेष्ठ मित्र वो,
बदल दे रंगत
दीपक बन ।

शब्द के शिल्प
व्यक्तित्व को दर्शाते
तौल के बोल ।

शब्द के फूल
महकाते चमन 
प्रेम से रंग ।

देता चुभन
जब स्वयं को खोजे 
मन दर्पण ।

वन औषधि
तन को रखे स्वस्थ
मन साधना ।

रख संवाद
छोड़ वाद विवाद
मिटे दूरियाँ ।

वक्त का दौर
शाख से झरे पात
ढूँढते ठौर ।

टूटी हैं छतें
गरीब परेशान
तेज थी आंधी ।

नदी में बाढ़
फसलें बरबाद
कृषक त्रस्त ।

पिता का गुस्सा
जिंदगी में भूकंप
देता है पथ ।

नदियाँ सूखी
धरती पे अकाल
धरा बेचैन ।

कड़वी वाणी
जीवन में सुनामी
करे विनाश ।

पथ दुर्लभ
राह में अवरोध
है भूस्खलन ।

मन का दर्द
उर का ज्वालामुखी
बरसे अग्नि  ।

कड़वा सत्य
जिंदगी में भूकंप
लाया प्रलय  ।

□ रामेश्वर बंग

हाइकु : प्रदीप कुमार दाश "दीपक"


हाइकुकार

प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

हाइकु

नवल ऊषा
खिल उठी कलियाँ
मोद नियंता ।

ठूँठ निराश
बारिश ने जगाई
कोंपल आस ।

जलती बत्ती
मोम पिघल देता
सहानुभूति ।

छाँव में ग़ुमा
धूप के सफ़र में
खुद को पाया ।

वृक्ष है चुप
हवा,पानी व धूप
सँवारें रूप ।

छांव व धूप
जीवन के दो रूप 
सुख व दुःख ।

पीली पत्तियां
पकड़ हुई ढीली
छूटी डालियां ।

ठिठके पाँव
ठहर गई धूप
छाँव के गाँव ।

रब पालक
हम सब इसके 
नन्हे-बालक ।

मन में भेद
कैसे करोगे रफू
दिल के छेद ?

पत्ते झरते
डाली छोड़ दी साथ
किसे कोसते ।

सुख सहज
दुःख के सफर का
चुकाता कर्ज ।

भीड़ दिखावा
साथ यहाँ छलावा
चल अकेला ।

मिट्टी के घर
बेहद मजबूत
रिश्ते पकड़ ।


□ प्रदीप कुमार दाश "दीपक"साँकरा

जिला - रायगढ़ (छत्तीसगढ़) 

हाइकु : सुरेन्द्र बांसल

हाइकुकार

सुरेन्द्र बांसल 


हाइकु 


अंधड़ याद
गुमसुम तितली
उजड़ा बाग़ ।

टूटे न मौन
पूछे रोज़ आईना
बता तू कौन ?

मोह के नाते
बोएं सुख सपने
दुख उगाते ।

याद है छांव
है यही विरासत
घर, न गांव ।

याद पराई
जीवन भर खोजे
नेह रजाई ।

फुस्स दलील
न्यायविद्ध बहरे
काणे वकील ।

प्रेम का पथ
दुर्गम औ  दूरस्थ
तप, न थक ।

कर्म की पूंजी
खोया भाग का खाता
लापता कुंजी ।

याद सुरंग
ये देह का पिंजरा
प्राण विहंग ।

बहता पानी
हमें याद दिलाए
जीवन फ़ानी ।

मन अशांत
जीवन अतुकान्त
खोजूं एकांत ।

जग का फेरा
रेत पे जैसे कोई
चित्र उकेरा ।

दो जून रोटी
गंवाया अस्तित्व
कटाई बोटी ।

जन्म का दिन
मिट्टी का ढेला भर
करो सृजन ।

रोता रहता
बहता मन सोता
चुप न होता ।

उड़ते पात
हैं जग के सब खेले 
ज्यों झंझावात ।

मन वीरान
कटी नेह की फसल
दु:ख लगान ।

रोटी की खोज
आत्म सम्मान जहां
मरता रोज़ ।

□  सुरेन्द्र बांसल

हाइकु कवयित्री शशि त्यागी जी के हाइकु


हाइकु कवयित्री 

शशि त्यागी 


हाइकु

--0-- 


1.
चीर अँधेरा
उदित रश्मि रथ
हुआ सवेरा ।

2.
ब्रह्मांड शून्य
मानव एक बिंदू
नेत्र पुतली ।

3.
नारी जीवन
कलकल बहती
पावन नदी ।

4.
आँख का बिंदू
हृदय में समाता
समग्र सिंधु ।

5.
नवेली बहू
घर मध्य घूमता
सुगंध झोंका ।

6.
प्रसव काल
शिशु रुदन सुन
माता मुस्काई ।

7.
पोते के हाथ
खुली हुई छतरी
दादा हैं झुके ।

8.
छीन ले गया
सपनों की गुड़िया
अल्ट्रासाउंड ।

9.
कनेर पुष्प
कानों खोल सुनते
हवा की बात ।

10.
ज्येष्ठ बिछड़ा
सावन बरसाता
आँसू की धार ।
---00---

□ शशि त्यागी

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

हाइकु : पूनम आनंद


हाइकु कवयित्री 

पूनम आनंद 


हाइकु 


रक्षाबंधन 
आशीर्वाद दोनों पा
जी गया रिश्ता ।

बंधे मन से
भेदभाव से दूर 
हो कर एक ।

रिश्तो के तार 
खून से उठकर 
अपने होते ।

प्रेम बगिया 
बिना धूप पानी के 
खिल उठती।

सावन झूमा
सजनी रूठी बैठी
पाती न आई ।

बौराए मन
कजरी नही गाए
मन उदास ।

नाचे मयुरी
सावन है संगिनी  
भीग के झूमो ।

□ पूनम आनंद

हाइकु : काशिनाथ भारंबे "निर्मोही"

हाइकुकार

काशिनाथ भारंबे "निर्मोही"

हाइकु   

   
कड़ी धूप में
खड़ा अमलतास
देता उल्लास ।

हरसिंगार 
भोर सुबह करें 
गंध फुवार ।
  
बूँदें बरसीं
मिट्टी से सौंधी गंध
महक उठी ।  
  
तेज धूप में
टेसू खिल रहे हैं
किस खुशी में ?   

तुफानी हवा
डगमगाती नाव
दूर है तट । 
   
पंख पसारे
मोर नाचता, देख
मोरनी  मुग्ध ।

□ काशिनाथ भारम्बे "निर्मोही"

हाइकु कवयित्री अंजुलिका चावला जी के हाइकु


हाइकु कवयित्री 

अंजुलिका चावला


हाइकु

--0--


सिहरे तन
करत बरजोरी
श्यामल घन ।

गगन अश्रु 
लागी तन अगन
सन्तप्त मन ।

गरज घन
गुंजित अष्ट दिशा
मृदंग धुन ।

दूल्हा गगन
बुँदियाँ जयमाल
धरा दुल्हन ।

बुझा अगन
विकल पशु पक्षी
दे प्राण दान ।

करत स्नान
हरित परिधान
लाजत धरा ।

बहत जल
वीथिन कलकल
कीच सकल ।
---00---

□ अंजुलिका चावला

हाइकु : पूनम मिश्रा "पूर्णिमा"


हाइकु कवयित्री 

पूनम मिश्रा "पूर्णिमा"


हाइकु 


खिली पांखुरी
पंकज कुंज वन
कुसुम रस ।

उदासी भूल
किरणों  की सलाई
पंछी कतार ।

  स्वर्ग के सूत्र     
     मिलाती है भूलोक        
कैसा संबंध ।

जल की छबि
स्तब्ध  हुआ है कवि
बहती धारा ।
    
          बौराए नभ           
          बादल नापे छोर            
गर्जन शोर ।
  
शिशु अरुण
घुंघराली-सी लटें
चंचल ऊषा: ।

सूने निलय
सुवर्ण सा चितेरा
कौन हो तुम ?

□ पूनम मिश्रा "पूर्णिमा"

हाइकु : नीलम शुक्ला


हाइकु कवयित्री 

नीलम शुक्ला

हाइकु 


नन्ही सी भोर
बरखा की गोद में
सुहावनी सी ।

मचल रही ।
खेलने आँगन में
झड़ियों संग ।

लाड़ लड़ायें 
विभोर हो वसुधा
चूमती शीश ।

भोर क्रीड़ाएं
जग मन हरती
मंगल बेला ।

प्रकृति मंच
बूंदों का थिरकना
सौम्य शोभना ।

झरते मेघ
मोतियन लड़ी से
मन मोहते ।

दुल्हन सजी
ओढ़ धानी चुनर
धरा निखार ।

हरी मेघो ने
विरह वेदनाएं
धरा प्रेयसी ।

दी सावन ने
यादों के झरोखों को
मिठ्ठी दस्तक ।

बूंदों ने छेड़ी
सरगम सुहानी
सावन रानी ।

झूमे है मन
सुन कजरी धुन
संग साजन ।

लगा काजल
वसुधा के आँचल
मेघ पागल ।

हँसी कोपले
पाकर आलिंगन
बूंदे प्रांगण ।

बरखा नृत्य
हरियाली सेज पे
झूमा पवन ।

अभिनंदन
हेतु आतुर भोर
रवि विभोर ।

नित नवीन
संस्कृति की जमीन
भोर सजाए ।

नई जागृति
उत्साह मधुशाला
ये भोर बाला  ।

□ नीलम शुक्ला

हाइकु : नरेंद्र श्रीवास्तव


हाइकुकार

नरेंद्र श्रीवास्तव

हाइकु 


सावन मेघ
जल कलश लिये
पावस पर्व ।
    
पावस पर्व
बूँदों की मालाओं से
धरा श्रृंगार ।
    
प्यासी धरती
बरखा की बूँदों में
घड़ा का पानी ।
      
काली घटायें
बूँदों को विदा देने
नभ पे आयीं ।
     
बरखा बूँदें
आकाश से बिछड़ीं
धरा में खोयीं । 
      
मेघ ने भेजी
सावन सगुन की
बूँदों की बिंदी ।
     
मेघ की पाती
बूँद बूँद अक्षर
धरा ने छुये ।
    
मेघ ने भेजे
वर्षा बूँद सुमन
धरा महके ।
    
पावस पर्व
मेघ समूह करें
जल तर्पण ।
     
मेघ से आया
वर्षा केसर जल
धरा ने पिया ।
      
बरखा बूँदें
शीशे के मन्दिर में
तस्वीर तेरी ।
    
बरखा बूँदें
गुनगुनाती रहीं
विरहा गीत ।
     
दिन पहाड़
थक के सोयी रात
स्वप्न देखती ।
    
रोटी की आस
पसीने की बूँदों से 
तर दिवस ।
    
महके पल
यत्र, तत्र, सर्वत्र
जीवन पुष्प ।
    
भोर से आस
साँझ से शिकायत
यही ज़िन्दगी ।
     
सूर्य किरणें
अँधेरा तलाशतीं
लौटी निराश ।
     
गाँव-शहर
ज़िन्दगी की कविता
लिखे पहर ।
    
दिन और रात
उम्र चढ़ती चले
जीवन सीढ़ी ।
     
खुशी मिली तो
आँसू झट आ गये
यादें लेकर ।
    
आँसू भरे थे
नयनों के डिब्बे में
छूते ही गिरे ।
    
उसने कहा
ज़िन्दगी रंगमंच
गलत नहीं ।
    

□ नरेंद्र श्रीवास्तव

~•~ हाइकु कवयित्री इंदिरा किसलय जी के हाइकु ~•~

हाइकु कवयित्री 

इंदिरा किसलय 

हाइकु

--0--


1.
स्वप्न पाहुन
थोड़ी प्रतीक्षा करें
नैन हैं भरे ।

2.
कितनी सगी
पंखुड़ी पर ओस
जैसे जिन्दगी ।

3.
नदी की साँसें
कुंद करे शैवाल
हाल बेहाल ।

4.
नर्म गोधूलि
झोली में बाँधकर
सूर्य ले चली ।

5.
अनोखी कृति
वर्षा की हर बूँद
है गणपति ।

6.
हैरान रात
नभ के पारिजात
शाखों पे तारे ।

7.
मय संगीत
डायरी में बंद हैं
अनाड़ी गीत ।

8.
धूप चिड़िया
डर से अधमरी
साँझ शिकारी ।

9.
अम्माँ की लोरी
पलकों पर नींद
भीगे फाहे सी ।

10.
माटी का इत्र
कलम में उड़ेला
कृति सचित्र ।
---00---

□  इंदिरा किसलय

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